शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति

बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति

बच्चे बहुत ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं। वे बहुत ही जल्दी सब कुछ जान और समझ लेना चाहते हैं। अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए उन सबसे प्रश्न पूछते रहते हैं जो उनके सम्पर्क में आते हैं। बहुधा ऐसा होता है कि उनके प्रश्नों के उत्तर बड़ों के पास भी नहीं होते। इसलिए वे उन्हें झिड़क देते हैं और कहते हैं कि बेकार के प्रश्न करके उन्हें परेशान न किया करो, जाओ जाकर अपना काम करो।
         बच्चे की जिज्ञासु प्रवृत्ति (curiosity) उनके जन्मजात सीखने की इच्छा होती है जो उन्हें अपने आस-पास की दुनिया को जानने, सवाल पूछने और प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है। इससे मस्तिष्क का विकास होता है। समस्या-समाधान कौशल बढ़ते हैं और वे जीवन भर सीखने वाले बनते हैं। इसे माता-पिता द्वारा धैर्य से प्रोत्साहित करने और अन्वेषण के अवसर प्रदान करने से पोषित किया जाना चाहिए, भले ही उनके 'क्यों' वाले प्रश्न थकाऊ और उबाऊ ही लगें।
          बच्चों के मन में अहं का प्रश्न नहीं होता। वे अपने भोलेपन से सबको मोह लेते हैं। उनके पूछे जाने वाले छोटे-छोटे तार्किक प्रश्न कभी-कभी बड़ों को भी सोचने के लिए विवश कर देते हैं। प्राय: छोटे बच्चों को क्या हुआ, क्यों हुआ, कब हुआ और कैसे हुआ की गुत्थी सुलझानी होती है। इसलिए सारा समय वे प्रश्न करके सबको परेशान कर देते हैं और डॉंट खाते रहते हैं।
        बहुधा उन्हें डाँटकर चुप करवा दिया जाता है। बड़े लोगों को जीवन के पचासियों झगड़े सुलझाने होते हैं। उन्हें घर-गृहस्थी और कार्यालय के सभी कार्य करने होते हैं। इसलिए वे उनके ढेरों प्रश्नों से ऊब जाते हैं और बच्चों को डपट देते हैं। इस डाँट-डपट का वे कभी बुरा नहीं मानते। डॉट खाकर कुछ देर शान्त बैठने के बाद फिर अपनी भोली-सी सूरत बनाते हुए अपने ज्ञानवृद्धि के मिशन पर चल पड़ते हैं।
         जब फुर्सत के पल होते हैं तो बच्चों की बातों का उत्तर तसल्ली से दिया जाता है। परन्तु जब वे बाल की खाल निकालने लगते हैं तब समयाभाव के कारण उनके प्रश्नों की बौछार सहनशक्ति की सीमा से परे हो जाती है। 
           मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों के सभी प्रश्नों का उत्तर सहनशीलता पूर्वक देना चाहिए। जो भी उनकी स्वाभाविक ज्ञिज्ञासाएँ हैं, उनका शमन होना ही चाहिए। इससे बच्चों की बुद्धि प्रखर होती है और वे मेधावी बनते हैं। जीवन के किसी भी क्षेत्र में वे सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। सभी उन उनकी और उनके माता-पिता की प्रशंसा करते नहीं अघाते।
          इसके विपरीत जिन बच्चों के ज्ञानार्जन की समस्याओं का समाधान नहीं होता उनकी बुद्धि कुँठित हो जाती है। वे जीवन की रेस में पिछड़ जाते हैं। चाहकर भी ऐसे बच्चे उन मेधावी साथियों के बराबर पहुँचकर उन्हें छू नहीं पाते। इस बात का दुख उन्हें जीवनपर्यन्त रहता है।
            इक्कीसवीं सदी में आज के बच्चे बहुत समझदार हैं। उन्हें आप कभी मूर्ख नहीं बना सकते। न ही उनके प्रश्नों के आप उल्टे-सीधे उत्तर दे सकते हैं। इसका कारण यह है कि जब कभी उन्हें अपना सही उत्तर मिल जाएगा तो वे आपको यह अहसास कराने से नहीं चूकेंगे कि आप गलत जवाब देते हैं। उनके अनुसार आपको कुछ भी नहीं आता। 
            यदि बच्चे के मन में यह बात घर कर गई कि उनके माता-पिता कुछ नहीं जानते तो बात-बात में वे दोहराते रहेंगे कि रहने दो आपको तो कुछ भी नही पता। किसी के भी सामने उन्हें यह कहने में जरा-सी झिझक महसूस नहीं होगी। जिसे सुनना कोई भी पसन्द नहीं करना चाहता कि उनके बच्चे उन्हें मूर्ख समझें।
              जिज्ञासु बच्चे दूसरे लोगों में रुचि लेते हैं जिससे वे अन्य लोगों के दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं और सहानुभूति विकसित करते हैं। वे हमेशा नई और दिलचस्प चीजें देखना चाहते हैं। बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना चाहिए जहाँ वे वस्तुओं को छू सकें और प्रयोग कर सकें। बच्चों को पुस्तकें और अलग-अलग तरह की सामग्री प्रदान करनी चाहिए। उन्हें अपनी पसन्द की चीजें चुनने की स्वतन्त्रता देनी चाहिए। यदि वे किसी चीज में रुचि दिखाते हैं तो उससे जुड़ी गतिविधि में उन्हें भाग लेने देना चाहिए।
             बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि उनके मन में उठने वाली सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया जाए। यदि उनके किसी प्रश्न का उत्तर नहीं भी समझ में नहीं आता तो उन्हें प्यार से समझाइए। स्वयं उस विषय की जानकारी एकत्र करके उन्हें ज्ञान से समृद्ध कीजिए। इस प्रकार उनको मानसिक सन्तोष देने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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