पिता आकाश से ऊँचा
आकाश की ऊँचाई सदा से उसकी महानता का प्रतीक रही है जिसे छूना शायद मनुष्य के लिए नामुमकिन है। उसे छू पाने की होड़ लगाते हुए पक्षी ऊँचे और अधिक ऊँचे तक उड़ने का प्रयत्न करते हैं परन्तु वे आकाश की ऊँचाई तक पहुँच ही नहीं पाते तब उसे छू लेना बड़ी दूर की बात हो जाती है। हाँ, इस प्रयास में उनके पंख अवश्य टूट जाते हैं। वे लहूलुहान भी हो जाते हैं, थककर चूर हो जाते हैं। फिर वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कभी-कभी कुछ पक्षी अपने प्राणों की आहुति तक दे देते हैं।
आकाश का गहरा नीला रंग आरम्भ से ही कलाकारों, चित्रकारों और रचनाकारों के लिए सदा प्रेरणा का स्त्रोत रहा है। रात्रि के समय उसका नीला रंग चॉंद और सितारों से आच्छादित हो जाता है। उस समय उसकी सुन्दरता देखते ही बनती है। जब प्रातःकाल सूर्य भगवान का आविर्भाव होता है तब वहाँ पर छाई हुई लालिमा देखते ही बनती है। उस समय आकाश पर छाया वह अन्धेरे का साम्राज्य हमारे देखते-देखते सूर्य के प्रकाश से ओझल हो जाता है। उसका निखरा हुआ नया रूप हमारे सामने आ जाता है।
मध्याह्न काल (दोपहर) में सूर्य के प्रचण्ड तेज से दमकते आकाश की छवि कुछ अलग-सी दिखाई देती है। चारों ओर प्रकाशमय वातावरण होता है। सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है। कहीं कोई ठोकर नहीं, कहीं कोई अन्धकार का साम्राज्य नहीं। होता है तो बस प्रकाशित आकाश जो सचमुच मोहक होता है। उसकी आभा से से चहुॅं ओर ओजस्वी आकाश दिखाई देता है। उस समय उसकी चमक को हम देखने में समर्थ नहीं हो पाते क्योंकि सूर्य के तेज से हमारी आँखे चुँधियाने लगती हैं।
रात्रि में जब अन्धेरा होता है तब आसमान काले रंग का दिखाई देता है। उस समय हमें ऐसा लगता है मानो काले रंग की चादर पर किसी ने चमकते हुए चाँद और सितारे टाँक दिए हैं। रात में झिलमिल करती हुई इस चादर की छवि को निहारने का आनन्द कुछ अलग प्रकार का होता है। यह समय प्रकृति के विश्राम करने का होता है। चारों ओर शान्ति छाई रहती है।
प्रातःकाल होते ही पक्षी अपने झुण्ड बनाकर आकाश में उड़ते हुए आते हैं। वे भोजन की तलाश में लग जाते हैं। अन्धेरा होने से पहले सायंकाल को पक्षी आकाश में उड़ते हुए अपने घोंसलों में चले जाते हैं। ऊॅंचे नभ में पक्षियों को उड़ते देखना बहुत मनभावन होता है। इससे भी बढ़कर पक्षियों की तरह के हवाई जहाज भी उसकी सुन्दरता में चार चॉंद लगा देते हैं। इन हवाई जहाजों को आकाश में उड़ता देखना हर आयु के लोगों को सुहाता है। वे इन्हें एकटक निहारते हैं।
आकाश को कुछ समय के लिए जब बादल ढक लेते हैं उस समय धरा पर मानो अन्धकार छा जाता है। फिर उमड़-घुमड़ कर बादल बरस जाते हैं। तब उसके बाद निकलने वाले इन्द्रधनुष की छटा निहारते ही बनती है। चमकता हुआ आसमान और उस पर दमकता हुआ सात रंगों से सजा इन्द्रधनुष सबका मन मोह लेता है। यह सतरंगी इन्द्रधनुष कलाकारों और रचनाकारों की प्रेरणा बनता है। बच्चे इसे निहारकर बहुत प्रसन्न होते हैं।
ऐसी महानता और ऊँचाई वाले आकाश से भी बड़ा स्थान शास्त्रों ने पिता का माना है। पिता मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने वाला होता है। वह अपने बच्चे का पालन-पोषण करता है। उसकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है। उसे पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाता है ताकि वह सिर उठाकर सब लोगों के सामने गर्व से खड़ा हो सके। जब बच्चा योग्य बनकर अपने दायित्वों को निभाने लगता है तब पिता गर्व से फूला नहीं समाता। यह उसके लिए गर्व का पल होता है।
पिता अपनी सन्तान के माध्यम से अपने सारे सपनों को साकार करना चाहता है। जब दूसरे लोग उसके बच्चे को होनहार अथवा योग्य सन्तान कहकर प्रशंसा करते हैं तो उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। पिता अपनी सन्तान का सदा ही शुभचिन्तक होता है। वह अपने सारे कष्टों और अभावों के बावजूद अपनी सन्तान के हित साधन में जुटा रहता है।
जिस प्रकार आकाश को छू पाना किसी के लिए भी असम्भव होता है, उसी प्रकार पिता की महानता को छू सकना बच्चों के बस की बात नहीं होती। सन्तान के लिए जो कार्य पिता करता है, उससे मनुष्य उऋण नहीं हो सकता। चाहे वह आयुपर्यन्त उसकी सेवा करता रहे। बच्चे पिता के ऊँचे कद के बराबर नहीं पहुँच सकते। इसलिए पिता की महानता और उसकी ऊँचाई का सम्मान करते हुए, उससे होड़ न करके उसे हर प्रकार से प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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