बुधवार, 31 दिसंबर 2025

स्वागत नववर्ष

स्वागत नववर्ष

स्वागत है नववर्ष
तुम एक बार फिर से 
मुस्कुराते हुए आ रहे हो
अपनी मनमोहिनी छटा बिखेरते हुए।

तुम्हारे आने का
उल्लास धरती पर
चहुँ ओर दिखाई देता है
हर मन नई आस लिए बाट जोहता है।

अब सब सोचते हैं 
शायद कुछ नया होगा
नव नवीन वादों से हटकर
सबके जीवन में हो जाएगा सुधार।

चाहते हैं रोक सकें
वह क्रन्दन, वह बन्धन,
वह भ्रष्टाचार, वह रिश्वतखोरी,
वह अनाचार, वह कदाचार मिल सब।

कोई कृष्ण धरा पर 
अस्मत की रक्षा और
आततायी के विनाश हेतु
शायद आ ही जाए सुदर्शन चक्र लिए।

भूखों को अन्न 
नग्नों वस्त्र देने वाला
कोई दानवीर एक बार
फिर से अवतरित हो जाए इस साल।

हो जाए किसी विध
आतंक का घिनौना रूप
इस जहाँ से कोसों कोस दूर
बच जाए मानवता शर्मसार होने से।

तुम्हारे आ जाने से
चारों ओर खुशियों का 
साम्राज्य छा जाए बस
आशा करते हैं मिलकर सब जन।

नव निर्माण हो 
नव-नूतन विहान हो
नव सृष्टि का विधान हो
नव उड़ान भरने के लिए नव पंख हों।

आओ नववर्ष आओ
चारों ओर होने वाले इस
जीवन संगीत को सुनो जरा
तुम्हारे आने की खुशी में हैं सब उत्सव।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

दीपक की भॉंति प्रकाशमान होना

दीपक की भाँति प्रकाशमान होना

मनुष्य को सदा दीपक की भाँति प्रकाशमान होना चाहिए। दीपक को यदि अन्धेरे कक्ष में जला दिया जाए तो वह अन्धकार को दूर करके उस कमरे को प्रकाशित करता है। उस समय यह पता ही नहीं चलता कि उस कमरे में कभी अन्धेरे का साम्राज्य था। उसी तरह मनुष्य को अपने सद् गुणों से चारों ओर अपना प्रकाश फैलाना चाहिए। मनुष्य इसीलिए मनुष्य कहलाता है कि वह अपने परिवेश में चारों ओर रहने वाले दूसरे लोगों की सुधबुध लेता रहे। उनके सुख-दुख को समझे और उनके साथ खड़ा रहे। 
           जब सूर्य का प्रकाश तीव्र होता है, उस समय किसी अन्य प्रकाश की आवश्कयता नहीं होती। उसके उपस्थित न होने पर ही अन्धकार अपने पैर पसारने लगता है। ऐसे समय में यदि एक छोटा-सा दीपक अन्धेरे कमरे में  रख दिया जाए तो उसके प्रकाश से कमरे में उजियारा हो जाता है। वहॉं पर रखी हुई सभी वस्तुऍं स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती हैं। वहाँ पर चलने-फिरने वाले लोगों का आवागमन इस प्रकार सुविधापूर्वक होने लगता है कि वे ठोकर खाकर गिरने से बच जाते हैं। 
            जिन मनुष्यों को उनके शुभकर्मों के कारण ईश्वर ने सामर्थ्यवान बनाया है, उनको चाहिए कि वे समाज के पिछड़े वर्ग के लिए दीपक की भाँति बनें। उनकी समस्याओं को सुनकर और समझकर उनकी उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए। उन लोगों के चेहरों पर यदि वे थोड़ी-सी प्रसन्नता भी ला पाएँ तो उनका मानव जीवन पाना वास्तव में सफल हो गया समझिए।
              वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जो अपने देश, धर्म व समाज के लिए कुछ कर गुजरने का साहस रखता हो। जिस प्रकार दीपक छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, धर्म-जाति आदि सभी प्रकार के बन्धनों से ऊपर उठकर सबको बराबर प्रकाश देता है, उसी प्रकार ये महापुरुष भी सबको एक समान मानते हैं। तथावत अपने दायित्वों को पूर्ण करने में संलग्न रहते है।
           अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं। इन्सान और अन्य जीवों में कुछ अन्तर तो होना आवश्यक है। मनुष्य को ही ईश्वर ने सोचने-समझने की शक्ति का वरदान दिया है। इसीलिए वह सृष्टि का सबसे उत्कृष्ट प्राणी कहा जाता है। हमारे ऋषि-मुनियों का मानना है कि सभी मनुष्येतर जीवों की भोगयोनि होती है। उस योनि में वे केवल अपने अशुभ कर्मो का दण्ड भोगते हैं। केवल मनुष्य जीवन ही कर्मयोनि होता है जिसमें शुभाशुभ सभी प्रकार के कर्मों को करने में वह स्वतन्त्र होता है।
           अब यह उसकी इच्छा है कि वह शुभकर्मो को करता हुआ अपना इहलोक और परलोक सुधार ले अथवा अशुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त होकर अपने परलोक तो क्या यह इहलोक भी बिगाड़ ले। अतः इस मनुष्य योनि में जितने अधिक शुभकर्म अथवा पुण्यकर्म अपने खाते में मनुष्य जोड़ पाएगा उतना ही सुख और ऐश्वर्य उसे आने वाले अगले जन्मों में भी मिलेगा।
             दीपक नेह की चिकनाई और उसमें डाली गई बाती से स्वयं को जलाकर दूसरों को प्रकाश देता है। उसी प्रकार मनुष्य जब दूसरों को अपने प्यार से सराबोर करता है और अपने संयम एवं अनुशासनात्मक जीवन से दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने में सफल होता है तभी वास्तव में वह समाज में प्रकाशित होता है। सबके लिए पूजनीय बन जाता है लोग उसे सिर-आँखों पर बिठाते हैं। ऐसे सज्जन मनुष्य समाज के दिग्दर्शक बनते हैं और  सबके अराध्य होते हैं।
            समाज कल्याण मन्त्रालय द्वारा योजनाएँ कई सामाजिक रूप से पिछड़े इस वर्ग की सुरक्षा हेतु बनाई गई हैं। बहुत-सी समाज सेवी संस्थाएँ भी इस कार्य में सक्रिय हैं परन्तु उनके इन कार्यों के लाभ से अभी भी एक बहुत बड़ा वर्ग वंचित रह जाता है। छोटी-छोटी सस्थाएँ भी इनकी भलाई के लिए कार्य कर रही हैं। इनके अतिरिक्त भी देश के गाँवों और प्रदेशों में अपने-अपने स्तर पर अनेक लोग इन परोपकारी कार्यों में निस्वार्थ भाव से जुटे हुए हैं।
           अभी भी इन आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के जीवनों को प्रकाश की महती आवश्यकता है। इनके सच्चे साथी बनकर यदि इनके जीवन को किसी तरह प्रकाशित किया जा सके तो मानव जन्म सफल हो जाएगा। वास्तव में इन्हीं दीपक स्वरूप व्यक्तियों का जीना ही इस ससार में जीना कहलाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

बच्चे में चोरी की आदत

बच्चे में चोरी की आदत

बच्चे को चोरी करने की गलत आदत यदि बचपन में ही पड़ जाए तो समझ लीजिए कि उसका जीवन बर्बाद हो गया। यदि किसी बड़े के समझाने का उस पर असर हो गया तब तो सब ठीक है अन्यथा अपने स्वयं के लिए तथा अपने घर-परिवार के लिए वह जीवन भर के लिए सन्ताप के समान बन जाता है। बड़े होने पर यह आदत पक जाती है। उसे धन कमाने का यह सरल मार्ग लगने लगता है। तब वह न्याय  व्यवस्था का दोषी बनकर सजा भुगतने के लिए विवश हो जाता है। बचपन में ही इस कुटेव का इलाज हो जाना चाहिए। 
            बच्चे को कोई भी, कहीं भी आकर्षक वस्तु यदि दिखाई दे जाए जो उसके पास नहीं हो तो वह लालचवश उसे पाने के लिए भरसक कोशिश करता है। अपने माता-पिता से उस वस्तु को खरीदकर देने की जिद करता है। यदि उनके पास उसे खरीदने की सामर्थ्य होती है तो उसे खरीद देते हैं अन्यथा कोई बहना बनाकर टाल देते हैं और फिर बच्चे को बहलाने का यत्न करते हैं। कभी-कभी माता-पिता को वह वस्तु अनावश्यक-सी लगती है। इसलिए भी वे मना कर देते हैं। पर बालमन की कौन कहे? बच्चे को तो जो भी अच्छा लगता है वह उसकी अलमारी में सजा हुआ होना चाहिए। चाहे वह उसके किसी काम का हो या न हो। वह उस वस्तु से कभी खेले या सिर्फ लेकर छोड़ दे।
          यहीं से बच्चे के मन में किसी दूसरे की चीज को उठा लेने की भावना मचलने लगती है। यदि उस भावना को वहीं पर ही दबा दीजिए तो बच्चा यह सीख जाता है कि जो भी वस्तु वह देखेगा, उसको खरीदना उसके लिए आवश्यक नहीं होता। परन्तु यदि बिना किसी को हवा लगे बच्चा किसी के घर से अपनी मनचाही वस्तु उठाकर लाता है और किसी को पता नहीं चल पाता तो उसका हौसला बढ़ जाता है। फिर दूसरी, तीसरी, चौथी बार भी जब उसकी चोरी के कारनामे का किसी को पता नहीं चलता तो वह इस कार्य में सिद्धहस्त  होने लगता है। यदि किसी की नजर में उसकी चोरी की हुई कोई चीज आ भी जाए तो वह कोई उल्टा-सीधा बहाना बनाकर झूठ बोल देता है। 
            बहुधा ऐसा होता है कि स्कूल में अपने अमीर दोस्तों की नई-नई सुन्दर चीजें जो उसके पास नहीं होतीं, उन्हें देखकर वह भी कक्षा में अपना रौब गाँठने के लिए उन्हें पाना चाहता है। इसी प्रकार उन बच्चों के पास बहुत से पैसे देखकर उसे भी यही लगता है कि उसके पास ढेर सारे पैसै हों और वह भी अपनी मनपन्सद चीजें कैण्टीन से लेकर खाए और उसे किसी के सामने नीचा न देखना पड़े। इन सब इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैसों की जरूरत होती है। तब वह क्लास में चोरी करता है। घर में माता-पिता या किसी अन्य बड़ों के पर्स में से पैसे निकालने लगता है। यदि उससे कभी जेब से निकले पैसों के बारे में पूछ लिया जाता है तो वह मासूम-सा बनकर सफेद झूठ बोल देता है।
            अपने जिन रिश्तेदारों, सम्बन्धियों अथवा अपने मित्रों के घर वह खेलने जाता है, वे सब उसकी इस आदत के कारण उसे अपने घर में नहीं आने देना चाहते। कोई-न-कोई बहाना बना देते हैं और उसे टाल देते हैं। उसकी चोरी करने की आदत के कारण उसके मित्रजन व कक्षा के साथी सभी उसे चोर कहकर अपमानित करते हैं। बारबार अपने लिए ऐसी तिरस्कार भरी बातें सुनकर वह और डीठ हो जाता है। इसमें आनन्द लेता हुआ वह धीरे-धीरे इस कुटेव का आदी बन जाता है।
            बच्चे में चोरी करने की इस आदत को क्लेप्टोमेनिया कहते हैं। यह एक मानसिक विकार कहलाता है। इसमें बच्चे का मन बार-बार चोरी करने का करता है। चोरी करने के बाद उसे बहुत प्रसन्नता मिलती है। इस समस्या के कारण बच्चे को कभी डॉंटना या मारना नहीं चाहिए। उससे कारण जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह क्यों चोरी करता है?
            कोई भी माता-पिता या परिवारी जन यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे में ऐसी बुरी आदत घर कर जाए। इसके लिए वे प्रयत्न भी करते रहते हैं परन्तु यदि उस बच्चे का दुर्भाग्य ही उसका साथ न छोड़े तो उनके किए सारे ही प्रयास धरे रह जाते हैं और वह मासूम बच्चा धीरे-धीरे अपनी इस लत के कारण समाज का शत्रु बन जाता है।
            माता-पिता को बच्चे को समझाना चाहिए कि चोरी करना बुरी बात है। चोरी की गई वस्तु के लिए भुगतान करने या उसे लौटाने में बच्चे की मदद करनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चोरी से बच्चे को किसी भी तरह का लाभ न मिलने पाए। उसे उपदेश देने अथवा भविष्य में बुरे व्यवहार की भविष्यवाणी करने या यह कहने से बचना चाहिए कि अब आप बच्चे को चोर या बुरा व्यक्ति मानने लगे हैं।
            इस चोरी की आदत के कारण बड़े होने पर वह पुलिस से बचने की जुगत भिड़ाने लगता है। उसमें हर बार तो सफल नहीं हो सकता। तब उसे न्यायालय द्वारा दोषी करार दिए जाते हुए हवालात की सींखचों के पीछे कैद होकर रह जाना पड़ता है। अपने इस दुष्कृत्य के कारण उन लोगों को अनजाने में सजा दे बैठता है जिनको इस सब से कोई भी लेना-देना नहीं होता।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 28 दिसंबर 2025

ईश्वर जो करता है अच्छा करता है

ईश्वर जो करता है अच्छा करता है 

हम प्राय: सुनते रहते हैं और कहते भी हैं कि ईश्वर जो करता है हमारे अच्छे के लिए ही करता है। कहने-सुनने यानी (theory) में तो यह बहुत अच्छा लगता है परन्तु जब इसका अभ्यास (practical) करने की बारी आती है तो हम बगले झाँकने लगते हैं। उस समय हम ईश्वर पर दोषारोपण करने‌ लगते हैं। हमें लगता है कि ईश्वर हमारे साथ अन्याय कर रहा है। पता नहीं किस जन्म का बदला वह हमारे से ले रहा है।
           उस समय हमें लगता है कि हमें ही परीक्षा में क्यों डाला जा रहा है? दुनिया में बहुत से और भी लोग हैं उनकी परीक्षा लो न। उस समय हम भूल जाते है कि जन्म से मृत्यु तक न जाने हम कितनी परीक्षाओं से गुजरते हैं। कुछ परीक्षाओं में हम पास होते हैं और कुछ में फेल हो जाते हैं। जब तक हम उन परीक्षाओं में पास नहीं हो जाते तब तक हमें परीक्षा देनी पड़ती है।
             ईश्वर हमेशा ही हमारी भलाई करता है परन्तु हम अज्ञानी उसकी महानता को समझ नहीं पाते और उस पर दोषारोपण करते हुए उसे कोसते रहते हैं। उस समय हम उसकी महानता को हम भूल जाते हैं। इसी विषय को दर्शाती हुई यहाँ एक कहानी मुझे याद आ रही है जो बचपन में हम सभी ने पढ़ी है।
              किसी राजा का एक मन्त्री था, उसे ईश्वर पर अटूट विश्वास था। वह हर कार्य का श्रेय ईश्वर को ही देता था। हर बात पर कहता था, "ईश्वर जो करता है हमारे अच्छे के लिए ही करता है।"
             एक दिन उस राजा की अंगुली कट गई। राजा ने उससे अंगुली कटने पर पूछा, "इसमें ईश्वर ने मेरा क्या भला किया?"
            मन्त्री ने अपनी आस्था के अनुरूप उत्तर दिया, "ईश्वर जो करता है हमारे अच्छे के लिए ही करता है। इसमें भी कोई बेहतरीन होगी।"
            राजा उसकी इस बात पर चिढ़ गया और उसे बहुत क्रोध आया। तब उसने अपने मन्त्री को जेल में डाल दिया। कुछ दिन बीतने के उपरान्त एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए जगल में गया। वहाँ जंगल में अपने देवता को बलि चढ़ाने के उद्देश्य से आदिवासियों ने राजा को पकड़ लिया। राजा की कटी हुई उस अंगुली को देखकर उसे यह कहते हुए छोड़ दिया, "इसका अंग भग हो चुका है। इसलिए देवता को इसकी बलि नहीं दी जा सकती।"
              उस समय राजा को यह प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि ईश्वर जो भी करता है हमारे अच्छे के लिए करता है। अपने राज्य में वापिस लौटकर उसने मन्त्री को जेल से बाहर निकाला। राजा ने उससे कहा, "ईश्वर पर तुम्हारे अटूट विश्वास के कारण आज मैं अपनी कटी हुई अंगुली के कारण बच गया पर इसमें तुम्हारा क्या भला हुआ?" 
           तब मन्त्री ने राजा से कहा, "मैं भी अपकी कटी हुई अंगुली के कारण ही बच गया।"
             राजा ने उससे पूछा, "वह कैसे?"
           ‌  मन्त्री ने राजा से कहा,"यदि आप मुझे जेल में न डालते तो मैं भी आपके साथ जंगल में शिकार के लिए जाता। आप तो कटी हुई अंगुली के कारण बच जाते और वे लोग मेरी बलि चढ़ा देते। मैं आपकी सेवा भी न कर पाता। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि ईश्वर जो भी करता है हमारे भले के लिए करता है।"
            यह सचमुच ही ईश्वर का चमत्कार है जिसे हमारी स्वार्थी बुद्धि समझ ही नहीं पाती। काल के मुँह में समाता हुआ मनुष्य भी वर्षों तक जीवित रह सकता है। वह प्रभु इतने चमत्कार दिखाता है कि उनका वर्णन भी हम नहीं कर सकते। 
            हम उस प्रभु पर सच्चे मन से यदि विश्वास करते हैं तो वह हमारे सारे बिगड़े हुए काम बना देता है। वह तो इसी प्रतीक्षा में रहता है कि कब मनुष्य उसे सच्चे मन से याद करे और वह उसकी सहायता के लिए आगे हाथ बढ़ाए।
           वह जगत्पिता परमात्मा ही हमारा अन्तिम ठौर है। दुनिया के सभी रिश्ते-नाते हमारा साथ छोड़ देते हैं परन्तु वह मालिक कभी हमें निराश नहीं करता। जो भी उसे पुकारता हुआ उसकी शरण में जाता है, वह उस पर अनुग्रह करता है। हर समय वह हमारे साथ-साथ चलता हुआ हमारी रक्षा करता है। इसीलिए वह जो भी हमारे लिए करता है, वह अच्छा ही करता है। हमें उसके न्याय पर बच्चे मन से पूरा विश्वास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

मनुष्य की स्वयं की परछाई

मनुष्य की स्वयं की परछाई

हर मनुष्य की अपनी स्वयं की एक परछाई होती है। वह अपनी परछाई के पीछे सदा भागता रहता है जो कभी उसके हाथ नहीं लगती। मनुष्य आगे-आगे चलता जाता है और यह परछाई हमेशा उसके पीछे-पीछे ही चलती रहती है। चाहकर भी वह हाथ बढ़ाकर उसे छू नहीं सकता। 
        इन्सान जब पीछे मुड़कर इसे देखने का प्रयास करता है तो यह सिमट जाती है और दिखाई नहीं देती। थोड़ी देर के बाद जब वह सीधा चलने लगता है तो यह पुन: उसके पीछे-पीछे हो जाती है। यह मृगतृष्णा के ही समान उसे छलती रहती है। कोई भी मनुष्य सदा के इसे लिए बाँधकर नहीं रख सकता। मनुष्य जहाँ भी जाता है उसकी यह परछाई उसके साथ-साथ चलती हुई सी सबको दिखाई देती है। यह प्रकाश में ही दिखाई देती है। प्रात:काल और सायंकाल यह छोटी होती है दोपहर के समय लम्बी हो जाती है। रात के स्याह अन्धेरे में यह भी छिप जाती है और तब दिखाई नहीं देती।
            यह एक दास की तरह पूर्ण रूपेण हमारा अनुसरण करती है। हम धीरे-धीरे चलते हैं तो यह भी मस्त चाल में चलती है। हम तेज-तेज चलते हैं तो यह भी तेजी दिखाती है और यदि हम भागते हैं तो यह भी भागती हुई दिखाई देती है। कहने का तात्पर्य यही है कि कैसी भी गति में हम हों, यह हमारे पीछे-पीछे रहती है।
           ऐसा कहा जाता है कि जब मनुष्य दुख और परेशानियों के अन्धेरे काले बादलों से घिर जाता है उस समय इस दुनिया के सभी भौतिक रिश्ते-नाते उसका साथ छोड़ देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि दुख के समय उसकी अपनी परछाई भी उससे मुँह मोड़ लेती है। कहने का तात्पर्य यही है कि रात की कालिमा जैसे भयंकर कष्ट के समय यह परछाई भी बेगानी हो जाती है और मनुष्य से दूर भाग जाती है। जब उसके जीवन से दुख के बादल छटने लगते हैं और मनुष्य को पुन: आशा की एक किरण दिखाई देने लगती है।
            तब धीरे-धीरे उसके दुखों का अन्त होने लगता है। उसके जीवन में सुखों के साथ-ही-साथ स्थायित्व का प्रकाश भी चमकने लगता है। उस समय यह फिर उसके पीछे हो लेती है और साथ चलने लगती है। यानी यह भी मनुष्य के सुख की साथी है दुख की कदापि नहीं। यह वही परछाई होती है जो कहने के लिए मनुष्य की अपनी होती है। परन्तु इस पर भी अन्य भौतिक पदार्थों की तरह भरोसा न करने का परामर्श हमारे विद्वान हमें देते रहते हैं।
          इस परछाई के विषय में एक और बात जो खास तौर से कही जाती है वह यह है कि जब मृत्यु मनुष्य के सिर पर मंडरा रही होती है, उस समय मनुष्य की परछाई दिखनी बन्द हो जाती है। अर्थात् मनुष्य जीवन के अन्तकाल के पहले ही यह परायों की तरह उसका साथ छोड़ देती है। बस यहीं तक का उसका और मनुष्य का साथ होता है। 
              भौतिक जगत की शेष अन्य सम्पदाओं की भाँति यह भी केवल इसी संसार में ही साथ निभाती है परलोक में हमारा साथ निभाने नहीं जाती। इस तरह तो उसे हम विश्वसनीय नहीं कह सकते। मनुष्य को चाहिए कि मृगतृष्णा के समान धोखा देने वाले इन छलावों के प्रपंच से यथासम्भव बचकर रहे। इनके जाल में बॅंधने से जीवन में कष्ट के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। ईश्वर सबके जीवन में भरपूर सुख और शान्ति दे इसी कामना के साथ।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति

बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति

बच्चे बहुत ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं। वे बहुत ही जल्दी सब कुछ जान और समझ लेना चाहते हैं। अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए उन सबसे प्रश्न पूछते रहते हैं जो उनके सम्पर्क में आते हैं। बहुधा ऐसा होता है कि उनके प्रश्नों के उत्तर बड़ों के पास भी नहीं होते। इसलिए वे उन्हें झिड़क देते हैं और कहते हैं कि बेकार के प्रश्न करके उन्हें परेशान न किया करो, जाओ जाकर अपना काम करो।
         बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति (curiosity) उनके जन्मजात सीखने की इच्छा होती है जो उन्हें अपने आस-पास की दुनिया को जानने, सवाल पूछने और प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है। इससे मस्तिष्क का विकास होता है। समस्या-समाधान कौशल बढ़ते हैं और वे जीवन भर सीखने वाले बनते हैं। इसे माता-पिता द्वारा धैर्य से प्रोत्साहित करने और अन्वेषण के अवसर प्रदान करने से पोषित किया जाना चाहिए, भले ही उनके 'क्यों' वाले प्रश्न थकाऊ और उबाऊ ही लगें।
          बच्चों के मन में अहं का प्रश्न नहीं होता। वे अपने भोलेपन से सबको मोह लेते हैं। उनके पूछे जाने वाले छोटे-छोटे तार्किक प्रश्न कभी-कभी बड़ों को भी सोचने के लिए विवश कर देते हैं। प्राय: छोटे बच्चों को क्या हुआ, क्यों हुआ, कब हुआ और कैसे हुआ की गुत्थी सुलझानी होती है। इसलिए सारा समय वे प्रश्न करके सबको परेशान कर देते हैं और डॉंट खाते रहते हैं।
        बहुधा उन्हें डाँटकर चुप करवा दिया जाता है। बड़े लोगों को जीवन के पचासियों झगड़े सुलझाने होते हैं। उन्हें घर-गृहस्थी और कार्यालय के सभी कार्य करने होते हैं। इसलिए वे उनके ढेरों प्रश्नों से ऊब जाते हैं और बच्चों को डपट देते हैं। इस डाँट-डपट का वे कभी बुरा नहीं मानते। डॉट खाकर कुछ देर शान्त बैठने के बाद फिर अपनी भोली-सी सूरत बनाते हुए अपने ज्ञानवृद्धि के मिशन पर चल पड़ते हैं।
         जब फुर्सत के पल होते हैं तो बच्चों की बातों का उत्तर तसल्ली से दिया जाता है। परन्तु जब वे बाल की खाल निकालने लगते हैं तब समयाभाव के कारण उनके प्रश्नों की बौछार सहनशक्ति की सीमा से परे हो जाती है। 
           मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों के सभी प्रश्नों का उत्तर सहनशीलता पूर्वक देना चाहिए। जो भी उनकी स्वाभाविक ज्ञिज्ञासाएँ हैं, उनका शमन होना ही चाहिए। इससे बच्चों की बुद्धि प्रखर होती है और वे मेधावी बनते हैं। जीवन के किसी भी क्षेत्र में वे सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। सभी उन उनकी और उनके माता-पिता की प्रशंसा करते नहीं अघाते।
          इसके विपरीत जिन बच्चों के ज्ञानार्जन की समस्याओं का समाधान नहीं होता उनकी बुद्धि कुँठित हो जाती है। वे जीवन की रेस में पिछड़ जाते हैं। चाहकर भी ऐसे बच्चे उन मेधावी साथियों के बराबर पहुँचकर उन्हें छू नहीं पाते। इस बात का दुख उन्हें जीवनपर्यन्त रहता है।
            इक्कीसवीं सदी में आज के बच्चे बहुत समझदार हैं। उन्हें आप कभी मूर्ख नहीं बना सकते। न ही उनके प्रश्नों के आप उल्टे-सीधे उत्तर दे सकते हैं। इसका कारण यह है कि जब कभी उन्हें अपना सही उत्तर मिल जाएगा तो वे आपको यह अहसास कराने से नहीं चूकेंगे कि आप गलत जवाब देते हैं। उनके अनुसार आपको कुछ भी नहीं आता। 
            यदि बच्चे के मन में यह बात घर कर गई कि उनके माता-पिता कुछ नहीं जानते तो बात-बात में वे दोहराते रहेंगे कि रहने दो आपको तो कुछ भी नही पता। किसी के भी सामने उन्हें यह कहने में जरा-सी झिझक महसूस नहीं होगी। जिसे सुनना कोई भी पसन्द नहीं करना चाहता कि उनके बच्चे उन्हें मूर्ख समझें।
              जिज्ञासु बच्चे दूसरे लोगों में रुचि लेते हैं जिससे वे अन्य लोगों के दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं और सहानुभूति विकसित करते हैं। वे हमेशा नई और दिलचस्प चीजें देखना चाहते हैं। बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना चाहिए जहाँ वे वस्तुओं को छू सकें और प्रयोग कर सकें। बच्चों को पुस्तकें और अलग-अलग तरह की सामग्री प्रदान करनी चाहिए। उन्हें अपनी पसन्द की चीजें चुनने की स्वतन्त्रता देनी चाहिए। यदि वे किसी चीज में रुचि दिखाते हैं तो उससे जुड़ी गतिविधि में उन्हें भाग लेने देना चाहिए।
             बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि उनके मन में उठने वाली सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया जाए। यदि उनके किसी प्रश्न का उत्तर नहीं भी समझ में नहीं आता तो उन्हें प्यार से समझाइए। स्वयं उस विषय की जानकारी एकत्र करके उन्हें ज्ञान से समृद्ध कीजिए। इस प्रकार उनको मानसिक सन्तोष देने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

बच्चे में हकलाने की आदत

बच्चे में हकलाने की आदत

बच्चे में हकलाने की आदत होने का अर्थ यह है कि उसमें आत्मविश्वास की कमी है। उसे माता-पिता और परिवार के प्यार की बहुत आवश्यकता है।
             बच्चे में पाई जाने वाली इस आदत के कारणों पर यदि विचार किया जाए तो यही समझ में आता है कि जिन बच्चों के माता-पिता किसी भी कारण से आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं अथवा गाली-गलौच करते रहते हैं, वहाँ बच्चे डरे और सहमे से रहते हैं। माता-पिता जब अपना आक्रोश उन मासूमों पर निकालते हैं तब वे किसी गलती के न किए जाने पर भी मार या डाँट खाने के डर के कारण हकलाने लगते हैं।
             कुछ घरों में बच्चों पर अनावश्यक रूप से कड़ा अनुशासन थोपा जाता है। अब बच्चे हैं तो यदाकदा शरारत भी करेंगे। गलती तो किसी से भी हो सकती है। बच्चे तो फिर बच्चे हैं। उनसे गलती हो जाना भी स्वाभाविक है। सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चे झूठ नहीं बोलते। बड़े होने पर तो वे भी दुनिया के सब छल-फरेब शीघ्र ही सीख जाते हैं। गलती के हो जाने पर उनसे माता-पिता या अध्यापक जब सख्ती से पूछते हैं तो बच्चे डाँट अथवा मार के डर से इतना अधिक घबरा जाते हैं कि जवाब देने के बजाय वे हकलाने लगते हैं।
            पहले तो सबको यही लगता है कि बच्चे लाड़ के कारण ऐसे अटक-अटककर बोल रहे हैं। परन्तु जब इन बच्चों को इस तरह हकलाकर बोलने की आदत पड़ जाती है, उस समय असली समस्याओं का आरम्भ होता है। सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब थोड़ा-सा बड़ा होने पर बच्चों में हीन भावना घर करने लगती है। 
             उन्हें समझ में आने लगता है कि वे आम बच्चों की तरह नार्मल नहीं हैं वे उनकी तरह फर्राटे से नहीं बोल सकते। वे रुक-रुककर या अटकते हुए बोलते हैं। फिर वे दूसरों के सामने बोलने में कतराने लगते हैं। जब वे बोलने हैं तब साथी उनका मजाक उड़ाते हैं और नाम रखते हैं। इससे बच्चों को और अधिक परेशानी होने लगती है।
           इसलिए धीरे-धीरे ऐसे बच्चे सदा एकान्त में ही रहना पसन्द करने लगते हैं। वे दोस्तों के साथ खेलने नहीं जाना चाहते। पार्टी आदि में भी जाने से कतराते हैं। बस उन्हें यही लगता है कि वहॉं जाकर वे बेचारे बन जाऍंगे। वहाँ पर जाएँगे तो लोग उनकी खिल्ली ही उड़ाएँगे अथवा उन पर तरस खाएँगे और उन्हें बेचारा समझेंगे।
            यदि अपने माता-पिता इन्हें बोझ की तरह समझेंगे और दूसरों के सामने उन्हें ले जाने में हिचकिचाऍंगे या अपनी सन्तान के रूप में उनका परिचय करवाने में कतराएँगे तब फिर कौन इनका हाथ थामकर इन्हें जीवन में संघर्ष करने का मार्ग बताएगा? कौन इन्हें जीवन की परीक्षा में पास कराएगा? 
             कई ऐसे बच्चे हैं जो हकलाने की अपनी इस कमजोरी से एक सच्चे योद्धा की तरह लड़कर जीत जाते हैं। वे जीतकर अपने जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। उनकी इस सफलता में उनके माता-पिता का पूरा सहयोग रहता है। वे सदा ही उनकी पीठ थपथपाकर उन्हें प्रेरित करने का सफल प्रयास करते हैं। उनके कारण ही ये बच्चे स्वयं में आत्मविश्वास जगा पाते हैं। स्पीच थैरेपी के द्वारा इनमे सुधार लाया जा सकता है।
         बच्चों के हकलाने (Stuttering) की कोई सीधा 'दवा' नहीं है बल्कि मुख्य इलाज स्पीच थेरेपी (Speech Therapy) है। स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट द्वारा दी जाती है। इसमें धीरे बोलना, साॉंस लेने की तकनीकें और आत्मविश्वास बढ़ाना सिखाया जाता है। साथ ही घर पर शान्त और आरामदायक माहौल बनाना, बच्चों से धैर्यपूर्वक बात करना और बीच में न टोकना जैसे तरीके भी बहुत जरूरी होते हैं ताकि हकलाहट कम हो सके और बच्चे सहज महसूस कर सकें।
              इन बच्चों पर तरस खाने की अथवा सहानुभूति प्रदर्शित करने की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें बस आपका प्यार और आशीर्वाद चाहिए जिस पर सदा से उनका हक है। अपना ध्यान उन पर केन्द्रित कीजिए जो वह कह रहे हैं। जब बच्चे बात कर रहे हों तो उनसे नजरें मिलाइए। जब बच्चे हकला रहे हों तो नजरें न फेरें अथवा नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिखाएँ। सकारात्मक प्रतिक्रिया देकर बच्चों कसे बातचीत करने के प्रयास को सुदृढ़ करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

बच्चे का डरना

 बच्चे का डरना

बच्चे का डर जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। कहते हैं पैदा होने के बाद कुछ समय तक उसे पिछले जन्मों की अच्छी-बुरी बातें याद आती रहती हैं। इसी कारण वह बिना बात के कभी हंसने लगता है तो कभी रोने। कभी-कभी डर के मारे चौंक जाता है और रो पड़ता है।
          बच्चे कई कारणों से डरते हैं जैसे अजनबी या अन्धेरे से डर, कल्पना की उड़ान, राक्षसों की कहानी सुनना, माता-पिता से अलगाव की चिन्ता, पारिवारिक तनाव या झगड़े अथवा टीवी पर आने वाली खबरें इत्यादि। कभी यह किसी अन्तर्निहित चिन्ता का संकेत भी हो सकता है। इससे बच्चे स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं। वे कल्पनाओं को वास्तविक मानने लगते हैं।
          सुनने में शायद आप सबको अटपटा लगेगा पर सच्चाई यही है कि प्रायः माताएँ बचपन से ही अपने मासूमों को अनजाने में घुट्टी में डर पिला देती हैं। बचपन का वह डर उनके हृदय में ऐसा घर कर जाता है कि आयुपर्यन्त वह किसी-न-किसी बात पर डरता रहता है।
        छोटा बच्चा जब थोड़ी-थोड़ी बात समझने लगता है और बोलने लगता है तब उसकी मासूम शरारतें सबका ही मन मोह लेती हैं। प्रायः बच्चे रात को देर तक खेलते रहते हैं और जागते रहते हैं। जब तक वे नहीं सोते तब तक किसी और को भी नहीं सोने देते। उन्हें सुलाने के लिए माता को अनेक यत्न करने पड़ते हैं। कभी वह उसे लोरी सुनाती है तो कभी कहानी। कभी लाइट बन्द करके उसे सोने के लिए प्रेरित किया जाता है। जब उसे सुलाने के सारे प्रयत्न असफल हो जाते हैं तब माता उसे किसी भी अनजान व्यक्ति अथवा किसी वस्तु का डर दिखाकर सुलाने का प्रयास करती है। 
           यहीं से डर का बीज उस नासमझ बच्चे के मन में गहरे बैठ जाता है। उसे ऐसा लगने लगता है कि यदि वह नहीं सोएगा तो उसका शायद अनिष्ट हो जाएगा या वाकई कोई उसे पकड़कर ले जाएगा।इसी क्रम में वह बारबार किसी-न-किसी से डरता रहता है। अपनी गलती के लिए अपने बड़ों से अथवा अध्यापकों से डरना तो उचित है। उसके लिए उसको पछताना चाहिए और उनसे माफी माँगकर भविष्य में उसे न दोहराने का वचन भी देना चाहिए। ऐसा करना उस बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत ही आवश्यक है। यह गुण हर बच्चे को अपनाना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चे को इस कार्य के लिए प्रोत्साहित करें।
         बच्चे प्रायः अनजान व्यक्ति को देखकर डरते हैं क्योंकि उनके मन में इस बात का भय रहता है कि शायद वह उसे उठाकर ले जाएगा और मार डालेगा। इसलिए शीघ्र ही उसका हाथ छुड़ाकर भागने का प्रयास करते हैं। सड़क पर चलने वाले वाहनों से बच्चों को डराने के स्थान पर उन्हें चलते समय उनसे सावधानी बरतने का परामर्श देना चाहिए। यदि वे लापरवाही से सड़क पर चलेंगे तो उन्हें चोट लग सकती है या जान भी जा सकती है।
          बच्चे कुत्ते, बिल्ली, बन्दर आदि जानवरों से डरते हैं। उन्हें डर लगता है कि यदि वे काट लेंगे तो इंजेक्शन लगवाने पड़ जाएँगे और इंजेक्शन से बच्चे तो क्या बड़े लोग भी डरते हैं। इसलिए वे उनसे बचकर निकलते हैं। बच्चे काक्रोच और चूहे आदि जीवों से भी डरते हैं। सड़क पर चलने वाले गाय, भैंस, गधा, घोड़ा, हाथी आदि पशु भी किसी को टक्कर मारकर नुकसान पहुँचा सकते हैं इसलिए उनसे बचने की हिदायत बच्चों को दी जाती है।
         बच्चे के मन में यदि बहुत अधिक डर समा जाए तो बात-बात पर चौंकने लगता है। जरा-सी डाँट पड़ने का अंदेशा हो तो वह काँपने लगता है। कभी-कभी कोई बच्चा डर के कारण डिप्रेशन में चला जाता है। नित्य प्रति माता-पिता की आपस में मार-कुटाई होना, गाली-गलौच करना या चीख-चिल्लाहट भी बच्चे के डर का कारण बन जाते हैं। बच्चों के सामने ऐसे झगड़ों से बचना चाहिए।
         अगर आपका छोटा बच्चा डर जाता है तो उसे सबसे पहले गले लगाकर, प्यार से बात करके सुरक्षित महसूस कराना चाहिए। उसके डर को स्वीकार करें। उसे न डॉंटें और न मजाक उड़ाऍं। यह जानने की कोशिश करेनी चाहिए कि उसे किस बात से डर लगता है। फिर धीरे-धीरे उसका सामना करने में मदद करें। उसे कहानी सुनाना या गहरी साँसें लेने के लिए सिखाना चाहिए। उसे यह बताना चाहिए कि डरना सामान्य बात है ताकि वह मानसिक रूप से मजबूत बन सके। 
          माता-पिता को ध्यान रखना चाहिए कि जहाँ तक हो सके बच्चे के मन में किसी भी तरह का डर घर न कर पाए इसका यत्न करना चाहिए। बच्चे को प्यार से अपने पास बिठाकर किसी भी विषय के हर पहलू के बारे में समझाना चाहिए। बच्चे को अच्छे और बुरे दोनों ही पक्षों की जानकारी दे देनी चाहिए। फिर उस बच्चे के विवेक पर इस बात को छोड़ देना चाहिए कि वह किसका चुनाव करता है। यदि बच्चा बिना किसी वजह डरता है या रात में सो नहीं पाता तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज से सलाह लें।
उसे सुरक्षित महसूस कराने के लिए बच्चे को गले लगाऍं, उसका हाथ पकड़ें और उसे बताऍं कि आप उसके साथ हैं और वह सुरक्षित है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

शून्य का महत्त्व

शून्य का महत्त्व

शून्य का अपने आप में कोई भी महत्त्व नहीं होता परन्तु जब वह एक से नौ तक किसी भी संख्या के साथ जुड़ जाता है तब उसका मूल्य बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि शून्य को एक के साथ जोड़ दिया जाए तो वह दस बन जाता है। इसी प्रकार से क्रमशः बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी और नब्बे बन जाता है। यदि किसी संख्या के साथ एक से अधिक शून्य जोड़ दिए जाएँ तो अरबों-खरबों तक की संख्या बन जाती है। कहने का तात्पर्य है किसी भी संख्या के साथ यदि शून्य बढ़ाते जाएँगे तो वह रकम उतनी ही बड़ी-बड़ी होती जाएगी। 
           वास्तव में शून्य का अर्थ कुछ नहीं होता। जब हम एक में शून्य जोड़ते हैं तो हमें एक ही मिलता है। यदि किसी को परीक्षा में शून्य अंक मिलते हैं तो इसका अर्थ होता है कि उसने सभी प्रश्न गलत किए हैं। हम कह सकते हैं कि शून्य केवल एक अंक नहीं बल्कि एक मौलिक अवधारणा है। इसने गणित को विकसित किया, प्रौद्योगिकी को सम्भव बनाया और दार्शनिक विचारों को गहरा किया है। 
           शून्य का हमारे जीवन में बहुत ही महत्व है। शून्य से ही हमारा जीवन शुरू होता है, शून्य में ही हम विलीन हो जाते हैं। शून्य से ही हम अपने हर काम को शुरू करते हैं। शून्य से ऊपर उठते हुए हम हर उपलब्धि को प्राप्त करते हैं। दुर्भाग्यवश यदि कभी हम शून्य पर आ जाते हैं तो ऊपर उठने की चाह फिर से बलवती होने लगती है। इस प्रकार हमारा जीवन शून्य पर ही चलता है। 
             हमारा जीवन भी एक प्रकार से शून्य होता है। जब मनुष्य पैदा होता है तब उसे कुछ भी ज्ञान नहीं होता। धीरे-धीरे वह जानने-समझने लगता है। वह बुद्धिमान बनने लगता है। यानी शून्य से ऊपर उठने के योग्य बनने लगता है। यदि उसमें हम सत्कर्मों को न जोड़ें तो हमारे इस जीवन का कोई मूल्य नहीं रह जाता। मनुष्य अपने खाते में जितने अधिक शुभकर्म जोड़ता जाता है, उतना ही संसार में उसका मूल्य बढ़ता जाता है। वह जीरो से हीरो बनने लगता है। अर्थात् वह संसार में महान बनकर सबके हृदयों में विराजमान हो जाता है। 
            मनुष्य का दिमाग उसे ईश्वर ने वरदन स्वरूप दिया है। विवेक शक्ति उसे ब्रह्माण्ड के अन्य जीवों से विशेष बनाती है। वह अपने दिमाग या विवेक का उपयोग यदि नहीं करता तब सभी लोग उसे सदा ही मूर्ख समझते हैं यानी शून्य या जीरो। उसके लिए महामूर्ख, गोबर गणेश, मिट्टी का माधो, गधा, अक्ल से पैदल इत्यादि विशेषणों का वे प्रयोग करते हैं।
        इससे भी अधिक यदि किसी मनुष्य का जन्म से ही दिमाग नहीं होता तो मेंटली रिटार्टिड कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यदि कहें तो वह मानव तन पाकर भी शून्य जैसा ही होता है। उसे अपनी कोई समझ नहीं होती पशुवत विचरण करता हुआ वह अपने घर-परिवार वालों को एक बोझ की तरह लगता है। उसके जन्म पर किसी को भी प्रसन्नता नहीं होती। उसके इस दुनिया से विदा होने पर सभी संबंधी राहत की साँस अवश्य लेते हैं।
            विचार यह करना है कि हम शून्य होने से बचना चाहते हैं या नहीं? मेरे विचार में कोई भी मनुष्य शून्य होना नहीं चाहेगा। उसका प्रयास यही होना चाहिए कि ऐसे कौन से कार्य वह करे कि दूसरों को सदा ही उसकी अनुपस्थिति अखरे। वह हमेशा सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहना चाहता है। चाहने मात्र से यह सब सम्भव नहीं हो सकता। उसके लिए मनुष्य को अपने आपको योग्य पात्र बनना होता है। मनुष्य को यह पात्रता कमानी होती है जो सदा ही समाज के नियमों के अनुसार आचरण करने से मिलती है। 
            मनुष्य के शुभकर्मों की अधिकता जब होती है तब उस जीव को मनुष्य का जन्म मिलता है। अपने पूर्वकृत अशुभ कर्मों को भोग लेने के पश्चात ही जीव को उनसे छुटकारा मिलता है उससे पहले कदापि नहीं। अन्यथा वह चौरासी लाख योनियों में अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगने के लिए बस बारबार चक्कर काटता रहता है और कष्ट भोगता है।
          शून्य पूर्णता की भावना का प्रतीक है जो यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक यात्रा का प्रत्येक पहलू व्यक्ति की पूर्णता में योगदान देता है। पूर्वी दर्शन में यह शून्यता (emptiness) है। यह बौद्ध धर्म की 'शून्यता' की अवधारणा से जुड़ा है जबकि यह असीम सम्भावनाओं के द्वार का भी प्रतीक है। ध्यान में 'शून्य' अवस्था प्राप्त करना, स्वयं को जानने और सत्य तक पहुँचने का मार्ग माना जाता है। 
          इस जन्म और मृत्यु के बन्धन से जीव जब तक मुक्त नहीं हो जाता तब तक उसे इस भवसागर के भंवर में गोते खाने पड़ते हैं इसके अतिरिक्त उसके पास और कोई चारा नहीं होता। इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ है और मृत्यु उससे दूर है तब तक उसे अपने पुण्य कर्मों की सूची को बढ़ाते रहना चाहिए और शून्यता की इस दुखदायी स्थिति से बचने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

संसार में आने का उद्देश्य

संसार में आने का उद्देश्य 

कबीरदास जी के एक सुप्रसिद्ध भजन की पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं-
   आया था किस काम को, तू सोया चादर तान के।
   सूरत सम्हाल ऐ गाफल, अपना आप पहचान रे।।
अर्थात् मनुष्य इस दुनिया में किस उद्देश्य से आया है, यह उसे भूलना नहीं चाहिए। अपनी वास्तविक पहचान को जानना चाहिए। अब होश में आ जाओ और अपने आप को पहचानो।
           इस विषय पर विचार करना आवश्यक है कि मनुष्य इस दुनिया में किस काम को करने के लिए आया था? ऐसा क्या हुआ कि वह यहाँ आने के अपने उद्देश्य को भूल गया है? उसे ऐसा क्या करना चाहिए कि जिससे वह जागकर स्वयं को पहचान सके?   
          कबीरदास जी का यह  निम्न दोहा हमें समझा रहा है -
      आया था किस काम को, बैठा है किस काम।
      तज कर मोह माया को, कर ले हरि का नाम।।
अर्थात् यह दोहा जीवन के उद्देश्य और नश्वरता पर आधारित हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हम इस दुनिया में क्यों आए हैं? हमारा असली काम क्या है? यह सांसारिक मोहमाया अस्थायी है। इस सांसारिक मोह और माया का त्याग कर देना चाहिए और भगवान के नाम का जाप करना चाहिए।
          यह दोहा हमें जीवन के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य को समझने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें बताता है कि हमें क्षणभंगुर सांसारिक कामों में नहीं उलझना चाहिए बल्कि ईश्वर की भक्ति पर ध्यान देना चाहिए।
            चौरासी लाख योनियों में अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों को भोगकर जीव मनुष्य का चोला धारण करता है। यह जन्म उसे ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मिला है। वह तब तक बारबार जन्म लेता रहता है जब तक वह अपने परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता।
          विद्वानों का कथन है कि जीव जब माता के गर्भ में होता है तब ईश्वर से नित्य प्रार्थना करता है कि मुझे इस अन्धेरे से बाहर निकालो और इस कष्ट से मुक्त करो। मैं सदा तुम्हें स्मरण करूँगा। परन्तु ज्योंहि जीव इस धरा पर अवतरित होता है त्योंहि उसे दुनिया की हवा लगने लगती है। वह ईश्वर से किए अपने सारे वादे भूल जाता है। फिर संसार के कारोबार में ऐसा रम जाता है कि वह इस संसार में आने के अपने उद्देश्य को किनारे कर देता है।
           इस प्रकार जीव इस संसार के मकड़जाल में फंसकर ही रह जाता है और गफलत में जीवन जीने लगता है। दुनिया की रेस में भागते-भागते निढाल होता रहता है। उसे दीन-दुनिया किसी की भी खबर नहीं रहती। बस अपने और अपनों के इर्द-गिर्द घूमते रहना उसकी प्रकृति बन जाती है। ऐसे में उसे अपने किए गए वादों की याद नहीं आती। 
            मनुष्य दुनिया में आकर बहुत स्वार्थी  बन जाता है। मनुष्य मृत्युपर्यन्त अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए अनेक यत्न करता है। पर वे हैं कि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते जाते हैं। मनुष्य के लिए अपने दायित्वों को निभाना प्राथमिकता होती है। ईश्वर का नाम जपना मानो उसकी सूची में आगे सरकता रहता है।
            बचपन में वह सोचता है कि अभी खेलने और पढ़ने की उम्र है। पहले अपने जीवन में सेटल हो जाऊँ फिर जवानी में ईश्वर को याद कर लूँगा। जब जवानी आती है तब घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण करने में वह बहुत अधिक व्यस्त हो जाता है। उस समय वह सोचता है कि बच्चे सेटल हो जाएँ, उनके शादी-ब्याह हो जाएँ तब फिर निश्चिन्त होकर मैं भगवान को याद करूँगा। वह अवस्था पार होने के बाद मनुष्य रिटायरमेंट की आयु में पहुँच जाता है और धीरे-धीरे अशक्त होने लगता है। तब शरीर उसका साथ नहीं देता और बीमारियाँ घेरने लगती हैं। उस अवस्था में भगवद् भजन फिर पीछे छूट जाता है।
           उस समय वह खीज उठता है जब कोई उसे ईश्वर का स्मरण करने के लिए कहता है। वह उत्तर देता है कि मैं बीमारी से पहले लडूँ या भगवान को याद करने बैठ जाऊँ। यदि उसने स्वयं को याद ही कराना है तो पहले मुझे ठीक तो करे। यही सब करते हुए उसका अन्तकाल भी आ जाता है। उस समय वह पश्चाताप करता है, प्रभु से क्षमा याचना करता और जीवन का समय बढ़ाने के लिए मिन्नतें करता है। उस समय उसे पर भर की‌ भी मोहलत नहीं मिल पाती।
             अब कुछ नहीं हो सकता। अब तो वही बात हो जाती है-  'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।' अपना सारा जीवन मनुष्य तथाकथित रूप से ईश्वर से नजरें चुराता रहता है। उसकी बताई हुई सारी शिक्षाओं को भूलकर दुनिया की चकाचौंध में खो जाता है। 
           यदि अन्तकाल में प्रसन्नता से हम उस मालिक के पास जाना चाहते हैं तो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। समय व्यर्थ गॅंवाए बिना उस प्रभु की अराधना में जुट जाना चाहिए। दुनिया के सारे कार्य व्यवहार स्वतः ही पूर्ण होते जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

नकल से विवेक कुण्ठित

नकल से विवेक कुण्ठित

दूसरों की नकल करने का स्वभाव हमारे उस विवेक को कुण्ठित कर देता है जो हमें अच्छाई और बुराई के अन्तर का ज्ञान कराता है। नकल करते समय हम अपने मस्तिष्क का नहीं बल्कि दिल का कहना मानते हैं। यानी कि जब कोई व्यक्ति केवल दूसरों की देखा-देखी या बिना सोचे-समझे नकल करता है तो उसकी अपनी सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह सही और गलत, अच्छे और बुरे के बीच का अन्तर नहीं कर पाता। उस समय मनुष्य अपने जीवन में उचित निर्णय लेने में असमर्थ होने लगता है। परिणाम स्वरूप वह गलत रास्ते की ओर अग्रसर हो सकता है। बुरी संगत में पड़कर व्यक्ति बुराइयों को सही मानने लगता है।
             यद्यपि नकल करते हुए मनुष्य को सदा अपनी अक्ल या बुद्धि का ही प्रयोग करना चाहिए। मनीषियों का मानना है कि बुद्धि ईश्वर ने हमें उपहार के रूप में दी है। जब हम दूसरों नकल करने का प्रयास करते हैं, उस समय मक्खी पर मक्खी नहीं मारनी चाहिए। इस विषय पर गहन विचार करना चाहिए कि जो काम हम करने जा रहे हैं उससे हमारी जग हंसाई तो नहीं होगी। 
          विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में कामचोरी के कारण जब गृहकार्य नहीं कर पाते तब साथी की कापी लेकर नकल कर लेते हैं। उस समय उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि वे अपने नाम के स्थान पर बिना समझे जल्दबाजी में साथी का नाम आदि लिख देते हैं। इससे अध्यापक को ज्ञात हो जाता है कि किसकी नकल करके वह कार्य किया गया है। इसी तरह परीक्षा के समय भी होता है। कभी-कभी अपने सही उत्तर को साथी के गलत उत्तर के कारण गलत लिखकर अपने अंक कम करवा लेने पर पछताना पड़ता हैं। यानी नकल करने से विद्यार्थियों में सोचने, याद करने और पढ़ने की क्षमता कम हो जाती है।
          आस-पड़ौस या बन्धु-बान्धवों के घर कोई भी नई वस्तु आ जाने पर हमारी अकुलाहट शुरू हो जाती है। चाहे वह उनका नया बड़ा घर हो अथवा महंगी नई गाड़ी हो। इनके अतिरिक्त बड़ा टीवी, बड़ा फ्रिज, महंगा नया फोन या आईपेड कुछ भी हो सकता है। हमारे मन में उन वस्तुओं को देखकर अनायास ही हीन भावना आने लगती है। तब सोचने लगते हैं कि कब हम उन अनावश्यक वस्तुओं को खरीद पाएँगे। 
           उस समय व्यक्ति और अधिक उलझ जाता है और उसे कुछ समझ नहीं आता।  उन वस्तुओं को खरीदने वालों को हम भाग्यशाली कहते हुए अपने दुर्भाग्य को कोसने लगते हैं। ईश्वर पर भी दोषारोपण करने से भी हम नहीं चूकते कि उसने हमें ये सब खरीदने की सामर्थ्य क्यों नहीं दी।
          तब हम अपने बैंक अकाऊँट खंगालते हैं। पड़ौसी के घर आने वाली नई वस्तुओं की नकल करके हम भी वस्तुएँ खरीद लेते हैं। उस समय हम उन वस्तुओं को खरीदने के लिए इतने अधिक उतावले हो रहे होते हैं कि यह भी विचार नहीं कर पाते कि उसे खरीदने के लिए हमारे पास साधन हैं भी या नहीं। यदि अपने पास धन है तो ठीक, नहीं तो जुगाड़ हो जाएगा वाली अपनी सोच का सहारा लेते हैं।
          तब हम पैसे का जुगाड़ करने में जुट जाते हैं। यदि हमें किसी अपने के माध्यम से धन मिल जाए तो बढ़िया, नहीं तो फिर हम किसी व्यक्ति से अथवा बैंक से कर्ज लेकर वह वस्तु खरीदकर परेशानी अवश्य मोल ले लेते हैं। आखिर उधार लिया हुआ पैसा चुकाना भी तो पड़ता है जिससे घर का मासिक बजट गड़बड़ा जाता है। कई आवश्यक खर्चों को मजबूरन रोकना पड़ जाता है।
           दूसरों की होड़ करते हुए हम अपने घर में यदा-कदा ऐसी वस्तुएँ भी एकत्रित कर लेते हैं जिनकी हमें आवश्यकता ही नहीं होती। इससे घर में जगह तो घिरती है और व्यर्थ ही पैसा भी बर्बाद हो जाता है। इसलिए यथासम्भव भेड़चाल न करते हुए दूसरों की नकल करने से बचना चाहिए। अपने विवेक का सहारा लेकर स्वयं को भविष्य में आने वाले कष्टों से सुरक्षित करने में ही बुद्धिमत्ता कहलाती है।
            अपने विचारों को स्पष्ट और सजग रखना चाहिए। अपनी सोच को व्यवस्थित करना चाहिए। अपनी गलतियों से सीखकर गलत आदतों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। अपने कार्यों का मूल्यांकन करते रहना चाहिए। कुसंगति से बचना चाहिए। सज्जनों की संगति में रहना चाहिए। सदा धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। सार रूप में हम कह सकते हैं कि नकल करना अपने विवेक को कमजोर करता है जबकि स्वाध्याय सज्जनों की संगति और आत्म-चिन्तन विवेक को मजबूत करते हैं और सही दिशा दिखाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

अमीर-गरीब की खाई पाटना

अमीर-गरीब की खाई पाटना

अमीर और गरीब की खाई को पाटना शायद उतना ही कठिन है जितना धरती और आकाश का मिलना। दोनों ही एक धुरी पर निश्चत दूरी बनाकर रहते हैं। धरती और आकाश के विषय में कहा जाता है कि एक स्थान पर ये मिल जाते हैं जिसे क्षितिज कहते हैं। यह वास्तविकता है या हमारी आँखों का भ्रम है इस पर विचार करना आवश्यक है।
           जब हम नजर उठाकर ऊपर आकाश की ओर देखते हैं तो हमें वह दूर-दूर तक दिखाई देता है। उसी तरह जब हम धरती की ओर देखते हैं तो हमें उसका ओरछोर भी नहीं समझ आता। खुले प्रदेश में जाकर जब हम बहुत दूर तक देखते हैं तो हमें ऐसा लगता है मानो धरती व आकाश परस्पर मिलने लगे हैं। वास्तव में ऐसा नहीं होता, वे दोनों कभी भी नहीं मिलते। वास्तव में यह केवल एक आभासी रेखा है अर्थात् हमारी अपनी ही नजरों का धोखा होता है।
           जिस प्रकार धरती और आकाश नहीं मिल सकते, उसी तरह अमीरी और गरीबी की खाई को पाटना बहुत कठिन कार्य है। आज इक्कीसवीं सदी के भारत में इन दोनों वर्गो का अन्तर दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। अमीर अधिक-अधिक अमीर बनते जा रहे हैं और गरीब नित्य ही अधिक गरीब होते जा रहे हैं। यह खाई पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रह सकती है।
               अमीर और गरीब की खाई का तात्पर्य है आय, सम्पत्ति और अवसरों में बहुत असमानता। कुछ अमीर लोग देश की अधिकांश आय और सम्पत्ति पर अपना प्रभुत्व जमाए रखते हैं। दूसरी ओर बड़ी परन्तु गरीब आबादी बहुत सीमित संसाधनों के साथ जीवन यापन करती है। इससे सामाजिक और आर्थिक विषमता बढ़ने लगती है। इस खाई के बढ़ने का कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक की पहुँच में अन्तर होता है। 
           अमीर बच्चों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ मिलती हैं जबकि गरीब बच्चों को सुविधाएँ मुश्किल से मिल पाती हैं। अमीर लोग एसी ट्रेनों में अथवा हवाई जहाज से यात्रा करते हैं जबकि गरीब लोग जनरल कोच में। यद्यपि यात्रा दोनों ही करते हैं परन्तु यह अन्तर स्पष्ट रूप से दिखता है कि उनकी सुविधाएँ अलग-अलग होती हैं।
          अमीर धन को 'अवसर' मानते हैं और निवेश करते हैं, जिससे उनका धन बढ़ता है। दूसरी ओर गरीब इसे 'कमाई की वस्तु' मानते हैं और केवल अपनी आय पर निर्भर रहते हैं। यह खाई राष्ट्रवाद, जलवायु परिवर्तन से असमान प्रभाव और शहरी क्षेत्रों में अमीरी-गरीबी के साथ-साथ रहने जैसी समस्याओं को बढ़ाती है। बढ़ता हुआ निजीकरण, रोजगार की कमी भी इस खाई का एक कारण कह सकते है।
             हम यहाँ किन्हीं आँकड़ों की बात नहीं करेंगे। इस लेख के माध्यम से केवल इतना ही यहाँ कहना चाहती हूँ कि हमें इन गरीबों के प्रति सदा सहिष्णुता का व्यवहार करना चाहिए। ये भी उस ईश्वर की सन्तान हैं जिसने अमीरों को और हम सभी मनुष्यों को बनाया है। इस भौतिक संसार में माता-पिता के लिए सभी बच्चे एक जैसे होते हैं चाहे वे गोरे या काले हों, स्वस्थ या रोगी हों, मोटे या पतले हों।      
          जिस जगत माता ने इस ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों को उत्पन्न किया है, वह तो अपने किसी भी जीव के साथ भेदभाव नहीं करती। वह अपने सभी बच्चों को उनके कर्मों के अनुसार यथासमय सब कुछ देती है। इसलिए उसे बिल्कुल सहन नहीं होता कि हम मनुष्य-मनुष्य में भेद करके उसकी सत्ता को चुनौती दें। उसके बच्चों से नफरत करें अथवा उन्हें धिक्कार कर परे हटा दें।
        ऐसी धन-सम्पत्ति जो न तो इहलोक और न ही परलोक में उनका साथ निभाती है, उसे प्राप्त करके पाकर मनुष्य  घमण्डी हो जाते हैं। वे अपने बराबर किसी को नहीं समझते। वे सोचते हैं कि उन्होंने धन क्या कमा लिया उन्हें लाइसेंस मिल गया है कि वे किसी के भी साथ दुर्व्यवहार कर सकते हैं। तभी वे किसी ऐसे इन्सान को इन्सान नहीं समझते।
        गरीब आदमी पर तो वे अविश्वास करते हैं। उन्हें चोर-उचक्का समझते हैं। उनको छोटा आदमी कहकर सदा उनका तिरस्कार करते हैं। पर सच्चाई तो यह है कि उनका एक कदम भी इनके बिना नहीं चल सकता। वे बेशक उनकी वफादारी पर सन्देह करते हैं।
        ईश्वर ने उन पर इतनी कृपा की है और उन्हें सुख के भरपूर साधन दिए हैं तो भी वे इतना नहीं करते कि इन लोगों की यथासम्भव सहायता करें। वे यदि चैरिटी करते हैं तो उसका उद्देश्य केवल दूसरों की वाहवाही पाना होता है। उन्हें यह बात सदा ही स्मरण रखनी चाहिए कि इन लोगों की दुआओं से ईश्वर उन्हें और सुख व समृद्धि देगा।
          धरती और गगन की तरह ही अमीर और गरीब में दूरी नहीं बनानी चाहिए। इन दोनों को सदा सद्भावना के धागे से जुड़कर रहना चाहिए। पूरे समाज के हित के लिए इन पिछड़े लोगों का उत्थान आवश्यक है। इस दिशा की ओर पहला कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।
चन्द्र प्रभा सूद   

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

पिता आकाश से ऊँचा

पिता आकाश से ऊँचा

आकाश की ऊँचाई सदा से उसकी महानता का प्रतीक रही है जिसे छूना शायद मनुष्य के लिए नामुमकिन है। उसे छू पाने की होड़ लगाते हुए पक्षी ऊँचे और अधिक ऊँचे तक उड़ने का प्रयत्न करते हैं परन्तु वे आकाश की ऊँचाई तक पहुँच ही नहीं पाते तब उसे छू लेना बड़ी दूर की बात हो जाती है। हाँ, इस प्रयास में उनके पंख अवश्य टूट जाते हैं। वे लहूलुहान भी हो जाते हैं, थककर चूर हो जाते हैं। फिर वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कभी-कभी कुछ पक्षी अपने प्राणों की आहुति तक दे देते हैं।
        आकाश का गहरा नीला रंग आरम्भ से ही कलाकारों, चित्रकारों और रचनाकारों के लिए सदा प्रेरणा का स्त्रोत रहा है। रात्रि के समय उसका नीला रंग चॉंद और सितारों से आच्छादित हो जाता है। उस समय उसकी सुन्दरता देखते ही बनती है। जब प्रातःकाल सूर्य भगवान का आविर्भाव होता है तब वहाँ पर छाई हुई लालिमा देखते ही बनती है। उस समय आकाश पर छाया वह अन्धेरे का साम्राज्य हमारे देखते-देखते सूर्य के प्रकाश से ओझल हो जाता है। उसका निखरा हुआ नया रूप हमारे सामने आ जाता है।
          मध्याह्न काल (दोपहर) में सूर्य के प्रचण्ड तेज से दमकते आकाश की छवि कुछ अलग-सी दिखाई देती है। चारों ओर प्रकाशमय वातावरण होता है। सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है। कहीं कोई ठोकर नहीं, कहीं कोई अन्धकार का साम्राज्य नहीं। होता है तो बस प्रकाशित आकाश जो सचमुच मोहक होता है। उसकी आभा से से चहुॅं ओर ओजस्वी आकाश दिखाई देता है। उस समय उसकी चमक को हम देखने में समर्थ नहीं हो पाते क्योंकि सूर्य के तेज से हमारी आँखे चुँधियाने लगती हैं।
          रात्रि में जब अन्धेरा होता है तब आसमान काले रंग का दिखाई देता है। उस समय हमें ऐसा लगता है मानो काले रंग की चादर पर किसी ने चमकते हुए चाँद और सितारे टाँक दिए हैं। रात में झिलमिल करती हुई इस चादर की छवि को निहारने का आनन्द कुछ अलग प्रकार का होता है। यह समय प्रकृति के विश्राम करने का होता है। चारों ओर शान्ति छाई रहती है।
          प्रातःकाल होते ही पक्षी अपने झुण्ड बनाकर आकाश में उड़ते हुए आते हैं। वे भोजन की तलाश में लग जाते हैं। अन्धेरा होने से पहले सायंकाल को पक्षी आकाश में उड़ते हुए अपने घोंसलों में चले जाते हैं। ऊॅंचे नभ में पक्षियों को उड़ते देखना बहुत मनभावन होता है। इससे भी बढ़कर पक्षियों की तरह के हवाई जहाज भी उसकी सुन्दरता में चार चॉंद लगा देते हैं। इन हवाई जहाजों को आकाश में उड़ता देखना हर आयु के लोगों को सुहाता है। वे इन्हें एकटक निहारते हैं।
          आकाश को कुछ समय के लिए जब बादल ढक लेते हैं उस समय धरा पर मानो अन्धकार छा जाता है। फिर उमड़-घुमड़ कर बादल बरस जाते हैं। तब उसके बाद निकलने वाले इन्द्रधनुष की छटा निहारते ही बनती है। चमकता हुआ आसमान और उस पर दमकता हुआ सात रंगों से सजा इन्द्रधनुष सबका मन मोह लेता है। यह सतरंगी इन्द्रधनुष कलाकारों और रचनाकारों की प्रेरणा बनता है। बच्चे इसे निहारकर बहुत प्रसन्न होते हैं।
         ऐसी महानता और ऊँचाई वाले आकाश से भी बड़ा स्थान शास्त्रों ने पिता का माना है। पिता मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने वाला होता है। वह अपने बच्चे का पालन-पोषण करता है। उसकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है। उसे पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाता है ताकि वह सिर उठाकर सब लोगों के सामने गर्व से खड़ा हो सके। जब बच्चा योग्य बनकर अपने दायित्वों को निभाने लगता है तब पिता गर्व से फूला नहीं समाता। यह उसके लिए गर्व का पल होता है।
            पिता अपनी सन्तान के माध्यम से अपने सारे सपनों को साकार करना चाहता है। जब दूसरे लोग उसके बच्चे को होनहार अथवा योग्य सन्तान कहकर प्रशंसा करते हैं तो उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। पिता अपनी सन्तान का सदा ही शुभचिन्तक होता है। वह अपने सारे कष्टों और अभावों के  बावजूद अपनी सन्तान के हित साधन में जुटा रहता है।
           जिस प्रकार आकाश को छू पाना किसी के लिए भी असम्भव होता है, उसी प्रकार पिता की महानता को छू सकना बच्चों के बस की बात नहीं होती। सन्तान के लिए जो कार्य पिता करता है, उससे मनुष्य उऋण नहीं हो सकता। चाहे वह आयुपर्यन्त उसकी सेवा करता रहे। बच्चे पिता के ऊँचे कद के बराबर नहीं पहुँच सकते। इसलिए पिता की महानता और उसकी ऊँचाई का सम्मान करते हुए, उससे होड़ न करके उसे हर प्रकार से प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

दूसरों की सहानुभूति बटोरना

दूसरों की सहानुभूति बटोरना

दूसरों की सहानुभूति बटोरने में कुछ लोगों को बहुत महारत हासिल होती है। दूसरों को बेवकूफ बनाने अथवा उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे नित नए बहाने गढ़ते रहते हैं। सोचने वाली बात यह है कि उन्हें स्वयं को सबके समक्ष बेचारा‌ बनाने में क्या मजा आता है? यह बात मुझे आज तक समझ नहीं आई। वे लोग कभी अपने स्वास्थ्य का रोना रोते रहते हैं तो कभी अपनी नाकामयाबी का। अपने घर-परिवार की छिछालेदर करके वे बहुत प्रसन्न होते हैं।
             कुछ लोग हर समय ही दूसरों के सामने अपने स्वास्थ्य अथवा अपनी मजबूरियों का रोना रो करके दूसरों को यह बताना चाहते हैं कि वे अकेले दुनिया में ऐसे हैं जो सबसे अधिक परेशान हैं। उन्हें इस बात को याद रखना चाहिए कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे कोई परेशानी न हो। किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो कोई धन-सम्पत्ति के न होने से दुखी है। कोई बच्चों के कारण परेशानी में है तो कोई व्यपार-नौकरी के साथियों से कष्ट में हैं।
           बहुत-सी बेटियाँ विवाह के उपरान्त से ही अपने ससुराल के लोगों की बुराई करके मायके में सहानुभूति पाना चाहती है। ऐसा करके वे अपने ससुराल पक्ष का अपमान करती हैं। कुछ लड़कियाँ अपने पति की बुराई अपने माता-पिता के सामने करके उसका सम्मान कम करवा देती हैं। वे भूल जाती हैं कि ऐसा करके वे अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए माता-पिता से धन-सम्पत्ति तो बटोर सकती हैं पर अपने पति व अपने घर को बदनाम कर देती हैं।
            सास अपनी बहू की बराई करके अपने घर-परिवार तथा अपनी सखियों में सहानुभूति बटोरती है और बहू अपनी सास की बुराई करके अपने मायके व सहेलियों में सहानुभूति बटोरने का यत्न करती है। इस प्रकार पर से कीचड़ उछालकर वे एक-दूसरे की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। इस तरह दोनों स्वयं को बन्धु-बान्धवों के समक्ष‌ बेचारा‌ घोषित कर देती हैं। वे भूल जाती हैं कि रहना तो उन दोनों ने एक ही घर में है। एक-दूसरे के साथ ही निभाना है।
           कुछ पुरुष साथी महिलाओं की सहानुभूति पाने के लिए अथवा उनसे दोस्ती करने के लिए अपनी पत्नी के विषय में झूठी और मनगढ़न्त कहानियाँ सुनाकर उसके चरित्र को कलंकित करने से नहीं हिचकिचाते। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि यदि उनकी पत्नी को किसी तरह पता चल जाएगा तो क्या होगा? अथवा यदि कभी वह उनके मित्रों के सामने आ जाएगी तो उनकी पोल खुल जाएगी। तब वे उनसे ऑंख भी नहीं मिला पाऍंगे।
          इसी प्रकार कई महिलाएँ भी कमोबेश इसी प्रकार का व्यवहार करके यानी वे अपने पति व अपने सास, ससुर व ननद की बुराई करके दूसरे पुरुष मित्रों से अनावश्यक अतरंगता बढ़ाने का यत्न करती हैं। अथवा अपने सहकर्मियों के मध्य बेचारी बनने का प्रयास करती हैं। इस प्रकार का व्यवहार करके वे पुरुष एवं महिलाएँ समाज में हंसी का पात्र बनते हैं और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध चलने का दोषी भी बनते हैं। सत्य यह है कि उनकी पोल कभी+न-कभी खुल जाती है और सच्चाई सबके सामने आ जाती है।
            कभी-कभी मित्र भी अपने दोस्तों की भावनाओं का मजाक उड़ाते हुए, उनसे जब तब अपना मतलब पूरा करने का प्रयास करते हैं। परन्तु असली मुद्दे की बात यह है कि जो भी लोग इस प्रकार से दूसरों की भावनाओं से खिलवाड़ करके जायज-नाजायज तरीकों से सहानुभूति पाना चाहते हैं, वे भूल जाते हैं कि जब सच्चाई सामने आती है तो बहुत ही शर्मसार होना पड़ता है। तब ऑंखे शर्म से झुक जाती हैं और तब ऐसे लोग बगलें झॉंकने लगते है।
           कहने का तात्पर्य है यह है कि झूठ के पैर नहीं होते और सच्चाई कभी छुप नहीं सकती। सच और झूठ में कभी सच का पलड़ा भारी हो सकता है तो कभी झूठ का। पर अन्त में सत्य सात पर्दों से मुस्कुराता हुआ बाहर आ ही जाता है। तब झूठ का लबादा उतर जाता है। ऐसे लोग कहीं के भी नहीं रहते। वे दूसरों की नजरों से उतर जाते हैं। उन लोगों पर फिर कोई विश्वास नहीं करता। इस तरह क्षणिक सहानुभूति बटोरने के चक्कर में वे अलग-थलग पड़ जाते हैं।
          अपनी स्थिति के विषय वास्तविक जानकारी देना उपयुक्त होता है। इससे न तो अपनी स्वयं की हेठी नहीं होती है और न ही रिश्तों की गरिमा नष्ट होती है। रिश्तों में सद्भाव बढ़ाने के लिए नफरत और झूठ का नहीं बल्कि प्यार और सच्चाई का छौंक लगाना चाहिए। ऐसा करने से रिश्तों की गर्माहट कम नहीं होती और एक-दूसरे के प्रति प्रेम तथा विश्वास बना रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 14 दिसंबर 2025

जीत की कामना

जीत की कामना

जीत की कामना हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है। कोई भी मनुष्य हारना पसन्द नहीं करता। हालॉंकि हार और जीत दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो नदी के दो किनारों की तरह कभी मिल नहीं सकते। वे आवश्यक दूरी बनाकर रहते हैं। एक समय में मनुष्य को जीत या हार दोनों में से कोई एक ही मिल सकती है। यह उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने सिर पर जीत का सेहरा बाँधना पसन्द करता है अथवा फिर हारकर अपना मन मसोसकर रह जाता है।
            हर खेल में जीत और हार के मायने अलग-अलग होते हैं क्योंकि वहाँ न जीत स्थायी होती है और न ही हार सदा के लिए होती है। वहाँ तो दोनों ही पक्ष आमने-सामने खड़े होते हैं। यह निश्चित है कि जब खेल की समाप्ति पर परिणाम घोषित किया जाएगा तो उन दोनों टीमों में से एक जीतेगा और दूसरा हाथ जाएगा। परन्तु जिन्दगी की इस रेस में ऐसा नहीं होता है। हम दोनों हाथों में लड्डू की तरह जीत और हार को एकसाथ लेकर तो कभी आनन्दित नहीं हो सकते। यदि यहाँ जीत का लक्ष्य लेकर चलेंगे तो हार से बच सकने का रास्ता खोजने में आसानी होगी।
           जीवन के खेल में हर कोई जीत के लिए लड़ता है, संघर्ष करता है। अपने प्रतिद्वन्द्वी को धोबी पछाड़ देने का प्रयत्न करता है। यह आवश्यक नहीं कि दिन विशेष हमारा ही होगा। हमारे सामने वाला भी तो जीत की कामना से ही उपस्थित होगा। अब जिसका प्रयास अधिक होगा उसी की मेहनत रंग लाएगी। इसका यह अर्थ नहीं कि हम हार मानकर निराश हो जाऍं अथवा कहीं मुॅंह छिपाकर बैठ जाऍं।  सयाने कहते हैं - 
      मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती 
इसका अर्थ यह है कि हार जीत का दूसरा पक्ष है। चींटी की तरह बार-बार परिश्रम करने वाले को जीत का स्वाद चखने से कोई नहीं रोक सकता।
             यहॉं एक बात कहना चाहती हूॅं कि हार जाने की कल्पना एक छोटा बच्चा भी कभी नहीं कर पाता। उसे शायद इस हार-जीत का अर्थ भी ठीक से नहीं पता होगा। जब वह खेलते हुए जीत जाता है तो खुश होता है, नाचने लगता है। इसके विपरीत जब वह खेल में हारने जाता है तो रोने लगता है। दूसरे बच्चों पर धोखा देने का आरोप लगाने लगाता है। उसके बाद वह खेल छोड़कर भाग जाता है।
           यह सत्य है कि जीतने वालों के हौंसले बुलन्द रहते हैं। वे अपने लिए आदर्श स्थापित करते हैं और दूसरों के आदर्श बनते हैं। ये निर्भीक लोग चुनौतियों का डटकर सामना करते हैं और उन्हें अपने पक्ष में करके ही दम लेते हैं। चाहे आकाश की ऊँचाई हो अथवा सागर की गहराई हो या फिर पर्वतों की रुकावट हो, उनके मार्ग में बाधा नहीं बनती। वे एक छोटी-सी नौका से विशाल सागर पार करने की सामर्थ्य रखते हैं। साइकिल से विश्व भ्रमण तक कर लेते है। एक बार जीत की आदत हो जाने पर बार-बार मनुष्य को इसका स्वाद चखने की इच्छा होती है।
            इसके विपरीत हार जाना बहुत ही सरल होता है। हाथ पर हाथ रखकर निठल्ले बैठ जाओ, जरा भी उद्यम न करो तब तो हार निश्चित है। परिवारी जन उठते-बैठते सदा लानत-मलानत करते रहते हैं। सारा समय नाकामयाबियों के किस्से सुनाकर उसे अपमानित करते रहते हैं। मित्र मण्डली हारे हुए व्यक्ति का साथी बनने से इन्कार कर देती है। तब भी यदि वह हार का ठीकरा अपने सिर पर फोड़ने से बाज नहीं आए तो ईश्वर ही ऐसे लोगों की रक्षा कर सकता है।
           हारने वाला अपने जीवन से सदा ही निराश रहता है। जो मनुष्य समाज में रहते हुए अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाता, उसके कारण वह सदा ही दूसरों के सामने अपना मुँह छिपाता फिरता है। उसके अपने पत्नी व बच्चे तक उसका साथ नहीं देते। वह अलग-थलग पड़ जाता है। उसे सदा के लिए ही नकारा घोषित करके अपने लोगों से दूर कर दिया जाता है। सयाने कहते हैं- 
                  हारे को हरि नाम
अर्थात् जो व्यक्ति हार जाता है उसके पास परमात्मा की शरण में जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता।
          कुछ लोग हार जाने के डर से रेस का भाग ही नहीं बनते ऐसे ढुलमुल चरित्र वाले लोग जीवन में सदैव पिछड़ते जाते हैं। उनका नाम तक भी कोई नहीं लेता। जीत साहस, कठेर परिश्रम एवं निडरता का प्रतीक है। जबकि हार आलस्य, भगोड़ेपन और डर का प्रतीक है। जो मनुष्य जितना आत्मविश्वास पूर्वक आगे बढ़ता जाता है, वह उतनी ही बाधाओं को पार करता हुआ सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। यही जीते हुए लोग इतिहास के पन्नों में युगों-युगों तक अमर हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

मॉं के हाथ का स्पर्श

 माँ के हाथ का स्पर्श

माँ के हाथ का स्पर्श बच्चे के लिए रामबाण दवा का काम करता है। बच्चा जब कहीं गिर जाता है या उसे चोट लग जाती है तो माँ उसे सहला देती है। वह अपनी चोट के दर्द को भूल जाता है। घर में जब अपने से किसी बड़े से उसे डाँट पड़ जाती है तो बच्चा रोते हुए आकर अपनी माँ से शिकायत करता है। तब माँ सब पर गुस्सा करने का उसे आश्वासन देकर बहला देती है। उसे विश्वास होता है कि मॉं से अपनी समस्या बता दी है तो वह चुटकी बजाते ही उसकी समस्या का समाधान कर देगी।
           उसका किसी दोस्त से यदि झगड़ा हो जाता है और वह दुखी होकर घर आता है तब माँ उन दोनों में प्यार से सुलह करवा देती है। स्कूल में टीचर से उसे फटकार लगती है तो बच्चा घर आकर अपनी माँ की गोद में दुबक जाता है। उसे लगता है कि वह अपनी माँ की गोद में है, वह उसे बचा लेगी। माँ उसके सिर पर जब अपना ममता भरा हाथ फेरती है और प्यार करती है तो बच्चा कक्षा में हुए अपने तथाकथित अपमान को भूल जाता है। प्रसन्न होकर वह मस्त हो जाता है।
            अपनी माँ पर हर बच्चा आँख मूँदकर विश्वास कता है। वह यही सोचता है कि उसकी माँ उसे हर परेशानी से छुटकारा दिला देगी। इसी सोच से वह प्रफुल्लित हो जाता है। अपने सारे दुख-दर्द अपनी माँ के साथ साझा करके वह सब कष्टों अथवा परेशानियों को भूल जाता है। उसे ऐसा लगता है मानो उसने कोई जंग जीत ली हो। तब नवीन उत्साह से मस्त होकर नाचने लगता है, खेलने लगता है। यह बच्चे की सरलता और सहजता का ही परिणाम होता है।
             इसे हम लोग 'टच थेरेपी' भी कह सकते हैं। बच्चे को कैसा भी कष्ट हो माँ के स्पर्श मात्र से ही वह अपने सारे कष्ट भूल जाता है। माँ का प्यार से सिर पर हाथ फेरना अथवा गोद में लेकर सहला देना ही उसकी हर मर्ज की दवा बन जाता है। बच्चे की यह हार्दिक इच्छा होती है कि जब भी उसे अपनी मॉं की आवश्यकता हो, वह उसे सरलता से उपलब्ध होनी चाहिए।
            ईश्वर की कुदरत है कि माँ के साथ उसका सम्बन्ध सबसे अधिक होता है। वह नौ मास तक माता के गर्भ में रहता है और उसी से ही पुष्ट होता है। यह सुरक्षाकवच जन्म के पहले ही माता द्वारा उसे मिलता है। यही कारण है कि वह अपने हर कार्य के लिए अपनी माँ पर ही निर्भर रहता है। अपनी हर छोटी-बड़ी जिद उसी के माध्यम से पूरी करने का यत्न करता है। माता बच्चे की प्रथम गुरु कहलाती है।
          समाज में ऐसा भी देखा गया है कि कुछ बच्चे जन्म से विकलॉंग होते हैं। बच्चे के पिता सहित उस घर के सभी लोग उसका दायित्व उठिना नहीं चाहते। वे उसे किसी संस्था में रखना चाहते हैं। परन्तु मॉं ही अकेली ऐसी होती हैं जो अपने उस बच्चे को कलेजे से लगाकर पालती है। उसे घर से दूर छोड़ने के लिए तैयार नहीं होती। वह अपने बच्चे की विकलॉंगता को अनदेखा कर देती है। बहुत से बच्चे अपनी किसी भी आवश्यकता के लिए पिता से बात करने में डरते हैं। परन्तु आशा भरी नजरों से अपनी माता की ओर देखते हैं। वह उनकी उम्मीदों पर खरी उतरती है।
            ऐसा नहीं है कि घर के अन्य सदस्य उसे प्यार नहीं करते अथवा उसे आश्वस्त नहीं करते। वे उसकी सारी आवश्यकताओं का ध्यान भी रखते हैं। उसके मन को बहलाने के लिए वे माँ की तरह लोरी भी सुनाते हैं और कहानी भी। उसे घुमाते-फिराते भी हैं और उसकी हर जिद को पूरा करते हैं। इतना सब होने के बाद भी बच्चे को केवल माँ की गोद ही चाहिए होती है।
          इसका कारण स्पष्ट है कि माँ का स्पर्श ही उसका सबसे बड़ा सहारा होता है। बच्चे को घर के अन्य सदस्य यदि न दिखें तो वह उनके बारे में पूछताछ करता है उन्हें ढूँढने का प्रयास करता है। परन्तु यदि वह कहीं से खेलकर लौटा है अथवा स्कूल से अपने घर वापिस आया है तो अपनी माँ को सामने न पाकर रोने लगता है। घर में चाहे सभी सदस्य विद्यमान हों पर वह यह कदापि सहन नहीं कर सकता कि उसकी अपनी माँ उसकी आँखों से पलभर के लिए भी ओझल हो जाए।
            विद्वानों का मानना है कि बच्चे की कोई गलत आदत छुड़ानी हो या उसे अच्छे संस्कार देने हों तो उसके सो जाने पर यदि माता उसके सिर पर हाथ फेरते हुए गलत आदत छोड़ने अथवा अच्छे संस्कार अपनाने के लिए प्रेरित करे तो बच्चे पर उस क्रिया का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 
             माँ बच्चे का यह सम्बन्ध बहुत ही भावनात्मक होता है। बच्चा काला हो या गोरा, दुबला हो या मोटा अथवा अपाहिज कैसा भी हो वह अपनी माँ के कलेजे का टुकड़ा होता है। उसे वह अपने सीने से लगाकर रखती है। दुनिया भर की मुसीबतें वह अकेले सह लेती है पर अपने बच्चे को गर्म हवा तक नहीं लगने देती । बच्चा भी यह जानता-समझता है कि दुनिया में कोई भी उस पर हंस ले या उसका मजाक उड़ा ले पर माँ कभी भी उसका उपहास नहीं करेगी। बच्चे को अपने पिता से भी अधिक अपनी माता पर विश्वास होता है। इसीलिए माँ तो माँ होती है। उसके नेह और उसकी छत्रछाया में बच्चे को हर पल आत्मविश्वास मिलता है। उसके सहारे वह कुछ भी कर गुजरता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

रुचिकर सुनने की चाहत

रुचिकर सुनने की चाहत

हमें जो रुचिकर लगता है वही हम सुनना चाहते हैं। हम यह कदापि नहीं चाहते कि कोई व्यक्ति हमारी आलोचना करे। इसे हम एक इन्सानी कमजोरी कह सकते हैं कि मनुष्य अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति का भी हस्तक्षेप अपने किसी भी मामले में पसन्द नहीं करता। उस समय उसे ऐसा लगता है कि कोई दूसरा व्यक्ति अनावश्यक ही हमारी स्वतन्त्रता में बाधक बन रहा है। यह बात हमें किसी भी तरह से सह्य नहीं होती। तब हम उस व्यक्ति की शक्ल भी नहीं देखना चाहते।
             मनुष्य स्वयं चाहे दूसरों पर कितनी ही छींटाकशी क्यों न कर ले, उन्हें भला-बुरा कह ले परन्तु जब उसकी बारी आती है तो वह क्रोधित हो जाता है। वह सोचता है कि फलाँ व्यक्ति की हिम्मत कैसे हुई कि उसका विरोध करे? अपने विरोधियों को वह गाली-गलौज करता है। उन्हें पानी पी-पीकर कोसता है। ऐसा तो कदापि नहीं हो सकता कि जो अच्छा है, मीठा है वह सब हमारे हिस्से में आएगा और जो कटु है, कड़वा है वह दूसरे के हिस्से में रहेगा। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं- 
          बिना आईने के मनुष्य अपना चेहरा 
          नहीं देख सकता।
अर्थात् अपनी असलियत जानने के लिए उसे दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है।
          हमें तो लोगों के वही विचार अच्छे लगते हैं जिनसे हमारी प्रशंसा होती हो। इसी प्रकार वहीं व्यक्ति अच्छा लगता है जो हमारे लिए अच्छी-अच्छी बातें कहे।  हमारी सोच रही होती है कि घर-परिवार में, भाई-बन्धुओं में और समाज में हमारा कोई भी विरोध करने वाला न हो। सभी लोग हमारी प्रशस्ति में कसीदे पढ़ते रहें। हमारे अन्दर जो भी बुराइयाँ हैं, उन्हें अनदेखा करके सब लोग केवल हमारी अच्छाइयों के प्रशंसक बनें। यह प्रशंसा चाहे दूसरे लोग स्वार्थवश चापलूसी ही क्यों न हो।
          इस सबको सोचने में, कल्पना करने में बहुत आनन्द आता है। परन्तु यदि हम इसे वास्तविकता के धरातल पर देख सकें तो कह सकते हैं कि यह कदापि सम्भव नहीं हो सकता। प्रत्येक मनुष्य में अच्छाई और बुराई दोनों का समावेश होता है। यदि मनुष्य में बुराई न हो तो वह देवतुल्य बन जाएगा। इस सत्य को जितनी जल्दी स्वीकार का लिया जाए, उतना ही मनुष्य के लिए अच्छा हो जाएगा। तब उसे अपनी अच्छाइयों को संवारने और बुराइयों को दूर करने में महारत हासिल हो जाएगी।
          हम भगवान तो हैं नहीं कि हममें कोई बुराई नहीं होगी। हम इन्सान हैं, गलतियाँ करना हमारा स्वभाव है। हम समय-समय पर गलतियाँ करते रहते हैं और फिर बार-बार उसके लिए क्षमा याचना करते हैं। जब हम पूर्ण नहीं हैं तो हमारी आलोचना होना भी स्वाभाविक है। हम इस समस्या से कभी बच नहीं सकते। ईश्वर जो पूर्ण है, हम लोग उस पर भी दोषारोपण करने से नहीं चूकते तो फिर दूसरों से यह आशा किस प्रकार रख सकते हैं कि हमारी मूर्खताओं के बावजूद भी वे हमें अपमानित नहीं करेंगे।
        अपनी टीका-टिप्पणी होने पर मनुष्य को कभी घबराना नहीं चाहिए। विपरीत परिस्थिति होने पर उसे सदैव डटकर सामना करना चाहिए, अपने आलोचकों को सम्मान देना चाहिए। ये वही लोग हैं जो उसकी कमियों को चुन-चुनकर दूर करने में उसकी सहायता करते हैं। यदि मनुष्य इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखे तो वह अपने अन्दर विद्यमान कमजोरियों को नियन्त्रित  करके अपने भावी जीवन को सफल बना सकता है। इन निन्दकों को कबीरदास जी ने शुभचिन्तक कहा है-
       निन्दक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय।
      बिन पानी-साबुन बिना निर्मल करे सुभाय॥
अर्थात्  इस दोहे में कबीर दास यह समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति आपकी निन्दा करता है, जो व्यक्ति हर समय आपके भीतर कमियॉं तलाशता है, उसे हमेशा अपने पास रखना चाहिए। क्योंकि एक वही है जो बिना साबुन या बिना पानी के आपके स्वभाव को निर्मल बना सकता है। आपके भीतर की हर कमी को दूर कर सकता है।
             वास्तव में निन्दक लोग मनुष्य के अन्तस के दोषों को दूर करने में सहायक होते हैं। इसलिए इनसे घृणा करने के बजाय उन्हें अपना हितैषी मानना चाहिए। यदि मनुष्य ऐसा सोच ले तो उसे अपनी निन्दा होने पर दुख नहीं होगा बल्कि उसे उन सब लोगों की तुच्छ मानसिकता के विषय में सोचकर कष्ट होगा जो अपना मूल्यवान समय अनावश्यक ही दूसरों की बुराई करने में बर्बाद करते हैं। तब अपनी प्रशंसा सुनकर उसे न तो प्रसन्नता होगी और न ही अपनी निन्दा सुनकर वह कभी विचलित होगा।
          वास्तव में अक्सर हम उन लोगों की कम्पनी में रहना पसन्द करते हैं जो हमारे प्रिय होते हैं जो हमारी तारीफ करते हैं या हमारे भीतर सिर्फ गुणों को ही खोजते हैं। अपने प्रति हुए ऐसे व्यवहार पर हम लोग आनन्दित रहते हैं। अपनी आलोचना की चिन्ता किए बिना, उससे सदा ही प्रेरणा लेकर हम नित्य ही उन्नति के शिखर पर पहुँच सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए

अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए 

अफवाहों पर हमें बिलकुल ध्यान नहीं देना चाहिए। अफवाहें फैलाने वाले बेसिर-पैर की बातों को उड़ाते रहते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि फैलाई गयी सारी खबरों में सच्चाई हो। कभी-कभी उनकी सत्यता की परख करने पर परिणाम शून्य होता है। उस समय हमारे मन को कष्ट होता है कि काश हमने इन अफवाहों को सुनकर व्यक्ति विशेष के लिए राय न बनाई होती। तब तक सब हाथ से निकल जाता है। हमने जो भी लानत-मलानत करनी होती है वह हम कर चुके होते हैं।
          ये अफवाहें हमारे लिए रास्ते का काँटा बन जाती हैं। यदि हम गम्भीरता से विचार करें तो आज इस भौतिकतावादी युग में सब कुछ सम्भव है। लोगों को दूसरों की छिछालेदार करने में अभूतपूर्व सुख मिलता है। उन्हें मिथ्या आत्मतोष मिलता है कि उन्होंने दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लोग अपने विरोधियों पर कीचड़ उछाल करके उन्हें अपमानित करने के अवसर से नहीं चूकते। परन्तु ऐसा दुष्कृत्य करने वाले वे भूल जाते हैं कि कल जब उनकी बारी आएगी तो फिर उन्हें कैसा लगेगा?
        इन कुत्सित अफवाहों से हम अपना ध्यान थोड़ा हटा करके तर्कशास्त्र की इस उक्ति पर हम विचार करते हैं। तर्कशास्त्र का मानना है- 
           यत्र यत्र धूम: तत्र तत्र वह्नि:
अर्थात् जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ अग्नि अवश्य होती है। यदि आग जलेगी तो धुआँ भी होगा। वह धुआँ दूर-दूर तक उड़कर जाता है। दूर तक उड़ते हुए उस धुँए के कारण यदि किसी को जलती हुई आग नहीं दिखाई देती तो उसका यह अर्थ हम कदापि नहीं लगा सकते कि कहीं भी आग नहीं जल रही है।
            अपने इस सूत्र को सिद्ध करने के लिए तर्कशास्त्र उदाहरण देता है कि एक मोटा-सा देवदत्त नामक व्यक्ति है जो दिन में नहीं खाता। इसका सीधा-सा यही अर्थ निकलता है कि देवदत्त खाना खाता ही नहीं है। अब प्रश्न यह उठता है कि फिर वह जीवित कैसे रहता है?
            इस पर तर्क या विवाद करते हुए शास्त्र कहता है कि यदि वह देवदत्त दिन में नहीं खाता तो निश्चित ही रात को खाता होगा। क्योंकि कोई भी व्यक्ति बिना खाए बहुत समय तक जीवित नहीं रह सकता। यदि वह स्वस्थ है तो पक्की बात है कि वह सबसे नजर बचाकर छिपकर खाता है या फिर रात को खाता है। इसे कह सकते हैं तर्क की कसौटी पर परख कर विश्वास करना।
            एक बात और मैं आपके सामने रखना चाहती हूँ जिससे आप सभी सहमत होंगे। मीडिया के इस युग में कम्प्यूटर के फोटोशाप के द्वारा किसी भी तरह के चित्र अथवा वीडियो बनाए जाते हैं। इसी प्रकार वायस मिक्सिंग करके आडियो भी बनाए जा रहे हैं। इन सबसे किसी को भी बदनाम किया जा सकता है। इस प्रकार आँखों से देखी पर भी विश्वास करना बहुत घातक हो सकता है।
          मीडिया द्वारा परोसे जा रहे उन्माद से बचना चाहिए। सामान्य सामाजिक दृष्टिकोण से चीजों को देखने-समझने की कोशिश करनी चाहिए। केवल किसी पक्ष या विपक्ष के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। सोशल मीडिया यानी व्हाट्सएप, फेसबुक, इन्स्टाग्राम आदि जैसे प्लेटफॉर्मों पर तेजी से फैलने वाले इन समाचारों पर ऑंख मूॅंदकर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। बहुधा शरारती तत्व इन्हें फैलाने का कार्य करते हैं। 
            किसी भी अशान्ति या गलतफहमी की स्थिति में बिना सोचे अपनी प्रतिक्रिया देने के स्थान पर शान्त रहकर संयम का प्रदर्शन करना चाहिए। इस विषय में भेड़चाल सदैव हानिकारक होती है।अपनी आँखों से देखी हुई और कानों से सुनी हुई किसी भी बात को आँख मूँदकर मानने से पहले उस पर अच्छी तरह विचार-विमर्श कर लेना चाहिए। उसे अपने विवेक की कसौटी पर कस लेना चाहिए तभी उसे मानना चाहिए। अन्यथा अनर्थ की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
          अन्त में यदि कहा जाए तो हमें अफवाहों को नजरअंदाज करना चाहिए। यदि  ऐसा लगे कि कोई इन्हें फैला रहा है अथवा किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी मिले तो तुरन्त स्थानीय पुलिस अथवा सम्बन्धित अधिकारियों को सूचित करना चाहिए। स्वयं होकर कोई कार्यवाही नहीं करनी चाहिए और न ही उसे फैलाना चाहिए। ये अफवाहें हमारे अपने लिए, देश, धर्म और समाज के लिए घातक हो सकती हैं। इसलिए सदा सावधानी बरतना बहुत आवश्यक होता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

दूसरों का मूल्यांकन

दूसरों का मूल्यांकन

दूसरों का मूल्यांकन करने का अर्थ होता है किसी व्यक्ति विशेष के विषय में पूर्ण जानकारी जुटाए बिना अपनी धारणाओं, अनुभवों‌ और पूर्वाग्रहों के आधार पर हम अपनी राय बना लेते हैं। उसी के अनुरूप हम किसी निष्कर्ष पर पहुॅंच जाते हैं और कोई निर्णय ले लेते हैं। हमें अपने ऊपर इतना विश्वास होता है कि हम किसी दूसरे की व्यक्ति की योग्यता, उसके चरित्र अथवा उसकी नियत का आकलन करने लगते हैं। वास्तव में यह एक स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है। 
          यह सामाजिक परिस्थितियों को समझने में हमारी सहायता करती है। हमारी सोच कभी-कभी नकारात्मक भी हो सकती है। दूसरों का मूल्यांकन करते समय हमें ऐसा प्रतीत होने लगता है कि फलाँ व्यक्ति में तो ऐसी कोई विशेष योग्यता नहीं है, हमें जिसकी चर्चा अवश्य करनी चाहिए। इस सत्य से हम मुॅंह नहीं मोड़ सकते कि संसार में कोई भी व्यक्ति दूसरे को योग्य कहकर उसकी प्रतिष्ठा नहीं करना चाहता।
           अपने घर की ओर नजर डालते हैं, वहाँ आपका बेटा अथवा बेटी इतने योग्य हो सकते हैं कि दफ्तर में उनके अधीन अनेक कर्मचारी हों। आफिस में उनका अनुशासन इतना अधिक हो कि कोई कर्मचारी गलत काम करने का साहस न कर सकता हो। वे स्वयं भी दिन-रात कार्य करते हुए, अपने अधीनस्थों से वैसा ही कार्य करवाते हों जैसा वे चाहते है। उनके विरोधी भी उनका लौहा मानने के लिए विवश हो जाते हों।
          ऐसे योग्य बच्चों के माता-पिता को यही लगता है कि उनके बच्चे बेशक बहुत पढ़-लिख गए हैं और बड़े हो गए हैं परन्तु फिर वे भी अभी नादान हैं, बहुत भोले हैं। उन बेचारों को तो दुनियादारी की बिल्कुल भी समझ नहीं है। अपनी ओर से वे उन्हें सदैव अपनी छत्रछाया में संरक्षित करना चाहते हैं। अपने बच्चों के लिए आयुपर्यन्त ही संवेदनशील बने रहना चाहते हैं।
            प्राय: पति भी अपनी पत्नी के विषय में सोचता है कि उसकी पत्नी तो मूर्ख है उसे दुनियादारी की क्या समझ है? यह भी हो सकता है वह यदि उसकी योग्यता के विषय में सोचने लगे तो उसे स्वयं ही समझ में आ जाए कि उसकी सोच बहुत गलत थी। उसकी पत्नी में तो बहुत से गुण हैं यानी कि वह मल्टी टेलेंटेड औरत है। वह घर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर सफल है। जितनी कुशलता व लगन से वह अपने दफ्तर के कार्य निपटाती है उसी ही निष्ठा से घर-गृहस्थी व बच्चों के कामों को भी करती है। अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए अनावश्यक ही नित्य नए बहाने नहीं बनाती।
           प्रायः पत्नियाँ भी अपने पतियों के विषय में इसी प्रकार के नकारात्मक विचार रखती हैं। उन्हें भी ऐसा लगता है उसके पति को कोई समझ नहीं है। न वह घर का कार्य कर पाता है और न बाहर के दायित्वों का निर्वहन कर सकता है। हाँ, घर पर जितना समय रहता है अशान्ति ही फैलाता रहता है। इसलिए दोनों एक-दूसरे के प्रति असहिष्णु हो जाते हैं और हर समय ही अपने साथी को सहन न कर सकने का रोना रोते रहते हैं।
             पति और पत्नी घर में एक-दूसरे को नासमझ मानकर परस्पर दोषारोपण करते रहते हैं। उन दोनों में से कोई भी अपने मन से यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता कि उनका अपना जीवनसाथी किन्हीं विशेष योग्यताओं वाला हो सकता है। जिसके कारण उसका सम्मान उसके अधीनस्थ करते हैं। उसके सम्पर्क में आने वाले उसके काम करने के तरीकों से बहुत प्रभावित हो जाते हैं। अपने फील्ड में लोग उसकी कार्यशैली और उसकी पर्सनेलिटी से ईर्ष्या करने के लिए विवश हो जाते हैं। 
            मित्र, बन्धु-बान्धव,भाई-बहन आदि भी अपने सम्बन्धियों के प्रति सकारात्मक विचार नहीं रखते। उनकी कल्पना से परे की बात होती है कि उनका प्रियजन इतना महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है जो बड़े-से-बड़े चैलेंज जीतकर आज इतना प्रतिष्ठित हो गया है। उससे मिलने के लिए भी समय लेना पड़ता है और प्रतीक्षा करनी होती है। उन्हें यह यह सब उसका अहं प्रतीत होता है।
             हमें किसी की भी वेशभूषा अथवा रहन-सहन से उसके प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं पालना चाहिए। उसका मूल्यांकन करते समय सचेत रहना चाहिए। किसी को भी कमतर नहीं समझना चाहिए। दूसरे का मूल्यांकन करते समय उसकी योग्यता और पद आदि को ध्यान में रखना बहुत ही आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

हम बच्चों की तरह मासूम बनें

हम बच्चों की तरह मासूम बनें

हम बड़े बच्चों की तरह मासूम बनकर क्यों नहीं रह सकते? यह यक्ष प्रश्न हमारे समक्ष मुँह बाये खड़ा है जिसका हल हम सबको मिलकर सोचना है। बच्चे बहुत सरल हृदय होते हैं। उनके मन में कोई छल-कपट नहीं होता। उनके मन में हम बड़े ही ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, कुटिलता आदि भावों को भरते हैं। कल्पना कीजिए यदि सभी बड़े लोग बच्चों की तरह सरल व सहज स्वभाव के हो जाएँ तो बहुत-सी बुराइयों का अन्त हो जाएगा अथवा वे पनपेंगी ही नहीं।
             तब किसी प्रकार के लड़ाई-झगड़े अथवा दंगे-फसाद की नौबत ही नहीं आएगी। यदि पलभर के लिए हम विवाद करेंगे या झगड़ा करेंगे तो अगले ही पल गले में बॉंहे डालकर घूमते हुए नजर आएँगे। ऐसी स्थिति के विषय में सोचकर मन को बहुत ही सुकून मिलता है। यदि धर्म, जाति, वर्ग एवं वर्ण आदि के पचड़ों में न पड़कर हम अपनी स्वयं की अथवा अपने देश की भलाई के कार्य कर सकें तो देश और समाज का भला हो सकता है।
            सरल स्वभाव के होते हुए हम हर प्रकार की  धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी, छल-फरेब, मारकाट, जालसाजी आदि से मुक्त हुए समाज की सहज ही कल्पना कर सकते हैं। सबसे बड़ी आतंकवाद की जो समस्या है, उससे भी विश्व को राहत की साँस मिल सकती है। हालाँकि यह सोच हम सब के लिए एक बहुत ही आदर्शवादी स्थिति की है जिसकी हम कल्पना मात्र ही कर सकते हैं। इस पर चलना हम कभी भी गंवारा नहीं करते। यह राह तो कठिनाई से भरी हुई है।
            जिन बच्चों के लिए बड़े लोग एक-दूसरे से टकराकर दुश्मनी मोल ले लेते हैं, वही बच्चे अगले क्षण सिर जोड़कर घूमते हुए नजर आ जाते हैं। इन बच्चों की दुनिया बड़ी अलग तरह की होती है जिसमें सबके लिए प्यार भरा होता है। एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले अथवा हाथ पकड़कर वे घूमते रहते हैं। किसी प्रकार के नफरत की वहाँ पर कोई गुँजाइश नहीं होती। बच्चे एक-दूसरे से यदि रूठते हैं तो कुछ ही समय पश्चात पहले ही की तरह दोस्त बन जाते हैं। उनके मध्य कोई अहं का मुद्दा नहीं बनता कि किसने‌ पहले सुलह की।
            उन्हें बड़ों की तरह न तो स्टेटस की चिन्ता होती है और न ही वे इन्सान-इन्सान में फर्क करते हैं। उनके लिए धर्म, जाति, रंग-रूप आदि का अन्तर कोई मायने नहीं रखता। उन्हें तो बस प्यार की भाषा समझ में आती है। जो भी उन्हें प्यार करता है, वे बच्चे उसी की अंगुली थामकर चल पड़ते हैं। बच्चों के शब्दकोश में 'अपना-पराया' जैसे कोई भी शब्द नहीं होते। हम बड़े अपने तुच्छ स्वार्थों के कारण ही ऐसा खतरनाक जहर उनके कोमल हृदयों में भर देते हैं जिससे बड़े होते हुए उनके मन भी प्रदूषित होने लग जाते हैं। उनका भोलापन तो हमारी मूर्खता से नष्ट हो जाता है और तब वे हमारे बताए हुए रास्ते से दुनिया की रेस में शामिल हो जाते हैं।
            बच्चों की मासूमियत हमें इसी से दिखाई देती है कि जब वे हर बात को समझने के लिए कब, क्या, क्यों, कैसे आदि प्रश्नों के माध्यम से हल ढूँढते हैं। मासूम से चेहरे पर गोल-गोल आँखे करके बच्चे सहज रूप से अपनी भोलीभाली जिज्ञासाओं को शान्त करने का यत्न करते रहते हैं। अपने बड़ों की डाँट-फटकार की उन्हें कोई परवाह नहीं होती। परेशान हुए बिना अथवा परवाह किए बिना वे बस बारबार अपने प्रश्नों की झड़ी हर किसी के आगे लगा देते हैं। वे इस बात से बेखबर रहते हैं कि जिनसे उन्होंने पूछा है, वे उनके प्रश्न का उत्तर दे भी पाएँगे अथवा नहीं।
            बच्चों की मासूमियत उनकी प्राकृतिक अवस्था है जो उन्हें दुनिया के प्रति एक अनोखी दृष्टि देती है। परन्तु उन्हें सही परवरिश की, वातावरण की तथा उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है ताकि वे अपनी मासूमियत के साथ-साथ समझदार और जिम्मेदार बन सकें। आधुनिक टेक्नोलॉजी और सामाजिक दबाव के कारण बच्चों की मासूमियत बहुत अधिक प्रभावित हो रही है। इस स्थिति में माता-पिता की भूमिका अपने बच्चों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। 
           बच्चे मासूम होते हैं क्योंकि उनका दिमाग दुनिया को समझने के लिए पूरी तरह विकसित नहीं होता। वे वर्तमान में जीते हैं और उनमें दुनियादारी की समझ कम होती है। इस कारण उनके व्यवहार में स्वाभाविक भोलापन होता है। उनकी यह मासूमियत माता-पिता के मार्गदर्शन और सामाजिक परिवेश से आकार लेती है। समय के साथ अनुभव और समझदारी के साथ बदलती है। उनके बचपन का यह दौर प्रायः प्रसन्नता, उम्मीद और पवित्रता से भरा होता है। 
            यदि हम सब तेरे मेरे वाली इस संकीर्ण मनोवृत्ति से छुटकारा पा सकें तो मानव जीवन सफल हो जाएगा। तब सभी राष्ट्र अपने बहुत से आपसी झगड़ों से मुक्त हो सकेंगे। अनावश्यक सैनिक खर्च में कटौती करके वे उस धन को अपने राष्ट्र की प्रगति करने में व्यय कर सकते हैं। अपने देश को निरन्तर उन्नति के मार्ग पर ले जा सकते हैं। अपने-अपने देशों को खुशहाल बना सकते हैं। इससे भाईचारा तो बढ़ेगा ही और विश्व सबके रहने के लिए एक खूबसूरत स्थान बन जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

प्रकृति का नियम

प्रकृति का नियम

दिन के बाद रात और रात के बाद दिन यही प्रकृति का नियम है। यह विधान बहुत कठोर है। इसमें कहीं भी नरमी अथवा सुविधा का स्थान नहीं है। सृष्टि के आरम्भ से ही ईश्वर ने यह विधान हमारे लिए बनाया है। सूर्य प्रातःकाल होते ही उदय होता है तब दिन होता है। जब चन्द्रमा प्रकट होता है तब रात्रि होती है। संध्या समय होने पर सूर्य अस्त हो जाता है और प्रातः होने पर चन्द्रमा विदा ले लेता है। इस क्रम कोई भी परिवर्तन आजतक नहीं हुआ और न ही कभी आने वाले समय में होगा।
           सूर्य व चन्द्रमा के उदित और अस्त होने का यह क्रम निर्बाध रूप से निरन्तर चलता रहता है। इसमें कहीं कोई त्रुटि नहीं होती। न ही उन दोनों को कोई प्रतिदिन कोई काम पर जाने का आदेश देता है और न ही कोई अलार्म उन्हें जगाता है। कभी इन दोनों ने यह नहीं सोचा कि हम प्रतिदिन अपनी ड्यूटी करके थक गए हैं, चलो इन्सानों की तरह चार दिन की छुट्टी करके हम भी आराम कर लें अथवा देश-विदेश में कहीं भी घूम आएँ या किसी हिल स्टेशन की सैर कर आएँ। 
          कल्पना कीजिए यदि ऐसी स्थिति कभी आ जाए तब क्या होगा? सूर्य के उदय न होने पर चारों ओर बर्फ का साम्राज्य हो जाएगा। हम गरमी और प्रकाश पाने के लिए छटपटाएँगे। दिन नहीं होगा और चारों ओर अन्धकार की चादर बिछी हुई दिखाई देगी। नदियों और नालों का सारा पानी जम जाएगा। हम पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसेंगे। पानी नहीं होगा तो अनाज उत्पन्न नहीं होगा। तब हम दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाऍंगे। खाने के लिए हमें परेशानी हो जाएगी।
          इसी प्रकार चन्द्रमा के न होने पर रात नहीं होगी। उसकी शीतलता से हम वंचित हो जाएँगे। सूर्य का प्रचण्ड प्रकोप हमें सहना पड़ेगा। इस प्रकार इन दोनों में से किसी एक के भी अवकाश पर चले जाने से सारे मौसमों और सारी ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा जाएगा।
            एवंविध सूर्य और चन्द्रमा के न होने की अवस्था में सारी सृष्टि में 'त्राहि माम्' वाली परिस्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इसी प्रकार अन्य प्राकृतिक संसाधनों के न होने पर भी संसार की स्थिति बहुत ही बिगड़ जाएगी। ईश्वर ने हम मनुष्यों को हर प्रकार का सुख और आराम देने के लिए सारा मायाजाल अथवा आडम्बर रचा है। 
          हमारे लिए उस मालिक ने दिन और रात बनाए हैं। इसका उद्देश्य यही है कि अपने स्वयं के लिए और घर-परिवार के दायित्वों को पूर्णरूपेण निभाने के लिए दिन भर जीतोड़ परिश्रम करो। जब थककर चूर हो जाओ तब रात हो जाने पर चैन की बाँसुरी बजाते हुए घोड़े बेचकर सो जाओ। अगली प्रातः तरोताजा होकर फिर से अपने काम में ने उत्साह से जुट जाओ। 
          मनुष्य सारा दिन हाड़ तोड़ मेहनत करके जब थकहार कर घर आता है तब उसे आराम करने की बहुत आवश्यक होता है। अगर ईश्वर ने रात न बनाई होती तो मनुष्य सो नहीं पाता। नींद न ले पाने के कारण अनिद्रा से परेशान होकर वह अनेक बिमारियों से ग्रस्त हो जाता। फिर डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए बहुमूल्य समय व धन की बरबादी होती। 
            इसी कड़ी में हम कह सकते हैं कि यदि ईश्वर ने दिन न बनाया होता तो चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार होता। हमें अपने कार्य करने‌ के लिए कुछ भी नहीं सुझाई पड़ता। हम इधर-उधर ठोकरें खाने के लिए विवश हो जाते। अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए क्या कर‌ पाते? यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न हमारे सम्मुख आ खड़ा होता। उस स्थिति की कल्पना करने मात्र से ही मन परेशान हो जाता है। वास्तव में इसे अकल्पनीय ही कहा जा सकता है।
          सूर्य का उदय होना हमें नवजीवन का सन्देश देता है और उसका अस्त होना जीवन के अन्तकाल का परिचायक है। सूर्य और चन्द्रमा दिन और रात के प्रतीक हैं जो हमें समझाते हैं कि जीवन में दुखों एवं कष्टों से पूर्ण रात कितनी भी लम्बी हो जाए, उसके बाद प्रकाश अवश्य आता है। सूरज और चन्दा की तरह जीवन में भी दिन और रात की तरह सुख एवं दुख की आँख मिचौली चलती रहती है। इसलिए जीवन में हार न मानते हुए आगे बढ़ते चले जाना चाहिए। यही प्रकृति की इस रचना का हम मनुष्यों के लिए सन्देश है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 7 दिसंबर 2025

ताली एक हाथ से नहीं बजानी

ताली एक हाथ से नहीं बजती

'ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती' यह हिन्दी भाषा का एक प्रसिद्ध मुहावरा है। इसका अर्थ हम यह कर सकते हैं कि किसी भी कार्य को करने के लिए दो लोगों की भागीदारी अथवा जिम्मेदारी की आवश्यक होती है। कोई भी झगड़ा, विवाद या महत्त्वपूर्ण कार्य केवल एक व्यक्ति के कारण कभी नहीं हो सकता। यानी मित्रता अथवा शत्रुता, प्रेम, घृणा या विवाद सब दो पक्षों की सहभागिता से ही होते हैं। इसके लिए आपसी सहयोग अथवा मतभेद दोनों ही आवश्यकता होती है। 
            यह कथन बिल्कुल सत्य है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। हम अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हैं तभी ताली बजा सकते हैं। अन्यथा यह कोरी कल्पना बनकर रह जाती है। हाँ, यह भी सत्य है कि एक हाथ से हम मेज को थपथपाकर अपनी सहमति अथवा प्रसन्नता अवश्य प्रदर्शित कर सकते हैं। 
           किसी भी समस्या या घटना में गलती केवल किसी व्यक्ति विशेष की नहीं होती, दोनों ही पक्षों की कुछ-न-कुछ हिस्सेदारी होती है। सच्ची सफलता और अच्छा रिश्ता बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों का सहयोग आवश्यक होता है। प्रेम, दोस्ती या झगड़ा ये सभी दो लोगों के बीच ही सम्भव हो सकते हैं। एक व्यक्ति अकेला कुछ भी नहीं कर सकता।पति-पत्नी के झगड़े में किसी एक को पूरी तरह से गलत ठहराना अनुचित है। किसी काम को सफल बनाने के लिए भी दो साथियों का मिलकर काम करना जरूरी होता है।
          यह तो हो ही नहीं सकता कि किसी एक की गलती के कारण झगड़ा हो जाए या वैमन्स्य हो जाए। जब तक दोनों लोग आपस में न टकराएँ तब तक दुश्मनी की नौबत नहीं आ सकती। इसलिए सावधानी रखनी आवश्यक है। घर, परिवार अथवा समाज में लोगों के व्यवहार को देखते-परखते हुए ही हम इसका अनुभव कर सकते हैं। भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्रों अथवा सम्बन्धियों आदि में यदि मनमुटाव या झगड़ा होता है तब हम एक-दूसरे को दोष देकर अपना-अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। यदि दोनों पक्षों की बात निष्पक्ष होकर सुन ली जाए तो पता चल जाता है कि गलती दोनों की होती है। 
           झगड़े की स्थिति में यदि एक व्यक्ति चुप लगा जाए तो दूसरा कब तक बकझक करेगा। आखिर वह भी यह कहकर चुप हो जाएगा कि यह तो कुछ बोलता नहीं, कौन दीवारों से सिर फोड़े? समस्या तभी बढ़ती है जब दोनों ही बराबर की टक्कर दें। कोई भी व्यक्ति अपने आपको छोटा कहलाना पसन्द नहीं करता। इसलिए कोई भी पक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं होता। सब एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देते रहते हैं। तभी ऐसी कटु स्थितियॉं बनती है।
          इसी प्रकार कार्यक्षेत्र में भी आपसी कटुता के कारण ही बॉस व कर्मचारियों के बीच मनमुटाव बढ़ता रहता है। इस कारण वहाँ पर कामबन्दी, तालाबन्दी अथवा धरने- प्रदर्शनों आदि की नौबत आती है। देश में अथवा विश्व में अपरिहार्य स्थितियॉं भी दो दलों अथवा दो देशों के कारण है बनती हैं। उनका परिणाम अथवा खमियाजा सभी को भुगतना पड़ता है।
             रिश्तों में अलगाव की स्थिति के लिए भी दोनों ही व्यक्ति जिम्मेदार होते हैं। एक का पक्ष लेकर दूसरे पर दोषारोपण करना अनुचित होता है। सभी समझदार लोगों को जागरूक रहना चाहिए और दूसरों को भी सचेत करना चाहिए। रिश्तों में यदि झूठे अहं को छोड़कर दोनों थोड़ा-सा गम खा लें तो बिखराव के कारण होने वाली बिनबुलाई समस्याओं से बचा जा सकता है। यह तो हो सकता है कि किसी एक की गलती दूसरे पर भारी पड़ जाती है। पर कमोबेश स्थिति यही होती है कि दोष दोनों का ही होता है। यह चर्चा हमारे भौतिक सम्बन्धों की होती है। 
           प्रकृति को हम दोष देते नहीं थकते कि वह हम पर अत्याचार करती है। कभी बाढ़ आ जाती है, कभी भूकम्प आ जाते हैं, कभी अतिवृष्टि होती है, कभी अनावृष्टि होती है, बीमारियाँ फैल रही हैं, हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है आदि। परन्तु क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखते हैं कि इन सारी प्राकृतिक आपदाओं के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। हमने स्वयं ही इन सब मुसीबतों को न्यौता दिया है।
             प्रकृति से हम स्वयं छेड़छाड़ करते हैं। हम खुद को बहुत विद्वान और महान मानते हैं। तभी प्राकृतिक संसाधनों का हम आवश्यकता से अधिक दोहन करते हैं। जब हम अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आएँगे तो उसका दण्ड कोई दूसरा नहीं हमें स्वयं को ही तो भोगना पड़ेगा। आज तक मुझे यह समझ नहीं आया कि फिर हम इतनी हाय तौबा क्योंकर करते हैं। स्वयं के आचरण पर लगाम क्यों नहीं लगाते?
             हमें प्रयास यही करना चाहिए कि जीवन में छोटी-मोटी कटुताओं को अनदेखा कर दिया जाए। उन्हें अनावश्यक तूल देकर आपसी सम्बन्धों की बलि न चढ़ाई जाए। सन्बन्धों को तोड़ने के लिए ताली को दोनों हाथों से नहीं बजानी चाहिए बल्कि उनमें मधुरता लाने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

अच्छाई और बुराई सगी बहनें

अच्छाई और बुराई सगी बहनें

अच्छाई और बुराई दोनों को हम सगी बहनें कह सकते हैं। ये दोनों बहनें होते हुए भी रंग-रूप तथा स्वभाव में एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। इन्हें हम एक ही सिक्के के दो पहलू भी कह सकते हैं। ये दोनों बहनें कभी भी एक-दूसरे के गले नहीं मिल सकतीं यानी कि एकसाथ किसी एक स्थान पर मिल-जुलकर नहीं रह सकतीं। हैरानी की बात यह है कि ये दोनों ही दो सांसारिक बहनों की तरह अपना सुख-दुख भी नहीं बाँट सकतीं। अपनापन तक नहीं जता सकतीं।
          दूसरे शब्दों में कह यह सकते हैं कि अच्छाई को घर में निवास देना हो तो बुराई से दामन छुड़ाना आवश्यक होता है। इसके विपरीत यदि बुराई को प्रश्रय देना हो तो पहले मनुष्य को अच्छाई से मुँह मोड़ना पड़ता है। यदि कभी हमें इन दोनों के रंग को दर्शाना हो तो हम अच्छाई के लिए सफेद रंग का प्रयोग करते हैं और बुराई के लिए काले रंग का। कहने का तात्पर्य यही है कि अच्छाई उज्ज्वलता का प्रतीक मानी जाती है। जबकि बुराई कालिमा का रूप कही जाती है।
          सीधा स्पष्ट-सा यह व्यवहार हमें समाज में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। नाटकों, फिल्मों आदि में हम देखते हैं कि अच्छे लोग प्रतीक के रूप में सफेद वस्त्र पहनते हैं और दुष्टों को काले वस्त्र पहनाए जाते हैं। टीवी में रामायण, महाभारत तथा कई और अन्य सीरियलस में हम सबने इस प्रकार के वस्त्र विन्यास को देखा था। अच्छाई को समाज में देवाता के रूप में पूजा जाता है। इसके विपरीत बुराई से सभी घृणा करते हैं, उसमें लिप्त व्यक्ति को देखकर नाक-मुंह सिकोड़ने लगते हैं।
            रामलीला आदि धार्मिक नाटकों के मंचन में भी अच्छाई और बुराई के अन्तर को दर्शाने के लिए ऐसे ही प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रयोग को देखते ही हम जान लेते हैं उजले वस्त्र पहना व्यक्ति चरित्रवान है और काले वस्त्रों को धारण करने वाला व्यक्ति विलेन है। इससे हमें इन दोनों के अन्तर को भली भाँति समझ लेना चाहिए। इसके साथ ही समाज का इनके प्रति जो रवैया है, उसे भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। मोटे तौर पर यह है अच्छाई और बुराई को पहचानने का एक तरीका।
           हमारे सामने यदि अच्छाई अथवा बुराई में से एक को चुनने का विकल्प रखा जाए तो हम में से अधिकांश लोग अच्छाई के पक्षधर ही होंगे और इसके साथ ही जाना चाहेंगे। ये लोग बुराई से घृणा करने वाले होते हैं। परन्तु बुराई इतनी आकर्षक होती है कि उसकी मोहिनी से बचना बहुत कठिन होता है। समझदार व्यक्ति उसके लटकों-झटकों के जाल में नहीं फंसते। परन्तु मन की दुर्बलता वाले लोग इसके बहकावे में शीघ्र आ जाते हैं और अपने लिए गड्ढा खोद लेते हैं।
        जो लोग अच्छाई वाले कठिन मार्ग का चयन करते हैं उनका रास्ता लम्बा तथा कठिनाइयों से भरा होता है। उस पथ पर चलते हुए उन्हें अनेक प्रकार की परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। उनमें पास हो जाने पर वे सदा सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। ऐसे लोग समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करते हैं। अच्छाइयों की अधिकता होने के कारण ये महापुरुष सत्त्वगुण वाले कहलाते हैं। इन्हें लोग देवतुल्य मानते हैं। यही लोग समाज के दिग्दर्शक बनते हैं। जन साधारण इनके पद चिह्नों पर चलकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
          बुराई का रास्ता सरल व आकर्षण होता है। यहाँ बहुत से अवगुण एवं दोष अपने पास बुलाने के लिए षडयन्त्र रचते रहते हैं। इनके झाँसे में आ जाने वाले लोग अपना मार्ग भटक जाते हैं। तब वे अपनी अच्छाई को छोड़कर कुमार्ग पर चल पड़ते हैं। वहॉं पर उन्हें कदम-कदम पर न्याय व्यवस्था से दो-चार होना पड़ता है। समाज विरोधी कार्य करने वालों को उनके अपने घर-परिवार के लोग त्याग देते हैं। समय बीतने पर वे अकेले रह जाते हैं। उस समय उन्हें इस गलत रास्ते पर आने का पश्चाताप होता है। यह सत्य है कि समय बीत जाने पर उसका कोई लाभ नहीं होता।
            वास्तव में अच्छाई का रास्ता लम्बा और चुनौतियों से भरा हुआ होता है। यह मार्ग कॉंटों से युक्त होता है। इस पर पर चलता हुआ मनुष्य अपना धैर्य खोने लगता है। जो लोग बिना डरे, बिना घबराए अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहते हैं वे निस्सन्देह सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते जाते हैं। इसके विपरीत बुराई का मार्ग तड़क-भड़क वाला व दिखने में सरल प्रतीत होता है। शार्टकट हमेशा नुकसान पहुँचाता है। इसलिए इस पथ पर चलने से पहले हमें इसके दूरगामी दुष्परिणामों पर निश्चित ही विचार कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

सागर की भॉंति गम्भीर

सागर की भाँति गम्भीर

मनुष्य को सागर की भाँति गम्भीर होना चाहिए। सागर की गम्भीरता की थाह हम मनुष्य नहीं पा सकते। वह अपने गर्भ में न जाने कितने अनमोल रत्नों को छिपाए हुए है जिनके बारे में हमें जानकारी तक नहीं है। जितना ही गहरे हम सागर में पैठते जाते हैं उतना ही इसकी विशालता का ज्ञान होता है। सागर की भॉंति मनुष्य को भी अपने अन्तस में रखे सभी रहस्यों को गुप्त रखना चाहिए, उन्हें आत्मसात करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में दूसरों के समक्ष उनको उद्घाटित नहीं करना चाहिए। इसी से ही उसकी गम्भीरता एवं महानता का ज्ञान होता है।
        सागर की सबसे बड़ी महानता यह है कि इसने हमें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का मार्ग देता है। मनुष्यों और सामान से लदे हुए भारी-भरकम समुद्री जहाजों को यह आवागमन से कभी नहीं रोकता। इस कारण लोगों को आने-जाने की सुविधा हो जाती है। इसकी महानता के कारण हम अनेकानेक वस्तुओं का सुविधापूर्वक आयात-निर्यात करके उनका उपभोग कर पाते हैं। यही कारण है कि विश्व के किसी भी कोने में बने हुए सामानों का हम उपयोग कर पाते हैं।
          अनेक नदियों को अपने अन्तस में समाकर सागर उन्हें एकाकार कर लेता है। इसका जल विभिन्न आकार-प्रकार के इतने अनेक खूबसूरत जलचरों की आश्रय स्थली है जिनके विषय में हमें कोई जानकारी नहीं है। उनकी खोज करने के लिए बारबार वैज्ञानिक आकर इसका सीना चीरते रहते हैं। अनेक खजानों को समेटने वाला यह सागर सदा ही सबके लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। इसकी लहरों का उतार-चढ़ाव किसी चमत्कार से कम नहीं है। लोग बहुत दूर-दूर से इसकी लहरों का आनन्द उठाने आते हैं।
          महापुरुषों की यही पहचान है कि वे अपने अन्तस में न जाने किन-किन दीन-दुखियों की गाथाओं को रहस्य बनाकर, अपने मन के किसी कोने में छिपा देते हैं। सम्पर्क में आने वाले लोगों की अच्छाइयों और बुराइयों को केवल अपने तक सीमित रखते हैं। उन्हें सबके समक्ष प्रसारित करके उन लोगों का अपमान‌ नहीं करते। सागर की लहरों की तरह हर प्रकार के उतार-चढ़ावों को ये लोग स्थिति से झेल लेते हैं पर उसकी आँच किसी पर नहीं आने देते। 
          अपने साथ अन्याय करने वालों को सागर की तरह विशाल हृदय बनकर क्षमा कर देते हैं। किसी से बदला लेने के बारे में ये महापुरुष विचार तक नहीं करते हैं। ऐसे महानुभावों की संगति सदा करनी चाहिए।
          पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं और राक्षसों ने समुद्र मन्थन किया था। मन्थन से मिलने वाले रत्नों का बटवारा तो हो गया परन्तु हलाहल विष को बाँटने के लिए कोई भी देवता या असुर तैयार नहीं हुए। तब भगवान शंकर ने उस विष का पान सृष्टि की भलाई के लिए किया था। यही कार्य सज्जन भी करते हैं। वे सदा दूसरों को सद् गुणों और खुशियों को लुटाने रहते हैं। लोगों के व्यंग्य बाणों को ये लोग भोले बाबा की तरह हंसते हुए सह जाते हैं।
           रामायण में एक प्रसंग आता है कि भगवान राम को रावण से युद्ध करने के लिए लंका पर चढ़ाई करनी थी। लंका में जाने के लिए समुद्र को पार करना आवश्यक था। उन्होंने सागर से मार्ग देने की प्रार्थना की थी। हम लोगों की तरह अनावश्यक अधिकार जमाने का प्रयास नहीं किया था। यह उनकी सज्जनता थी और महानता थी।
        भगवान भोलेनाथ के विषय में प्रचलित है कि वे इतने भोले हैं जो हर भक्त की सच्चे मन से की साधना से प्रसन्न होकर उसे मनचाहा वरदान दे देते हैं। परन्तु यदि वे किसी कारण से कुपित हो जाएँ तो फिर उनके ताण्डव से सृष्टि में कोई भी नहीं बच सकता। इसीलिए लोग उन्हें प्रसन्न करने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
            सागर हमें सब सुख देता है परन्तु फिर भी हम मनुष्य उसे दूषित करने से संकोच नहीं करते। वहॉं कचरा डालने से बाज नहीं आते। इस कारण उसका जल स्तर बढ़ जाता है। उसका परिणाम उसके उफान यानी 'ज्वार भाटा' के रूप में प्रकट होता है जो किसी भी समय इस पृथ्वी पर भयंकर विनाश कर सकता है। ऐसी चेतावनी वैज्ञानिक समय-समय पर देते रहते हैं। परन्तु हम लोग उनकी चेतावनियों को अनसुना करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करते हैं।
          सागर की तरह घोर गम्भीर सज्जन लोग हमारे जीवन के मार्गदर्शक व प्रेरक होते हैं। वे समाज की धरोहर होते हैं। अत: उनका सम्मान करने की आदत हम सबको होनी चाहिए। ऐसे महापुरुष संसार में बहुत विरले होते हैं। उनको खोने के विषय में सोचना भी नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

माता-पिता का मान बेटियॉं

माता-पिता का मान बेटियाँ

बेटियाँ अपने माता-पिता का मान होती हैं। अपने मायके की शान होती हैं। अपने भाइयों की जान होती हैं। उनकी भी भाइयों में जान बसती है। उन्हें घर-परिवार में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। उनकी राय को सदा ही अहमियत दी जाती हैं। उनकी चहचहाहट से सारा घर गुलजार रहता है। उनके कहीं चले जाने पर मानो घर में उदासी का साम्राज्य फैला जाता है। उनकी उपस्थिति उनके घर को सदा जीवन्त बनाए रखती है।
              सभी माता-पिता अपनी प्यारी बेटी को खूब पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ देखना चाहते हैं। आज बेटियॉं अपने माता-पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए जी-जान से प्रयत्न कर रही हैं। अपने माता-पिता का नाम रौशन करती हुईं वे उच्च पदों पर आसीन हैं।
           समयानुसार जब बेटी की शादी हो जाती है तो उसका दायित्व बहुत बढ़ जाता है। तब उसे मायके के साथ-साथ अपने ससुराल की भी चिन्ता करनी चाहिए। उसे केवल मायके के बारे में सोचते हुए अपने ससुराल के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं भूलना चाहिए। मायके में हर दूसरे दिन जाना या अपनी ससुराल की छोटी-मोटी नोकझोंक को नमक-मिर्च लगाकर माता-पिता की सहानुभूति बटोरने से बचना चाहिए। इससे सम्बन्धों में दरार आने की सम्भावना बढ़ जाती है जिससे दोनों घरों में अनावश्यक तनाव बढ़ने लगता है और मनमुटाव होने लगता है।
             पढ़ी-लिखी समझदार लड़कियों से समाज समझदारी की उम्मीद रखता है। जब तक पानी सिर से ऊपर होने की नौबत न आए तब तक सदा ही अपने परिवार में मिलजुलकर सामंजस्य बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
          भाई की शादी के बाद तो बेटी को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो सके मायके को अपने भाई और भाभी के सुपुर्द कर देना चाहिए। वे अपने घर को कैसे भी रखते हैं, उसमें दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए। भाभी और ननद के सम्बन्धों की बुनियाद आपसी प्रेम व विश्वास पर टिकी होती है क्योंकि वे रक्त सम्बन्ध नहीं होते। इस रिश्ते में कटुता न आने पाए, इसलिए सदा सावधान रहना चाहिए।
            हर व्यक्ति सुरुचिपूर्ण तरीके से, अपनी इच्छा से ही अपने घर की साज-सज्जा करना चाहता है। उसमें जाकर व्यर्थ ही मीनमेख निकालना सर्वथा अनुचित होता है। ऐसा करने से उनके मन में आपके प्रति रोष उत्पन्न होने लगता है। उन्हें ऐसा लगता है कि उनके घर में आप अनावश्यक रूप से हस्ताक्षेप कर रही हैं। यह बेरुखी वाला व्यवहार धीरे-धीरे बढ़ता हुआ विनाश के कगार पर पहुँच जाता है। 
              अपने माता-पिता की चिन्ता हर बेटी को निस्सन्देह रहती है। भाई-भाभी को यह कहकर अपमानित करना कि वे उनका ध्यान नहीं रखते अनुचित है। वे उनके भी माता-पिता हैं। इसलिए वे यथासम्भव उनका सम्मान करते हैं तथा ध्यान रखते ही हैं।
          सबसे बड़ी समस्या तब आड़े आती है जब बेटी भाई-भाभी के विरुद्ध अपने माता-पिता के कान भरती है और वे भी उसकी बातों में आकर अपने बेटे-बहू को दोष देने लगते हैं। मैं सबसे प्रार्थना करूँगी कि ऐसी स्थितियों से यथासम्भव बचने का यत्न करना चाहिए। सभी रिश्तों को यथोचित बनाए रखना चाहिए। बेटी के अथवा किसी रिश्तेदार के या पड़ोसी के बरगलाने पर अपने घर की शान्ति कभी भी भंग नहीं करनी चाहिए। रहना तो अपने घर में ही है तो फिर ऐसे वैमनस्य से बचना चाहिए।
           यदि अपने घर में कलह का वातावरण बनाकर रखेंगे तो फिर आप अपना ठिकाना कहॉं बनाऍंगे? ऐसी अवस्था में यदि बेटी चाहे भी तो माता-पिता को अपने साथ नहीं रख पाती। दूसरी और न ही वे अपने बेटे का घर छोड़कर बेटी के पास रहना चाहते हैं। इसका कारण हमारा है पारिवारिक व सामाजिक ढाँचा इस प्रकार का है कि बेटे के पास ही माता-पिता रहना चाहते हैं। आजकल समय और परिस्थितियों में कुछ बदलाव आया है कि जहॉं इकलौती बेटी होती है वहॉं माता-पिता उसके ही साथ रहते हैं।
              बेटियों को एक बात का और ध्यान रखना चाहिए कि मायके में अनावश्यक दखल देते हुए अपने ससुराल की ओर से लापरवाह नहीं होना चाहिए। कहीं ऐसी  स्थिति न हो जाए -
          दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम।
अर्थात् बेटी का मायके से सम्बन्ध बिगड़ जाए और ससुराल में भी सम्मान कम हो जाए।
             यह बात हमेशा ही स्मृति में रखनी चाहिए कि माता-पिता का साथ सबको सीमित समय तक ही मिलता है। परन्तु बहन को अपने भाई और भाभी के साथ आयु पर्यन्त निभाना होता है। अतः अपनी ओर से ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे घर-परिवार में सबका सम्मान बना रहे और जग हंसाई भी न हो। 
चन्द्र प्रभा सूद