रविवार, 7 दिसंबर 2025

ताली एक हाथ से नहीं बजानी

ताली एक हाथ से नहीं बजती

'ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती' यह हिन्दी भाषा का एक प्रसिद्ध मुहावरा है। इसका अर्थ हम यह कर सकते हैं कि किसी भी कार्य को करने के लिए दो लोगों की भागीदारी अथवा जिम्मेदारी की आवश्यक होती है। कोई भी झगड़ा, विवाद या महत्त्वपूर्ण कार्य केवल एक व्यक्ति के कारण कभी नहीं हो सकता। यानी मित्रता अथवा शत्रुता, प्रेम, घृणा या विवाद सब दो पक्षों की सहभागिता से ही होते हैं। इसके लिए आपसी सहयोग अथवा मतभेद दोनों ही आवश्यकता होती है। 
            यह कथन बिल्कुल सत्य है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। हम अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हैं तभी ताली बजा सकते हैं। अन्यथा यह कोरी कल्पना बनकर रह जाती है। हाँ, यह भी सत्य है कि एक हाथ से हम मेज को थपथपाकर अपनी सहमति अथवा प्रसन्नता अवश्य प्रदर्शित कर सकते हैं। 
           किसी भी समस्या या घटना में गलती केवल किसी व्यक्ति विशेष की नहीं होती, दोनों ही पक्षों की कुछ-न-कुछ हिस्सेदारी होती है। सच्ची सफलता और अच्छा रिश्ता बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों का सहयोग आवश्यक होता है। प्रेम, दोस्ती या झगड़ा ये सभी दो लोगों के बीच ही सम्भव हो सकते हैं। एक व्यक्ति अकेला कुछ भी नहीं कर सकता।पति-पत्नी के झगड़े में किसी एक को पूरी तरह से गलत ठहराना अनुचित है। किसी काम को सफल बनाने के लिए भी दो साथियों का मिलकर काम करना जरूरी होता है।
          यह तो हो ही नहीं सकता कि किसी एक की गलती के कारण झगड़ा हो जाए या वैमन्स्य हो जाए। जब तक दोनों लोग आपस में न टकराएँ तब तक दुश्मनी की नौबत नहीं आ सकती। इसलिए सावधानी रखनी आवश्यक है। घर, परिवार अथवा समाज में लोगों के व्यवहार को देखते-परखते हुए ही हम इसका अनुभव कर सकते हैं। भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्रों अथवा सम्बन्धियों आदि में यदि मनमुटाव या झगड़ा होता है तब हम एक-दूसरे को दोष देकर अपना-अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। यदि दोनों पक्षों की बात निष्पक्ष होकर सुन ली जाए तो पता चल जाता है कि गलती दोनों की होती है। 
           झगड़े की स्थिति में यदि एक व्यक्ति चुप लगा जाए तो दूसरा कब तक बकझक करेगा। आखिर वह भी यह कहकर चुप हो जाएगा कि यह तो कुछ बोलता नहीं, कौन दीवारों से सिर फोड़े? समस्या तभी बढ़ती है जब दोनों ही बराबर की टक्कर दें। कोई भी व्यक्ति अपने आपको छोटा कहलाना पसन्द नहीं करता। इसलिए कोई भी पक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं होता। सब एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देते रहते हैं। तभी ऐसी कटु स्थितियॉं बनती है।
          इसी प्रकार कार्यक्षेत्र में भी आपसी कटुता के कारण ही बॉस व कर्मचारियों के बीच मनमुटाव बढ़ता रहता है। इस कारण वहाँ पर कामबन्दी, तालाबन्दी अथवा धरने- प्रदर्शनों आदि की नौबत आती है। देश में अथवा विश्व में अपरिहार्य स्थितियॉं भी दो दलों अथवा दो देशों के कारण है बनती हैं। उनका परिणाम अथवा खमियाजा सभी को भुगतना पड़ता है।
             रिश्तों में अलगाव की स्थिति के लिए भी दोनों ही व्यक्ति जिम्मेदार होते हैं। एक का पक्ष लेकर दूसरे पर दोषारोपण करना अनुचित होता है। सभी समझदार लोगों को जागरूक रहना चाहिए और दूसरों को भी सचेत करना चाहिए। रिश्तों में यदि झूठे अहं को छोड़कर दोनों थोड़ा-सा गम खा लें तो बिखराव के कारण होने वाली बिनबुलाई समस्याओं से बचा जा सकता है। यह तो हो सकता है कि किसी एक की गलती दूसरे पर भारी पड़ जाती है। पर कमोबेश स्थिति यही होती है कि दोष दोनों का ही होता है। यह चर्चा हमारे भौतिक सम्बन्धों की होती है। 
           प्रकृति को हम दोष देते नहीं थकते कि वह हम पर अत्याचार करती है। कभी बाढ़ आ जाती है, कभी भूकम्प आ जाते हैं, कभी अतिवृष्टि होती है, कभी अनावृष्टि होती है, बीमारियाँ फैल रही हैं, हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है आदि। परन्तु क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखते हैं कि इन सारी प्राकृतिक आपदाओं के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। हमने स्वयं ही इन सब मुसीबतों को न्यौता दिया है।
             प्रकृति से हम स्वयं छेड़छाड़ करते हैं। हम खुद को बहुत विद्वान और महान मानते हैं। तभी प्राकृतिक संसाधनों का हम आवश्यकता से अधिक दोहन करते हैं। जब हम अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आएँगे तो उसका दण्ड कोई दूसरा नहीं हमें स्वयं को ही तो भोगना पड़ेगा। आज तक मुझे यह समझ नहीं आया कि फिर हम इतनी हाय तौबा क्योंकर करते हैं। स्वयं के आचरण पर लगाम क्यों नहीं लगाते?
             हमें प्रयास यही करना चाहिए कि जीवन में छोटी-मोटी कटुताओं को अनदेखा कर दिया जाए। उन्हें अनावश्यक तूल देकर आपसी सम्बन्धों की बलि न चढ़ाई जाए। सन्बन्धों को तोड़ने के लिए ताली को दोनों हाथों से नहीं बजानी चाहिए बल्कि उनमें मधुरता लाने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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