संसार चक्की के दो पाटों की भाँति
यह असार संसार चक्की के दो पाटों की भाँति निरन्तर चलायमान है। चक्की में जब हम अनाज डालते हैं तो वह उसे पीस देती है। इस संसार रूपी चक्की में जीव पिसता है। इस चक्की का एक पाट जन्म है और दूसरा पाट मृत्यु है। इस जन्म और मृत्यु के दोनों पाटों में जीव आजन्म पिसता रहता है। क्षणभंगुर कहे जाने वाले इस संसार में जन्म और मृत्यु के दो पाटों में पिसते हुए मनुष्य का अन्त निश्चित है। अतः इस असार संसार से मनुष्य की विरक्ति होना स्वाभाविक ही है।
सन्त कबीरदास जी ने इसी सार को अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोया है-
चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।
अर्थात् कबीर दास जी कहते हैं कि अनाज पीसने वाली चलती हुई चक्की को देखकर उन्हें रोना आ गया। जिस प्रकार चक्की के दो पाट जो पत्थर से बने हुए हैं, उनके बीच में आने पर अनाज का कोई भी दाना साबुत नहीं बचता। उसी प्रकार इस संसार रूपी चक्र में जन्म और मृत्यु के बीच पिसकर कोई भी जीव अछूता नहीं रहता। हर जीव को काल के गाल में समाना ही होता है। यह दोहा हमें स्मरण कराता है कि यह जीव का यह जीवन और संसार दोनों ही नाशवान हैं।
ये दो पाट द्वन्द्व हैं यानी सुख-दुःख, लाभ- हानि, जय-पराजय, यश-अपयश, अपना-पराया, दिन-रात आदि। इनसे जो जीत गया, समझो वही बच सकता है। वही परम ज्ञान को प्राप्त करके मुक्त हो सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' में इसे साक्षी भाव कहा है।
कबीरदास जी को उदास देखकर उनके पुत्र कमाल ने यह दोहा लिखा-
चलती चक्की देख कर, दिया कमाल ठठाय।
कीले से जो लग रहा, सोई रहा बचाय।।
अर्थात् जब कबीरदास जी संसार की नश्वरता को देखकर रोते हैं कि जन्म और मृत्यु रूपी दो पाटों के बीच में फंसकर कोई भी जीव साबुत नहीं बचता यानी सब नष्ट हो जाते हैं। उनके इस प्रकार शोक करने पर उनके पुत्र कमाल हँसते हैं और समझाते हैं कि जो दाने चक्की की कीलों या बीच के हिस्से से चिपके रहते हैं, वे पिसने से बच जाते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य स्वयं को भगवान की भक्ति और उनकी शरण रूपी कील से जोड़कर रखता है, उसका भक्षण काल या मृत्यु और संसार के दुःख नहीं कर पाते।
पहला दोहा मनुष्य की अनित्यता के कारण वैराग्य उपजाता है लेकिन दूसरा दोहा मन में आशा और आस्था का दीपक दिखाता है। आवागमन रूपी दो पाटों में फँसा जीव अपने दायित्वों को निभाते हुए सदा ऐसे ही पिसता रहता है।
इस विवेचना से कुछ प्रश्न मन में उठते हैं कि बचकर क्या जीवन और मृत्यु से मुक्त हो सकते है? क्या काल को वश में किया जा सकता है? पानी के बुलबुले जैसे इस नश्वर जीवन को क्या स्थायित्व मिल सकता है? पल-पल नष्ट होते हुए इस शरीर को सदा यथावत रखा जा सकता है?
इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है - नहीं। जो मनुष्य प्रभु भक्ति के मार्ग पर चल पड़ता है और उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, केवल वही इस संसार में बच सकता है। हर तरफ से स्वयं को समेटकर सिर्फ उस मालिक के साथ एकाकार हो जाना ही इस ज्ञान का मूल मन्त्र है।
जन्म और मृत्यु के इस भय से बचने का ही साधन है मुक्ति। मनीषी इसे निर्वाण, परम पद और अभय पद आदि नामों से अभिहित करते हैं। इस अवस्था को शरीर की सीमा में रहते हुए पाया जा सकता है। अपने अन्तस् के शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से स्वयं को मुक्त कराना ही मोक्ष पाना है।
मनुष्य को वीतरागी बनना चाहिए। सभी विपरीत गुणों के अतिक्रमण से जब वह बच जाता है तो उसके पश्चात ही व्यक्ति गुणातीत बनता है। जीवन के तमाम परस्पर विरोधी भाव चक्की के दो पाटों की तरह होते हैं। निस्सन्देह पाप कर्म और पुण्य कर्म दोनों ही प्रकार के कर्म मनुष्य के बन्धन की वजह बनते हैं।
राग-द्वेष आदि भाव संसार, समाज, परिवार और राष्ट्र में हमेशा ही रहेंगे। मनुष्य स्वयं को इनसे विलग करके मुक्त हो सकता है। जीवन के सभी विरोधी प्रतीत होने वाले भावों में जो सम रहता है उसे उपनिषदों, ऋषियों-मुनियों और भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोगी कहा है। वही जन्म और मृत्यु के बन्धनों को काट सकता है। तब वह काल का ग्रास नहीं बनता।
जीवन का द्वैत भाव उसे चक्की के दो पाटों की तरह ही खा जाता है। जो सच्ची श्रद्धा और अपने निश्चित मन से कीले में चिपके अनाज की तरह उस परमपिता परमात्मा के सदैव समीप रहता है, वही इस भव सागर को पार कर लेता है। जो अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहण करते हुए चौबिसों घण्टे अपने हृदय में प्रभु का स्मरण करता रहता है, वह बालक भक्त प्रह्लाद की तरह हर प्रकार के भौतिक कष्टों से मुक्त हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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