रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

आजकल लोगों में अपनापन कम होने लगा है। हर रिश्ते से लोग दूरी बनाने लगे हैं। अपनेपन में आने वाली यह दूरी मनुष्य के क्रोध को बढ़ाने का कार्य करने लगी है। भौतिक युग में जहाँ मनुष्य जीवन के बाकी सारे मायने बदलते जा‌ रहे हैं, वहाँ इसके साम्राज्य का भी विस्तार होने लगा है। कोई मनुष्य अपने जीवन की रेस में पिछड़ना नहीं चाहता, वह सदा अग्रणी बने रहना चाहता है। शायद यही कारण है कि उसे अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और फिर उसे अनावश्यक ही बात-बेबात पर क्रोध आने लगता है।
            वैस यह क्रोध मनुष्य का ऐसा शत्रु है जो उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। राहू ग्रह की तरह उसके विवेक को ग्रसकर ग्रहण लगा देता है। उसे अपने बन्धु-बान्धवों से दूर कर देने में यह अहं भूमिका निभाता है। इस क्रोध का कोई सानी नहीं है क्योंकि यह हमारी सोच से भी अधिक चालबाज या चतुर होता है। इसे अच्छी तरह पता है कि कहाँ अपना जोर आजमाना है और किस के सामने खून के घूँट पीकर चुप लगा जाना है। किसी भी क्षेत्र में अपने से अधिक बलशाली व्यक्ति के सामने यह मिमियाने लगता है।
            यह क्रोध अक्सर कमजोर पर ही निकलता है क्योंकि केवल उन असहाय दुर्बलों पर ही हमारा वश चलता है। हम अपनी कामवाली बाई, सब्जी वाला, धोबी, माली आदि पर ही अपने मन की भड़ास निकाल सकते हैं अथवा बहस कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए एक गाड़ी वाला अपने से बड़ी गाड़ी वाले से हाथ जोड़कर माफी माँग लेता है, परन्तु आटो वाले, रिक्शा चालक, साईकिल सवार अथवा पैदल चलने वालों पर ही वह अपना गुस्सा निकालने का यत्न करता हैं। 
            किसी पहलवान या गैंगस्टर के सामने तो सबकी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाती है। कार्यालय में अपने बॉस के सामने पैर पटकने की हिम्मत कोई भी कर्मचारी नहीं कर सकता। पता होता है कि यदि वहाँ क्रोध दिखाया तो नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाएगा। तब घर-परिवार का खर्च चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए वहॉं अपमान सहन कर भी वह चुप्पी साध लेता है।‌ सभी लोग अपने अधीनस्थों पर ही क्रोध कर सकते हैं बस। उन पर क्रोध करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
            इस तरह हम देखते हैं कि यह क्रोध कैसे-कैसे गुल खिलाता है। यह मनुष्य के अन्तस् में छुपी हुई कमजोरियों को सबके सामने उजागर कर देता है। इन्सान को पता भी नहीं चलता और यह क्रोध अपनी चाल चल देता है। उसे अहंकारी होने का मेडल दिला‌ देता है। लोग ऐसे व्यक्ति के सामने नहीं पड़ना चाहते। उसे दूर से देखकर वे किनारा कर लेते हैं। अपने इस क्रोध रूपी शत्रु के कारण धीरे-धीरे वह अकेला रह जाता है।
            प्रकृति को हम इन्सान अपने स्वार्थ के लिए बहुत अधिक हानि पहुँचाते हैं। नदियों के जल में कचरा और फेक्ट्रियों की गन्दगी डालकर उन्हें दूषित करते हैं। पेड़ों को काटते हैं, वायु प्रदूषित करते हैं। इस कारण वर्षा पर प्रभाव पड़ता है। मौसम चक्र में परिवर्तन होने लगता है। वातावरण को हम गाड़ियों के धुऍं से दूषित करते हैं। जब यह प्रकृति हम लोगों पर क्रोध करती है तो इस धरती पर विनाश हो जाता है। हम सब परेशान हो जाते हैं, उससे उभरने के लिए उपाय सोचते हैं।
           नदियों में बाढ़ आने से लोगों और पशुओं की मृत्यु हो जाती है, बड़े-बड़े भवन तक टूट जाते हैं और फसल नष्ट हो जाती है। जब सुनामी जैसी आपदाएँ आती है तो दूर-दूर तक विनाश हो जाता है। भूकम्प आ जाने पर भी जान-माल की बहुत हानि होती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और ओलावृष्टि सभी धरती पर कहर बरसाती हैं। हमारे दोष के कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मचने लगता है। ये सभी प्रकृतिक आपदाएँ हमारी मूर्खता का परिणाम हैं। जब-जब हम सब लापरवाह हो जाते हैं तब-तब ये सब तो झेलना ही पड़ता है। इससे बचना असम्भव हो जाता है।
            अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती है। जब वह तैश में आती है तो सारे भेदभाव भूलकर महलों और झोंपड़ियों सबको समान रूप से खाक में मिला देती है। शहरों और जंगलों को राख के ढेर में बदल देती है। लोहे जैसी कठोर धातु को भी पिघला देती है। उस समय वह किसी के प्रति सहानुभूति नहीं रखती। सब लोगों को उसका प्रकोप झेलना पड़ता है।
            इसी प्रकार पशुओं को जब क्रोध आता है तो वे भी किसी का लिहाज नहीं करते। पलटकर वार कर देते हैं। चाहे वह साँप हो, कुत्ता हो, हाथी हो अथवा कोई अन्य पशु। हम समझ सकते हैं कि क्रोध चाहे मनुष्य का हो, पशु-पक्षी का हो अथवा प्रकृति का हो सदैव विनाशकारी होता है। इसका दुष्परिणाम किसी एक मनुष्य को नहीं अपितु बहुतों को भुगतना पड़ता है।
      ‌      इस नामुराद क्रोध को शान्त करने की महती आवश्यकता होती है। इसके लिए गहरी सांस लेनी चाहिए। हो सके तो 10 से 1 तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। पानी पीना चाहिए अथवा उस स्थान से हट जाना चाहिए।मौन रहना चाहिए, ध्यान लगाना चाहिए और अपनी पसन्द का संगीत सुनना गुस्से को नियन्त्रित करने में सहायक होता है। इनके अतिरिक्त सकारात्मक सोच और नियमित दिनचर्या से भी क्रोध पर काबू पाया जा सकता है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए और सद् ग्रन्थों का वाचन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें