दूसरों की सहानुभूति बटोरना
दूसरों की सहानुभूति बटोरने में कुछ लोगों को बहुत महारत हासिल होती है। दूसरों को बेवकूफ बनाने अथवा उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे नित नए बहाने गढ़ते रहते हैं। सोचने वाली बात यह है कि उन्हें स्वयं को सबके समक्ष बेचारा बनाने में क्या मजा आता है? यह बात मुझे आज तक समझ नहीं आई। वे लोग कभी अपने स्वास्थ्य का रोना रोते रहते हैं तो कभी अपनी नाकामयाबी का। अपने घर-परिवार की छिछालेदर करके वे बहुत प्रसन्न होते हैं।
कुछ लोग हर समय ही दूसरों के सामने अपने स्वास्थ्य अथवा अपनी मजबूरियों का रोना रो करके दूसरों को यह बताना चाहते हैं कि वे अकेले दुनिया में ऐसे हैं जो सबसे अधिक परेशान हैं। उन्हें इस बात को याद रखना चाहिए कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे कोई परेशानी न हो। किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो कोई धन-सम्पत्ति के न होने से दुखी है। कोई बच्चों के कारण परेशानी में है तो कोई व्यपार-नौकरी के साथियों से कष्ट में हैं।
बहुत-सी बेटियाँ विवाह के उपरान्त से ही अपने ससुराल के लोगों की बुराई करके मायके में सहानुभूति पाना चाहती है। ऐसा करके वे अपने ससुराल पक्ष का अपमान करती हैं। कुछ लड़कियाँ अपने पति की बुराई अपने माता-पिता के सामने करके उसका सम्मान कम करवा देती हैं। वे भूल जाती हैं कि ऐसा करके वे अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए माता-पिता से धन-सम्पत्ति तो बटोर सकती हैं पर अपने पति व अपने घर को बदनाम कर देती हैं।
सास अपनी बहू की बराई करके अपने घर-परिवार तथा अपनी सखियों में सहानुभूति बटोरती है और बहू अपनी सास की बुराई करके अपने मायके व सहेलियों में सहानुभूति बटोरने का यत्न करती है। इस प्रकार पर से कीचड़ उछालकर वे एक-दूसरे की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। इस तरह दोनों स्वयं को बन्धु-बान्धवों के समक्ष बेचारा घोषित कर देती हैं। वे भूल जाती हैं कि रहना तो उन दोनों ने एक ही घर में है। एक-दूसरे के साथ ही निभाना है।
कुछ पुरुष साथी महिलाओं की सहानुभूति पाने के लिए अथवा उनसे दोस्ती करने के लिए अपनी पत्नी के विषय में झूठी और मनगढ़न्त कहानियाँ सुनाकर उसके चरित्र को कलंकित करने से नहीं हिचकिचाते। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि यदि उनकी पत्नी को किसी तरह पता चल जाएगा तो क्या होगा? अथवा यदि कभी वह उनके मित्रों के सामने आ जाएगी तो उनकी पोल खुल जाएगी। तब वे उनसे ऑंख भी नहीं मिला पाऍंगे।
इसी प्रकार कई महिलाएँ भी कमोबेश इसी प्रकार का व्यवहार करके यानी वे अपने पति व अपने सास, ससुर व ननद की बुराई करके दूसरे पुरुष मित्रों से अनावश्यक अतरंगता बढ़ाने का यत्न करती हैं। अथवा अपने सहकर्मियों के मध्य बेचारी बनने का प्रयास करती हैं। इस प्रकार का व्यवहार करके वे पुरुष एवं महिलाएँ समाज में हंसी का पात्र बनते हैं और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध चलने का दोषी भी बनते हैं। सत्य यह है कि उनकी पोल कभी+न-कभी खुल जाती है और सच्चाई सबके सामने आ जाती है।
कभी-कभी मित्र भी अपने दोस्तों की भावनाओं का मजाक उड़ाते हुए, उनसे जब तब अपना मतलब पूरा करने का प्रयास करते हैं। परन्तु असली मुद्दे की बात यह है कि जो भी लोग इस प्रकार से दूसरों की भावनाओं से खिलवाड़ करके जायज-नाजायज तरीकों से सहानुभूति पाना चाहते हैं, वे भूल जाते हैं कि जब सच्चाई सामने आती है तो बहुत ही शर्मसार होना पड़ता है। तब ऑंखे शर्म से झुक जाती हैं और तब ऐसे लोग बगलें झॉंकने लगते है।
कहने का तात्पर्य है यह है कि झूठ के पैर नहीं होते और सच्चाई कभी छुप नहीं सकती। सच और झूठ में कभी सच का पलड़ा भारी हो सकता है तो कभी झूठ का। पर अन्त में सत्य सात पर्दों से मुस्कुराता हुआ बाहर आ ही जाता है। तब झूठ का लबादा उतर जाता है। ऐसे लोग कहीं के भी नहीं रहते। वे दूसरों की नजरों से उतर जाते हैं। उन लोगों पर फिर कोई विश्वास नहीं करता। इस तरह क्षणिक सहानुभूति बटोरने के चक्कर में वे अलग-थलग पड़ जाते हैं।
अपनी स्थिति के विषय वास्तविक जानकारी देना उपयुक्त होता है। इससे न तो अपनी स्वयं की हेठी नहीं होती है और न ही रिश्तों की गरिमा नष्ट होती है। रिश्तों में सद्भाव बढ़ाने के लिए नफरत और झूठ का नहीं बल्कि प्यार और सच्चाई का छौंक लगाना चाहिए। ऐसा करने से रिश्तों की गर्माहट कम नहीं होती और एक-दूसरे के प्रति प्रेम तथा विश्वास बना रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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