मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

सदा बुद्ध

धी(सद् बुद्धि) का वरदान मनुष्य को ईश्वर ने विशेष रूप से दिया है जो सृष्टि के अन्य जीवों से उसे अलग करता है। इसके बल पर मनुष्य इस ब्रह्माण्ड में अपना स्थान बनाता है।
    पशु और मनुष्य में केवल बुद्धि का अंतर है। सोना-जागना, खाना-पीना, लड़ाई-झगड़ा करना और संतानोत्पत्ति करना आदि सभी कार्य तो मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी जीव भी कर लेते हैं।
     बुद्धि से रहित मनुष्य को पशु कहते हैं। हालांकि कहने को ही वे पशु होते हैं सचमुच के पशु नहीं बन जाते। जैसे पशुओं या मूर्खों की भाँति व्यवहार करने वालों को हम शेर, गाय, घोड़ा, गधा, उल्लू, तोता, मेंढक, सांप आदि कह देते हैं।
       विवेक बुद्धि मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करती है। इसीलिए वह अपनी बुद्धि के बल पर वह शेर जैसे खूंखार और हाथी जैसे बलशाली पशुओं को वश में कर लेता है। आकाश की ऊँचाइयों को छूने का हौंसला रखता है। समुद्र की गहराई में पैठकर मोती निकाल कर ले आता है। हम सबके जीवन के ऐशो-आराम के लिए उसने तरह-तरह के सभी प्रकार के अविष्कार किए।
         सद् बुद्धि मनुष्य को कुमार्ग की ओर जाने से रोकती है। कुमार्ग की ओर जाने वाले मनुष्य से सभी किनारा कर लेते हैं । इसका कारण है कि कोई भी अनावश्यक रूप से बुरा कहलाकर समाज में हँसी का पात्र नहीं बनना चाहता। एक उदाहरण देखिए। एक शराबी यदि शराब के पात्र में दूध लेकर जा रहा हो तो लोग यही समझेंगे कि शराब लेजा रहा है। इस बात का कोई विश्वास ही नहीं करेगा कि वह दूध लेकर जा रहा है।
       इसके विपरीत एक सज्जन दूध के पात्र में शराब लेकर भी जा रहा तो लोग समझेंगे दूध ही ले जा रहा है। इसका कारण उसकी साफ-सुथरी छवि है। यही अंतर होता है दोनों के प्रति समाज की सोच का। इस सोच को हम कभी भी नहीं बदल सकते।
यदि हम अपनी सद् बुद्धि के अनुसार चलेंगे तो हम गलत रास्ते पर कभी नहीं जाएँगे। बुद्धि हमारे शरीर रूपी रथ का सारथी है जो सभी इन्द्रिय रूपी घोड़ों को मन रूपी चाबुक से साधती है। बुद्धि के इस प्रकार नियंत्रण से हमारे शरीर में विद्यमान यात्री आत्मा अपने गंतव्य तक पहुँच सकती है। अन्यथा सभी इन्द्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह इधर-उधर विषय-वासनाओं में फँस जाएँगी और हमारी आत्मा अपने लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकेगी। इस प्रकार वह आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकेगी।
        बुद्धि हमें ज्ञाता और ज्ञेय का भेद स्पष्ट कराती है। स्मृति का आधार भी हमारी बुद्धि ही है। विद्वानों की बुद्धि निश्चयात्मक होती है जिससे वे सोच-समझकर अपने कार्यों का निष्पादन करते हुए सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। इसके विपरीत अनिश्चयात्मक बुद्धि वाले लोग करणीय व अकरणीय कार्यों का अंतर नहीं कर पाते तभी वे जीवन की रेस में पिछड़ जाते हैं। हमें समझ-बूझकर यह निश्चय करना है कि हम किस ओर जाएँ?
       इसी लिए बार-बार हम ईश्वर से सद् बुद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं ताकि हम सन्मार्ग पर चलकर इस संसार में अपने आने के उद्देश्य को सफल कर सकें और चौरासी लाख योनियों व जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकें।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

धृति(धैर्य)

धृति(धैर्य) का हमारे जीवन में होना बहुत आवश्यक है। इसके बिना मनुष्य के जीवन में उथल-पुथल मच जाएगी। कहने को तो सभी यह कहते हैं कि मुझमें बड़ा धैर्य है पर वास्तविकता इससे परे है। प्रश्न यह उठता है कि उसकी परीक्षा कब होती है? इस विषय में तुलसीदास जी कहते हैं कि आपात काल में धीरज की परीक्षा की जा सकती है।
         यह कथन अक्षरशः सत्य है। जब मनुष्य के जीवन में कष्ट का समय आता है तब ज्ञात होता है कि वह धैर्यवान है या नहीं। यदि वह धीरतापूर्वक उस कष्ट का समय व्यतीत कर लेता है तो वह सचमुच धैर्यशील है। इसके विपरीत यदि वह हाय तौबा मचाकर अपना तथा सभी अपनों का जीवन मुहाल कर देता है तो यह अधीरता कहलायेगी।
       धीर व्यक्ति अपने रास्ते स्वयं ही चुनते हैं। अपने लिए जिस लक्ष्य का वे निर्धारण करते हैं उसे जी-जान लगाकर निष्ठा पूर्वक प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। जब तक अपने लक्ष्य को पा नहीं लेते आराम नहीं करते  और लक्ष्य को भार मान उसे बीच मझधार में छोड़कर नहीं भागते।
       धैर्यवान अपने कार्य को पूरा करके ही दम लेते हैं चाहे उन्हें कितनी ही कठिनाइयों का सामना करना पड़े। चाहे वह कार्य आकाश की ऊँचाई को नापना हो, ग्रह-नक्षत्रों की सैर करनी हो, समुद्र की गहराई की थाह लेनी हो, पर्वतों का सीना चीर कर मार्ग बनाना हो या हम सबकी सुख-सुविधाओं के लिए अविष्कार करने हों। वे सभी चुनौतियों का सामना बड़े धैर्य से करते हैं।
       धीर-गंभीर व्यक्ति का सभी लोग सम्मान करते हैं।और उन्हें सिर आँखों पर बिठाते हैं। हम अपने जीवन में अनुभव करते हैं कि धैर्य का फल बहुत मीठा होता है।
          हर कार्य का फल समय से ही मिलता है। उसके लिए यदि हाय-तौबा करेंगे तो भी कुछ नहीं होगा।
      इस संसार में आने के लिए भी मनुष्य को नौ मास तक के समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। स्वयं जीव या माता-पिता भी कितने अधीर क्यों न हो जाएँ समय की प्रतीक्षा के अतिरिक्त उनके पास और कोई चारा नहीं होता।
       माली भी पेड़ लगाने के लिए बीज बोता है तो अगले ही दिन फल तोड़ कर बाजार बेचने नहीं जाता। हर प्रकार के फल व अनाज की फसल निश्चित समय पर होती है। माली या किसान कितने भी जल से सिंचाई कर ले समय से पहले इच्छित फल नहीं प्राप्त कर सकता धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता है और उसकी सुरक्षा के नित-नये उपाय करता है।
       इसी प्रकार बच्चे को माता-पिता विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजते हैं। ऐसा तो नहीं होता कि वह अगले ही दिन बारहवीं कक्षा पास करके विद्यालय से बाहर आ जाए। ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता क्योंकि वहाँ नर्सरी से बारहवीं यानी चौदह वर्ष तक का समय एक विद्यार्थी को पढ़ने के लिए आवश्यक होता है। उतने समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है और धैर्य रखना पड़ता है।
      यदि कोई इसके विपरीत सोचे तो उसे हम मूर्ख ही कहेंगे। हम धैर्यपूर्वक बच्चे के विद्यालय की शिक्षा समाप्त कर आगे पढ़ाई करने की प्रतीक्षा करते हैं।
        जीवन यापन बड़ी शान्ति व धीरज से करना पड़ता है अन्यथा अधैर्य को अपनाने से बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अधीरता करने से हमारे कार्य तो बिगड़ते ही हैं साथ ही जग हँसाई भी होती है। इसलिए धैर्य का साथ कदापि नहीं त्यागना चाहिए उसे एक आभूषण की भाँति अपनाना चाहिए।

रविवार, 21 दिसंबर 2014

ज्ञान बच्चों से भी

बच्चों को छोटा या अनुभवहीन मानकर उनका तिरस्कार करना उचित नहीं है। उनसे भी यदि कुछ सीखने को मिले तो झिझकना नहीं चाहिए बल्कि प्रसन्नता पूवर्क सहर्ष उनके सद् परामर्श का मान रखना चाहिए। उनकी प्रशंसा खुले मन से करके उनका उत्साहवर्धन करना चाहिए हतोत्साहित नहीं।
      छोटे बच्चे छल-कपट से दूर पारदर्शी,  भावुक, सरल, सच्चे व सहज होते हैं। ज्यों-ज्यों वे बड़े होते हैं समाज में व्याप्त बुराइयों को हैरान होकर देखते हैं। उनको हम अपने व्यवहार से छल-कपट सिखाते हैं। हमारी छोटी-छोटी को वे बड़ी बारीकी से जाँचते व परखते हैं। हमारे अनुचित व्यवहार को देखकर वे अपने भोलेपन में बहुत कुछ सुझाव देते हैं या सिखा जाते हैं। हम अपने बड़ेपन के अहंकार में उनकी तर्कसंगत बातों को अनसुना कर देते हैं। उन्हें अपनी हद में रहने के लिए कहकर दुत्कार कर चुप करा देते हैं।
       इस उक्ति को हम अनुचित नहीं कह सकते जो हमें सिखाती हैं- child is the father of man. 
       कुछ वर्ष पहले मैं अंतिम पीरियड में शायद दसवीं कक्षा में पढ़ा रही थी। छुट्टी की घंटी बजी। अचानक ही मेरे मुँह से निकला- 'चलो एक दिन और खत्म हुआ।' यह सुनते ही कक्षा में से एक बच्चे(उसका नाम अब याद नहीं) ने यह वाक्य सुनते ही तुरंत कहा- 'मैम आप  तो कभी ऐसी बात नहीं करतीं। फिर आज आपने कैसे यह कह दिया।' उस समय मैंने बस यही कहा-' यूँ ही मुँह ने निकल गया।'
         उसके बाद मैंने सोचा कि मैं तो बहुत आशावादी हूँ निराशा को अपने पास भी नहीं फटकने देती फिर मेरे मुँह से ये शब्द क्यों निकले? किसी मित्र को परेशानी में निराश होते देखकर या मस्तिष्क में आये किसी क्षणिक विचारमंथन के कारण हो सकता है कि अप्रत्याशित से ये शब्द मुँह से निकल गए हों।
      इस घटना में मुझे यह बात अच्छी लगी कि बच्चे हमारे आचार, व्यवहार या विचारों को बहुत बारीकी से जाँचते हैं। मैंने उसी समय यह निश्चय किया कि पुनः ऐसी गलती नहीं करूँगी।
      आज के वैज्ञानिक युग की बात करें तो छोटे-छोटे बच्चे भी कमप्यूटर व मोबाइल आदि भलीभाँति चलाना जानते हैं। यदि उनके जमाने की तकनीक को उनसे सीख लिया जाए तो इसमें मुझे कोई बुराई नहीं दिखाई देती। मैंने प्रायः लोगों को यह कहते सुना है- 'कौन सीखे इन बच्चों से?' है न वही अहम की टकराहट है जो हमें इस नयी तकनीक के ज्ञान से वंचित रख रही है।
       बच्चों में नित्य नया खोजने की सहज जिज्ञासा होती है। मेरी तरह आपने भी ध्यान दिया होगा कि जो भी वस्तु वे बाज़ार से खरीदते हैं घर पहुँचनते ही फटाफट उसका पोस्टमार्टम कर डालते हैं। अपनी इस बालसुलभ जिज्ञासा के कारण बहुधा वे डाँट-फटकार खाते हैं परंतु फिर भी इस आदत को नहीं छोड़ते। इसीलिए वे शीघ्र ही नई-नई जानकारी जुटा लेते हैं। जहाँ हम परेशान होते हैं वे चुटकियों में समाधान कर हमें हैरत में डाल देते हैं।
        आजकल प्रायः सभी विद्यालयों में पढ़ाई के माध्यम के रूप में कम्प्यूटर का शिक्षण अनिवार्य कर दिया गया है। उनको गृहकार्य, परीक्षा, प्रोजेक्ट आदि में इसकी आवश्यकता होती है। इसलिए प्रायः सभी बच्चों इस तकनीक को बहुत अच्छी तरह जानते व समझते हैं।
       हम छोटे बच्चों को भगवान का रूप मानते हैं। और साथ ही यह भी कहते हैं कि उनके मुँह से निकली हर बात सच होती है। ऐसी मान्यताओं वाले हम इन बच्चों की अवहेलना करके गलत करते हैं। उन्हें भी पूरा महत्त्व देना चाहिए।

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

धर्मान्तरण

धर्मांतरण का मुद्दा आजकल बहुत गरमाया हुआ है। इस विषय पर समाचार पत्र भरे होते हैं और टीवी पर नित्य प्रति चर्चाएँ हो रही हैं। सोचने की बात यह है कि आखिर यह धर्मांतरण किस चिड़िया का नाम है जिसने सभी धर्मगुरुओं को हिला कर रख दिया है।
        एक धर्म को मानने वाले जब अपना धर्म छोड़कर किसी दूसरे धर्म में परिवर्तित हो जाते हैं तब उसे हम धर्मांतरण कहते हैं। धर्म परिवर्तन के कई कारण होते हैं। कभी-कभी किसी धर्म विशेष के धर्मावलम्बी शक्तिशाली होते हैं जो दूसरे धर्म के कमजोर या असहाय लोगों को डरा-धमकाकर अपने वश में करने के लिए उनके धर्म को बदलने के लिए जबरदस्ती करते हैं। उन्हें या उनके परिवार जनों को जान से मार देने की धमकी देकर धर्म बदलवाते हैं। ऐसे उदाहरण इतिहास में बहुतायत से मिल जाते हैं।
          एक धर्म के लोग अपने पैसे के बल पर निर्धन लोगों को पैसा, नौकरी आदि का या कोई अन्य लालच देते हैं। अपनी मजबूरियों के कारण वे अपने धर्म को छोड़ दूसरे धर्म को अपना लेते हैं।
       ऐसा भी होता है कि अपने धर्म के प्रति विद्वेष के कारण लोगों को जो धर्म पसंद आ जाता है उसे प्रसन्नता से अपनाते हैं। वैसे ऐसा कम ही होता है।
    स्वयं अपनी इच्छा से भी कभीकभार लोग धर्म परिवर्तन करते हैं। एक-दूसरे धर्म में जब जीवन साथी ढूँढ लेते हैं तब धर्मेतर विवाह संबंध बनाने के कारण अपना धर्म छोड़ कर स्वेच्छा से दूसरे साथी का धर्म अपना लेते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हुए विवाह अवश्य किए जाएँ पर दोनों पति-पत्नी अपने-अपने धर्म की अनुपालना करते हुए, बिना धर्म परिवर्तन किए प्रसन्नता पूर्वक जीवन बिताएँ।
       अपने धर्म में रहते हुए उसे छोड़ना बहुत मुश्किल होता है। अपने रीति-रिवाजों को त्यागना और भी असंभव-सा होता है। आज तक यह समझ नहीं आया कि वो कौन सी ऐसी मजबूरी होती है जिसके कारण लोग अपने धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपना लेते हैं।
      अपनी मान्यताओं को तिलांजलि देने की सोच गले नहीं उतरती। जो संस्कार हमारी जड़ों में गहरी पैठ बना चुके हैं उन्हें उखाड़ फैंकना किसी के लिए भी सरल नहीं होता।
        विचारणीय यह है कि धर्म परवर्तन कर लेने से क्या अपने संस्कार या अपनी मान्यताएँ छोड़ना इतना सरल है? वे लोग अपने संस्कार या मान्यताएँ छोड़ नहीं पाते और नये सिरे से सब मन से अपना नहीं पाते। इस कारण दुविधा में रहते हैं। तब उनके लिए पश्चाताप करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता।
         जितने प्रलोभन या वादे लोगों को धर्म बदलवाने के लिए दिए जाते हैं वास्तव में  उन्हें पूरा नहीं किया जाता। वास्तविकता का सामना होने पर वे समझ जाते हैं कि उनका धर्म परिवर्तन महज उनके साथ धोखा है। तो वही स्थिति होती है- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। इसीलिए कहा है कि-
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मे भयावहः।
अर्थात् अपने धर्म में मरना श्रेयस्कर होता है दूसरे धर्म में भयावह होता है।
        इसलिए अपना धर्म कैसा भी हो वही श्रेष्ठ होता है। दूसरे का धर्म अपनाना सबसे बड़ी मूर्खता है। अत: अपने धर्म में रहते हुए कितनी भी कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े अपने धर्म में ही अंगद की तरह पाँव जमाकर रहना चाहिए।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

चाहत का आधार

चाहत का आधार नहीं, नफरत सी दीवार नहीं
चलो इसे छोड़ो बस, यह तो मेरी सरकार नहीं

आते जाते पाते नाते, तोहफे सबही आधार नहीं
प्यार से सींचो इनको, नफरत का व्योपार नहीं

जीना जग में भला है यारो, घुटके जीना काम नहीं
झूम-झूम खुशियाँ सहेज रे, मायूसी का काम नहीं

ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ, चारों ओर खबर आम नहीं
जगमग दीप जलाओ, आंधियों का बस काम नहीं

हँसते-गाते जी लो पलभर, रोने का फिर नाम नहीं
भागो-भागो छूकर देखो, लक्ष्य तुम्हारा धाम नहीं

पालो उसको हाथ बढ़ाके, मुड़ जाने का काम नहीं
बार-बार मौके नहीं आते, इतने तो तुम नादान नहीं

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

चोरी एक अपराध

अस्तेय(चोरी न करना) सुनने में कुछ अटपटा सा लगता है। किसी भी व्यक्ति से यदि कहा जाए कि वह चोरी का व्यवहार न करे तो शायद वह लाठी लेकर हमारे पीछे आएगा या अनाप-शनाप शब्दों से हमारा स्वागत करेगा।
       यह सत्य है कि चोरी शब्द किसी की धन-सामग्री आदि को बिना पूछे उठा ले जाना या दूसरे की वस्तु को नजर बचाकर ले जाना कहलाती है।
      यदि हमें कुछ पसंद आ जाए और हम सोचें कि इसे हम उठा लें पर उठाएँ नहीं तो भी यह चोरी कहलाती है। यह भी एक प्रकार से चोरी ही कहलाती है। जसे हम मानसिक चोरी की संज्ञा देते हैं। इससे भी बचना चाहिए।
      जिस व्यक्ति में यह अवगुण होता है उसके जैसे लोग ही उससे दोस्ती करते हैं अन्य समझदार नहीं। न कोई उसे अपने पास बिठाता है और न ही अपने घर का मेहमान बनाता है। सबको इस बात का भय होता है कि कहीं उनकी वस्तु चुराकर न ले जाए।
       चोरी पकड़े जाने पर भारतीय दण्ड संहिता में सजा का प्रावधान है। विभिन्न धाराओं में इन अपराधों की सजा के विधान हैं।
      प्राचीन काल में हमारे देश में इस अपराध के लिए दंड का विधान था। उस समय चोरी की सजा के रूप में हाथ काट दिए जाते थे।
       कुछ लोगों को एक प्रकार की बिमारी होती है जिसमें मनुष्य कोई भी वस्तु कहीं से भी बिना पूछे उठाकर ले जाता है। यह भी चोरी ही कहलाती है। कई लोगों के घर के लोग जो उनकी इस आदत को जानते हैं उनसे बातों-बातों में जानकारी लेकर उस उठायी गई वस्तु को क्षमायाचना सहित वापिस कर आते हैं।
        कभीकभार बच्चे कुसंगति में पड़ जाते हैं और वे अपने अनाप-शनाप खर्चों के लिए घर-बाहर कहीं से भी चोरी करते हैं। ऐसे बच्चे समाज में हमेशा तिरस्कृत किए जाते हैं व पकड़े जाने पर सजा भी पाते हैं। उनके माता-पिता को बिना किसी अपराध के भी अपमानित होना पड़ता है।
       गरीबी में ही लोग चोरी करते हैं ऐसा कहना अक्षरशः सत्य नहीं है। अमीर घरों, अफ्सरों व बड़े पदों पर कार्य करने वालों के बच्चे भी बहुत बार चोरी करते हुए पकड़े जाते हैं। टीवी पर इस विषय पर चर्चा होती रहती है व समाचार पत्रों में भी न्यूज छपती रहती हैं।
         अब हम चर्चा करते हैं उस चोरी की जो प्रायः सभी लोग करते हैं। जब टैक्स देने का समय आता है तब इन्कम टैक्स, सेल्स टैक्स और एक्साइज ड्यूटी बचाने के तरह-तरह के प्रपंच करते हैं। झूठे- सच्चे खर्च दिखाते हैं। मकान,  दुकान या अन्य कोई प्रापर्टी खरीदनी हो तब भी  हम पूरे दिए गए पैसों पर टैक्स नहीं देते। जिससे खरीदते हैं उसे पूरा पैसा देते हैं परंतु टैक्स देने के समय हम बहुत कम पैसों पर। यह सभी चोरी के प्रकार हैं जिसके विषय में सोशल मीडिया आए दिन जानकारी देता रहता है।
        इसी प्रकार नौकरी के साथ अतिरिक्त कार्य से कमाए धन पर भी टैक्स का भुगतान नहीं करना भी चोरी ही कहलाती है। भ्रष्टाचार व बेईमानी से कमाया गया धन भी चोरी की ही श्रेणी में आता है।
       किसी भी प्रकार से की गई चोरी मनुष्य का चैन छीन लेती है। अपना सुख व चैन बनाए रखने के लिए हमेशा अपने सारे हिसाब-किताब साफ रखें।
      आत्मोत्थान के लिए अपने कर्मों को स्वच्छ रखना बहुत आवश्यक है। जहाँ तक हो सके समाज व दुनिया से छुपकर अपराध करने के स्थान पर स्वयं को पाक-साफ रखने का यत्न करें। अपनी अंतस के द्वारा दिखाए सन्मार्ग पर चलने का यत्न करके अपने बच्चों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करें।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

संत समाज का आईना

संत समाज का आईना व मार्गदर्शक होते हैं। साधु-संतों की जाति नहीं पूछी जाती बल्कि उनका ज्ञान परखा जाता है। इसीलिए कहा है-
'जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।'
       जिसे हम वास्तव में संत कहते हैं वह संसार के बंधनों से मुक्त होता है। वह किसी आडंबर या नाम की इच्छा नहीं रखता।ऐसे संत समाज का आभूषण कहलाते हैं। वे अनाम रहकर आत्मोन्नति के लिए समाज से कटकर जंगलों, पर्वतों या गुफाओं साधना करते हुए  कैवल्य प्राप्त करते हैं। और यदि समाज में रहते भी हैं तो भौतिक ऐश्वर्यों का त्याग कर समाज की भलाई के कार्य करते हुए संसार से विदा लेते हैं। 
       संतों को हम उनके सद् गुणों, संयम, आचार-व्यवहार, उनकी कथनी-करनी के एकस्वरूप होना आदि गुणों से पहचान सकते हैं।
       संत को पहचान कर उस पर विश्वास करना उचित है। दूसरों की चिकनी-चुपडी बातों में न उलझकर अपने विवेक पर भरोसा कीजिए।आपकी तर्क की कसौटी  पर जो खरा उतरे उसे मानें अन्यथा सब छोड दें।
     संत समाज को दिशा नहीं दे सकता अथवा दिग्दशर्क नहीं बनता तो ऐसा वह त्याज्य है व सम्मान नहीं प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकता।
      संत की कोइ उपाधि नहीं होती। न ही उसके लिए कोई मापदंड होता है। उसके लिए किसी विद्वत परिषद के गठन की भी आवश्यकता नहीं होती।
     संत यदि केवल पुस्तकीय ज्ञान से प्रभावित करता है और उसका आचरण अनुकरणीय नहीं है तो वह त्याज्य है। पुस्तकीय ज्ञान तो गधे पर लादे बोझ की तरह होता है यदि उस पर मन, वचन व कर्म से आचरण न किया जाए। साधु-संतो की परख उनके सद् गुणों और आचरण से होती है।
       हमारा अपना विवेक सबसे बडी कसौटी है। अपनी तर्क की कसौटी पर जो खरा उतरे उसे ही विद्वान मानें अन्यथा सब छोड दें। हमारा विश्वास हमारी पूँजी है इसे यूँ ही नहीं डगमगाने दे सकते।
      वे कदापि संत या धर्मगुरु नहीं कहे जा सकते जिन्हें लोकप्रशंसा की भूख हो। जो टीवी अथवा राजनैतिक पार्टी के मंच से लुभावने और मंत्रमुग्ध करने वाले प्रवचनों और भाषणों से सबको मन्त्र मुग्ध कर लें।  इसके अतिरिक्त वे भी संत नहीं हो सकते जो देश व समाज के प्रति आपराधिक गतिविधियों में संलग्न हो। मजबूरन उन पर भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आरोप सिद्ध किए जाएँ।
       संतों का स्वभाव बालसुलभ होता है। वे सच्चे संत नहीं हो सकते जो द्वन्द्व सहन नहीं कर सकते या मात्र अपनी आलोचना से विचलित हो जाएँ।
      मेरा मानना है कि संत की उपाधि के  ज्ञान, धैर्य, इन्द्रिय नियंत्रण, मानसिक और शारीरिक बल के आकलन की कदापि आवश्यकता नहीं होती। संत बनाने या कहलाने के कोई मानक या मापदंड नहीं हैं।
     एक आख्यान है कि ऋषि विश्वामित्र को महर्षि कहलाने के लिए महर्षि वसिष्ठ की अनुमति चाहिए थी। पर जब तक वे इस पद के योग्य न हुए तब तक वसिष्ठ जी ने उन्हे महर्षि नहीं कहा। वर्षों की साधना के पश्चात जब वे अपने आचरण से इस पद के योग्य हुए तब उन्हें महर्षि वसिष्ठ ने उनको महर्षि विश्वामित्र कहकर पुकारा।
       साधना करके ही ये उपाधियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। वैसे जो वास्तव में सच्चे संत होते हैं वे इन उपाधियों के गुलाम नहीं होते। उनके कर्म ऐसे होते हैं जिससे लोग उन्हें सिर माथे पर बिठाते हैं।
       दूसरों को धोखा देने या ठगने वालों से हमेशा सावधान रहना चाहिए चाहे वे तथाकथित धर्मगुरु कहलवाने वाले हों या आम धूर्त। इनसे किनारा करना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।
     यदि आप कर्मसिद्धांत और पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं तो कबीर दास जी के शब्दों में मानकर चलिए-
  जो करेगा सो भरेगा तू क्यों भया उदास।