सोमवार, 30 जून 2025

बड़े होने की जल्दी

बड़े होने की जल्दी

मनुष्य जब बच्चा होता है तो उसे बड़े होने की बहुत जल्दी होती है। वह सोचता है कि कब वह बड़ा होगा और अपनी मनमर्जी के अनुसार चलेगा। उसे यह लगता है कि घर में जो बड़े हैं वे हमेशा उस पर हुक्म चलाते हैं। न चाहते हुए भी उसे सबका कहना मानना पड़ता है। वह यह भी सोचता है उसकी तो जैसे कोई इच्छा ही नहीं है। वह किसी से भी ऊँची आवाज में बात नहीं कर सकता। अगर आस-पड़ोस या स्कूल से शिकायत आ जाए, फिर तो बस उसकी खैर नहीं। 
             बच्चा हमेशा यही सोचता है कि मुझ बेचारे को मारने, पीटने और डॉंटने का अधिकार घर के सब बड़े लोगों को है। वह बेचारा तो किसी भी बात का विरोध भी नहीं कर सकता। यदि वह कभी ऐसा कर देता है तो उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उसे तब बहुत बुरा लगता है जब उससे छोटी-सी गलती हो जाने पर उसे सब लोगों से डॉंट खानी पड़ जाती है। उसे समझ नहीं आता उउस समय पता नहीं सभी घर के सदस्यों का प्यार पता नहीं कहॉं उड़न छू हो जाता है।
             घर में हर कोई उसे बात-बात पर टोकता है। कभी पढ़ाई के नाम और कभी खेलने के बहाने से वह बच्चा बेचारा सबकी नसीहतें सुन-सुनकर परेशान होता रहता है। घर हो अथवा स्कूल हर तरफ उसे अपने बड़ों की मर्जी से ही चलना पड़ता है। हर कदम पर यानी उठने-बैठने, खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने के समय उसे वह बलि का बकरा बनना पड़ता है। 
            बच्चा हमेशा सोचता है कि बड़े लोग बहुत सुखी होते हैं। उन्हें सवेरे जल्दी उठकर नींद खराब करके स्कूल नहीं जाना पड़ता। उन्हें होमवर्क करने की कोई चिन्ता नहीं होती है और न परीक्षा व उसके परिणाम का डर होता है। जहाँ उनका दिल चाहता है वे बिना पूछे, बिना रोक-टोक के‌ चले जाते हैं। किसी से इजाजत लेने की भी आवश्यकता नहीं होती। वह अपने भविष्य के सपने देखता है कि स्कूल पास करके कालेज जा रहा है। फिर कालेज की पढ़ाई पूरी करके वह नौकरी कर रहा है। इस तरह वह धीरे-धीरे अपने खुशहाल जीवन के सपनों में खोने लगता है। 
            जब वह थोड़ा और बड़ा होता है तब अपनी गृहस्थी बसाने के लिए उत्साहित होता है। घर-गृहस्थी और नौकरी की चक्कर-घिन्नी में फंसा जब वह कोल्हू का बैल बनने लगता है तब उसे आपने बचपन की खट्टी-मीठी यादें सताने लगती हैं। तब वह गुहार लगता है कि कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब बच्चा बड़ा हो जाता है तब उसे अपना बचपन याद आने लगता है। फिर वह सोचता है काश उसका पहले वाला बचपन लौट आए।
           उस समय वह युवा बच्चा बनना चाहता है। पर बचपन का समय तो कहीं पीछे छूट जाता है। वह लौटकर वापिस नहीं आता। वह सोचता है कि माता-पिता की छत्रछाया में बहुत आनन्द था। उसे न कोई चिन्ता थी, न कोई फिक्र थी। खाना-पीना और मस्ती करना बस यही उसके काम हुआ करते थे। यदि किसी ने उसे कुछ कहा या सुना दिया तब चीख-चिल्ला लिए और यदि उसे पुचकार दिया तो अपने को खुदा समझ लिया। 
             अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए जिद करना और उनके पूरा होने पर उत्सव मनाने जैसा आनन्द ही तो जीवन होता था। यदि इच्छा पूरी नहीं होती थी तो जिद करके रूठ जाता था। फिर सबके प्यार और मनुहार करने पर मान जाता था। तब मम्मी-पापा आदि घर के सभी लोग खुश हो जाते थे। जीवन के आने वाले थपेड़ों से माता-पिता उसे ‌बचाते थे। स्वयं कष्ट सहकर भी हमारी सारी जरूरतें पूरी करते थे। उस समय हम राजा हुआ करते थे। अपनी बालहठ 'येन केन प्रकारेण' अर्थात् किसी भी तरह मनवा लेते थे।
            जीवन इसी तरह चलता रहता है। एक पड़ाव को पार करके उसमें लौटना किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं होता। अपने आने वाले अगले पड़ाव को हम आशा भरी नजरों से देखते हैं। एक को खोने का गम व दूसरे को पाने का आनन्द भी स्थायी नहीं रह पाता। जीवन की जिस भी अवस्था में हम जी रहे हैं, उसमें ईश्वर का धन्यवाद करते हुए आगे बढ़ते रहें तो फिर आनन्द-ही-आनन्द होता है। यही मानव जीवन का सार है जिसे समझकर उदासीनता से मुक्त हुआ जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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