रविवार, 29 जून 2025

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना

स्वर्ग और नरक की परिकल्पना प्रायः सभी धर्मो में मिलती है। इसके विषय में बहुत कुछ कहा व सुना जाता है। स्वर्ग व नरक के विषय में यदि विचार किया जाए तो मन इसके विपरीत सोचता है। माना यही जाता है कि बुरे कर्म करने वालों को नरक मिलता है जहाँ बदबू होती है, कड़ाहों में तेल उबलता रहता है जिसमें दुष्कर्म करने वालों को डाला जाता है आदि। कहने का तात्पर्य है कि वहाँ जीव को तरह-तरह की प्रताड़ना मिलती है। इसके विपरीत स्वर्ग है, वहाँ भोग विलास के सभी साधन हैं। वहॉं अपसराएँ हैं, हरियाली है आदि। यानी कि सद् कर्म करने वालों को स्वर्ग मिलता है।‌ वहॉं सभी प्रकार के ऐशो आराम मिलते हैं।
               कहते हैं कि ईश्वर का परमधाम एक स्थान विशेष है जिसे प्राप्त करके मनुष्य जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। वहॉं पर विद्यमान चित्रगुप्त सभी प्राणियों के लेखेजोखे का हिसाब रखने के लिए खाता रखते हैं। मृत्यु के पश्चात जब मृतक ऊपर जाता है तो उसे जीवन में किए गए कर्मों को पढ़कर सुनाया जाता है। तदनुसार उसे स्वर्ग या नरक उपहारस्वरूप या सजा के रूप में दिया जाता है। मृत्यु के देवता यमराज जीव के शरीर में विद्यमान आत्मा को ले जाने के लिए अपने दूतों यानी यमदूतों को भेजते हैं।
            अब यह विचारणीय है कि हमारे शरीर में रहने वाली आत्मा, अजर, अमर व नित्य है और इस पर किसी की स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान श्रीकृष्ण ने इस विषय में हमें समझाते हुए कहा है-
            न जायते म्रियते वा कदाचन 
            नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
            अजो नित्यं शाश्वतोsयं पुराणो 
               न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थात् आत्मा का कभी न जन्म होता है और न मृत्यु ही होती है। ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा। आत्मा अजर, नित्य, शाश्वत व प्राचीन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।
'श्रीमद्भगवद्गीता' का यह श्लोक भी देखिए जिसमें आत्मा की अमरता‌ के विषय में कहा है -
       नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
       न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥
अर्थात् यह श्लोक हमें समझा रहा है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते है, न इसे आग्नि जला सकती है। जल इस आत्मा को गीला नहीं कर सकता और हवा इसे‌ सुखा नहीं सकती।
             अब प्रश्न यह उठता है कि सभी सुख-दुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण आदि स्थितियाँ अथवा भोग इस शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। तो फिर स्वर्ग अथवा नरक में दण्ड किसे मिलता है और किसे सारी सुख-सुविधाएँ मिलती हैं?
             इस भौतिक शरीर को मृत्यु के पश्चात तो अपने-अपने धर्म के अनुसार जला दिया जाता है या दफना दिया जाता है। इसका सीधा-सा यही अर्थ है कि इस शरीर का सम्बन्ध इसी पृथ्वी पर ही समाप्त हो गया है। फिर इस शरीर को सजा या पुरस्कार नहीं मिल सकता। आत्मा को तो हमारे ग्रन्थ इन भोगों से परे  मानते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा भी इस सजा या पुरस्कार की अधिकारी नहीं है। हमारे मनन करने का विषय यह है कि अनश्वर आत्मा और नश्वर शरीर जब दोनों ही स्वर्ग और नरक के सुख-दुख के अधिकारी नहीं हैं तो फिर और कौन है?
              हमारी तर्क बुद्धि यही कहती है कि स्वर्ग व नरक किसी विशेष निश्चित स्थान पर नहीं हैं। वे दोनों इसी धरा पर ही हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं तो जब हम सुख-सुविधाओं से सम्पन्न होते हैं, अपने बन्धु-बान्धवों के साथ हर प्रकार से सुखी और समृद्ध जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं तो हम स्वर्ग में रहते हैं या स्वर्ग के समान सुख भोग रहे होते हैं।  उसकी सुगन्ध चारों ओर फैलती है।
               इसके विपरीत हम दुखों-परेशानियों में भी घिर जाते हैं। उस समय हम सबसे अलग-थलग रहकर कष्टों का सामना करते हैं। उस समय मानो हम नरक तुल्य जीवन जीते हैं। वह समय हमारे लिए बहुत ही कष्टकारी होता है। उस समय ऐसा लगता है कि हमारा साया भी साथ छोड़कर चला गया है। तब सभी बन्धु-बान्धव भी हमसे किनारा कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं सहायता न करनी पड़ जाए। उस समय हम नरक तुल्य कष्ट भोग रहे होते हैं।
              हम कह सकते हैं कि स्वर्ग व नरक दोनों किसी आसमान पर विद्यमान नहीं हैं। बल्कि इसी धरती पर हैं। हम अपने इस जीवनकाल में पूर्वजन्म कृत सभी शुभाशुभ कर्मों को भोगते हैं। इसे ही हम स्वर्ग और नरक का भोगना कहते हैं। स्वर्ग और नरक के इन सुखों और दुखों को हमें निश्चित ही भोगना पड़ता है। इसका विचार करके अपने कर्मों की ओर ध्यान देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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