शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र

ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र

ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है जिसका हम अज्ञानी मनुष्य पार नहीं पा सकते। पल में वह क्या-से-क्या कर देता है? कुछ भी हमें समझ नहीं आता। वह हमें हैरान करता हुआ पल में ही राजा को रंक बना देता है व रंक को राजा बनाकर सिंहासन पर बैठा देता है। देखते-ही-देखते वह आलिशान भवनों को मटियामेट कर देता है। बड़ी-बड़ी सभ्यताओं को यूँ ही पलक झपकते नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। उसकी माया वही जाने। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि कोई भी इसका भेद आज तक नहीं जान सका।
             आने वाली प्रातः राज्य को प्राप्त करने वाले भगवान राम को अपनी छोटी रानी कैकेयी के हठ के कारण, रातोंरात जंगलों में भटकने के लिए चौदह वर्षों के लिए भेज दिया। उनके साथ ही भाई लक्ष्मण और पत्नी भगवती सीता भी वन में उनके साथ चले गए। बाद में भगवती सीता के हरण का दंश भगवान राम को झेलने के लिए विवश होना पड़ा। अन्ततः हनुमान जी और सुग्रीव आदि की सहायता से भगवती सीता को मुक्त करवाकर अपने देश अयोध्या वापिस आए। फिर गर्भवती सीता मॉं का वन गमन हुआ और अन्त में उनका धरती में समाना भी कष्टप्रद रहा।
            स्वप्न में दान देने वाले सत्यवादी राज हरिश्चन्द्र को राजपाट छोड़कर श्मशान का रखवाला बना दिया। उनकी पत्नी को दासी के रूप में व पुत्र राजकुमार को बिकवा दिया। अन्त में पुत्र की मृत्यु के कारण शोकग्रस्त पति-पत्नी को उसके कफन का मोहताज बना दिया। श्मशान के नियमानुसार कर न दे सकने के कारण मॉं को पुत्र के संस्कार के लिए अपनी आधी साड़ी देनी पड़ी।
            आज जिनकी हम सादर पूजा करते हैं,  आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती समाज को दिशा देने का कार्य कर रहे थे। उन्हें अपने ही लालची और रिश्वत लेने वाले रसोइए के द्वारा जहर पिलवा दिया। ईसाई मतावलम्बियों के भगवान कहे जाने वाले ईसा मसीह को सूली पर टंगवा दिया।
           इस प्रकार हम नहीं जानते कि वह किसको और कब भाग्यशाली बना दे। उसके सिर पर अपना वरद हस्त रखकर उसे इतिहास में अमर कर दे और सबके सिर-आँखों पर बिठा दे।
            सर्व विदित सत्य है कि लोकप्रसिद्ध रामायण के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि अपने जीवन के पूर्वकाल में डाकू थे। ऋषियों को लूटने के लिए पकड़ा तो उन्होंने घर जाकर पूछने के लिए कहा की तुम्हारी इस पाप की कमाई में कौन-कौन भागीदार होगा। पत्नी-पुत्रादि परिवार जनों ने पाप की कमाई में बराबर के भागीदार होने से इन्कार करते हुए उत्तर दिया कि तुम्हारा काम परिवार का पालन करना है। कैसे भी धन कमाओ हमें कोई मतलब नहीं। तुम अपने दुष्कर्मों को स्वयं भोगोगे, हम नहीं।
             इस घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। कठोर साधना करते हुए वे अमर रामकथा के रचयिता बने। महर्षि वाल्मीकि व उनकी रचित रचना 'वाल्मीकिरामायणम्' दोनों ही इस संसार में प्रसिद्ध हो गए। अनेक परवर्ती रचनाकारों का प्रेरणा स्त्रोत बन गए। इसी प्रकार दुर्दान्त डाकू अंगुलीमाल लोगों की हत्या करके उनकी अंगुली काटकर माला बना देता था। उस डाकू को भी महात्मा बुद्ध की शरण में भेज दिया और महात्मा बना दिया। वे महात्मा बुद्ध के परम‌शिष्य बनकर उनका प्रचार करने लगे।
        महाकवि कालिदास जैसे महामूर्ख जिसे यह भी ज्ञात नहीं था कि जिस पेड़ की टहनी पर बैठकर उसे ही काट रहा था, उसकी शादी परम विदुषी विद्योतमा से करवा दी। फिर उन्हें इतना विद्वान बना दिया कि वे आज भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में प्रसिद्ध व अनुकरणीय हैं। उनके ग्रन्थों का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया है। साँप को रस्सी समझकर अन्धेरी रात में पत्नी के पास पहुँचने वाले उस अन्धप्रेमी तुलसीदास जी से 'रामचरितमानस' लिखवाकर युगों-युगों तक के लिए उन्हें अमर बना दिया।
            इस ईश्वर के चमत्कारों का बखान करने लगें तो न जाने कितने जन्म बीत जाएँगे पर उसकी लीलाओं का, चमत्कारों का वर्णन समाप्त नहीं होगा। ऐसे उस महान प्रभु की शरण में जाने से ही सद् गति मिलती है। वह किसी का भी अहंकार सहन नहीं करता। रावण, हिरण्यकश्यप जैसे शक्तिशालियों की भी गर्वोक्तियाँ को सहन नहीं करता जो स्वयं को भगवान मानने लगे थे। उनको भी उसने नष्ट कर दिया। रावण का वध श्रीराम जी के हाथों हुआ। हिरण्यकश्यप का वध नृसिंह भगवान के द्वारा किया गया।
        जितना विनम्र व जिज्ञासु बनकर हम उसकी शरण में जाएँगे, उतना ही उसके हृदय में स्थान पाएँगे। इसका कारण है कि वह अपनी शरण में सच्चे मन से आए हुए जीवों को निराश नहीं करता। उसे केवल हमारे अन्तस् के भाव ही भाते हैं। उसे दिखावे या प्रदर्शन से उसे हम कदापि प्राप्त नहीं कर सकते। वह अपने सच्चे भक्तों की कठोर परीक्षाएँ लेता है। उन्हें कुन्दन की तरह शुद्ध और पवित्र बनाता है। जो भक्त उसकी कसौटी पर खरे उतरते हैं, वे ही उसके प्रिय बनते हैं अन्य नहीं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 3 जुलाई 2025

मैं कौन हूॅं?

 मैं कौन हूँ?

हम जीव इस संसार में जन्म लेते हैं और सारा जीवन यही सोचते रहते हैं कि मैं कौन हूँ? मैं इस संसार में क्यों आया हूँ? उसके बाद मुझे कहाँ जाना है? आदि ये सभी प्रश्न हमें बेचैन करते रहते हैं। हैं न यह कैसी विडम्बना कि हम इन प्रश्नों को आजीवन हल ढूॅंढने का यत्न करते रहते हैं। आयुपर्यन्त हम इन पहेलियों को सुलझाने के लिए किसी सिरे‌ की तलाश करते रहते हैं पर न जाने ये सूत्र कैसे है जो हमारे हाथ ही नहीं लगते। हम थक-हारकर स्वयं ही शान्त होने का प्रयास करते हैं।
              आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी जब ज्ञानार्जन के लिए गुरु श्री विरजानन्द जी का द्वार खटखटाया तो गुरु जी ने उनसे पूछा, 'कौन है?' 
स्वामी जी ने उत्तर दिया, 'मैं आपके पास यही जानने आया हूँ।' 
             महात्मा बुद्ध भी इन्हीं सब प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए आधी रात को ही अपना राजपाट, अपने माता-पिता, अपनी सोती हुई पत्नी और सोते हुए अबोध पुत्र को छोड़कर अपने राजमहल से‌ बाहर‌ चले गए।
            इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना बहुत आवश्यक है तभी तो हम अपने ही विषय में जान सकेंगे। 'बृहदारण्यकोपनिषद्' के इस मन्त्रांश में कहा है ‌-
               अहं ब्रह्मास्मि।
अर्थात् इसका अर्थ है कि व्यक्तिगत आत्मा (आत्मा) और ब्रह्माण्डीय आत्मा (ब्रह्म) एक ही हैं।
            यह वाक्यांश 'अद्वैत वेदान्त' के सिद्धान्त का समर्थन करता है जो कहता है कि मनुष्य अपने भीतर ब्रह्म को पहचान सकता है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्य को गहराई से सोचे तो समझ आ जाएगा कि मैं उस अजर, अमर, अविनाशी परमात्मा का ही अंश हूँ। इसीलिए अपना रूप परिवर्तन करके अपने कृत कर्मों को भोगने के लिए बारम्बार इस असार संसार में जन्म लेता हूँ। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि आत्मा उस 'परम आत्मा' का एक अंश है।   
           'श्वेताश्वतरोपनिषद्' के इस मन्त्र में हमें आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध में बताया है- 
           द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
           समानवृक्षं परिषस्व जाते।।
           तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
           नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।।         
अर्थात एक ही वृक्ष पर दो पक्षी यानी परमात्मा और आत्मा  बैठे हुए हैं। पहला परमात्मा केवल द्रष्टा है और दूसरा आत्मा भोग करने वाला है।
              इसी विचार को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं- 
            ईश्वर अंस जीव अविनासी।
अर्थात् ईश्वर का अंश यह जीव (आत्मा) अविनाशी है। 
            मैं आत्मा अग्नि हूँ, ज्ञान, प्रकाश, गति एवं अग्रणी हूँ। मेरे अन्तस् में संकल्प की अग्नि निरन्तर प्रज्ज्वलित रहती है। अत: मेरा जीवन पथ सदा प्रकाशमान रहता है। 'ऋग्वेद' में कहा है -
                अग्निरस्मि जन्मना जातवेद:। 
अर्थात् मैं जन्म से ही अग्नि हूँ और सभी चीजों को जानने वाला हूँ। 
              यह वाक्य अग्नि के ज्ञान और शक्ति को दर्शाता है, जो जन्म से ही विद्यमान है और सभी चीजों को जानता है। यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि मैं ईश्वर का ही रूप हूँ और वह मेरे रोम-रोम में समाया हुआ है। मेरे सिर पर उस परमेश्वर का वरद हस्त है। इसलिए संसार में आकर मुझे स्वयं को उसके निर्देश के अनुरूप बनाना है।
             मैं मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हूँ। मुझे अपनी इस श्रेष्ठता का मान रखते हुए अपने को योग्य सिद्ध करना है। मुझमें ईश्वर ने सभी पंच महाभूतों के गुणों का समावेश किया है। पृथ्वी जैसा धैर्य मुझे दिया है। मुझे जल के समान शीतलता प्रदान की है। वायु के समान मुझे गतिशील बनाया है। अग्नि की भाँति मुझे तेजस्वी बनाया है। आकाश के तुल्य व्यापकता मुझमें है।
                प्रभु ने मुझे विवेक शक्ति, भुजबल, साहस, आत्मविश्वास व स्वाभिमान का वरदान दिया है। कहने को मैं एक व्यक्ति हूँ पर सभ्यता व संस्कृति का प्रतिमान हूँ। दया, ममता, करुणा, प्रेम, वात्सल्य, शान्ति, क्षमा आदि का पालन करना मेरा धर्म है। मुझे अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस मानव जीवन को व्यर्थ नहीं गवाना है।
                   सर्वभूतहिते रत:
अर्थात् प्राणिमात्र की भलाई करना मेरा दायित्व है। मेरा घर-परिवार ही नहीं सारी पृथ्वी मेरा कुटुम्ब है जिसकी परिकल्पना हमारे ऋषियों ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' कहकर की है।
              ईश्वर ने हमें जन्म इसलिए दिया है कि अपनी शक्तियों को जागृत कर आत्म साक्षात्कार करके मैं उसमें लीन हो जाऊँ। जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होकर यानी आवागमन के चक्र से मुक्ति पाकर मैं मोक्ष को प्राप्त करूँ।
             अन्त में 'ईशावास्योपनिषद' के अनुसार यह कहना उपयुक्त होगा- 
              योSसौ पुरुष:, सोSहम् अस्मि
अर्थात् जैसा वह पुरुष यानी परमात्मा है, वही मैं हूँ। दूसरे शब्दों में जैसा वह परमेश्वर है वैसा ही मैं भी हूँ। मैं किसी रूप में उससे भिन्न नहीं हूँ। बस मुझे उसके गुणों को आत्मसात करके अपने में विस्तार करना है। और फिर उसके साथ एकरूप हो जाना है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

खानपान का बहुत प्रभाव

खानपान का बहुत प्रभाव

हमारे आचरण पर हमारे खानपान का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है। सुनने में शायद अटपटा-सा लग रहा है परन्तु यही सत्य है। आजकल बहुत से लोग इस बात को दकियानूसी कहकर मजाक में उड़ा देते हैं। परन्तु सच्चाई यही है कि अन्न का जीवन में बहुत महत्त्व होता है। इस अन्न से हमारा शरीर पुष्ट होता है और हम स्वस्थ रहते हैं। जो लोग पौष्टिक आहार लेते हैं, उनके चेहरे पर ओज होता है। उनमें कार्य करने की स्फूर्ति रहती है। उन्हें अपेक्षाकृत थकावट कम होती है।
            दूसरी ओर जिन लोगों को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पाता, कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। उनका चेहरा निस्तेज होता है। वे शीघ्र ही थकान का अनुभव करते हैं। इसलिए खानपान का हमें बहुत ध्यान रखना चाहिए। इस विषय पर हम सबको गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। खानपान के विषय में हमारे बड़े-बजुर्ग हमें समझाते हुए कहते हैं- 
          जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन
अर्थात् जैसी कमाई का अन्न घर में आएगा वैसा ही परिवार जनों का आचरण भी हो जाएगा।
             इसी बात की पुष्टि 'छान्दोग्योपनिषद' का यह मन्त्र करता है। इस मन्त्र में ऋषि कहते हैं -
       आहारशुद्धौ सत्तवशुद्धि: ध्रुवा स्मृति:।
         स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:॥
अर्थात् आहार शुद्ध होने से हमारा अन्त:करण शुद्ध होता है। इससे ईश्वर में स्मृति दृढ़ होती है। स्मृति प्राप्त हो जाने से हृदय की अविद्या जनित सभी गाँठे खुल जाती हैं।
            तामसिक और राजसिक भोजन करने से स्वास्थ्य की हानि होती है जिसका मानसिक प्रभाव होता है। मनुष्य का स्वास्थ्य रहना बहुत आवश्यक होता है। मन में तमोगुण बढ़ता है अर्थात् मनुष्य पर कुविचार हावी होते हैं जिसका परिणाम हम अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार, तेजाब फैंकना, पारिवारिक विघटन आदि बुराइयों के रूप में देखते हैं। मन में अवसाद बना रहता है व सद् कार्यों में मन नहीं लगता। हमारा मन इन्द्रियों के वश में होकर भटकता रहता है।
              यदि हम स्वास्थ्य के नियमों के अनुसार मौसम के अनुकूल भोजन करेंगे तो शरीर स्वस्थ रहेगा अन्यथा रोगी हो जाएगा। तब हमें बहुत कष्ट का सामना करना पड़ेगा। हम स्वयं तो परेशान होंगे ही, साथ ही अपने परिजनों को भी कष्ट में डाल देते हैं। अपनी मेहनत की कमाई डाक्टरों के हवाले करनी पड़ेगी। रोगी व्यक्ति स्वयं अपने को संभाल नहीं पाता तो घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण कैसे कर सकेगा? यह कष्ट उसे और अधिक पीड़ित करता है। 
              महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' नामक महाकाव्य में इस पर प्रकाश डाला है- 
              शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
अर्थात् शरीर स्वस्थ होगा तभी मनुष्य अपने धर्म का पालन करेगा और अपने दायित्वों को पूर्ण कर सकेगा।
             यदि हम कहें कि शरीर और मन दोनों की सृष्टि अन्न से ही होती है तो यह कथन अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनि सात्विक आहार पर बल देते थे। अन्न से शरीर पुष्ट होता है व मन में सद् विचारों की अधिकता होती है। हम लोग खाने के लिए जीते हैं जबकि खाना जीने के लिए होना चाहिए। आजकल घर का शुद्ध खाना खाने के बजाय जंक फूड का प्रचलन बढ़ता जा रहा जो स्वास्थ्य की हानि कर रहा है। जानते-समझते हुए हम इसके गुलाम होते जा रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे आजकल बीपी, शूगर, मोटापा, दिल की बिमारी, कमजोर नजर और न जाने किन-किन बिमारियों के शिकार हो रहे हैं।
             विचारणीय है कि जिन परिवारी जनों के लिए मनुष्य पाप-पुण्य, छल-फरेब, झूठ- सच सब करता है, उसका पुण्य बटोरने के लिए तो सब तैयार हो जाते हैं पर उसके पाप का हिस्सा बाँटने वाला उसके अतिरिक्त और कोई नहीं होगा। तो फिर यह अत्याचार और अनाचार से धन किसलिए कमाना? क्यों किसी व्यक्ति का गला काटना या उसका दिल दुखाना? मेरे कहने से इस विषय पर विचार अवश्य करना। तब शायद मेरी बात का तात्पर्य आप लोग समझ सकें।
             वास्तव में सच्चाई व ईमानदारी की कमाई में जो बरकत होती है, उसका कोई मुकाबला नहीं हो सकता। इसी कमाई से घर-परिवार व स्वयं मनुष्य सुखी रहता है। उसकी सन्तान भी योग्य, आज्ञाकारी व संस्कारी होती है। हो सकता है वह दुनिया की नजर में लूजर हो पर उसका कोई भी ऐसा कार्य नहीं जो सीमित साधन होने पर भी पूरा न हो सके। ईश्वर ऐसे व्यक्ति का खास ख्याल रखता है व उसे कभी निराश नहीं होने देता। फिर हमें भी ईश्वर के अनुसार चलना चाहिए।
              मनीषी मानते हैं कि हमारे शरीर में सभी देवी-देवताओं का निवास होता है। तामसिक भोजन का अंश उनको मिलता है तो वे कमजोर हो जाते हैं और सात्विक भोजन से वे पुष्ट होते हैं। अपने घर-परिवार को संस्कारी बनाने के लिए, उन्हें सात्विक अन्न खिलाएँ जो तन और मन दोनों के लिए आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 30 जून 2025

बड़े होने की जल्दी

बड़े होने की जल्दी

मनुष्य जब बच्चा होता है तो उसे बड़े होने की बहुत जल्दी होती है। वह सोचता है कि कब वह बड़ा होगा और अपनी मनमर्जी के अनुसार चलेगा। उसे यह लगता है कि घर में जो बड़े हैं वे हमेशा उस पर हुक्म चलाते हैं। न चाहते हुए भी उसे सबका कहना मानना पड़ता है। वह यह भी सोचता है उसकी तो जैसे कोई इच्छा ही नहीं है। वह किसी से भी ऊँची आवाज में बात नहीं कर सकता। अगर आस-पड़ोस या स्कूल से शिकायत आ जाए, फिर तो बस उसकी खैर नहीं। 
             बच्चा हमेशा यही सोचता है कि मुझ बेचारे को मारने, पीटने और डॉंटने का अधिकार घर के सब बड़े लोगों को है। वह बेचारा तो किसी भी बात का विरोध भी नहीं कर सकता। यदि वह कभी ऐसा कर देता है तो उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उसे तब बहुत बुरा लगता है जब उससे छोटी-सी गलती हो जाने पर उसे सब लोगों से डॉंट खानी पड़ जाती है। उसे समझ नहीं आता उउस समय पता नहीं सभी घर के सदस्यों का प्यार पता नहीं कहॉं उड़न छू हो जाता है।
             घर में हर कोई उसे बात-बात पर टोकता है। कभी पढ़ाई के नाम और कभी खेलने के बहाने से वह बच्चा बेचारा सबकी नसीहतें सुन-सुनकर परेशान होता रहता है। घर हो अथवा स्कूल हर तरफ उसे अपने बड़ों की मर्जी से ही चलना पड़ता है। हर कदम पर यानी उठने-बैठने, खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने के समय उसे वह बलि का बकरा बनना पड़ता है। 
            बच्चा हमेशा सोचता है कि बड़े लोग बहुत सुखी होते हैं। उन्हें सवेरे जल्दी उठकर नींद खराब करके स्कूल नहीं जाना पड़ता। उन्हें होमवर्क करने की कोई चिन्ता नहीं होती है और न परीक्षा व उसके परिणाम का डर होता है। जहाँ उनका दिल चाहता है वे बिना पूछे, बिना रोक-टोक के‌ चले जाते हैं। किसी से इजाजत लेने की भी आवश्यकता नहीं होती। वह अपने भविष्य के सपने देखता है कि स्कूल पास करके कालेज जा रहा है। फिर कालेज की पढ़ाई पूरी करके वह नौकरी कर रहा है। इस तरह वह धीरे-धीरे अपने खुशहाल जीवन के सपनों में खोने लगता है। 
            जब वह थोड़ा और बड़ा होता है तब अपनी गृहस्थी बसाने के लिए उत्साहित होता है। घर-गृहस्थी और नौकरी की चक्कर-घिन्नी में फंसा जब वह कोल्हू का बैल बनने लगता है तब उसे आपने बचपन की खट्टी-मीठी यादें सताने लगती हैं। तब वह गुहार लगता है कि कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब बच्चा बड़ा हो जाता है तब उसे अपना बचपन याद आने लगता है। फिर वह सोचता है काश उसका पहले वाला बचपन लौट आए।
           उस समय वह युवा बच्चा बनना चाहता है। पर बचपन का समय तो कहीं पीछे छूट जाता है। वह लौटकर वापिस नहीं आता। वह सोचता है कि माता-पिता की छत्रछाया में बहुत आनन्द था। उसे न कोई चिन्ता थी, न कोई फिक्र थी। खाना-पीना और मस्ती करना बस यही उसके काम हुआ करते थे। यदि किसी ने उसे कुछ कहा या सुना दिया तब चीख-चिल्ला लिए और यदि उसे पुचकार दिया तो अपने को खुदा समझ लिया। 
             अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए जिद करना और उनके पूरा होने पर उत्सव मनाने जैसा आनन्द ही तो जीवन होता था। यदि इच्छा पूरी नहीं होती थी तो जिद करके रूठ जाता था। फिर सबके प्यार और मनुहार करने पर मान जाता था। तब मम्मी-पापा आदि घर के सभी लोग खुश हो जाते थे। जीवन के आने वाले थपेड़ों से माता-पिता उसे ‌बचाते थे। स्वयं कष्ट सहकर भी हमारी सारी जरूरतें पूरी करते थे। उस समय हम राजा हुआ करते थे। अपनी बालहठ 'येन केन प्रकारेण' अर्थात् किसी भी तरह मनवा लेते थे।
            जीवन इसी तरह चलता रहता है। एक पड़ाव को पार करके उसमें लौटना किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं होता। अपने आने वाले अगले पड़ाव को हम आशा भरी नजरों से देखते हैं। एक को खोने का गम व दूसरे को पाने का आनन्द भी स्थायी नहीं रह पाता। जीवन की जिस भी अवस्था में हम जी रहे हैं, उसमें ईश्वर का धन्यवाद करते हुए आगे बढ़ते रहें तो फिर आनन्द-ही-आनन्द होता है। यही मानव जीवन का सार है जिसे समझकर उदासीनता से मुक्त हुआ जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 29 जून 2025

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना प्रायः सभी धर्मो में मिलती है। इसके विषय में बहुत कुछ कहा व सुना जाता है। स्वर्ग व नरक के विषय में यदि विचार किया जाए तो मन इसके विपरीत सोचता है। माना यही जाता है कि बुरे कर्म करने वालों को नरक मिलता है जहाँ बदबू होती है, कड़ाहों में तेल उबलता रहता है जिसमें दुष्कर्म करने वालों को डाला जाता है आदि। कहने का तात्पर्य है कि वहाँ जीव को तरह-तरह की प्रताड़ना मिलती है। इसके विपरीत स्वर्ग है, वहाँ भोग विलास के सभी साधन हैं। वहॉं अपसराएँ हैं, हरियाली है आदि। यानी कि सद् कर्म करने वालों को स्वर्ग मिलता है।‌ वहॉं सभी प्रकार के ऐशो आराम मिलते हैं।
               कहते हैं कि ईश्वर का परमधाम एक स्थान विशेष है जिसे प्राप्त करके मनुष्य जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। वहॉं पर विद्यमान चित्रगुप्त सभी प्राणियों के लेखेजोखे का हिसाब रखने के लिए खाता रखते हैं। मृत्यु के पश्चात जब मृतक ऊपर जाता है तो उसे जीवन में किए गए कर्मों को पढ़कर सुनाया जाता है। तदनुसार उसे स्वर्ग या नरक उपहारस्वरूप या सजा के रूप में दिया जाता है। मृत्यु के देवता यमराज जीव के शरीर में विद्यमान आत्मा को ले जाने के लिए अपने दूतों यानी यमदूतों को भेजते हैं।
            अब यह विचारणीय है कि हमारे शरीर में रहने वाली आत्मा, अजर, अमर व नित्य है और इस पर किसी की स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान श्रीकृष्ण ने इस विषय में हमें समझाते हुए कहा है-
            न जायते म्रियते वा कदाचन 
            नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
            अजो नित्यं शाश्वतोsयं पुराणो 
               न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थात् आत्मा का कभी न जन्म होता है और न मृत्यु ही होती है। ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा। आत्मा अजर, नित्य, शाश्वत व प्राचीन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।
'श्रीमद्भगवद्गीता' का यह श्लोक भी देखिए जिसमें आत्मा की अमरता‌ के विषय में कहा है -
       नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
       न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥
अर्थात् यह श्लोक हमें समझा रहा है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते है, न इसे आग्नि जला सकती है। जल इस आत्मा को गीला नहीं कर सकता और हवा इसे‌ सुखा नहीं सकती।
             अब प्रश्न यह उठता है कि सभी सुख-दुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण आदि स्थितियाँ अथवा भोग इस शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। तो फिर स्वर्ग अथवा नरक में दण्ड किसे मिलता है और किसे सारी सुख-सुविधाएँ मिलती हैं?
             इस भौतिक शरीर को मृत्यु के पश्चात तो अपने-अपने धर्म के अनुसार जला दिया जाता है या दफना दिया जाता है। इसका सीधा-सा यही अर्थ है कि इस शरीर का सम्बन्ध इसी पृथ्वी पर ही समाप्त हो गया है। फिर इस शरीर को सजा या पुरस्कार नहीं मिल सकता। आत्मा को तो हमारे ग्रन्थ इन भोगों से परे  मानते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा भी इस सजा या पुरस्कार की अधिकारी नहीं है। हमारे मनन करने का विषय यह है कि अनश्वर आत्मा और नश्वर शरीर जब दोनों ही स्वर्ग और नरक के सुख-दुख के अधिकारी नहीं हैं तो फिर और कौन है?
              हमारी तर्क बुद्धि यही कहती है कि स्वर्ग व नरक किसी विशेष निश्चित स्थान पर नहीं हैं। वे दोनों इसी धरा पर ही हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं तो जब हम सुख-सुविधाओं से सम्पन्न होते हैं, अपने बन्धु-बान्धवों के साथ हर प्रकार से सुखी और समृद्ध जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं तो हम स्वर्ग में रहते हैं या स्वर्ग के समान सुख भोग रहे होते हैं।  उसकी सुगन्ध चारों ओर फैलती है।
               इसके विपरीत हम दुखों-परेशानियों में भी घिर जाते हैं। उस समय हम सबसे अलग-थलग रहकर कष्टों का सामना करते हैं। उस समय मानो हम नरक तुल्य जीवन जीते हैं। वह समय हमारे लिए बहुत ही कष्टकारी होता है। उस समय ऐसा लगता है कि हमारा साया भी साथ छोड़कर चला गया है। तब सभी बन्धु-बान्धव भी हमसे किनारा कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं सहायता न करनी पड़ जाए। उस समय हम नरक तुल्य कष्ट भोग रहे होते हैं।
              हम कह सकते हैं कि स्वर्ग व नरक दोनों किसी आसमान पर विद्यमान नहीं हैं। बल्कि इसी धरती पर हैं। हम अपने इस जीवनकाल में पूर्वजन्म कृत सभी शुभाशुभ कर्मों को भोगते हैं। इसे ही हम स्वर्ग और नरक का भोगना कहते हैं। स्वर्ग और नरक के इन सुखों और दुखों को हमें निश्चित ही भोगना पड़ता है। इसका विचार करके अपने कर्मों की ओर ध्यान देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 28 जून 2025

ईश्वर की उपासना सच्चे मन से

ईश्वर की उपासना सच्चे मन से

ईश्वर को हम सभी लोग अपने-अपने तरीके से स्मरण करते हैं और उसे पाने का प्रयास करते हैं। इसके लिए कुछ लोग कर्मकाण्ड करते हैं, कुछ लोग पूजा-पाठ करते हैं, कुछ लोग जप-तप करते हैं और कुछ लोग व्रत आदि के द्वारा प्रभु को पाने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हम अपनी भक्ति में सफल हो पाते हैं या नहीं, इस विषय में हम नहीं जानते। केवल वह मालिक ही इस सत्य को जानता है कि उसे हमारी आराधना में सच्चाई दिखाई देती है या मात्र प्रदर्शन ही दिखता है।
             ईश्वर की उपासना यदि ईमानदारी व सच्चे मन से की जाए तभी वह उसे भाती है। प्राणीमात्र के प्रति मन में सद् भावना न हो तो मनुष्य उस प्रभु का प्रिय नहीं बन सकता। हम अपने बच्चों और अपने बन्धु-बान्धवों से बहुत प्यार करते हैं। सदा उनके सुख-दुख में हर्ष और शोक का अनुभव करते हैं। उसी प्रकार वह मालिक चाहता है कि उसकी बनाई हुई इस सृष्टि के समस्त जीवों से भी हम लोग बिना किसी भेदभाव के अपने मन की गहराई से प्यार करें जैसा स्नेह वह हम सबके प्रति रखता है।
             हम में से बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो अपने आपको ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त मानते हैं। बाकी सबको अपने समक्ष तुच्छ समझते हैं। चाहे वे स्वयं प्रभु भक्ति का प्रदर्शन ही क्यों न कर रहे हों। वे यह दावा करते हैं कि वे ईश्वर के बहुत पास हैं या यूँ कहें कि वे स्वयं को ही ईश्वर मानते हैं। दूसरों पर अत्याचार करके, उन्हें हिकारत की नजर से देखकर अपने अहं को तुष्ट करते हैं। जबकि ईश्वर को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वह हमसे प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखने के लिए कहता है। परमात्मा स्वयं भी दीन-दुखियों की सहायता करता है। इसलिए हम ईश्वर को दीनबन्धु कहते हैं।
              एक ऐसी ही कथा सुनी थी। नारद जी को बड़ा अभिमान था कि वे प्रभु श्री हरि विष्णु के सबसे बड़े भक्त हैं। ऐसा माना जाता है कि नारद मुनि जी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण करते रहते हैं।एक बार नारद जी भगवान विष्णु जी के पास गए और कहा, "हे भगवन! मुझसे बड़ा आपका कोई अन्य भक्त संसार में नहीं है।"
             प्रभु ने उन्हें यह कहकर निराश किया, "वे उनके सबसे बड़े भक्त नहीं बल्कि उनसे भी बड़ा भक्त कोई और है।" 
             नारद जी के पूछने पर प्रभु ने कहा, "एक किसान है जो किसी गॉंव में रहता है। वह मेरा सबसे बड़ा भक्त हैं।"
            यह सुनकर नारद जी को अच्छा नहीं लगा, वे बहुत परेशान हो गए। नारद जी उसी समय उस परम भक्त से मिलने के लिए चले गए। वे जब उस किसान से मिले तो आश्चर्यचकित रह गए, 'वह किसान दिन में सिर्फ तीन बार प्रभु को याद करता है। एक बार प्रातः खेत में जाते समय, दूसरा दिन में खाना खाते समय और तीसरी बार जब वह वापिस घर आता है।'
               नारद जी को यह सब समझ नहीं आया।  वे प्रभु के पास गए और पूछा, "भगवन! दिन में केवल तीन बार आपको याद करने वाला किसान मुझसे आपका बड़ा भक्त कैसे हो गया?"
               श्री हरि मुस्कुराए और तेल से भरा हुआ एक पात्र नारद जी को देते हुए बोले, "नारद! जाओ पृथ्वी का एक चक्कर लगाकर आओ। पर यह याद रखना कि तेल की एक भी बूँद धरती पर गिरनी नहीं चाहिए।"
              नारद जी भ्रमण करके, प्रभु का कार्य सम्पन्न करके वापिस लौट आए। प्रभु से प्रशंसा पाने की कामना से कार्य पूर्ण के करने की चर्चा करने लगे। तब प्रभु ने उनसे पूछा, "इस कार्य को करते समय मुझे कितनी बार मुझे याद किया?" 
              नारद जी ने इन्कार में सिर हिला दिया और कहा, "प्रभु! आपका आदेश था कि तेल पात्र से गिरना नहीं  चाहिए। मैं आपका काम कर रहा था। बस इसी में ध्यान लगा रहा। आपके नाम का स्मरण नहीं किया।"
            तब प्रभु ने नारद जी को समझाया, "जो व्यक्ति मुझे सच्चे मन से याद करता है और अपने कर्तव्य को करते हुए समय मेरा स्मरण करता है, वही मेरा प्रिय भक्त कहलाता है। 
            इस दृष्टान्त से समझने वाली मुख्य बात यह है कि ईश्वर मनुष्य की भावना को देखता है। वह दिखावे या रिश्वत वाली भावना को पसन्द नहीं करता। वह सदा हमारे अपने मन में विद्ममान रहता है। जब चाहे अपने मन में झॉंककर उसे प्राप्त कर लो। ईश्वर को निश्छल, ईर्ष्या-द्वेष से रहित, सच्चे व ईमानदार लोग पसन्द आते हैं। इसलिए हम अपने अन्तस में जितना अधिक सद् गुणों का विस्तार करेंगे उतना ही ईश्वर के समीप जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 27 जून 2025

द्वन्द्व सहन करना

द्वन्द्व सहन करना

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में द्वन्द्व सहन करने पर बल दिया है। समझने वाली बात है कि यह द्वन्द्व किस चिड़िया का नाम है? द्वन्द्व का अर्थ है विरूद्ध स्वभाव वाली स्थितियों को सहन करना। हम इनका विषलेषण इस प्रकार कर सकते हैं- सुख-दुख, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान, सफलता-असफलता आदि विरोधाभासी स्थितियों का सामना करना। इसी प्रकार सर्दी-गर्मी, दिन-रात, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि प्राकृतिक द्वन्द्वों को भी नित्य प्रति सहन करना पड़ता है।
              ये सभी स्थितियाँ हमारे जीवन में अपने क्रम से आती हैं। संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास ने 'कुमासम्भवम्' में इस श्लोक के माध्यम से हमें बताया है -
     कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा।    
     नीचैर्गच्छत्युपरिच दशा चक्रनेमिक्रमेण​।। 
अर्थात् किसी को सदा सुख नहीं मिलता और उसी प्रकार सदा दुख भी नहीं मिलता। जिस प्रकार पहिए के चलने पर उसमें में लगे हुए अरे(तीलियाँ) ऊपर और नीचे होती रहती हैं, उसी प्रकार ही हमारे जीवन में सुख और दुख की स्थिति होती है। 
            ये स्थितियाँ हमारे जीवन में निरन्तर आती रहती हैं। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। कभी सुख-समृद्धि के हिण्डोले में झूलते हुए हम जीवन का आनन्द लेते हैं और कभी दुख-परेशानियों में घिर कर व्यथित होते हैं। जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब हम उन्नति की पराकाष्ठा को छूते हैं और फिर दूसरे ही पल ऐसी पटखनी खाते हैं कि जमीन में लग जाते हैं।
              'श्रीमद्भगवद्गीता' में हमें भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में समझाया है कि ये सारे द्वन्द्व मानव जीवन में बारी-बारी से आते हैं। कभी हमें सुख मिलता है कभी दुख। कभी हम उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं तो कभी कठोर श्रम करने पर भी अवनति के गर्त में गिरते हैं। जब कभी हमारा यश चारों ओर फैलता है तब हम आसमान में उड़ने लगते हैं। हम अपने झूठे अहंकार में डूबकर अपने चारों ओर एक अभेद्य-सी दीवार खड़ी कर लेते हैं। तब हम हर किसी को कीट-पतंगों की भाँति समझने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि ऐसा करने से हम निश्चित ही अपयश के भागीदार बनेंगे। इस स्थिति से हम लोगों को यथासम्भव बचना चाहिए।
        काम-धन्धे में कभी-कभी हमें आशा से बढ़कर लाभ मिलता है तो कभी सावधान रहते हुए भी किसी कारणवश अचानक हानि उठानी पड़ जाती है। इस स्थिति के लिए हम तैयार भी नहीं होते परन्तु फिर भी हमें यह कष्ट झेलना पड़ता है।  बदलते हुए मौसम में सर्दी-गर्मी आदि ऋतुओं को झेलना मनुष्य की मजबूरी बन जाती है। दिन-रात, प्रतिदिन ये अपना सन्देश हमें देते रहते हैं। अतिवृष्टि-अनावृष्टि, ऑंधी-तूफान आदि प्राकृतिक द्वन्द्वों को भी सहन करना पड़ता है। ये सब भी समयानुसार ईश्वर की इच्छा से इस सृष्टि पर मानव जीवन में आते रहते हैं। इनसे बच पाना सम्भव नहीं होता बल्कि सामना करना पड़ता है।
             निष्कर्षत: हम अपने जीवन में इसी प्रकार इन सभी द्वन्दों को सहन करते हैं। ये सभी स्थितियाँ हर मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों के अनुसार अवश्यमेव आती हैं। इनका सामना करना हमारी विवशता है क्योंकि हमारे पास और कोई चारा नहीं है। इसलिए इनका सामना हर स्थिति में सम होकर अर्थात् एक समान रह कर करना चाहिए। जब इन्हें जीवन का एक हिस्सा मान लेंगे तब हमें अधिक कष्ट नहीं होगा। उस समय ये सब सामान्य जीवन का अंग प्रतीत होगा।
              ईश्वर की शरण में जाने से और उसकी उपासना करने से ही इन द्वन्द्वों को सहन करने की शक्ति मिलती है। उसी से अपनी रक्षा करने के लिए गुहार लगानी चाहिए। उसी का स्मरण करने से ही सच्चा सुख और शान्ति प्राप्त होती है। इसलिए उसकी शरण में जाना ही एकमात्र विकल्प हमारे पास बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद