निर्माण और विनाश
निर्माण और विनाश परस्पर विरोधी होते हुए भी एक सिक्के के दो पासों की तरह जुड़े रहते हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ निर्माण है वहाँ विनाश भी अवश्यम्भावी होता है। विनाश और निर्माण दोनों साथ-साथ चलते हैं। यहॉं हम वसन्त ऋतु और पतझड़ का उदाहरण लें सकते हैं। एक ओर पतझड़ के कारण वृक्षों के पत्ते और फूल गिरकर पेड़ों को ठूॅंठ बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर वसन्त ऋतु चारों ओर हरियाली और सुगन्ध लेकर आती है।
यानी निर्माण एक रचनात्मक, योजनाबद्ध और समय लेने वाली प्रक्रिया है जो नई वस्तुओं को बनाती है। दूसरी ओर विनाश एक शीघ्र घटने वाली, बेतरतीब और नकारात्मक प्रक्रिया है जो मौजूद संरचनाओं को नष्ट कर देती है। निर्माण का उद्देश्य विकास है जबकि विनाश का परिणाम ह्रास या समाप्ति होता है।
इसीलिए इस संसार को मरणधर्मा कहा जाता है। इसका अर्थ यही है कि जो भी चराचर जीव इस दुनिया में आया है उसकी मृत्यु निश्चित है। उसके चाहने या न चाहने का कोई औचित्य नहीं होता। उसे इस धरा से जाना ही होता है, उसके पास इसका कोई विकल्प नहीं होता। सदा के लिए कोई भी यहाँ नहीं रह सकता।
निर्माण का उद्देश्य सृजन, उपयोगिता और वृद्धि करना होता है। निर्माण सकारात्मक होता है जो संरचना का निर्माण करता है। जबकि विनाश का उद्देश्य प्रायः वस्तुओं को मिटाना अथवा ऊर्जा को नष्ट करना होता है। वह विनाशकारी और नकारात्मक होता है जो संरचना का ह्रास या क्षरण करता है।
बीज का वृक्ष बनना रूप परिवर्तन होता है, निर्माण नहीं कहलाता। परन्तु वृक्ष को काटकर उससे अपनी आवश्यकता की अथवा आकर्षक वस्तुएँ बनाना निर्माण कहलाता है। उस काष्ठ को नष्ट कर देना या ईंधन के रूप में उसका प्रयोग करना ही विनाश कहलाता है।
यह समस्त चराचर जगत् उस प्रभु की रचना है अथवा निर्माण है। जब भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं तब वे स्थान-स्थान पर विनाश का ताण्डव करती हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि मचने लगती है। वे किसी भी चराचर जीव का पक्षपात नहीं करतीं। सभी पर उस विनाश का प्रभाव पड़ता है।
किसी भी निर्माण में वर्षों लगते हैं किन्तु उसका विनाश करने में अधिक समय नहीं लगता। जैसे एक बहुमंजिला भवन बनाने में वर्ष भर या इससे भी अधिक समय लग सकता है परन्तु उसे तोड़ने के लिए कुछ दिन ही बहुत हो जाते हैं। मैं यही कहना चाहती हूँ कि निर्माण करना बहुत कठिन कार्य होता है और विध्वंस करना अपेक्षाकृत बहुत सरल होता है।
'सूक्तिमुक्तावली' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव का वर्णन किया है-
दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तुनिमेष-
मात्रेण भजेद् विनाशम्।
कृतं कुलालस्य तु वर्षमैक नेतुं हि
दण्डस्य मुहुर्तमात्रम्॥
अर्थात् लम्बी अवधि में परिश्रम से प्रस्तुत की गई वस्तु का विनाश क्षणभर में ही किया जा सकता है। कुम्भकार को जिस वस्तु को तैयार करने में एक वर्ष का समय लगता है, उसी को डण्डे ने क्षणभर में ही विध्वस्त कर दिया।
इस श्लोक के माध्यम से कवि हमें यही समझाना चाहता है कि निर्माण की अपेक्षा विध्वंस सरलता से, बिना समय गॅंवाए पलभर में किया जा सकता है। कुम्हार का उदाहरण देकर अपनी बात को कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में प्रस्तुत किया है। इसके माध्यम से सरलता से कवि का आशय समझा जा सकता है।
इतिहास के पन्ने खंगालने पर हम जान सकते हैं कि कितने शहर, कितनी सभ्यताएँ समय बीतते पृथ्वी के गर्त में समा गईं। आज जब कभी उन स्थानों की खुदाई की जाती है तो वहाँ से उन प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष मिलते रहते हैं। वे किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होते। यह उन सबकी विनाश लीला को दर्शाती है। आखिर कभी तो वहाँ इतना निर्माण हुआ होगा।
विद्वानों का मानना है कि रेगिस्तान के स्थान पर नदियाँ अथवा समुद्र आ जाते हैं और समुद्रों अथवा नदियों के स्थान पर शहर बस जाते हैं। इसी प्रकार पर्वत धरती में बदल जाते हैं और पृथ्वी पहाड़ों अथवा टीलों में बदल जाती है। यह भी निर्माण और विनाश की ही कहानी कही जा सकती है। इसी तरह समुद्र से भी यदा कदा खोई वस्तुओं के अवशेष मिलते रहते हैं जिसके विषय में जानकर हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
मनुष्य को सदा निर्माण कार्य करते रहना चाहिए जो देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के लिए उपयोगी हों। उसे आतंकवादी तथा तोड़फोड़ की अन्य सभी गतिविधियों से यथासम्भव दूर हो रहना चाहिए। निर्माण सदा-सर्वदा श्रेयस्कर होता है और विनाश की ओर कदम बढ़ाना पतन का कारण बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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