मंगलवार, 24 मार्च 2015

हमारी जीभ

बत्तीस दाँतों में हमारी जीभ सुरक्षित रहती है। इसका कारण है कि दाँत कठोर होते हैं। जब निकलते हैं तो भी परेशान करते हैं और जब हमसे विदा लेते हैं तब भी कष्ट देते हैं। कितनी ही कठोर वस्तु क्यों न हो उसे ये दाँत पल भर में चूरा कर देते हैं। इसी कठोरता के कारण सुख के साथ-साथ दुख का कारण भी बनते हैं। अपने इस कठोर व्यवहार के कारण ये किसी प्रकार का समझौता नहीं कर पाते। तभी आयुपर्यन्त साथ नहीं निभाते बल्कि बीच में ही साथ छोड़कर विदा ले लेते हैं।
         ये सदा ही अकड़कर रहते हैं झुकना इनका स्वभाव नहीं। यह तो ईश्वरीय नियम है कि किसी का भी घमंड स्वीकार्य नहीं होता। महाविद्वान रावण का अहंकार हो या भगवान कृष्ण के मामा कंस हो या अपने को स्वयंभू भगवान कहने वाले हिरण्यकश्यप का अहम हो सभी नष्ट हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक अपनी गर्वोक्तियों के कारण नष्ट हो गए।
       मुँह में रहने वाली जीभ लचकदार है इसीलिए समझौता कर लेती और मृत्यु तक साथ निभाती है। यह है तो पर चमड़े की जो समय-असमय फिसल ही जाती है जिसका खामियाजा मनुष्य को कभी-कभी तो आयुपर्यन्त भुगतना पड़ता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने है महाभारत का युद्ध है। द्रौपदी यदि दुर्योधन को कठोर शब्दों से आहत न करती तो शायद उस महाविनाश से बचा जा सकता था जिसका नुकसान हमारा देश शताब्दियों बाद भी आज तक भुगत रहा है।
         इसीलिए हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते हैं- 'यह जीभ राज कराती है नहीं तो मिट्टी में मिला देती है।' मुझे यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप सभी  सुधी जन जानते हैं कि इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से।
        यह जीभ बड़ी ही चटोरी है। यह ऐसी इन्द्रिय है जिसको वश में करना आवश्यक है।
          जब तब हमें स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए ललचाती रहती है।  जहाँ चटपटा देखा इसकी लार टपकने लगती है। इसकी इस आदत के कारण बहुधा मनुष्य को मुसीबत का सामना करना पड़ता है। आप कहेंगे यह कैसे? इसके उत्तर में यही कह सकती हूँ कि हर खाद्य पदार्थ हर व्यक्ति को सूट नहीं करता। कई अपरिहार्य कारणों से हमें किन्हीं खाद्यान्नों को खाने के लिए डाक्टर मना करते हैं पर यह हमारी जीभ माने तब न। हमें ललचाती रहती है और हम उन को खाकर और अधिक बीमार व लाचार हो जाते हैं। जब रोग बढ़ता है तब पछताते हैं कि काश समय रहते गलत खानपान से परहेज करते तो स्वस्थ रहते। डाक्टरों के पास जाकर पैसा व समय बरबाद न करते।
         सादा भोजन खाने के बजाय चटपटा भोजन चटखारे ले-लेकर खाना इसका स्वभाव है। इसका चटोरापन शांत करने के लिए मनुष्य अथक प्रयास करता है। सारे पाप-पुण्य इसी के कारण करता रहता है। चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, किसी का गला काटना आदि काटने मनुष्य स्वयं को रोक नहीं पाता जिनका अंत विनाशकारी होता है।
       हमें यथासंभव दाँतों की तरह कठोर न बनकर फलदार वृक्ष की तरह झुकने की प्रवृत्ति वाला बनना चाहिए तभी अधिक समय तक सरवाइव कर सकते हैं। जीभ की तरह नरम व लचीला होना चाहिए ताकि जीवन भर साथ निभा सके परंतु उसकी तरह लालची या स्वाद का गुलाम नहीं बनना चाहिए जिससे जीवन में अनचाहे ही दुखों-परेशानियों को बुलावा(न्यौता) दे दिया जाए।

सोमवार, 23 मार्च 2015

प्रेम

प्रत्येक जीव से प्रेम का व्यवहार करना चाहिए। महत्मा बुद्ध का कथन है- 'समस्त प्राणियों से प्रेम करना ही सच्ची मनुष्यता है।' छोटी-छोटी बातों को अपने अहम के कारण तूल नहीं देनी चाहिए और न ही एक-दूसरे से नाराज होकर संबंधों को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए। भावावेश में संबंध-विच्छेद करने पर उनमें जुड़ाव कठिन हो जाता है। यदि उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास किया जाए तो मन में कसक रह जाती है। इसी विचार का रहीम जी ने बहुत सुन्दर शब्दों में विवेचन किया है-
         रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
         टूटे से फिर न जुरे, जुरे  गाँठ  परि  जाय॥
टूटकर जुड़े संबंधों में पूर्ववत् मधुरता नहीं रह जाती बल्कि अविश्वास का काँटा मन में गड़ा रहता है। अतः जहाँ तक हो सके यत्न यही करना चाहिए कि संबंधों में खटास न आए। अपने अहम को दरकिनार करके रूठे हुओं को मना लेना चाहिए इससे जीवन में पश्चाताप नहीं करना पड़ता।
        पारिवारिक व सामाजिक जीवन में प्रेम पुल का कार्य करता है। जहाँ यह पुल टूटा वहीं पारिवारिक विघटन की संभावना बढ़ जाती है। ये रिश्ते जितना हमारा संबल बनते हैं उतने ही नाजुक भी होते हैं। बड़ी सूझबूझ से इनको निभाना होता है। जरा सी लापरवाही होने पर इनमें दरार आने लगती है। रिश्तों के विषय में कहा जाता है कि वे कच्चे धागों से बंधे होते हैं। कितने सुन्दर शब्दों में इसी भाव को निम्नलिखित दोहे में रहीम जी ने समझाया है-
         रुठे  सुजन  मनाइए जो रुठें  सौ  बार।
         रहिमन फिर फिर पोइए टूटे मुक्ताहार॥
       आज रिश्तों में पारदर्शिता न होकर स्वार्थ हावी हो रहा है।भौतिक युग में धन प्रधान होता जा रहा है। नजदीकी रिश्तों को भी स्वार्थ के तराजू में तौला जाता है। जब तक स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है तब तक संबंध बने रहते हैं।
      ऐसे संबंध लंबे समय तक नहीं चलते। स्वार्थ की पूर्ति होते ही आपसी सौहार्द समाप्त हो जाता है।
      सभी रिश्ते अपने-आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। परिवार, संबंधी, मित्र और पड़ोसी सभी को हम प्रेम से अपना बना सकते हैं। और तो और शेर जैसे खूँखार जीव को भी अपने वश में कर सकते हैं। समाज के उपेक्षित वर्ग में भी यदि हम प्यार बाँट सकें तो वे भी हमारा साथ नहीं छोड़ेंगे। कबीर दास जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा है-
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई  आखर  प्रेम  के  पढ़ै  सो  पंडित  होय॥
सबके साथ समानता का व्यवहार करने से सभी नाजुक रिश्ते बने रहते हैं। किसी को भी त्यागना उचित नहीं। आश्चर्य होता है कि यह देखकर कि लोग दूसरों से दोस्ती गाँठते हैं, उनके साथ संबंध बनाते हैं पर अपने भाई-बहनों से बात करके राजी नहीं होते। उनका चेहरा तक नहीं देखना चाहते।
       ईश्वर भी हमसे प्रेम की अपेक्षा रखता है। जो संसार को पैदा करता है व उसे सभी नेमतें देता है उसे हमसे कुछ भी नहीं चाहिए। पर वह यह भी नहीं चाहता कि उसकी बनाई सृष्टि में हम नफरत फैलाएँ। प्रेम के कारण ही भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर खाए। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के राजसी भोग छोड़कर विदुर के घर शाक खाया। धन्ने जाट को प्रभु ने प्रत्यक्ष दर्शन दिए। अनन्य प्रेम होने पर मनुष्य ईश्वर का प्रिय बनता है तथा रोग-शोक से मुक्त हो जाता है। फिर जन्म-मरण के बंधनों से  मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

रविवार, 22 मार्च 2015

'द' का अर्थ

उपनिषद की कथा है कि एक बार देवता, असुर व मनुष्य प्रजापति के पास गए और उनसे उपदेश देने के लिए कहा। उन्होंने उन्हें केवल 'द' शब्द का उपदेश दिया। तीनों ने उस शब्द का अर्थ अपनी बुद्धि के अनुसार लगाया।
       देवताओं ने 'द' शब्द से संयम अर्थ लिया। असुरों ने इस 'द' शब्द से अर्थ समझा दया। मनुष्यों ने 'द' शब्द का अर्थ निकाला दान।
       एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ यह बताते हैं कि अपनी-अपनी योग्यता व बौद्धिक क्षमता के अनुसार ही अर्थ ग्रहण करता है।
        यह एक प्रतीकात्मक कथा है। दैवी, आसुरी व मानवी ये सभी शक्तियाँ हमारे अपने अंतस में विद्यमान हैं। इन शक्तियों में कभी किसी का पलड़ा भारी होता है तो कभी किसी का। जो गुण हावी होता हैं तदनुसार मनुष्य वर्ताव करता है।
       दैवी गुण जब मनुष्य में प्रधान होते हैं तब वह देवता तुल्य हो जाता है। उसे अपने कदम फूँक-फूँक कर रखने पड़ते हैं। ऐसे दैवी गुणों वाला व्यक्ति समाज का दिग्दर्शक होता है। अपनी आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ समाज के निर्माण का कार्य भी वह करता है।
       ये लोग परोपकारी व अपना सर्वस्व दूसरों के लिए न्योछावर करने वाले होते हैं। दुखियों व पीड़ितों के लिए छायादार वृक्ष के समान होते हैं जहाँ जाकर उन्हें मानसिक शांति मिलती है।
       अब प्रश्न उठता है कि देवतुल्य व्यक्ति को संयम का उपदेश क्यों? इसका सीधा-अर्थ है कि संसार में आकर्षण इतने अधिक हैं कि उसे अपने चरित्र की रक्षा करनी पड़ती है। नहीं तो वह भी समय की धारा में बहता हुआ तथाकथित सद्पुरुषों की भाँति दूसरों के धन का हरण करने वाला, धोखेबाज, भ्रष्टाचारी, कालाबाजारी करने वाला, हेराफेरी करने वाला बन जाएगा। पर ऐसा करने पर ये फिर समाज में कलंक की तरह हो जाएँगे।
        उनका देवत्व तो नहीं बच सकेगा। इसलिए अपने जीवन को संयमित बनाना ही उनके लिए आवश्यक हो जाता है। तभी उनके लिए द(दमन) उपदेश की सार्थकता होती है।
       असुर यानि आसुरी विचार हमारे मन में विद्यमान रहते हैं। वे सदा शार्टकट का सहारा लेना चाहते हैं। हड़बड़ाहट में उल्टे- सीधे कार्य करते हैं। प्रायः समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहना पसंद करते हैं। स्वेच्छाचारी उनको न अपनों का डर होता है न समाज का। वे दूसरों को कष्ट देकर आत्मतुष्टि प्राप्त करते हैं। दूसरों की आँख की किरकिरी ये लोग घर-परिवार, देश व समाज के शत्रु होते हैं। न इनकी दोस्ती अच्छी होती है न दुश्मनी। जहाँ तक हो सके इनसे किनारा करना ही श्रेयस्कर होता है। इनके लिए द(दया) का उपदेश बिल्कुल जरूरी है।
       तीसरे नंबर पर हैं मनुष्य यानि कि मानुषी प्रवृत्ति। मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं- दया, ममता, सौहार्द आदि। मानवोचित गुण होने से ही समाज में भाईचारा बना रहता है। सामाजिक, धार्मिक, घर-परिवार व देश व समाज के सभी कार्य सुचारू रूप से चलते रहें इसके लिए हर कदम पर धन की आवश्यकता होती है। तभी मनुष्यों को द(दान) करने का उपदेश दिया।
        यह सांकेतिक कथा अपने में इतनी गहराई छुपाए हुए है। हम तो इसे कथा की तरह पढ़-सुनकर आनन्द लेते हैं। परन्तु यह हमारे गहन भावों को झकझोर देती है। हमें मनन करने के लिए विवश करती है कि हम देवतुल्य बनकर अमर होना चाहते हैं अथवा असुर बनकर मुँह छिपाते रहना चाहते है या मनुष्य बनकर जीवन व्यतीत करना चाहते हैं।

शनिवार, 21 मार्च 2015

बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जैसा भी रूप हम देना चाहते हैं उन्हें उसी साँचे में ढालना पड़ता है। इसे हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जैसा माता-पिता उन्हें बनाना चाहते हैं वैसे ही वे बन जाते हैं।
        बच्चा जब इस संसार में आँख खोलता है तभी से उसकी शिक्षा आरंभ हो जाती है। उसके दूध पीने, सूसू-पाटी आदि की ट्रेनिंग शुरु होती है। ज्यों-ज्यों बड़ा होने लगता है तब बैठना-उठना, खांन-पान चलना आदि सिखाया जाता है। फिर और बड़ा होने पर स्कूली शिक्षा दी जाती है। तो इस प्रकार बच्चा आयुपर्यन्त कुछ-न-कुछ सीखता रहता है।
       बच्चे को जैसा परिवेश अपने घर-परिवार में मिलता है वैसे ही वह बनता है। इसलिए माता-पिता को सबसे पहले स्वयं पर ध्यान देना आवश्यक है। ऐसा न हो कि बच्चा वह सब सीख ले जो हम उसे नहीं सीखाना चाहते। यदि उसे बचपन में सही दिशानिर्देश मिल जाए तो वे निश्चित ही सभ्य समाज का एक अटूट हिस्सा बनता है उसकी नफरत का नहीं।
          बच्चे की सबसे पहली पाठशाला उसका घर होता है। अपने घर में जैसा देखता है उसे ही ब्रह्म वाक्य मान लेता है। घर में उसे झूठ का व्यवहार दिखाई देता है तो उसे झूठ बोलने में बुरा नहीं लगता। इसी तरह जब घर में सबको एक-दूसरे से छिपाव-दुराव करते देखता है तो अपनी गलतियाँ छुपाने लगता है। घर में पीठ पीछे एक-दूसरे की बुराई सुनकर अपना उल्लू सीधा करना सीख जाता है।
       कई बार माता-पिता अत्यधिक लाड़-प्यार में बच्चों को बचपन में बिगाड़ देते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होकर स्वच्छन्द हो जाते हैं और कुमार्गगामी हो जाते हैं। ये बच्चे घर-परिवार के लिए सिरदर्द बन जाते हैं और समाज के लिए अभिशाप।तब माता-पिता उन्हें दुत्कारते हैं व अपने भाग्य को कोसते हैं। तब तक पानी सिर से निकल जाता है।
        ऐसे बच्चे जो बच्चे किसी कारण से बचपन में बिगड़ जाते हैं वे माता-पिता की पहुँच से बहुत दूर निकल जाते हैं। तब उन्हें वापिस लौटाना नामुमकिन तो नहीं पर कठिन अवश्य हो जाता है।
        सोशल मीडिया, समाचार पत्र व टीवी ऐसे बच्चों के कुकर्मों को उजागर करते रहते हैं जिनके माता-पिता उच्च पदों पर आसीन हैं अथवा बड़े-बड़े व्यापारी हैं या संभ्रांत कुल के होते हैं। ये वही बच्चे होते हैं जिन्हें अतिमोह के कारण अनावश्यक लाड़-प्यार में माता-पिता बचपन में ही बिगाड़ देते हैं। उनकी जायज व नाजायज माँगों को न कहने के बजाय बिना परिणाम सोचे पूरा करते हैं। यही बच्चे बड़े होकर देश व समाज विरोधी गतिविधियों में कब लिप्त हो जाते हैं उन मासूम बच्चों को पता ही नहीं चलता और वे समाज के अपराधी बन जाते हैं।
         वास्तव में हमें अपने गिरेबान में झाँकने की आवश्यकता है। छोटा बच्चा अपने आसपास के माहौल को बड़ी बारीकी से देखता है। उससे बहुत कुछ सीखता है।
        यह बात हम सबको अवश्य याद रखनी चाहिए कि इस संसार में बच्चा जब जन्म लेता है तब वह मासूम होता है। इस दुनिया के छल प्रपंचो से अनजान होता है। तभी बच्चों को भन सच्चा कहते हैं। उन्हें छल-कपट के संस्कार हमीं देते हैं।
        उन भोले-भाले बच्चों पर हम अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का अनावश्यक दबाव न डाले तभी उनका चहुँमुखी विकास हो सकता है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

बोया पेड़ बबूल का

         'बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाए।' 
यह उक्ति हमें समझा रही है कि बबूल के पेड़ से हम कदापि आम का स्वादिष्ट व रसीला फल नहीं खा सकते। उसके लिए आम का बीज बोकर ही हमें आम का पेड़ लगाना पड़ेगा। बबूल के पेड़ से काँटे ही मिलेंगे मीठे फल नहीं।
        आम का पेड़ देर से फल देता है। वह मीठे फल व शीतल छाया पेड़ लगाने वाले को देता है बल्कि सभी को देता है जो उसके संपर्क में आते हैं। इसी प्रकार सद् विचारों वाले लोगों के संपर्क में आने वालों को भी उनकी अच्छाई का फल मिलता है। बबूल की तरह कष्टदायी जनों के संपर्क में आने वालों को कांटे ही मिलते हैं।
       इस संसार में मनुष्य जैसा करता है या जैसा बोता है वैसा ही फल उसे मिलता है। उसी प्रकार जीवन में हम अच्छे कर्म करेंगे तभी सुख, शांति व समृद्धि मिलेगी। यदि हम सद् कर्म नहीं करेंगे तो निश्चित ही दुखों व कष्टों का सामना करना ही पड़ेगा। इसीलिए यह उक्ति कही जाती है-
               'जैसी करनी वैसी भरनी'
इसका सीधा-सा अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करेगा वैसा ही उसे बदले में मिलेगा। अथवा जैसा कर्म करता है वैसा ही फल भोगता है।
         हमें वही मिलता है जो जीवन में हम दूसरों के साथ बाँटते हैं। दूसरों के साथ विष साझा करेंगे तो हम अमृत पाएँगे ऐसी कल्पना करना ही व्यर्थ है। हमें अमृत तभी मिलेगा जब हम दूसरों को अमृत पिलाएँगे। हम भगवान शिव नहीं हैं जो विषपान करके भी सबको अमृत देंगे। संसार में हम अपने लिए सभी से मधुर व्यवहार की अपेक्षा करते हैं पर स्वयं इसके विपरीत आचरण करते हैं। तब ऐसा सोचना कि हमारे साथ सब अच्छा होगा सर्वथा अनुचित है। लेने और देने के बाट एक जैसे होने चाहिएँ तभी परस्पर सौहार्द बना रहता है अन्यथा उलाहने ही शेष रह जाते हैं। सबके साथ समभाव रखकर चलने से ही व्यवहार में संतुलन बना रहता है।
       हम अगर चारों ओर खुशियाँ बाँटेंगे तो ईश्वर की कृपा से हमारी झोली में भी खुशियाँ ही आएँगीं। इसके विपरीत यदि हम स्वार्थ, नफरत या ईष्या-द्वेष की खेती करेंगे तो यही फसल काटेंगे। हमें भी दूसरों से स्वार्थ व नफरत का व्यवहार ही मिलेगा।
        उस समय हमारे साथी दूसरों के प्रति किए गए दुर्व्यवहार बनते हैं दया, ममता, सौहार्द और प्रेम आदि सद् व्यवहार नहीं। तब हम सिर धुनकर पछताते हैं। उस समय हमें ऐसा लगता है कि यह सारा जमाना हमारा दुश्मन हो गया है। कोई भी हमें नहीं चाहता, यह सब सोचते हुए हम धीरे-धीरे अवसाद का शिकार होने लगते हैं।फिर  शुरू होते हैं डाक्टरों के चक्कर, समय और पैसे की बरबादी के साथ-साथ स्वास्थ्य की हानि भी होती है। यह स्थिति स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।
        ऐसे समय हम पानी पी-पीकर सभी को कोसते हैं। सबका खून सफेद होने का रोना रोते हैं परन्तु अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास ही नहीं करते कि हम दूसरों के साथ अपना व्यवहार कैसे रखते  हैं?
          हमारी परिकल्पना किस तरह के समाज, परिवार अथवा देश का निर्माण करने की है? यह हम पर निर्भर करता है। जैसा भी हम चाहते हैं उसके लिए यत्न भी तो हमीं को ही करना पड़ेगा। यदि हम चारों ओर सुख, शांति, समृद्धि व सौहार्द का साम्राज्य बनाना चाहते हैं तो इन्हीं भावों को सबके साथ बाँटना होगा। इस दिशा में हमारा आगे कदम बढ़ाना तभी सार्थक हो सकेगा।

गुरुवार, 19 मार्च 2015

संतोष

दूसरे की थाली में रखा हुआ लड्डू हमेशा हमें बड़ा दिखाई देता है। यह उक्ति हम सब सुनते और कहते रहते हैं। हमने कभी इस पर विचार ही नहीं किया कि अपनी थाली में रखा हुआ लड्डू हमें छोटा क्यों दिखाई देता है?
        जहाँ तक मुझे समझ आता है इसका अर्थ यह है कि मनुष्य ऐसा प्राणी है जो कभी संतुष्ट नहीं होता। उसे अपना धन-दौलत, ऐशो-आराम, गाड़ी, नौकर-चाकर आदि सब कम लगते हैं। दूसरों की हर वस्तु उसे अपनी वस्तुओं से अधिक लगती हैं। कभी-कभी तो हद हो जाती है जब वह किसी पड़ोसी, मित्र या संबंधी की कोई नई खरीददारी देखकर उसकी होड़ में बिना समय गंवाए उसे तुरंत खरीदने के लिए लालायित हो जाता है।
          उसे पाने के लिए वह चोरी-डकैती, लूटमार, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, दूसरे का गला काटना, कालाबाजारी, टैक्सचोरी जैसे अपराध करने से बाद नहीं आता। जिन सभी अपराधों को वह बुरा मानता है उसी डगर पर चल पड़ता है।
        इस तरह दूसरों की होड़ करते हुए वह और-और पाने की चाह करता रहता है जो कभी समाप्त नहीं होती। एक वस्तु को जब वह किसी के पास देख लेता है तो उसके पीछे दिन-रात भागता है। उसे पाने के लिए हर संभव यत्न करता है और हासिल कर लेता है तो फिर दूसरी को पाने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस तरह एक के बाद एक लालच मनुष्य को घेरता रहता है। यह लालच उसे अपने जाल में ऐसा फंसाता है कि मनुष्य जितना उससे बाहर निकलने का  प्रयत्न करता है उतना ही उसमें और अधिक उलझता जाता है।
        इस उलझन को सुलझाने के लिए कहीं तो सीमारेखा खींचनी पड़ती है। प्रश्न  यह उठता है कि वह सीमा कौन निर्धारित करेगा? इस सीमा को हमें स्वयं ही तय करना है। आखिर हमें कभी तो इस भटकन से छुटकारा पाना ही होगा नहीं तो सारा जीवन अशांत ही रहना पड़ेगा।
         यदि उसके मन में संतुष्टि का भाव आ जाए तो वह भटकन से बच सकता है। संतोष ऐसा धन है जो किसी को मिल जाए तो उसे कोई लालच नहीं घेरता। मनुष्य दुनिया का सबसे धनी व्यक्ति बन जाता है। यह दोहा देखिए-
गोधन गजधन बाजिधन और रत्नधन खान।
जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान॥
संतोष रूपी धन के सामने दुनिया के सभी ऐश्वर्य मनुष्य के लिए धूल के समान हो जाते हैं। फिर उसे किसी दूसरे की थाली की ओर ललचाई नजरों से देखने तक की आवश्यकता नहीं रह जाती।
        मनुष्य मे यह संतोष भाव कब आएगा यह कहा नहीं जा सकता। आने को तो सौ रुपए में आ जाए और न आए तो करोड़ रुपयों में भी न आए। मनुष्य जब इस संतोष की भावना को आत्मसात कर लेगा तभी संतुष्ट हो पाएगा। आयु की भी कोई सीमा नहीं। कुछ ऐसे लोग होते हैं जो सारा जीवन किसी न किसी कारण से असंतुष्ट रहते हैं।
       इस असार संसार में मनुष्य को उतना ही मिलता है जितना भाग्य में होता है। उससे अधिक और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता। ईश्वर बहुत ही न्यायकारी है। हर किसी को उसके हिस्से का अंश बिना कहे व बिना मांगे यथासमय वह दे देता है। उसके घर इस संसार की तरह अंधेर नहीं है।
         उस प्रभु के प्रति पूर्णरूपेण समर्पण भाव रखने से मन में संतोष की भावना आती है।

बुधवार, 18 मार्च 2015

माँ की गोद

माँ की गोद ऐसा स्थान है जहाँ हर बच्चा स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित समझता है। उसे वहाँ हर प्रकार का सुकून मिलता है। वह कितने भी कष्ट में क्यों न हो बस माँ की गोद मिल गई तो मानो उसे स्वर्ग मिल गया। फिर उससे बढ़कर उसे और कुछ भी नहीं चाहिए।
        बच्चा थका हारा  जब घर में घुसता है तो वह माँ की तलाश करता है। वह न दिखे तो रोने-चिल्लाने लगता है।उस समय उसे ऐसा लगता है कि मानो उसका सब कुछ खो गया है। इसी प्रकार जब आस-पड़ोस, मुहल्ले या विद्यालय में कहीं लड़ाई करके या पिटकर आता है तो माँ की गोद में सिर रखकर सुबककर अपनी बेचारगी पर रोना चाहता है। वह जानता है कि उसकी पीड़ा को उसके बिना बताए ही माँ खुद समझ जाएगी, उसका मजाक नहीं उड़ाएगी बल्कि उसे सांत्वना देगी और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरेगी।
       वह अपनी माँ को भली-भाँति जानता है। उसे पता है कि घर-परिवार में जब बड़े बच्चों से प्रताड़ित किया जाएगा तब माँ उनका लिहाज नहीं करेगी बल्कि उन्हें डांट-फटकार लगाकर उसका पक्ष लेगी। इसी प्रकार पिता या घर के किसी अन्य बड़े व्यक्ति से डांट-मार खाकर माँ की गोद में सुख व चैन पाता है।
         बच्चे की पूरी दुनिया उसकी माँ होती है। उसका संसार माँ की गोद में ही समाप्त होती है। उसके बड़े होने पर जब उसकी प्राथमिकताएँ बदलने लगती हैं तब भी माँ के बिना वह अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। उसका रुठना-मानना व जिद्द करना उसकी माँ के दम पर ही होता है। जो बच्चे अपनी जरूरतों के बारे में अपने पापा से नहीं कह सकते वे माँ से ही उन्हें पूरी करवाते हैं।
        आज इस भौतिक युग की आपाधापी के इस जीवन में कुछ बच्चे माता-पिता के साथ रहते हैं परन्तु कुछ अन्य बच्चों को आजीविका की मजबूरी में घर से दूर देश-परदेश में रहना पड़ता है।
     वे सभी रिश्तों को भूल सकते हैं पर माँ की ममता और उसके निस्वार्थ प्रेम को कदापि नहीं। मृत्यु पर्यन्त मनुष्य अपनी माँ को याद करता रहता है। माँ के इस संसार से विदा हो जाने पर भी प्रतिदिन कितनी ही बार अपनी माँ को 'हाय माँ' कहकर याद करता है।
        यह सांसारिक माँ पर हम इतना प्यार व दुलार लुटाती है और बिन माँगे अपने बच्चों की सारी आवश्यकताएँ पूरी करती है। हम उस माँ को कैसे भूल जाते हैं जिसने हमें इस संसार में पैदा किया है। हमें उस मालिक विषय में सोचने की फुर्सत भी नहीं मिलती।
        उस प्रभु की गोद में विश्राम करने का विचार हमारे मन में भी नहीं आता। हमारी वह जगत् जननी माँ सदा ही इस प्रतीक्षा में  रहती है कि कब उसके बच्चे बाँहे पसारे हुए उसके पास आएँगे और उसकी गोद में सुख व चैन पाएँगे। हम इतने अहसान फरामोश बच्चे हैं जो उसकी सुध बिसरा बैठते हैं।                     
             इस संसार में आँखें खोलने के बाद हम धीरे-धीरे इसी दुनिया के होकर रह जाते हैं। उस माँ से दूरी बना लेते हैं और भौतिक रिश्ते-नातों में मस्त हो जाते हैं। स्वार्थों के कारण उसे अपने से दूर कर देते हैं। जब हम उस माँ का दिल दुखाते हैं, तो फिर हम सुखी नहीं हो सकते, कष्ट तो हमारे पास आना ही है।
        इस जीवन में स्वयं को कष्टों से बचाने और अपने लिए सुख-शांति की तलाश करने के लिए तो उस प्रभु की, उस जगत् जननी माँ की महान गोद की शरण लेनी चाहिए। वह खुले दिल से हमारी प्रतीक्षा में बाट जोहती है।