शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

मनुष्य को अपने सिर पर बहुत अधिक बोझ नहीं उठाना चाहिए। उसे अपनी पीठ पर मात्र उतना ही बोझ लादकर चलना चाहिए जितना वह आराम से उठा सकता हो। फिर वह बोझ चाहे उसके रिश्तों का हो अथवा किसी सामान का। इसके अतिरिक्त चाहे वह बोझ उसके अभिमान का ही क्यों न हो। देखा जाता है कि अपनी सामर्थ्य से अधिक बोझ लेकर चलने वाला मनुष्य इस ससार में अक्सर डूब जाता है। 
               बोझ ढोने का अर्थ भारी सामान या वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लादकर ले जाना या उठाना होता है। इसके अतिरिक्त  जिम्मेदारियों, कठिनाइयों या मानसिक तनाव को सहन करने को भी कहते हैं। जीवन में समस्याओं का बोझ उठाना पड़ता है। परिवार या काम का दायित्व सम्भालने को भी हम उसका बोझ कह सकते हैं। मनुष्य को अपनी की गई गलतियों का बोझ दुःख अथवा‌ परिणाम सहने के रूप में  ढोना पड़ता है।
             रिश्तों की अहमियत हम सब लोग जानते हैं परन्तु जब ये रिश्ते मनुष्य के लिए बोझ बन जाएँ तो उनसे दूरी बनाना ही उचित होता है। वैसे तो सभी रिश्ते बहुत ही नाजुक और महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनको सदा सहृदयता और सद् भावना से ही निभाना चाहिए। उनमें टकराव की स्थिति कभी उत्पन्न न होने पाए, इससे बचने का यथासम्भव प्रयास मनुष्य को करना चाहिए। 
             यदि उन रिश्तों मे आपसी भाईचारा तथा विश्वास समाप्त हो जाए तो वे भार की तरह हो जाते हैं। एकतरफा रिश्ता लम्बे समय तक हाथ थामकर साथ नहीं चल पाता। ऐसे रिश्ते जो जीवन में नासूर बनकर कष्टदायी बन जाते हैं, उनके लिए अपने मन की शान्ति भंग नहीं करनी चाहिए। उन्हें छोड़ देना ही श्रेयस्कर होता है। 
             यात्रा के लिए जब कभी जाना हो तो यत्न यही करना चाहिए कि सीमित सामान ही लेकर जाया जाए। कम सामान होने पर उसे सम्हालना अधिक सुविधाजनक होता है। यदि बहुत सारा आवश्यक अथवा अनावश्यक  सामान लेकर चला जाएगा तो फिर बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सामान की रखवाली करने के कारण मनुष्य के घूमने-फिरने का आनन्द कम हो जाता है।
             मनुष्य पर उसके घमण्ड का बोझ बहुत अधिक होता है। वह अपने अहं में अन्धा होकर अच्छे और बुरे का विवेक खो बैठता है। अहंकार का नशा जब सिर पर चढ़कर नाचने लगता है तब मनुष्य स्वयं को भगवान से कम नहीं समझता। वह इतराता फिरता है। मद में चूर वह आकाश में उड़ता फिरता है। उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उस समय वह दुनिया को आग लगा देने की बातें करने लगता है।
             एक दृष्टान्त पढ़ा था।‌ उसमें बताया गया था कि एक धोबी के पास एक गधा और एक घोड़ा था। धोबी घोड़े से बहुत प्यार करता था और खूब देखभाल करता था। गधे पर वह सारा सामान लादता रहता था। घोड़ा गधे की दुर्दशा पर उसका मजाक बनाता था। उसने गधे को समझाया कि जब उसका काम करने का मन नहीं करता तो वह बहाना बना लेता है। तब मालिक परेशान हो जाता है तब फिर उसकी बहुत देखभाल करता है।
             गधा अपने ऊपर लादे जाने वाले बोझ से बहुत व्यथित रहता था। मालिक भी ऐसा था जो दिन-प्रतिदिन बिना सोचे-समझे उसका भार बढ़ाता रहता था। वह दिन भर बोझ उठाते-उठाते उदास रहने लगा था। वह भी घोड़े की तरह कभी आराम करना चाहता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अपने मालिक को सबक सिखाएगा। शाम को जब धुले हुए सूखे कपड़े लेकर आ रहा था तो रास्ते में नदी पार करते समय उसने नदी में गिरने का नाटक किया। 
            उसके ऊपर लदे हुए वे सारे कपड़े भीग गए और उनका भार बहुत अधिक हो गया। वे भारी कपड़े घर तक ले जाने में उसकी कमर टूटने लगी। उसके मालिक को उस पर जरा-सा भी तरस नहीं आया। उसे ऊपर से अपने मालिक की मार भी खानी पड़ गई।
              अब विचार यह करना है कि यह गधा केवल कोई धोबी का गधा है। नहीं, यह केवल धोबी का गधा नहीं है। हम मनुष्य भी जीवन भर रिश्तों और अपने अहं का बोझ अपने सीने पर ही ढोते रहते हैं और दूर से देखती हुई नियति हम पर हँसती रहती है। 
          मोहमाया के बन्धनों में जकड़े हुए हम मनुष्य चाहकर भी इस बोझ को उतारकर नहीं फैंक पाते। सड़े और नासूर बन रहे इन बन्धनों से मुक्त होने का सार्थक प्रयास करना चाहिए। इसलिए बोझ कैसा भी हो, उसे सिर से उतारकर फैंकने से ही हम सुख की साँस लेकर चैन की बाँसुरी बजा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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