शुक्रवार, 27 जून 2025

द्वन्द्व सहन करना

द्वन्द्व सहन करना

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में द्वन्द्व सहन करने पर बल दिया है। समझने वाली बात है कि यह द्वन्द्व किस चिड़िया का नाम है? द्वन्द्व का अर्थ है विरूद्ध स्वभाव वाली स्थितियों को सहन करना। हम इनका विषलेषण इस प्रकार कर सकते हैं- सुख-दुख, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान, सफलता-असफलता आदि विरोधाभासी स्थितियों का सामना करना। इसी प्रकार सर्दी-गर्मी, दिन-रात, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि प्राकृतिक द्वन्द्वों को भी नित्य प्रति सहन करना पड़ता है।
              ये सभी स्थितियाँ हमारे जीवन में अपने क्रम से आती हैं। संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध महाकवि कालिदास ने 'कुमासम्भवम्' में इस श्लोक के माध्यम से हमें बताया है -
     कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा।    
     नीचैर्गच्छत्युपरिच दशा चक्रनेमिक्रमेण​।। 
अर्थात् किसी को सदा सुख नहीं मिलता और उसी प्रकार सदा दुख भी नहीं मिलता। जिस प्रकार पहिए के चलने पर उसमें में लगे हुए अरे(तीलियाँ) ऊपर और नीचे होती रहती हैं, उसी प्रकार ही हमारे जीवन में सुख और दुख की स्थिति होती है। 
            ये स्थितियाँ हमारे जीवन में निरन्तर आती रहती हैं। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। कभी सुख-समृद्धि के हिण्डोले में झूलते हुए हम जीवन का आनन्द लेते हैं और कभी दुख-परेशानियों में घिर कर व्यथित होते हैं। जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब हम उन्नति की पराकाष्ठा को छूते हैं और फिर दूसरे ही पल ऐसी पटखनी खाते हैं कि जमीन में लग जाते हैं।
              'श्रीमद्भगवद्गीता' में हमें भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में समझाया है कि ये सारे द्वन्द्व मानव जीवन में बारी-बारी से आते हैं। कभी हमें सुख मिलता है कभी दुख। कभी हम उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं तो कभी कठोर श्रम करने पर भी अवनति के गर्त में गिरते हैं। जब कभी हमारा यश चारों ओर फैलता है तब हम आसमान में उड़ने लगते हैं। हम अपने झूठे अहंकार में डूबकर अपने चारों ओर एक अभेद्य-सी दीवार खड़ी कर लेते हैं। तब हम हर किसी को कीट-पतंगों की भाँति समझने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि ऐसा करने से हम निश्चित ही अपयश के भागीदार बनेंगे। इस स्थिति से हम लोगों को यथासम्भव बचना चाहिए।
        काम-धन्धे में कभी-कभी हमें आशा से बढ़कर लाभ मिलता है तो कभी सावधान रहते हुए भी किसी कारणवश अचानक हानि उठानी पड़ जाती है। इस स्थिति के लिए हम तैयार भी नहीं होते परन्तु फिर भी हमें यह कष्ट झेलना पड़ता है।  बदलते हुए मौसम में सर्दी-गर्मी आदि ऋतुओं को झेलना मनुष्य की मजबूरी बन जाती है। दिन-रात, प्रतिदिन ये अपना सन्देश हमें देते रहते हैं। अतिवृष्टि-अनावृष्टि, ऑंधी-तूफान आदि प्राकृतिक द्वन्द्वों को भी सहन करना पड़ता है। ये सब भी समयानुसार ईश्वर की इच्छा से इस सृष्टि पर मानव जीवन में आते रहते हैं। इनसे बच पाना सम्भव नहीं होता बल्कि सामना करना पड़ता है।
             निष्कर्षत: हम अपने जीवन में इसी प्रकार इन सभी द्वन्दों को सहन करते हैं। ये सभी स्थितियाँ हर मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों के अनुसार अवश्यमेव आती हैं। इनका सामना करना हमारी विवशता है क्योंकि हमारे पास और कोई चारा नहीं है। इसलिए इनका सामना हर स्थिति में सम होकर अर्थात् एक समान रह कर करना चाहिए। जब इन्हें जीवन का एक हिस्सा मान लेंगे तब हमें अधिक कष्ट नहीं होगा। उस समय ये सब सामान्य जीवन का अंग प्रतीत होगा।
              ईश्वर की शरण में जाने से और उसकी उपासना करने से ही इन द्वन्द्वों को सहन करने की शक्ति मिलती है। उसी से अपनी रक्षा करने के लिए गुहार लगानी चाहिए। उसी का स्मरण करने से ही सच्चा सुख और शान्ति प्राप्त होती है। इसलिए उसकी शरण में जाना ही एकमात्र विकल्प हमारे पास बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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