मंगलवार, 1 जुलाई 2025

खानपान का बहुत प्रभाव

खानपान का बहुत प्रभाव

हमारे आचरण पर हमारे खानपान का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है। सुनने में शायद अटपटा-सा लग रहा है परन्तु यही सत्य है। आजकल बहुत से लोग इस बात को दकियानूसी कहकर मजाक में उड़ा देते हैं। परन्तु सच्चाई यही है कि अन्न का जीवन में बहुत महत्त्व होता है। इस अन्न से हमारा शरीर पुष्ट होता है और हम स्वस्थ रहते हैं। जो लोग पौष्टिक आहार लेते हैं, उनके चेहरे पर ओज होता है। उनमें कार्य करने की स्फूर्ति रहती है। उन्हें अपेक्षाकृत थकावट कम होती है।
            दूसरी ओर जिन लोगों को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पाता, कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। उनका चेहरा निस्तेज होता है। वे शीघ्र ही थकान का अनुभव करते हैं। इसलिए खानपान का हमें बहुत ध्यान रखना चाहिए। इस विषय पर हम सबको गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। खानपान के विषय में हमारे बड़े-बजुर्ग हमें समझाते हुए कहते हैं- 
          जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन
अर्थात् जैसी कमाई का अन्न घर में आएगा वैसा ही परिवार जनों का आचरण भी हो जाएगा।
             इसी बात की पुष्टि 'छान्दोग्योपनिषद' का यह मन्त्र करता है। इस मन्त्र में ऋषि कहते हैं -
       आहारशुद्धौ सत्तवशुद्धि: ध्रुवा स्मृति:।
         स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:॥
अर्थात् आहार शुद्ध होने से हमारा अन्त:करण शुद्ध होता है। इससे ईश्वर में स्मृति दृढ़ होती है। स्मृति प्राप्त हो जाने से हृदय की अविद्या जनित सभी गाँठे खुल जाती हैं।
            तामसिक और राजसिक भोजन करने से स्वास्थ्य की हानि होती है जिसका मानसिक प्रभाव होता है। मनुष्य का स्वास्थ्य रहना बहुत आवश्यक होता है। मन में तमोगुण बढ़ता है अर्थात् मनुष्य पर कुविचार हावी होते हैं जिसका परिणाम हम अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार, तेजाब फैंकना, पारिवारिक विघटन आदि बुराइयों के रूप में देखते हैं। मन में अवसाद बना रहता है व सद् कार्यों में मन नहीं लगता। हमारा मन इन्द्रियों के वश में होकर भटकता रहता है।
              यदि हम स्वास्थ्य के नियमों के अनुसार मौसम के अनुकूल भोजन करेंगे तो शरीर स्वस्थ रहेगा अन्यथा रोगी हो जाएगा। तब हमें बहुत कष्ट का सामना करना पड़ेगा। हम स्वयं तो परेशान होंगे ही, साथ ही अपने परिजनों को भी कष्ट में डाल देते हैं। अपनी मेहनत की कमाई डाक्टरों के हवाले करनी पड़ेगी। रोगी व्यक्ति स्वयं अपने को संभाल नहीं पाता तो घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण कैसे कर सकेगा? यह कष्ट उसे और अधिक पीड़ित करता है। 
              महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' नामक महाकाव्य में इस पर प्रकाश डाला है- 
              शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
अर्थात् शरीर स्वस्थ होगा तभी मनुष्य अपने धर्म का पालन करेगा और अपने दायित्वों को पूर्ण कर सकेगा।
             यदि हम कहें कि शरीर और मन दोनों की सृष्टि अन्न से ही होती है तो यह कथन अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनि सात्विक आहार पर बल देते थे। अन्न से शरीर पुष्ट होता है व मन में सद् विचारों की अधिकता होती है। हम लोग खाने के लिए जीते हैं जबकि खाना जीने के लिए होना चाहिए। आजकल घर का शुद्ध खाना खाने के बजाय जंक फूड का प्रचलन बढ़ता जा रहा जो स्वास्थ्य की हानि कर रहा है। जानते-समझते हुए हम इसके गुलाम होते जा रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे आजकल बीपी, शूगर, मोटापा, दिल की बिमारी, कमजोर नजर और न जाने किन-किन बिमारियों के शिकार हो रहे हैं।
             विचारणीय है कि जिन परिवारी जनों के लिए मनुष्य पाप-पुण्य, छल-फरेब, झूठ- सच सब करता है, उसका पुण्य बटोरने के लिए तो सब तैयार हो जाते हैं पर उसके पाप का हिस्सा बाँटने वाला उसके अतिरिक्त और कोई नहीं होगा। तो फिर यह अत्याचार और अनाचार से धन किसलिए कमाना? क्यों किसी व्यक्ति का गला काटना या उसका दिल दुखाना? मेरे कहने से इस विषय पर विचार अवश्य करना। तब शायद मेरी बात का तात्पर्य आप लोग समझ सकें।
             वास्तव में सच्चाई व ईमानदारी की कमाई में जो बरकत होती है, उसका कोई मुकाबला नहीं हो सकता। इसी कमाई से घर-परिवार व स्वयं मनुष्य सुखी रहता है। उसकी सन्तान भी योग्य, आज्ञाकारी व संस्कारी होती है। हो सकता है वह दुनिया की नजर में लूजर हो पर उसका कोई भी ऐसा कार्य नहीं जो सीमित साधन होने पर भी पूरा न हो सके। ईश्वर ऐसे व्यक्ति का खास ख्याल रखता है व उसे कभी निराश नहीं होने देता। फिर हमें भी ईश्वर के अनुसार चलना चाहिए।
              मनीषी मानते हैं कि हमारे शरीर में सभी देवी-देवताओं का निवास होता है। तामसिक भोजन का अंश उनको मिलता है तो वे कमजोर हो जाते हैं और सात्विक भोजन से वे पुष्ट होते हैं। अपने घर-परिवार को संस्कारी बनाने के लिए, उन्हें सात्विक अन्न खिलाएँ जो तन और मन दोनों के लिए आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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