नकल से विवेक कुण्ठित
दूसरों की नकल करने का स्वभाव हमारे उस विवेक को कुण्ठित कर देता है जो हमें अच्छाई और बुराई के अन्तर का ज्ञान कराता है। नकल करते समय हम अपने मस्तिष्क का नहीं बल्कि दिल का कहना मानते हैं। यानी कि जब कोई व्यक्ति केवल दूसरों की देखा-देखी या बिना सोचे-समझे नकल करता है तो उसकी अपनी सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह सही और गलत, अच्छे और बुरे के बीच का अन्तर नहीं कर पाता। उस समय मनुष्य अपने जीवन में उचित निर्णय लेने में असमर्थ होने लगता है। परिणाम स्वरूप वह गलत रास्ते की ओर अग्रसर हो सकता है। बुरी संगत में पड़कर व्यक्ति बुराइयों को सही मानने लगता है।
यद्यपि नकल करते हुए मनुष्य को सदा अपनी अक्ल या बुद्धि का ही प्रयोग करना चाहिए। मनीषियों का मानना है कि बुद्धि ईश्वर ने हमें उपहार के रूप में दी है। जब हम दूसरों नकल करने का प्रयास करते हैं, उस समय मक्खी पर मक्खी नहीं मारनी चाहिए। इस विषय पर गहन विचार करना चाहिए कि जो काम हम करने जा रहे हैं उससे हमारी जग हंसाई तो नहीं होगी।
विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में कामचोरी के कारण जब गृहकार्य नहीं कर पाते तब साथी की कापी लेकर नकल कर लेते हैं। उस समय उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि वे अपने नाम के स्थान पर बिना समझे जल्दबाजी में साथी का नाम आदि लिख देते हैं। इससे अध्यापक को ज्ञात हो जाता है कि किसकी नकल करके वह कार्य किया गया है। इसी तरह परीक्षा के समय भी होता है। कभी-कभी अपने सही उत्तर को साथी के गलत उत्तर के कारण गलत लिखकर अपने अंक कम करवा लेने पर पछताना पड़ता हैं। यानी नकल करने से विद्यार्थियों में सोचने, याद करने और पढ़ने की क्षमता कम हो जाती है।
आस-पड़ौस या बन्धु-बान्धवों के घर कोई भी नई वस्तु आ जाने पर हमारी अकुलाहट शुरू हो जाती है। चाहे वह उनका नया बड़ा घर हो अथवा महंगी नई गाड़ी हो। इनके अतिरिक्त बड़ा टीवी, बड़ा फ्रिज, महंगा नया फोन या आईपेड कुछ भी हो सकता है। हमारे मन में उन वस्तुओं को देखकर अनायास ही हीन भावना आने लगती है। तब सोचने लगते हैं कि कब हम उन अनावश्यक वस्तुओं को खरीद पाएँगे।
उस समय व्यक्ति और अधिक उलझ जाता है और उसे कुछ समझ नहीं आता। उन वस्तुओं को खरीदने वालों को हम भाग्यशाली कहते हुए अपने दुर्भाग्य को कोसने लगते हैं। ईश्वर पर भी दोषारोपण करने से भी हम नहीं चूकते कि उसने हमें ये सब खरीदने की सामर्थ्य क्यों नहीं दी।
तब हम अपने बैंक अकाऊँट खंगालते हैं। पड़ौसी के घर आने वाली नई वस्तुओं की नकल करके हम भी वस्तुएँ खरीद लेते हैं। उस समय हम उन वस्तुओं को खरीदने के लिए इतने अधिक उतावले हो रहे होते हैं कि यह भी विचार नहीं कर पाते कि उसे खरीदने के लिए हमारे पास साधन हैं भी या नहीं। यदि अपने पास धन है तो ठीक, नहीं तो जुगाड़ हो जाएगा वाली अपनी सोच का सहारा लेते हैं।
तब हम पैसे का जुगाड़ करने में जुट जाते हैं। यदि हमें किसी अपने के माध्यम से धन मिल जाए तो बढ़िया, नहीं तो फिर हम किसी व्यक्ति से अथवा बैंक से कर्ज लेकर वह वस्तु खरीदकर परेशानी अवश्य मोल ले लेते हैं। आखिर उधार लिया हुआ पैसा चुकाना भी तो पड़ता है जिससे घर का मासिक बजट गड़बड़ा जाता है। कई आवश्यक खर्चों को मजबूरन रोकना पड़ जाता है।
दूसरों की होड़ करते हुए हम अपने घर में यदा-कदा ऐसी वस्तुएँ भी एकत्रित कर लेते हैं जिनकी हमें आवश्यकता ही नहीं होती। इससे घर में जगह तो घिरती है और व्यर्थ ही पैसा भी बर्बाद हो जाता है। इसलिए यथासम्भव भेड़चाल न करते हुए दूसरों की नकल करने से बचना चाहिए। अपने विवेक का सहारा लेकर स्वयं को भविष्य में आने वाले कष्टों से सुरक्षित करने में ही बुद्धिमत्ता कहलाती है।
अपने विचारों को स्पष्ट और सजग रखना चाहिए। अपनी सोच को व्यवस्थित करना चाहिए। अपनी गलतियों से सीखकर गलत आदतों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। अपने कार्यों का मूल्यांकन करते रहना चाहिए। कुसंगति से बचना चाहिए। सज्जनों की संगति में रहना चाहिए। सदा धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। सार रूप में हम कह सकते हैं कि नकल करना अपने विवेक को कमजोर करता है जबकि स्वाध्याय सज्जनों की संगति और आत्म-चिन्तन विवेक को मजबूत करते हैं और सही दिशा दिखाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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