गुरुवार, 28 मई 2026

दोषारोपण करना सबसे सरल

दोषारोपण करना सबसे सरल 

दूसरों पर दोषारोपण करना सबसे सरल कार्य है। मनुष्य सोचता है कि दूसरे को फंसाकर वह बच जाएगा परन्तु ऐसा होता नहीं है। स्वयं का बचाव करने के लिए कभी भी दूसरों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। सच्चाई कभी-न-कभी तो प्रकट हो ही जाती है। उस समय मनुष्य की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है। तब बगलें झाँकने के अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं शेष बचता।
           दोषारोपण करना वास्तव में सबसे सरल और तात्कालिक प्रतिक्रिया है जो अक्सर अपनी गलतियों या जिम्मेदारियों से बचने के लिए अपनाई जाती है। यह व्यवहार क्षणिक राहत देता है। अन्ततः व्यक्तिगत विकास को बाधित करता है। इससे रिश्तों में खटास आती है और नकारात्मकता बढ़ती है। 
           हम सब मानते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। उसके पास सत्य को प्रकट करने के लिए अपने ही तरीके हैं। कभी-कभी मनुष्य का अपना जमीर ही उसे बार-बार कचोटने लगता है। तब वह अपराधबोध से बहुत अधिक ग्रसित हो जाता है और फिर वह मानसिक दबाव झेल नहीं पाता। इस कारण वह स्वयं ही उस सत्य को सबके समक्ष प्रकट कर देता है जिसे वह एक अर्से से छिपाता चला आ रहा होता है।
          हमारे सयाने हमें चेतावनी देते हुए कहते हैं -
         झूठ को सात पर्दों में भी छिपाकर रख लो
         वह सामने आ ही जाता है। 
जैसे सुगन्ध चारों ओर बिना प्रयास के फैलती है। इसी प्रकार दुर्गन्ध भी हर तरफ फैल जाती है। और भी कहा जाता है - 
             झूठ के पाँव नहीं होते।
कहने का तात्पर्य है कि झूठे दूसरों के कन्धों पर चढ़कर वह बहुत समय तक सवारी नहीं कर सकता। उसे वास्तविकता के धरातल पर आना ही होता है।
            बचपन से ही दोषारोपण की यह बीमारी आरम्भ हो जाती है। शैतानी करने पर अपने दूसरे भाई-बहन अथवा मित्र-पडौसी के बच्चे पर अपना दोष मढ़ने का कार्य बच्चे बखूबी करते हैं। पढ़ाई ठीक से न करने पर जब परीक्षा में कम अंक आते हैं तब अपनी खाल बचाने के लिए अध्यापक पर पक्षपात का दोष लगाना सबसे सरल कार्य होता है। अध्यापक ने जबरदस्ती अंक काटे हैं, उसे मेरे साथ पता नहीं क्या दुश्मनी है?
            ज्यों ज्यों इन्सान बड़ा होता जाता है त्यों त्यों दोषारोपण के इस अनुचित कार्य में वह अधिक दक्षता प्राप्त करता जाता है। समय और स्थितियों के अनुसार वह अपने बचाव के लिए बकरे ढूँढता ही रहता है। कार्यालय में गड़बड़ी करने पर कभी अपने बास को दोष देता है तो कभी अपने ही  साथियों को कटघरे में खड़ा कर देता है। जब और कोई न मिले तो उस समय बस सरकार को ही कोसकर अपनी भड़ास निकाल लो।
              अपने घर में ही देखिए, पति अपनी पत्नी पर किसी भी प्रकार की गलती का दोष मढ़कर, उसे भलाबुरा कहकर अपने अहं को तुष्ट कर लेता है। इसी तरह पत्नी भी अपने पति को गाहेबगाहे दोषी ठहराकर सबकी सहानुभूति बटोरने का प्रयास करती रहती है।
            जन साधारण हर समस्या को बढ़ावा देने और उसका निदान न करने के लिए अपने चुने हुए नेताओं को दोष देते हैं, सारा समय उनकी आलोचना करते रहते हैं। सभी राजनैतिक दल अपने विरोधियों पर प्रतिदिन परेशानियाँ बढ़ाने का दोषारोपण करते हैं।
           सड़क पर चलते हुए कोई भी व्यक्ति अपनी गलती न मानकर सामने वाले को ही दोष देता है, गाली-गलौच करता है और मारपीट करने के लिए उतावला हो जाता है।
          यदि सभी मनुष्य अपने अनतस् में या अपने गिरेबान में झाँक ले तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। तब उन्हें अपने ऊपर शर्म आने लगेगी कि वे किस हद तक गिर सकते हैं। 
          सन्त  कबीरदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा आत्म-निरीक्षण और विनम्रता का सन्देश देता है। यह दोहा भी यही सच्चाई प्रकट कर रहा है -
       बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई।
       जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोई।।
अर्थात् जब हम दूसरों में कमियॉं ढूंढते हैं तो हमें कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिलता। लेकिन जब हम अपने मन के भीतर झॉंकते हैं तो हमें एहसास होता है कि हमसे बुरा कोई नहीं है। 
           कबीरदास जी के अनुसार हमें दूसरों की गलतियॉं खोजने के स्थान पर अपनी कमियों को सुधारना चाहिए। सच्चा ज्ञान खुद को जानने और आत्म-सुधार करने से ही आता है। दूसरों के दोष ढूँढते हुए हम छिद्रान्वेषी बन जाने का अपराध करते हैं। यदि हम स्वयं को खोजने लगें तब पता चलेगा कि हमारे भीतर दोषों की कोई कमी नहीं है।
        अतः दोषारोपण करना छ़ोड़कर यदि अपने दोषों का सुधार कर लें तो यह मानव जीवन धन्य हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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