शनिवार, 3 मई 2025

दिन के समान मनुष्य जीवन

दिन के समान मनुष्य जीवन

मनुष्य इस संसार में जन्म लेता है। मनुष्य का यह जीवन दिन के समान होता है, ऐसा हम कह सकते हैं। पूरे दिन को हम तीन भागों में बाँटते है- 
1 सूर्योदय काल यानी प्रातःकाल
2 मध्याह्न काल यानी दोपहर का समय
3 सूर्यास्त काल या संध्या काल यानी सांयकाल 
 इसी प्रकार मानव जीवन को भी तीन भागों में बाँटा जा सकता है- 
1 बाल्यकाल यानी बचपन
2 युवावस्था यानी जवानी का समय
3 वृद्धावस्था यानी बुढ़ापे का समय
           सूर्योदय अर्थात् सूर्य का उदय होना। इस समय वह लालिमा लिए हुए सभी के आकर्षण का केन्द्र बनता है। हम सबकी आशाओं का प्रतीक होता है। इस शैशवावस्था वाले सूर्य का स्तुतिगान हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुश: किया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय सूर्य का प्रकाश ब्रह्माण्ड को रात्रि के अन्धकार से मुक्त करके जीवों में नवजीवन का संचार करता है। सभी जीव-जन्तु अपने-अपने कार्यों में संलग्न होने लगते हैं। सूर्य का यह शैशव काल सम्पूर्ण प्रकृति को उल्लासित कर देता है। 
         इसी प्रकार हमारे मानव जीवन का बाल्यकाल भी बहुत मनभावन होता है। छोटा बच्चा सभी को अपनी छोटी-छोटी शरारतों से आकर्षित करता है। यह समय नवनिर्माण का होता है। इस अवस्था में सबको उससे आशा होती है कि बड़ा होकर वह कुछ करेगा। यहाँ उमंग होती है, उल्लास होता है और कुछ भी कर गुजरने का साहस होता है। बच्चा अपने माता-पिता के जीवन में खुशियों के साथ-साथ उनकी आशाओं का कारक भी बनता है। उसके भावी जीवन की नींव इसी समय में रखी जाती है।
             मध्याह्नकाल जिसे हम दोपहर कहते हैं, उस समय सूर्य अपने उत्कर्ष पर होता है। तब सूर्य की गर्मी व प्रकाश दोनों ही तीव्र होते हैं। इसे हम सूर्य की युवावस्था भी कह सकते हैं। तब सूर्य इतना अधिक तेजस्वी होता है कि उसके तेज को सहन नहीं किया जा सकता। उसकी ओर देख पाना बहुत कठिन होता है। उसकी गर्मी को झेलने में जीव असमर्थ हो जाते हैं। उसके प्रकाश को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि कभी धरा पर अन्धकार का साम्राज्य भी रहा होगा।
          उसी प्रकार मानव की युवावस्था भी होती है। जवानी में उसकी शक्ति और तेज अधिक होते हैं। इस समय वह ऊर्जावान होता है। अपने तेज और अपनी ऊर्जा के बल पर वह किसी भी समस्या से भिड़ जाता है। अपने बचपन से अब तक वह विद्यार्जन करके सेटल हो जाता है। तब वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के योग्य बन जाता है। विवाह करने के साथ-साथ वह अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों का निर्वहण बहुत तत्परता से करता है।
           दिन का अन्तिम समय सूर्यास्त का होता है। इस समय सूर्य अपने तेज व प्रकाश से हीन होकर अस्ताचल की ओर गमन करता है। यानी यह दिवस का अवसान होता है। अन्त की ओर जाने वाले सूर्य की पूजा नहीं की जाती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय वह निर्बल हो जाता है। सभी  जीव-जन्तु अपने-अपने कार्यों को समाप्त करके अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। कहते हैं चढ़ती कला को सभी प्रणाम करते हैं। पूर्णमासी के चाँद की लोग पूजा करते हैं, उसके लिए खीर बनाने हैं और व्रत भी रखते है। 
           इसी तरह मानव अपने अन्तिम काल यानी वृद्धावस्था में हर प्रकार से शक्तिहीन हो जाता है। रिटायर होने के पश्चात उसमें खालीपन घर करने लगता है। तब तक बच्चे अपने-अपने घोंसलों में चले जाते हैं। वह स्वयं को असहाय एवं अकेला महसूस करने लगता है। उसे ऐसा लगने लगता है कि किसी को भी उसकी आवश्यकता नहीं रह गई है। इस तरह वह निराशा में डूबने लगता है। यह वही समय है जब वह अन्तिम पड़ाव की ओर अपने कदम बढ़ाने लगता है।
            इस प्रकार सूर्य अस्त हो जाता है, अगले दिन फिर से नई यात्रा की शुरूआत के लिए और फिर से आशा का प्रतीक बनने के लिए। यही मानव जीवन का भी क्रम होता है। तीनों अवस्थाओं को पार करता हुआ वह मृत्यु के पथ पर अग्रसर होता है अपने नवजीवन की खोज में। फिर से जीवन का वही क्रम दोहराया जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 2 मई 2025

ईश्वर की अराधना का प्रदर्शन

ईश्वर की आराधना का प्रदर्शन

इस संसार में ईश्वर ने हमें इसलिए भेजा था कि हम उसका स्मरण करते हुए भवसागर को पार करके मोक्ष प्राप्त करें। परमात्मा के साथ एकाकार होकर तदरूप हो जाएँ। पर बड़े अफसोस की बात है कि जीव के रूप में जन्म लेने के पश्चात हम दुनिया की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने आने के उद्देश्य को ही भूल गए हैं। जबकि माता के गर्भ में रहते हुए, वहॉं के अन्धकार से घबराकर ईश्वर से प्रार्थना करते थे, "हे प्रभु! मुझे इस अन्धकार और कष्ट से मुक्ति प्रदान कीजिए। संसार में जाकर मैं सदैव आपका स्मरण करूॅंगा।"
         पर होता क्या है? इस दुनिया में आते ही जीव यहॉं की चकाचौंध में खो जाता है। उसे ईश्वर से किया गया अपना वादा भी विस्मृत हो जाता है यानी याद नहीं रहता। वह बस रंगरेलियॉं मनाने में मस्त होने लगता है। दुनिया के व्यापार में मग्न होकर ईश्वर से दूरी बनाने लगता है। ईश्वर की उपासना भी अपने जीवन में करनी चाहिए। इस विषय पर मनुष्य मौन साध लेता है। तब सोचता है कि प्रभु के स्मरण का समय अभी नहीं आया है। बहुत सारा जीवन पड़ा है हरि भजन के लिए।
           तब वह सोचता है कि अभी तो मैं व्यस्त हूॅं, कुछ समय बाद भगवान को याद कर लूॅंगा, उसका नाम जप लूॅंगा। अभी और दायित्व पूरे कर लें। ईश्वर का क्या है, उसे बुढ़ापे में जप लेंगे। परन्तु बड़े दुख की बात है कि वृद्धावस्था भी बीत जाती है। वह समय आ ही नहीं पाता और और मृत्यु सिर पर आकर खड़ी हो जाती है। उसकी इस असार संसार से विदाई की बेला आ जाती है। तब मनुष्य पश्चाताप करता है कि मैंने क्या कर डाला? उस समय कुछ नहीं हो सकता। यदि मनुष्य ईश्वर की उपासना निरन्तर करता रहे, तो उसे कभी घबराने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
          तब वह रो-रोकर प्रभु से अपने लिए थोड़े समय की मोहलत मॉंगता है। वह प्रार्थना करते हुए कहता है, " हे प्रभु! मुझे थोड़ा-सा समय दे दो ताकि मैं तुम्हारी अराधना करके अपना वचन निभा लूॅं।" परन्तु मनुष्य को तब पलभर के लिए भी समय का एक्सटेंशन नहीं मिल पाता।
          अपने जीवनकाल में ईश्वर की आराधना हम केवल प्रदर्शन के लिए करते हैं। हम चाहते हैं कि लोग हमें ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त कहें। इसके लिए अपने नाम के पत्थर लगवाते हैं। समय-समय पर भंडारे भी करवाते हैं। दूसरों को दिखाने के लिए मोटा दान भी करते हैं। पर यह सब समाज को दिखाने के लिए होता है। वास्तव में मन में भावना तो होती नहीं। सबसे बड़ी बात यह भी है कि लोग जायज-नाजायज हर प्रकार से धन कमाते हैं। फिर अपनी सफेदपोशी बनाए रखने के लिए समाज सेवा के नाम पर दान आदि के सब कार्य करते हैं।
             हमारा मन हमेशा चहुॅं ओर भटकता रहता है। कबीरदास जी ने बहुत ही कठोरता से हमें चेताने का प्रयास किया है-
       माला फेरत जुग भया मिटा न मन का फेर।
     कर का मनका छोड़कर मन का मनका फेर।।
अर्थात् कबीरदास जी कहना है कि वर्षों ईश्वर का भजन करते हुए बीत गए परन्तु हमारे मन से हेर-फेर की भावना समाप्त नहीं होती। मन पंछी की तरह ऊँची उड़ान भरता रहता है। उसे हम नियंत्रण में नहीं कर पाते बल्कि वह हमें जैसे नाच-नचाता है वैसे ही हम करते चले जाते हैं। इसलिए भगवद् भजन सच्चे मन से करो। उसके लिए हाथ में माला लेकर फेरने से कुछ नहीं होगा अपितु माला के मनकों को फेरना छोड़ कर अपने अन्तस् में चलने वाली साँसों की माला का सहारा लो और उस पर मन को एकाग्र कर सात्विकता से मालिक का ध्यान करो।
      बहुत ही सुन्दर शब्दों में कबीरदास जी ने हमारा मार्गदर्शन किया है। ईश्वर का निवास ब्रह्माण्ड के कण-कण में है, जर्रे-जर्रे में है। उसे पाने के लिए इधर-उधर ठोकरें खाने की आवश्यकता नहीं। हमें जंगलों में भटकने, तीर्थों में जाने, तथाकथित गुरुओं को माथा टेकने और तन्त्र-मन्त्र का सहारा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह तो सदा ही हमारे पास है। जब भी हम उसे देखना चाहते हैं तो बहुत सरल उपाय है। अपने मन के अन्दर झाँककर उसके दर्शन कर सकते हैं।वहॉं पर पल भर में ही उसके दर्शन हो जाएँगे। 
        यद्यपि इस मार्ग पर चलना बहुत कठिन है पर असम्भव नहीं है। मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? सचमुच यदि वह ईश्वरमय होना चाहता है तो विश्व की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। बस दुनिया की चकाचौंध से मन को हटाकर ईश्वर की ओर प्रवृत्त करना पड़ता है। ईश्वर की भक्ति का प्रदर्शन न करके सच्चे मन से और श्रद्धा से यदि उस प्रभु की अराधना की जाए तो वह अपने साधक का हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 1 मई 2025

हर स्थिति के लिए तैयार रहिए

हर स्थिति के लिए तैयार रहिए

मनुष्य जीवन में सदैव उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए उनका सामना करना उसकी विवशता है जाती है। घबरा कर अथवा परेशान होकर वह उनसे अपना मुॅंह नहीं मोड़ सकता। ये सब जीवन का एक भाग ही होते हैं। सदा अच्छा और मीठा हमारे हिस्से आए और कड़वा दूसरों के पास पहुॅंच जाए। ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। यह सर्व विदित सत्य है कि मनुष्य को अपने जीवन में हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। उसके जीवन में उतार-चढ़ाव क्रम से आते रहते हैं। उसे अपनी परेशानियों से दो-दो हाथ करने से घबराना नहीं चाहिए।
          इसी सत्य की भाँति यह भी उतना ही सत्य है कि अच्छे समय में तो सभी मित्रों-सम्बन्धियों का सहयोग मिलता है। मनीषी कहते हैं कि मक्खियॉं गुड़ पर ही आती हैं। इस बात को यहॉं लिखने का उद्देश्य मात्र इतना है कि यदि मनुष्य सुखी व सम्पन्न है अथवा उसका व्यापार उड़ान पर है या वह ऊॅंचे पद पर कार्यरत हैं, उसके पास तब तो चाटुकारों की लाइन लग जाती है। लोग उसकी प्रशस्ति गाने लगते हैं। उसके आगे-पीछे घूमने लगते हैं। उसके सभी बन्धु-बान्धव, जान पहचान वाले, पड़ौसी आदि किसी बहाने से उसके घर आने लगते हैं और उपहार लाना भी नहीं भूलते।
          इसके विपरीत जब वह दुखी या परेशानी में होता है तो सबसे पहले उसके बन्धु-बान्धव उसका साथ छोड़ देते हैं। उसके मित्र और पड़ौसी भी कन्नी काटने लगते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं वह कुछ मॉंग न ले। कहीं उसकी सहायता न करनी पड़ जाए। मनीषी कहते हैं कि दुखों के आने पर मनुष्य का साया भी उसका साथ छोड़ देता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परेशानी के समय जब अपना साया भी साथ छोड़ देता है, उस समय दूसरे लोगों से क्या शिकवा शिकायत करना? 
         ऐसे विपरीत समय में अपने पास यदि कुछ बचाया हुआ संचित धन होगा तो कष्ट का समय थोड़ी सुविधा से गुजर जाता है। तब किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता ही नहीं होती। ऐसी अनचाही स्थितियों के लिए सबसे आवश्यक है कि धीरे-धीरे छोटी-छोटी बचत करके अपने धन को बचाया जाए। कहने का तात्पर्य है कि जितनी भी हमारी कमाई है उसमें से कुछ अंश आने वाले धूप-छाँव अर्थात् उत्कर्ष व अपकर्ष के समय के लिए बचाकर रखें। 
          वैसे तो हमारी जरूरतें हमेशा ही मुँह बाये खड़ी रहती हैं। न चाहते हुए भी अनचाहे खर्चे आकर हमारा बजट बिगाड़ देते हैं। फिर भी सभी समस्याओं से जूझते हुए मनुष्य को उनके सामने डटकर खड़े हो जाना चाहिए। हमारा प्रयास सदा यही होना चाहिए-
        ते ते पाँव पसारिये जेती लम्बी सौर।
अर्थात् मनुष्य के पास जितनी लम्बी चादर हो, उसे उतने ही पैर फैलाने चाहिएँ। अन्यथा उसके पैर चादर से बाहर निकल आते हैं।
         दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि अपने मित्रों, सम्बन्धियों अथवा पड़ौसियों आदि की होड़ करके जीवन को कष्टप्रद नहीं बनाना चाहिए। ईश्वर ने हमारे कर्मों के अनुसार हमें जितना दिया है, उसी में ही अपने जीवन की गाड़ी चलानी चाहिए और सन्तुष्ट रहने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा फिर इस संसार में खाली हाथ ही रह जाना पड़ता है। यानी यह तो जबरदस्ती कष्टों को न्योता देने वाली बात हो जाएगी। जहॉं तक हो सके ऐसी स्थिति से बचकर रहना चाहिए। अपने जीवन को अनावश्यक ही नरक नहीं बनाना चाहिए।
          कहते हैं न बूँद-बूँद से घट भर जाता है। इसी तरह जो भी थोड़ा-बहुत बचाऍंगे तो वह धीरे-धीरे इकट्ठा होकर हमारा सुरक्षा कवच बन जाएगा। इसके लिए  छोटी-छोटी बचत कर सकते हैं। बैंक में या डाकखाने में अपनी सुविधानुसार राशि की आर. डी. करवा सकते हैं। जब वह मैच्योर हो जाए तब उस राशि की एफ. डी. करवा सकते हैं। इस प्रकार धन बढ़ता रहता है। यह सबसे सुरक्षित तरीका है पैसा जोड़ने के लिए। अधिक ब्याज के लालच में अपने परिश्रम से कमाए धन को धूर्त या ठगी करने वाली कम्पनियों में निवेश करने से बचना ही श्रेयस्कर होता है।
            इस प्रकार अपने जीवन में सोच-विचार कर आगे कदम बढ़ाना चाहिए। एवं विध हम स्वयं को सुखी और समृद्ध बना सकते हैं। यह धन हमारा सुख-दुख का साथी बनकर हमें हर समय साथ निभाता है। यह हमें आत्मविश्वास से भर देता है जिससे जीवन में सफलता हमारे कदम चूमने लगती है। इस तरह हम अपने को हर स्थिति के लिए तैयार कर सकते हैं। अत: रास्ते में आने कठिनाइयों से जूझने के अपने सफल प्रयासों की बदौलत हम प्रसन्नतापूर्वक अपने जीवन की नौका संसार सागर के पार तैरा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 28 अप्रैल 2025

अपने व्यवहार से शत्रु और मित्र

अपने व्यवहार से शत्रु और मित्र

इस संसार में जब मनुष्य का जन्म होता है तब उसे अपने रिश्ते ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलते हैं। ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता है, वह अपने मित्र बनाने लगता है। आयु के साथ-साथ उसे मित्र बनाने की समझ आने लगती है और वह अपने मित्रों का चुनाव करने लगता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रिश्तों को चुनने की स्वतन्त्रता उसे नहीं मिलती। वह केवल अपने मित्रों का चुनाव कर सकता है। उन लोगों के साथ उसका जैसा व्यवहार होता है, उसी के अनुरूप वे रिश्ते प्रगाढ़ होते रहते हैं यानी बनते या बिगड़ते हैं। 
          आज के समय में मनुष्य यद्यपि अपनी लाभ-हानि को देखते हुए सम्बन्ध बनाने का प्रयास करता है। जिन बन्धु-बान्धवों से उसे अपना स्वार्थ सिद्ध होता दिखाई देता है, उनसे वह अपनी समीपता बढ़ाने लगता है। दूसरी ओर जहॉं उसे उनसे कुछ पाने की आशा नहीं होती, उनसे वह किनारा करने लगता है। आधुनिक समाज में व्यक्ति के स्वार्थ रिश्तों पर भारी पढ़ने लगे हैं। बड़े दुख की बात है कि उसी के अनुसार वह उनको परखना चाहता है।
            वैसे देखा जाए तो इस संसार में जब ईश्वर मनुष्य को बच्चे के रूप में भेजता है तो वह एक कोरी स्लेट की तरह होता है। वह बहुत ही सरल हृदय होता है। उस मासूम बच्चे को लोग भगवान का रूप कहते हैं क्योंकि वह दुनिया के छल-कपट, प्रपंच से दूर होता है। जैसे जैसे वह बड़ा होता है उसे इस दुनिया की हवा लगने लगती है तो वह हर प्रकार के छल-फरेब सीखने लगता है। उसका भोलापन जाने कहॉं तिरोहित हो जाता है। उसे दुनियादारी की समझ अच्छे से आने लगती है।
           इस दुनिया में रहकर मनुष्य कुछ लोगों को अपना मित्र बना लेता है। इसके विपरीत अपने छल छद्म से वह कुछ लोगों को अपना शत्रु बना लेता है। यह सब उसके अपने व्यवहार का ही परिणाम होता है। इसी विचार को 'चाणक्यनीति:' में आचार्य चाणक्य ने हमें समझाया है- 
        न क कस्यचित् शत्रु: न क कस्यचित् मित्रम्।
          व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा।।
अर्थात् कोई किसी का मित्र नहीं होता  है और न ही कोई किसी का शत्रु होता है। हम अपने व्यवहार से ही शत्रु और मित्र बनाते हैं।
           मित्र बनाना और मित्रता करना बहुत सरल है परन्तु उसे निभाना बहुत कठिन होता है। जब तक हम निःस्वार्थ भाव से मित्रता निभाते हैं तो हमारे सम्बन्ध लम्बे समय तक बने रहते हैं। हमारे स्वार्थ जब टकराने लगते हैं तब वह मित्रता नहीं रह जाती बल्कि व्यापार बन जाती है। यदि हमारे श्मशान जाने तक हमारा साथ निभाती है तो वास्तव में वही मित्रता कहलाती है। सही मायने में हम तभी सच्चे मित्र होते हैं। मित्रता की परिभाषा और सच्ची पहचान ही यही है।
         शत्रु बनाना सबसे आसान कार्य होता है। हम अपनी स्वयं की गलतियों से लोगों को अपना शत्रु बना बैठते हैं। हमारा अहं, हमारा अविवेक, हमारा जनून ही हमारे सिर पर चढ़कर नाचने लगते हैं, उस समय हमें लगता है कि हमें दुनिया में किसी की भी आवश्यकता नहीं है। हमारे यही विचार हमारे दुश्मन बन जाते हैं और बन्धु-बान्धवों को हमारा शत्रु बनाने का काम बखूबी निभाते हैं। इस प्रकार का व्यवहार करके जाने-अनजाने हम अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करते जाते हैं।
          राजनीति में तो शत्रु व मित्र की पहचान करना बहुत कठिन है। पता ही नहीं चलता कि कौन मित्र हैं और कौन शत्रु। इसका एक ही कारण है सत्तालोलुपता। सत्ता को पाने के लिए किसी भी बाप बनाया जा सकता है और किसी से भी विलग हुआ जा सकता है। ऐसी स्थिति बनने अथवा होने पर इस प्रकार से दुश्मनी का प्रदर्शन किया जाता है मानो वहाँ कुत्ते और बिल्ली का वैर है। यानी वे कभी मित्र रहे ही नहीं थे। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति के क्षेत्र में कौन शत्रु है और कौन मित्र कहना कठिन-सा होता है। वहॉं शत्रु और मित्र की परिभाषा कब बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। इस तरह वहॉं पर बनने वाले सम्बन्ध कभी स्थाई नहीं होते।
           इस चर्चा का सार यही है कि हर मनुष्य को सोच-समझ कर शत्रु व मित्रों का चुनाव करना चाहिए। इससे धोखा खाने से बचा जा सकता है। अपना जीवन सुख और शान्ति से व्यतीत किया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 26 अप्रैल 2025

अशरीरी मन का महत्व

अशरीरी मन का महत्व 

हमारे शरीर में जो मन विद्यमान है, वह अशरीरी है। मन को अशरीरी इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका कोई आकार नहीं होता, कोई रूप नहीं होता है। अतः कोई इसे देख नहीं सकता है। फिर भी हम इसके महत्त्व को नकार नहीं सकते। हिरण की नाभि में छुपी कस्तूरी के समान यह सबके शरीर में रहता है। अशरीरी होते हुए भी यह हमारे जीवन में विशेष रोल अदा करता है। यह हमारे मानव जीवन को अपनी इच्छानुसार चलाता है। इसके अपने कुछ नियम भी हैं, जिनको समझना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
          हमारा मन हर उस वस्तु को पाना चाहता है, जो हमारे पास नहीं होती है। जब तक उसे प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह उसके लिए व्याकुल रहता है। उसकी व्यग्रता से प्रतीक्षा करता है। उसके यथासम्भव मेहनत करता है। परन्तु जब उस वस्तु को प्राप्त कर लेता है, तब उसके प्रति विरक्त होने लगता है यानी उसे मन भूलने लगता है। तब वह वस्तु उसे मामूली-सी लगने लगती है। जो वस्तु उसे सरलता से, बिना परेशानी के प्राप्त जाती है, वह उसकी कद्र नहीं करता। 
           यहॉं हम एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। एक छोटा बच्चा नया खिलौना लेने के लिए जिद करता है, रोता है, चीखता-चिल्लाता है, परन्तु जब उसके माता-पिता उसे वह ले देते हैं, तब वह खुश होता है। उससे कुछ दिन खेलता है, फिर उसे भूल जाता है कि वैसा कोई खिलौना कभी उसके पास था। फिर भी यदि कोई दूसरा बच्चा उस खिलौने से खेलने लगे, तो उससे झपटकर छीन लेता है। उस समय उस खिलौने के लिए उसमें अपनेपन का भाव आ जाता है, जो कुछ समय पूर्व तक कहीं दिखाई नहीं देता था।
           बच्चे का उदाहरण देने का तात्पर्य यह है कि मानव मन सदा ही बच्चा बना रहना चाहता है। वह बच्चे की भाँति सरल, दयालु, छल-कपट से रहित रह सकता है, पर सदा के लिए नहीं। इसे समय आने पर गिरगिट की तरह रंग बदलने में भी महारत हासिल है। यह सरलता से अपने सभी रंग दिखा देता है। इसलिए इससे बचकर चलने की बहुत ही आवश्यकता होती है। यद्यपि यह बहुत कठिन कार्य है, परन्तु यदि ध्यान दिया जाए, तो ऐसे लोगों को पहचानना कठिन नहीं है। 
           यही स्थिति मनुष्य के मन की भी होती है। मनचाही वस्तु को पाकर वह उसे बेशक भूल जाता है, पर दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब हमारा अपना हमसे दूर होता है, उसके लिए वह बेचैन होता है, रोता है। जो हमारे पास होता है, उसकी वह उपेक्षा करता है। यह मन सदा भविष्य के बारे में सोचता है, वर्तमान की वह चिन्ता नहीं करता। भूतकाल उसे बहुत प्रिय होता है, तभी उन गलियों में भ्रमण करता रहता है।
         जहाँ मनुष्य पहुँच जाता है, मन वहाँ से हटकर कहीं दूर चला जाता है। यह मन आगे-आगे दौड़ता है और हम उसके पीछे भागते रहते हैं। वह कभी कहीं जाता है और कभी कहीं। जहाँ हम जाना चाहते हैं, वह धत्ता दिखाकर अन्यत्र चला जाता है। हम उसे पकड़ने का यत्न करते हैं, तो वह मुँह चिढ़ाकर भागने लगता है। हम घर में होते हैं, तो वह देश-विदेश की सैर करने चला जाता है। जब हम बाहर होते हैं, तब इसे घर की याद सताने लग जाती है। फिर यह बिसूरने लगता है।
            मन मानो धरती को छूता हुआ क्षितिज है। वह कहीं है नहीं, बस अपने होने का अहसास करवाता रहता है। यदि हम आगे बढ़ते हैं, तो वह हमसे भी कहीं आगे बढ़ जाता है। मन का यह खेल बड़ा विचित्र है। इसे समझना वास्तव में असम्भव है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि यह मन हमारे पास रहकर भी हमारी पहुॅंच से बहुत दूर है। मानो वह कोई दूर की कौड़ी है। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे इस मन से हमारा तो कुछ भी लेना-देना नहीं है। कभी-कभी यह बड़ा पराया-सा लगने लगता है।
          मन सदा ऊँचे-ऊँचे स्वप्न देखता रहता है। इसका सारा खेल अभाव के साथ सम्बन्ध बनाने का होता है। यदि मनुष्य के पास एक लाख रुपए हों तो मन उन्हें अनदेखा करके दस लाख रुपयों की जमा-घटा करने लगाता रहता है, जो हमारे पास नहीं हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मन वहाँ भागता है, जहाँ हमारी पहुँच नहीं होती। मन कभी प्रसन्न होने वाला नहीं है। वह बस और और के चक्कर में रहता है। इस मन का सूत्र पकड़ने में हम असमर्थ रह जाते हैं।
          इस मन की माया को आज तक कोई नहीं समझ सका। ऋषि-मुनि भी इसे वश में करने या जीतने के प्रयास में हार जाते हैं। यह हर व्यक्ति को नाच नचाता रहता है। न चाहते हुए भी हम मनुष्य इस दुसाध्य मन की कठपुतली बनकर इसके कहने के अनुसार चलते रहते हैं। अनेक बार ठोकर खाकर भी हम सम्हलते नहीं हैं। बार-बार इसके झॉंसे में आकर परेशान होते हैं। हमें समझ नहीं आता कि मन के कहे अनुसार अथवा उसके पीछे भागने का कोई भी लाभ होता है क्या?
         अपने मन को ध्यान के द्वारा एकाग्र किया जा सकता है। विचारणीय यह है कि इस ध्यान को लगाने के लिए भी तो मन को साधना अनिवार्य हो जाता है। जब ईश्वर का भजन करने बैठो, तब इस दुष्ट मन को सारे जहान की बातें याद आने लगती हैं। यानी उस समय वह यहाँ वहाँ भटकने लगता है। जिन विषयों को हम कभी का ठण्डे बस्ते में डाल चुके होते हैं, वह उन्हें भी खोद-खोदकर बाहर निकाल लाता है। फिर भी इस मन को साधने से ही हमारा कल्याण सम्भव हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

समय के अनुसार बदलना

समय के अनुसार बदलना 

यह सत्य है कि समय हमारे कहने से अथवा हमारे अनुसार नहीं बदलता। प्रकृति का यह नियम है कि मनुष्य को ही समय के साथ कदमताल करते हुए बदलना पड़ता है। ऐसा नहीं हो सकता कि हम कहें तो इसी पल समय हमें आगे भविष्य की ओर ले जाए। यानी भविष्य में हमारे साथ जो भी अच्छा या बुरा घटित होने वाला है, वह हमें सब दिखा दे। और हम चौकन्ने हो जाऍं। अथवा हम कहें तो वह हमें भूतकाल में ले‌ जाए। जहॉं पहुॅंचकर हम अपनी गलतियों या अच्छाइयों को देख सकें। फिर उन पर विचार कर सकें।
          यह मानकर चलिए कि जो आज हमारे पास है, वह कल नहीं रहेगा। बीते हुए कल में जो हमारे पास था, उसे हम आज के समय में कदापि नहीं ला सकते। इसलिए मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह अपने समय का सदुपयोग करना सीख ले। उसे व्यर्थ ही गॅंवाने की भूल न करे। अपने जीवन के हर एक पल को बेहतर तरीके से जीना चाहिए। अन्यथा समय बीतने पर पश्चाताप करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता। अपने परिवारी जनों और अपने बन्धु-बान्धवों को भी समय का उपयोग करने‌ के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए।
           दूसरे लोगों की देखा-देखी मनुष्य को स्वयं को अनावश्यक परेशान नहीं करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य जो भी प्राप्त करता है या उपलब्धि पाता है, वह उसके अपने अथक परिश्रम का ही परिणाम होता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ईमानदारी से प्रयास करने के उपरान्त भी सफलता उसके हाथ नहीं लगती। जो भी यत्नपूर्वक न प्राप्त हो, उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। उस पर सन्तोष करना ही मनुष्य के लिए एकमात्र विकल्प बचता है। फिर उसे पुनः दुगने उत्साह से जुटकर अपनी जीत को हाथ बढ़ाकर पा लेना चाहिए।
          यदि मनुष्य इस सत्य को आत्मसात कर लेता है कि इस दुनिया में जो सन्तुष्ट है, वही अपने जीवन में सुखी रह सकता है। यानी जब मनुष्य को सन्तोष रूपी धन मिल जाता है, उस समय वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति बन जाता है। मनुष्य जितना अपने बन्धु-बान्धवों या पड़ोसियों की नकल करने का यत्न करता है, उतना जीवन में दुखों और परेशानियों को न्योता देता है। जितना भी मनुष्य को प्राप्त हो रहा है, उसमें ही उसे जीवन का आनन्द लेना चाहिए। यह सूत्र उसे अनावश्यक तनाव से बचाता है। 
           संसार में हर मनुष्य सोने का चम्मच मुॅंह में लेकर पैदा नहीं होता। करोड़पति या अरबपति भी हर कोई नहीं बन सकता। यह सब मनुष्य के पूर्व कृत कर्मों के कारण ही मिलता है। इसलिए उनकी होड़ करना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है। इसलिए कोल्हू का बैल बन जाने पर भी उसके जीवन में बहुत अधिक सुधार नहीं हो पाता। अपने से कमजोर स्थिति वालों की ओर देखकर चलने से ही मनुष्य का भला होता है। वह सोचने के लिए विवश हो जाता है कि वह बहुत लोगों से अच्छा जीवन व्यतीत कर रहा है। 
           मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार जितना भी कम या अधिक कमा पाता है, उसमें ही उसे गुजार बसर करनी आनी चाहिए। इस प्रकार वह बहुत सी मुसीबतें से बच सकता है। उसे अपनी चादर से बाहर पैर नहीं फैलाने चाहिए। दूसरों की होड़ में अपने जीवन को दॉंव पर नहीं लगाना चाहिए। उसे अपने जीवन में  आने वाली धूप-छांव के लिए भी कुछ न कुछ बचत करनी चाहिए। ताकि आवश्यकता पढ़ने पर उसे किसी का मुॅंह न ताकना पड़े और न ही कर्ज लेने की नौबत आए। इससे उसका बजट गड़बड़ा जाता है। 
           मनुष्य का जीवन एक कोरे कागज की भॉंति होता है। इस पर जो भी अच्छा या बुरा लिखना‌ है,  मनुष्य को बहुत ही सोच-समझकर लिखना होता है। एक बार ही मनुष्य जो चाहे उस कागज पर अपनी इच्छा से लिख सकता है। फिर उसे बच्चों की तरह रबर की सहायता से मिटाने की अनुमति नहीं मिलती। उसके द्वारा लिखा हुआ ही उसका भविष्य बन जाता है। समय धीरे-धीरे आगे सरकता जाता है। भागकर अथवा हाथ उठाकर या हाथ आगे बढ़ाकर किसी भी प्रकार से नहीं पकड़ा जा सकता।
          घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए जीवन में भागमभाग बनी रहती है। मनुष्य को केवल पैसा कमाने की मशीन बनकर नहीं रह जाना है। यथासम्भव अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करना चाहिए। सबसे आवश्यक  है कि दिन में एक बार खुलकर हंसना चाहिए। साथ ही अपने परिवार के साथ हर वर्ष एक या दो बार भ्रमण के लिए जाना चाहिए। मित्रों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करना चाहिए। इस प्रकार करने से मन प्रसन्न रहता है। मनुष्य कुछ समय के लिए अपनी समस्याओं से राहत का अनुभव करता है।
            समय प्रवहमान है। उसको तो किसी भी हालत में रोका नहीं जा सकता। जो भी शुभाशुभ कर्म हमने पूर्व में किए हैं, उनको हम बदल नहीं सकते। समय रहते हम अपने कर्मों की शुचिता पर ध्यान दें सकते हैं। हमें आने वाले समय के लिए सावधान हो जाना चाहिए। भूतकाल की अपनी भूलों को सुधारने का अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। उन्हें पुनः न दोहराने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए। जन कल्याण के कार्यों को भी यदा-कदा कर लेना चाहिए। इससे समाज के प्रति हमारे दायित्वों का निर्वहन होता है। 
          अपने समय का सदुपयोग करने के लिए सब ओर से ध्यान हटाकर अपने जीवन को व्यवस्थित करने का प्रयास करना चाहिए। अपने विचारों में परिपक्वता लाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए अच्छा सोचना चाहिए। अपने स्वास्थ्य को घर के बने पौष्टिक भोजन से पुष्ट करना चाहिए। यथासम्भव अच्छे मित्रों की संगति में रहना चाहिए। योगाभ्यास करना चाहिए। रात को सोते समय पर्याप्त नींद आए, इसके लिए अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। ईश्वर की उपासना करके मन को शान्त करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

वृद्धावस्था का आधार गीता का सार

वृद्धावस्था का आधार गीता का सार

जीवन के संध्याकाल में मनुष्य को इस संसार में जल में कमल की तरह रहना चाहिए। जिस प्रकार जल में रहते हुए भी कमल को जल छू भी नहीं पाता। उसी प्रकार सकारात्मक विचार रखते हुए मनुष्य को भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार मोह-माया से स्वयं को दूर करके ईश्वर की उपासना में मन लगाना चाहिए। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जैसे महाराज जनक राजकाज करते हुए भी दुनिया की मोह-माया से विरक्त थे, तभी उन्हें विदेहराज कहते हैं। उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना चाहिए पर उनमें फॅंसकर नहीं रह जाना चाहिए।
             हर कार्य को परमात्मा को समर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य में कर्त्तापन का भाव नहीं आता। तब अहंकार उसके पास फटकता तक नहीं है। निस्सन्देह वृद्धावस्था का आधार गीता का सार ही है। 'श्रीमद्भगवद् गीता' धर्मज्ञान के साथ साथ मनुष्य को जीवन जीने की कला भी समझाती है। गीता के उपदेशों का अनुसरण करके वृद्धावस्था में मनुष्य न केवल स्वयं का बल्कि समाज का भी भला कर सकता है। 
            महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन शत्रु सेना में अपने बंधु-बांधवों को देखकर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दुख का त्याग करके अपने कर्तव्य के पथ पर अग्रसर होने का उपदेश दिया था।  कहने का अर्थ है कि मनुष्य को केवल कर्म करते रहना चाहिए, शेष सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे परिणाम की प्राप्ति होती है। इसलिए अपने शेष बचे हुए जीवन में सकारात्मक रहकर अच्छे कर्म करने का यत्न करना चाहिए।
           वृद्धावस्था में मन पर नियन्त्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। मन बहुत चंचल होता है और वह सदा यहाँ वहाँ भटकता रहता है। इस अशांत मन को अभ्यास और वैराग्य के नियमित अभ्यास से वश में किया जा सकता है। जब मनुष्य इस मन को साध लेता है तो मन उसके अनुसार चलने लगता है। यानी मनुष्य मन का स्वामी बन जाता है, उसका सेवक नहीं बनता। इससे यह मन अनावश्यक ही उसे अपने इशारों पर नहीं नचा पाता। मन के कहने में न आकर मनुष्य स्वयं ही अपने लिए नियमों को बनाता है।
          वृद्धावस्था में प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य तनाव से मुक्त रहे। यह तनाव मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है। इससे डिप्रेशन में जाने की सम्भावना बनी रहती है। व्यर्थ की चिन्ता और असुरक्षा की भावना से व्यथित नहीं होना चाहिए। वृद्धों में साधारणत: यह भावना दिखाई देती है। इस आयु में अनावश्यक ही पूर्वाग्रह नहीं पालने चाहिए। ऐसा करने से आखिर वह किस पर विश्वास कर सकेगा। इस प्रकार तो जीना ही कठिन हो जाएगा। इसलिए तनाव से मुक्त रहने के लिए धर्म और कर्म का मार्ग अपनाना चाहिए।
            वृद्धावस्था में भी मनुष्य को आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। जहॉं तक सम्भव हो अपने कार्य स्वयं ही करने का उसे अभ्यास बनाना चाहिए।अपना कार्य ईमानदारी से करना चाहिए। इस आयु में आकर भी मनुष्य यदि जोड़-तोड़ में लगा रहता है तो वह अपना सम्मान खो देता है। सारी आयु मनुष्य भागमभाग में व्यस्त रहता है। अब उस आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर रहकर उसे अपने जीवन को संयत कर लेना चाहिए। शान्त मन से बैठकर स्वाध्याय करना चाहिए और ईश्वर की आराधना में अपना समय व्यतीत करना चाहिए।
            वृद्धावस्था में क्रोध पर नियन्त्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। क्रोध सभी बुराइयों का मूल है। गीता में लिखा है कि क्रोध भ्रम पैदा करता है और भ्रम से बुद्धि विचलित होती है। घर या बाहर यदि मनुष्य अनावश्यक क्रोध करता रहेगा तो वह अपना सम्मान खो देगा। कोई भी उसकी बात को सुनने के लिए तैयार नहीं होगा। वह घर में अलग थलग होकर अकेलेपन का शिकार हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा कारण है कि क्रोधी मनुष्य को कोई भी पसन्द नहीं करता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं।
           यह शरीर नश्वर है, इसे एक दिन अवश्य ही इस संसार को त्यागकर जाना होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के शरीर परिवर्तन को मनुष्य के वस्त्र परिवर्तन के समान बताया है। उनके अनुसार मृत्यु समयानुसार आनी है। इसलिए इसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए। हमारा शरीर एक रथ के समान है जो आत्मा रूपी सवार का साधन मात्र है। इसका सही तरीके से रख-रखाव करना बहुत आवश्यक है। इसे उचित आहार-विहार से पुष्ट करना चाहिए। जिह्वा के स्वादों को इस अवस्था में त्याग देना उचित होता है।
          इस संसार में सभी जीव यात्री हैं। हमें निश्चत समय व निश्चत स्टेशन पर उतर जाना होता है। अत: वृद्ध होने पर भी प्रसन्नतापूर्वक जीना चाहिए। अपने मन में निराशा या हताशा का भाव कदापि नहीं रखना चाहिए। पुनर्जन्म होने पर शरीर फिर से प्राप्त होना ही होता है। समयानुसार किसी न किसी रूप में जीव को इस नश्वर संसार में आना‌ होता है। उस समय फिर से सभी रिश्ते-नाते पुनः नए रूप में ही मिलते हैं। इसलिए साथ छोड़कर जाने वालों के लिए शोक या दुख नहीं करना चाहिए। 
           इस आयु तक आते-आते मनुष्य के पास अनुभव रूपी ज्ञान का खजाना एकत्रित हो जाता है। अपनी सुखद वृद्धावस्था के लिए मनुष्य धन का संचय भी करता है। अपने अर्जित धन को यथायोग्य निर्धन व जरूरतमन्द के लिए यदा-कदा दान देना चाहिए। इस तरह धन की सार्थकता का अनुभव होता रहेगा। अपने ज्ञान के कोश का सदुपयोग करके मनुष्य को आत्म सन्तोष होता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका ज्ञान व्यर्थ नहीं गया। उससे किसी का तो मार्गदर्शन हुआ। समाज को दिशा देने का कार्य समाज के बुजुर्गों को करना चाहिए।
           वृद्धावस्था में आत्मचिन्तन करना बहुत आवश्यक होता है। मनुुष्य को प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। इससे व्यक्ति के अंतस में छुपे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सकता है। सभी जीवों में परमात्मा का अंश जीवात्मा विद्यमान है। इसलिए उन्हें अपने समान समझते हुए सभी प्राणियों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। अपने बच्चों से आशा व अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। जितना हो सके उनकी सहायता करनी चाहिए। हर परिस्थति में ईश्वर का धन्यवाद करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए। 
           'श्रीमद्भगवद्गीता' को सभी उपनिषदों का सार कहा जाता है। इसमें बताए गए जीवन मूल्यों से जीवन के हर पड़ाव की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति मनुष्य को मिलती है। उसका आत्मिक बल बढ़ता है। इसलिए मनुष्य को गीता में बताए गए सूत्रों को हृदय की गहराई से अपना कर्तव्य मानकर अपनाना चाहिए। इसके लिए किन्तु या परन्तु नहीं करना चाहिए। वृद्धावस्था में इन बताए गए सूत्रों को अपनाने से निस्संदेह व्यक्ति उन्नति के पथ की ओर निरन्तर अग्रसर होता है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद