माँ के हाथ का स्पर्श
माँ के हाथ का स्पर्श बच्चे के लिए रामबाण दवा का काम करता है। बच्चा जब कहीं गिर जाता है या उसे चोट लग जाती है तो माँ उसे सहला देती है। वह अपनी चोट के दर्द को भूल जाता है। घर में जब अपने से किसी बड़े से उसे डाँट पड़ जाती है तो बच्चा रोते हुए आकर अपनी माँ से शिकायत करता है। तब माँ सब पर गुस्सा करने का उसे आश्वासन देकर बहला देती है। उसे विश्वास होता है कि मॉं से अपनी समस्या बता दी है तो वह चुटकी बजाते ही उसकी समस्या का समाधान कर देगी।
उसका किसी दोस्त से यदि झगड़ा हो जाता है और वह दुखी होकर घर आता है तब माँ उन दोनों में प्यार से सुलह करवा देती है। स्कूल में टीचर से उसे फटकार लगती है तो बच्चा घर आकर अपनी माँ की गोद में दुबक जाता है। उसे लगता है कि वह अपनी माँ की गोद में है, वह उसे बचा लेगी। माँ उसके सिर पर जब अपना ममता भरा हाथ फेरती है और प्यार करती है तो बच्चा कक्षा में हुए अपने तथाकथित अपमान को भूल जाता है। प्रसन्न होकर वह मस्त हो जाता है।
अपनी माँ पर हर बच्चा आँख मूँदकर विश्वास कता है। वह यही सोचता है कि उसकी माँ उसे हर परेशानी से छुटकारा दिला देगी। इसी सोच से वह प्रफुल्लित हो जाता है। अपने सारे दुख-दर्द अपनी माँ के साथ साझा करके वह सब कष्टों अथवा परेशानियों को भूल जाता है। उसे ऐसा लगता है मानो उसने कोई जंग जीत ली हो। तब नवीन उत्साह से मस्त होकर नाचने लगता है, खेलने लगता है। यह बच्चे की सरलता और सहजता का ही परिणाम होता है।
इसे हम लोग 'टच थेरेपी' भी कह सकते हैं। बच्चे को कैसा भी कष्ट हो माँ के स्पर्श मात्र से ही वह अपने सारे कष्ट भूल जाता है। माँ का प्यार से सिर पर हाथ फेरना अथवा गोद में लेकर सहला देना ही उसकी हर मर्ज की दवा बन जाता है। बच्चे की यह हार्दिक इच्छा होती है कि जब भी उसे अपनी मॉं की आवश्यकता हो, वह उसे सरलता से उपलब्ध होनी चाहिए।
ईश्वर की कुदरत है कि माँ के साथ उसका सम्बन्ध सबसे अधिक होता है। वह नौ मास तक माता के गर्भ में रहता है और उसी से ही पुष्ट होता है। यह सुरक्षाकवच जन्म के पहले ही माता द्वारा उसे मिलता है। यही कारण है कि वह अपने हर कार्य के लिए अपनी माँ पर ही निर्भर रहता है। अपनी हर छोटी-बड़ी जिद उसी के माध्यम से पूरी करने का यत्न करता है। माता बच्चे की प्रथम गुरु कहलाती है।
समाज में ऐसा भी देखा गया है कि कुछ बच्चे जन्म से विकलॉंग होते हैं। बच्चे के पिता सहित उस घर के सभी लोग उसका दायित्व उठिना नहीं चाहते। वे उसे किसी संस्था में रखना चाहते हैं। परन्तु मॉं ही अकेली ऐसी होती हैं जो अपने उस बच्चे को कलेजे से लगाकर पालती है। उसे घर से दूर छोड़ने के लिए तैयार नहीं होती। वह अपने बच्चे की विकलॉंगता को अनदेखा कर देती है। बहुत से बच्चे अपनी किसी भी आवश्यकता के लिए पिता से बात करने में डरते हैं। परन्तु आशा भरी नजरों से अपनी माता की ओर देखते हैं। वह उनकी उम्मीदों पर खरी उतरती है।
ऐसा नहीं है कि घर के अन्य सदस्य उसे प्यार नहीं करते अथवा उसे आश्वस्त नहीं करते। वे उसकी सारी आवश्यकताओं का ध्यान भी रखते हैं। उसके मन को बहलाने के लिए वे माँ की तरह लोरी भी सुनाते हैं और कहानी भी। उसे घुमाते-फिराते भी हैं और उसकी हर जिद को पूरा करते हैं। इतना सब होने के बाद भी बच्चे को केवल माँ की गोद ही चाहिए होती है।
इसका कारण स्पष्ट है कि माँ का स्पर्श ही उसका सबसे बड़ा सहारा होता है। बच्चे को घर के अन्य सदस्य यदि न दिखें तो वह उनके बारे में पूछताछ करता है उन्हें ढूँढने का प्रयास करता है। परन्तु यदि वह कहीं से खेलकर लौटा है अथवा स्कूल से अपने घर वापिस आया है तो अपनी माँ को सामने न पाकर रोने लगता है। घर में चाहे सभी सदस्य विद्यमान हों पर वह यह कदापि सहन नहीं कर सकता कि उसकी अपनी माँ उसकी आँखों से पलभर के लिए भी ओझल हो जाए।
विद्वानों का मानना है कि बच्चे की कोई गलत आदत छुड़ानी हो या उसे अच्छे संस्कार देने हों तो उसके सो जाने पर यदि माता उसके सिर पर हाथ फेरते हुए गलत आदत छोड़ने अथवा अच्छे संस्कार अपनाने के लिए प्रेरित करे तो बच्चे पर उस क्रिया का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
माँ बच्चे का यह सम्बन्ध बहुत ही भावनात्मक होता है। बच्चा काला हो या गोरा, दुबला हो या मोटा अथवा अपाहिज कैसा भी हो वह अपनी माँ के कलेजे का टुकड़ा होता है। उसे वह अपने सीने से लगाकर रखती है। दुनिया भर की मुसीबतें वह अकेले सह लेती है पर अपने बच्चे को गर्म हवा तक नहीं लगने देती । बच्चा भी यह जानता-समझता है कि दुनिया में कोई भी उस पर हंस ले या उसका मजाक उड़ा ले पर माँ कभी भी उसका उपहास नहीं करेगी। बच्चे को अपने पिता से भी अधिक अपनी माता पर विश्वास होता है। इसीलिए माँ तो माँ होती है। उसके नेह और उसकी छत्रछाया में बच्चे को हर पल आत्मविश्वास मिलता है। उसके सहारे वह कुछ भी कर गुजरता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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