जीत की कामना
जीत की कामना हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है। कोई भी मनुष्य हारना पसन्द नहीं करता। हालॉंकि हार और जीत दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो नदी के दो किनारों की तरह कभी मिल नहीं सकते। वे आवश्यक दूरी बनाकर रहते हैं। एक समय में मनुष्य को जीत या हार दोनों में से कोई एक ही मिल सकती है। यह उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने सिर पर जीत का सेहरा बाँधना पसन्द करता है अथवा फिर हारकर अपना मन मसोसकर रह जाता है।
हर खेल में जीत और हार के मायने अलग-अलग होते हैं क्योंकि वहाँ न जीत स्थायी होती है और न ही हार सदा के लिए होती है। वहाँ तो दोनों ही पक्ष आमने-सामने खड़े होते हैं। यह निश्चित है कि जब खेल की समाप्ति पर परिणाम घोषित किया जाएगा तो उन दोनों टीमों में से एक जीतेगा और दूसरा हाथ जाएगा। परन्तु जिन्दगी की इस रेस में ऐसा नहीं होता है। हम दोनों हाथों में लड्डू की तरह जीत और हार को एकसाथ लेकर तो कभी आनन्दित नहीं हो सकते। यदि यहाँ जीत का लक्ष्य लेकर चलेंगे तो हार से बच सकने का रास्ता खोजने में आसानी होगी।
जीवन के खेल में हर कोई जीत के लिए लड़ता है, संघर्ष करता है। अपने प्रतिद्वन्द्वी को धोबी पछाड़ देने का प्रयत्न करता है। यह आवश्यक नहीं कि दिन विशेष हमारा ही होगा। हमारे सामने वाला भी तो जीत की कामना से ही उपस्थित होगा। अब जिसका प्रयास अधिक होगा उसी की मेहनत रंग लाएगी। इसका यह अर्थ नहीं कि हम हार मानकर निराश हो जाऍं अथवा कहीं मुॅंह छिपाकर बैठ जाऍं। सयाने कहते हैं -
मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती
इसका अर्थ यह है कि हार जीत का दूसरा पक्ष है। चींटी की तरह बार-बार परिश्रम करने वाले को जीत का स्वाद चखने से कोई नहीं रोक सकता।
यहॉं एक बात कहना चाहती हूॅं कि हार जाने की कल्पना एक छोटा बच्चा भी कभी नहीं कर पाता। उसे शायद इस हार-जीत का अर्थ भी ठीक से नहीं पता होगा। जब वह खेलते हुए जीत जाता है तो खुश होता है, नाचने लगता है। इसके विपरीत जब वह खेल में हारने जाता है तो रोने लगता है। दूसरे बच्चों पर धोखा देने का आरोप लगाने लगाता है। उसके बाद वह खेल छोड़कर भाग जाता है।
यह सत्य है कि जीतने वालों के हौंसले बुलन्द रहते हैं। वे अपने लिए आदर्श स्थापित करते हैं और दूसरों के आदर्श बनते हैं। ये निर्भीक लोग चुनौतियों का डटकर सामना करते हैं और उन्हें अपने पक्ष में करके ही दम लेते हैं। चाहे आकाश की ऊँचाई हो अथवा सागर की गहराई हो या फिर पर्वतों की रुकावट हो, उनके मार्ग में बाधा नहीं बनती। वे एक छोटी-सी नौका से विशाल सागर पार करने की सामर्थ्य रखते हैं। साइकिल से विश्व भ्रमण तक कर लेते है। एक बार जीत की आदत हो जाने पर बार-बार मनुष्य को इसका स्वाद चखने की इच्छा होती है।
इसके विपरीत हार जाना बहुत ही सरल होता है। हाथ पर हाथ रखकर निठल्ले बैठ जाओ, जरा भी उद्यम न करो तब तो हार निश्चित है। परिवारी जन उठते-बैठते सदा लानत-मलानत करते रहते हैं। सारा समय नाकामयाबियों के किस्से सुनाकर उसे अपमानित करते रहते हैं। मित्र मण्डली हारे हुए व्यक्ति का साथी बनने से इन्कार कर देती है। तब भी यदि वह हार का ठीकरा अपने सिर पर फोड़ने से बाज नहीं आए तो ईश्वर ही ऐसे लोगों की रक्षा कर सकता है।
हारने वाला अपने जीवन से सदा ही निराश रहता है। जो मनुष्य समाज में रहते हुए अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाता, उसके कारण वह सदा ही दूसरों के सामने अपना मुँह छिपाता फिरता है। उसके अपने पत्नी व बच्चे तक उसका साथ नहीं देते। वह अलग-थलग पड़ जाता है। उसे सदा के लिए ही नकारा घोषित करके अपने लोगों से दूर कर दिया जाता है। सयाने कहते हैं-
हारे को हरि नाम
अर्थात् जो व्यक्ति हार जाता है उसके पास परमात्मा की शरण में जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता।
कुछ लोग हार जाने के डर से रेस का भाग ही नहीं बनते ऐसे ढुलमुल चरित्र वाले लोग जीवन में सदैव पिछड़ते जाते हैं। उनका नाम तक भी कोई नहीं लेता। जीत साहस, कठेर परिश्रम एवं निडरता का प्रतीक है। जबकि हार आलस्य, भगोड़ेपन और डर का प्रतीक है। जो मनुष्य जितना आत्मविश्वास पूर्वक आगे बढ़ता जाता है, वह उतनी ही बाधाओं को पार करता हुआ सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। यही जीते हुए लोग इतिहास के पन्नों में युगों-युगों तक अमर हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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