संसार में आने का उद्देश्य
कबीरदास जी के एक सुप्रसिद्ध भजन की पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं-
आया था किस काम को, तू सोया चादर तान के।
सूरत सम्हाल ऐ गाफल, अपना आप पहचान रे।।
अर्थात् मनुष्य इस दुनिया में किस उद्देश्य से आया है, यह उसे भूलना नहीं चाहिए। अपनी वास्तविक पहचान को जानना चाहिए। अब होश में आ जाओ और अपने आप को पहचानो।
इस विषय पर विचार करना आवश्यक है कि मनुष्य इस दुनिया में किस काम को करने के लिए आया था? ऐसा क्या हुआ कि वह यहाँ आने के अपने उद्देश्य को भूल गया है? उसे ऐसा क्या करना चाहिए कि जिससे वह जागकर स्वयं को पहचान सके?
कबीरदास जी का यह निम्न दोहा हमें समझा रहा है -
आया था किस काम को, बैठा है किस काम।
तज कर मोह माया को, कर ले हरि का नाम।।
अर्थात् यह दोहा जीवन के उद्देश्य और नश्वरता पर आधारित हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हम इस दुनिया में क्यों आए हैं? हमारा असली काम क्या है? यह सांसारिक मोहमाया अस्थायी है। इस सांसारिक मोह और माया का त्याग कर देना चाहिए और भगवान के नाम का जाप करना चाहिए।
यह दोहा हमें जीवन के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य को समझने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें बताता है कि हमें क्षणभंगुर सांसारिक कामों में नहीं उलझना चाहिए बल्कि ईश्वर की भक्ति पर ध्यान देना चाहिए।
चौरासी लाख योनियों में अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों को भोगकर जीव मनुष्य का चोला धारण करता है। यह जन्म उसे ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मिला है। वह तब तक बारबार जन्म लेता रहता है जब तक वह अपने परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेता।
विद्वानों का कथन है कि जीव जब माता के गर्भ में होता है तब ईश्वर से नित्य प्रार्थना करता है कि मुझे इस अन्धेरे से बाहर निकालो और इस कष्ट से मुक्त करो। मैं सदा तुम्हें स्मरण करूँगा। परन्तु ज्योंहि जीव इस धरा पर अवतरित होता है त्योंहि उसे दुनिया की हवा लगने लगती है। वह ईश्वर से किए अपने सारे वादे भूल जाता है। फिर संसार के कारोबार में ऐसा रम जाता है कि वह इस संसार में आने के अपने उद्देश्य को किनारे कर देता है।
इस प्रकार जीव इस संसार के मकड़जाल में फंसकर ही रह जाता है और गफलत में जीवन जीने लगता है। दुनिया की रेस में भागते-भागते निढाल होता रहता है। उसे दीन-दुनिया किसी की भी खबर नहीं रहती। बस अपने और अपनों के इर्द-गिर्द घूमते रहना उसकी प्रकृति बन जाती है। ऐसे में उसे अपने किए गए वादों की याद नहीं आती।
मनुष्य दुनिया में आकर बहुत स्वार्थी बन जाता है। मनुष्य मृत्युपर्यन्त अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए अनेक यत्न करता है। पर वे हैं कि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते जाते हैं। मनुष्य के लिए अपने दायित्वों को निभाना प्राथमिकता होती है। ईश्वर का नाम जपना मानो उसकी सूची में आगे सरकता रहता है।
बचपन में वह सोचता है कि अभी खेलने और पढ़ने की उम्र है। पहले अपने जीवन में सेटल हो जाऊँ फिर जवानी में ईश्वर को याद कर लूँगा। जब जवानी आती है तब घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण करने में वह बहुत अधिक व्यस्त हो जाता है। उस समय वह सोचता है कि बच्चे सेटल हो जाएँ, उनके शादी-ब्याह हो जाएँ तब फिर निश्चिन्त होकर मैं भगवान को याद करूँगा। वह अवस्था पार होने के बाद मनुष्य रिटायरमेंट की आयु में पहुँच जाता है और धीरे-धीरे अशक्त होने लगता है। तब शरीर उसका साथ नहीं देता और बीमारियाँ घेरने लगती हैं। उस अवस्था में भगवद् भजन फिर पीछे छूट जाता है।
उस समय वह खीज उठता है जब कोई उसे ईश्वर का स्मरण करने के लिए कहता है। वह उत्तर देता है कि मैं बीमारी से पहले लडूँ या भगवान को याद करने बैठ जाऊँ। यदि उसने स्वयं को याद ही कराना है तो पहले मुझे ठीक तो करे। यही सब करते हुए उसका अन्तकाल भी आ जाता है। उस समय वह पश्चाताप करता है, प्रभु से क्षमा याचना करता और जीवन का समय बढ़ाने के लिए मिन्नतें करता है। उस समय उसे पर भर की भी मोहलत नहीं मिल पाती।
अब कुछ नहीं हो सकता। अब तो वही बात हो जाती है- 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।' अपना सारा जीवन मनुष्य तथाकथित रूप से ईश्वर से नजरें चुराता रहता है। उसकी बताई हुई सारी शिक्षाओं को भूलकर दुनिया की चकाचौंध में खो जाता है।
यदि अन्तकाल में प्रसन्नता से हम उस मालिक के पास जाना चाहते हैं तो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। समय व्यर्थ गॅंवाए बिना उस प्रभु की अराधना में जुट जाना चाहिए। दुनिया के सारे कार्य व्यवहार स्वतः ही पूर्ण होते जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद