शनिवार, 28 जून 2025

ईश्वर की उपासना सच्चे मन से

ईश्वर की उपासना सच्चे मन से

ईश्वर को हम सभी लोग अपने-अपने तरीके से स्मरण करते हैं और उसे पाने का प्रयास करते हैं। इसके लिए कुछ लोग कर्मकाण्ड करते हैं, कुछ लोग पूजा-पाठ करते हैं, कुछ लोग जप-तप करते हैं और कुछ लोग व्रत आदि के द्वारा प्रभु को पाने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हम अपनी भक्ति में सफल हो पाते हैं या नहीं, इस विषय में हम नहीं जानते। केवल वह मालिक ही इस सत्य को जानता है कि उसे हमारी आराधना में सच्चाई दिखाई देती है या मात्र प्रदर्शन ही दिखता है।
             ईश्वर की उपासना यदि ईमानदारी व सच्चे मन से की जाए तभी वह उसे भाती है। प्राणीमात्र के प्रति मन में सद् भावना न हो तो मनुष्य उस प्रभु का प्रिय नहीं बन सकता। हम अपने बच्चों और अपने बन्धु-बान्धवों से बहुत प्यार करते हैं। सदा उनके सुख-दुख में हर्ष और शोक का अनुभव करते हैं। उसी प्रकार वह मालिक चाहता है कि उसकी बनाई हुई इस सृष्टि के समस्त जीवों से भी हम लोग बिना किसी भेदभाव के अपने मन की गहराई से प्यार करें जैसा स्नेह वह हम सबके प्रति रखता है।
             हम में से बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो अपने आपको ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त मानते हैं। बाकी सबको अपने समक्ष तुच्छ समझते हैं। चाहे वे स्वयं प्रभु भक्ति का प्रदर्शन ही क्यों न कर रहे हों। वे यह दावा करते हैं कि वे ईश्वर के बहुत पास हैं या यूँ कहें कि वे स्वयं को ही ईश्वर मानते हैं। दूसरों पर अत्याचार करके, उन्हें हिकारत की नजर से देखकर अपने अहं को तुष्ट करते हैं। जबकि ईश्वर को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वह हमसे प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखने के लिए कहता है। परमात्मा स्वयं भी दीन-दुखियों की सहायता करता है। इसलिए हम ईश्वर को दीनबन्धु कहते हैं।
              एक ऐसी ही कथा सुनी थी। नारद जी को बड़ा अभिमान था कि वे प्रभु श्री हरि विष्णु के सबसे बड़े भक्त हैं। ऐसा माना जाता है कि नारद मुनि जी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण करते रहते हैं।एक बार नारद जी भगवान विष्णु जी के पास गए और कहा, "हे भगवन! मुझसे बड़ा आपका कोई अन्य भक्त संसार में नहीं है।"
             प्रभु ने उन्हें यह कहकर निराश किया, "वे उनके सबसे बड़े भक्त नहीं बल्कि उनसे भी बड़ा भक्त कोई और है।" 
             नारद जी के पूछने पर प्रभु ने कहा, "एक किसान है जो किसी गॉंव में रहता है। वह मेरा सबसे बड़ा भक्त हैं।"
            यह सुनकर नारद जी को अच्छा नहीं लगा, वे बहुत परेशान हो गए। नारद जी उसी समय उस परम भक्त से मिलने के लिए चले गए। वे जब उस किसान से मिले तो आश्चर्यचकित रह गए, 'वह किसान दिन में सिर्फ तीन बार प्रभु को याद करता है। एक बार प्रातः खेत में जाते समय, दूसरा दिन में खाना खाते समय और तीसरी बार जब वह वापिस घर आता है।'
               नारद जी को यह सब समझ नहीं आया।  वे प्रभु के पास गए और पूछा, "भगवन! दिन में केवल तीन बार आपको याद करने वाला किसान मुझसे आपका बड़ा भक्त कैसे हो गया?"
               श्री हरि मुस्कुराए और तेल से भरा हुआ एक पात्र नारद जी को देते हुए बोले, "नारद! जाओ पृथ्वी का एक चक्कर लगाकर आओ। पर यह याद रखना कि तेल की एक भी बूँद धरती पर गिरनी नहीं चाहिए।"
              नारद जी भ्रमण करके, प्रभु का कार्य सम्पन्न करके वापिस लौट आए। प्रभु से प्रशंसा पाने की कामना से कार्य पूर्ण के करने की चर्चा करने लगे। तब प्रभु ने उनसे पूछा, "इस कार्य को करते समय मुझे कितनी बार मुझे याद किया?" 
              नारद जी ने इन्कार में सिर हिला दिया और कहा, "प्रभु! आपका आदेश था कि तेल पात्र से गिरना नहीं  चाहिए। मैं आपका काम कर रहा था। बस इसी में ध्यान लगा रहा। आपके नाम का स्मरण नहीं किया।"
            तब प्रभु ने नारद जी को समझाया, "जो व्यक्ति मुझे सच्चे मन से याद करता है और अपने कर्तव्य को करते हुए समय मेरा स्मरण करता है, वही मेरा प्रिय भक्त कहलाता है। 
            इस दृष्टान्त से समझने वाली मुख्य बात यह है कि ईश्वर मनुष्य की भावना को देखता है। वह दिखावे या रिश्वत वाली भावना को पसन्द नहीं करता। वह सदा हमारे अपने मन में विद्ममान रहता है। जब चाहे अपने मन में झॉंककर उसे प्राप्त कर लो। ईश्वर को निश्छल, ईर्ष्या-द्वेष से रहित, सच्चे व ईमानदार लोग पसन्द आते हैं। इसलिए हम अपने अन्तस में जितना अधिक सद् गुणों का विस्तार करेंगे उतना ही ईश्वर के समीप जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

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