शनिवार, 31 जनवरी 2026

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह है। इसमें हमें बिना रुके लगातार ऊपर की ओर बढ़ते रहना चाहिए। यह यात्रा धैर्य, कड़ी मेहनत, सकारात्मकता और समर्पण के साथ हर कदम पर नए मुकाम हासिल करने का नाम है जो हमें सफलता और ऊॅंचाइयों तक ले जाती है। ऊपर जाओ तो सफलता की बुलन्दियों को छू लो और यदि नीचे उतरने पर आएँ तो गिरावट का कोई अन्त नहीं। इनके अतिरिक्त यदि घुमावदार सीढ़ियों में उलझ गए तो फिर मनुष्य को चक्करघिन्नी की तरह गोल-गोल घूमते रह जाना पड़ता है। 
             जितना हम जीवन में पढ़-लिखकर योग्य बनते हैं उतनी ही उन्नति करते जाते हैं और फिर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं। तब धीरे-धीरे हम हर प्रकार की सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं। जब वह अपने लक्ष्य तक पहुँचता है और ऊपर की सीढ़ी पर खड़ा होकर नीचे की ओर देखता है तब उसे सब बौने दिखाई देते हैं। उस समय उसे अपने साथ कोई भी खड़ा नहीं दिखता। वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। इसका अर्थ यही है कि जितना मनुष्य ऊँचाइयों को छूता है उतना ही उसके पास समयाभाव हो जाता है। अपने कार्यालयीन दायित्वों को निपटाने में दिन-रात व्यस्त रहता है। चाहकर भी अपने पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को वाँच्छित समय नहीं दे पाने के कारण वह बिल्कुल अकेला रह जाता है। 
          इस समय अपने उच्च पद के कारण मनुष्य को अहंकार से बचना चाहिए बल्कि उससे दूर रहना चाहिए तभी तो उसकी महानता तभी बनी रह सकती है। यदि वह चाटुकारों के मध्य घिरकर घमण्डी हो जाए तो उसका पतन निश्चित होता है।
          सीढ़ियों से नीचे उतरने पर मनुष्य नीचे आ जाता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने जीवन में नीचे की ओर जाने लगे तो वह कहाँ तक पतन के रास्ते पर चलता जाएगा, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह अधोपतन अन्तत: मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है जो उसे सबसे दूर कर देता है। उसके अपने ही घर-परिवार के लोग उसे एक कलंक की तरह देखते हैं जो उनके सपनों और आशाओं को चूर-चूर कर रहा है। तब वह सभ्य समाज पर बोझ की तरह हो जाता है।
            सभी लोग उसको हिकारत की नजर से देखते हैं। उससे मित्रता करना आम इन्सान पसन्द नहीं करता। सभी उससे दूर जाने की सोचते हैं और मौका मिलने पर अपमानित करने से नहीं चूकते। ऐसा व्यक्ति समाज विरोधी कार्य करता हुआ न्याय व्यवस्था का अपराधी बनकर इधर-उधर छुपता फिरता है। उसका दिन-रात का चैन नष्ट हो जाता है। अपने बन्धु-बान्धव ही उससे किनारा कर लेते हैं और वह अकेलेपन का दंश भोगने के लिए विवश हो जाता है।
          घुमावदार सीढ़ियों पर गोल-गोल घुमते हुए भी हम लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इसी प्रकार जीवन में भी यदि मनुष्य स्थिर बुद्धि न हो तो वह यहाँ-वहाँ भटकता रहता है। कभी सज्जनों के सगति में उन्नति करता है। यदि दुर्भाग्यवश दुर्जनों की संगति में फंस जाए तो पिछड़ जाता है।
           जीवन में अनावश्यक घूमते हुए वह अपना अमूल्य समय बरबाद कर देता है पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता। ऐसा व्यक्ति जीवन की बाजी हारने लगते है। उसे कदम-कदम पर निराशा का सामना करना पड़ता है। अपने ढुलमुल रवैये के कारण वह चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पाता बल्कि फिसलकर पीछे चला जाता है जो निश्चय ही उसकी निराशा का कारण बन जाता है। आगे चलकर ही ऐसा व्यक्ति सोचने की अधिकता के कारण मानसिक रोगों  का शिकार बन जाता है। 
            पुरुषार्थ यानी सीढ़ियॉं हमेशा साथ देती है जबकि भाग्य यानी लिफ्ट कभी भी बन्द हो सकती है। इसलिए सदा कर्म पर भरोसा करना श्रेयस्कर होता है। सीढ़ियों की तरह यदि हम एक कदम छोड़कर आगे बढ़ेंगे तो गिरने का डर रहेगा। इसलिए जीवन में क्रमिक उन्नति यानी एजुकेशन, करियर और लक्ष्य निर्धारण आवश्यक है। सफलता एक जटिल पहेली है जिसमें पुरुषार्थ और भाग्य दोनों का योगदान होता है।
            जहाँ तक हो सके अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। फिर उसके अनुसार परिश्रम करके उसे पाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सफलता शत-प्रतिशत मिलेगी। कभी-कभी मनुष्य को असफलता का मुँह भी देखना पड़ेगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि निराश होकर बैठा जाए। पुन: पुन: प्रयास करने पर ईश्वर अवश्य फल देता है।
         सफलता के लिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। परिश्रम हमें तैयार करता है और हमारे लिए अवसर उत्पन्न करता है। दूसरी ओर भाग्य हमें अप्रत्याशित लाभ प्रदान कर सकता है। यद्यपि केवल भाग्य पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ ही हम अपनी सफलता की सम्भावनाओं को बढ़ा सकते हैं। सीढ़ियों की तरह जीवन को ऊँचाई की ओर ले जाने का प्रयास करना हितकर होता है। इसके साथ ही यह भी याद रखना आवश्यक है कि यही सीढ़ियाँ ऊपर ले जाती हैं, नीचे भी लाती हैं और गोल-गोल भटकाती भी हैं। इसलिए अपनी उन्नति चाहने वाले मनुष्य के लिए सचेत रहना बहुत जरूरी है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

विशाल संसार सागर

विशाल संसार सागर

संसार रूपी सागर या भवसागर एक रूपक मात्र है। जीवन की तुलना एक अथाह, अशान्त समुद्र से की जाती है। संसार को सागर के समान कहा गया है क्योंकि यह अनन्त और वह पार करने में कठिन होता है, जैसे समुद्र होता है। इस संसार रूपी समुद्र में अच्छाई अमृत है तो बुराई जहर है। जो अच्छाई और बुराई को समाज के हित के लिए जो पीता है, उसे भगवान शिव कहते हैं। भगवान भोलेनाथ ने हमेशा इस सृष्टि का कल्याण चाहा है। इस सागर में मोह-माया, कर्मों और दुखों का गहरा पानी भरा हुआ है। 
            इस विशाल भवसागर को पार करने के लिए सत्संग, भक्ति और ज्ञान को एक नौका के समान माना जाता है जो जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति दिलाती है। धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से इस सागर को पार करने के लिए ईश्वर की भक्ति, ज्ञान या सत्संग को एक दृढ़ नौका अथवा पुल के रूप में वर्णित किया गया है। भवसागर से पार होने का अर्थ है सांसारिक मोह और दुखों से मुक्त होना। इस विशाल संसार सागर में हमारी छोटी-सी जीवन नैया हिचकोले खाती चलती है। यह हमारी अपनी जीवन रूपी नौका है तब इसके नाविक भी हमीं हैं। इसे सम्हालकर पार लगना हमारा कर्त्तव्य है।
           इतने विशाल समुद्र में एक छोटी-सी नाव के सहारे उसे पर करना बहुत ही कठिन हो जाता है । उसमें उठने वाली लहरों से नाव हिचकोले खाने लगती है। कभी-कभी बड़े-बड़े जहाजों से टकराकर इसके चूर-चूर होने का खतरा बन जाता है। यदा कदा यह डूबने-उतरने भी लगती है। इसी प्रकार इसे विशालकाय समुद्री जीवों का भी डर रहता है कि कहीं वे आक्रमण करके उसकी नाव को डूबो कर नाविक को खा न जाएँ। यह भी सम्भव है कि वह वहीं-कहीं उलझकर गायब हो जाए।
            इसी प्रकार यह संसार भी जीवों का सागर है। यहाँ पर फूँक-फूँककर हर कदम रखना पड़ता है। जरा-सी चूक हुई कि सब समाप्त हो जाता है। यहाँ मनुष्य सुखों और दुखों की लहरों पर सदा डूबता-तरता रहता है। कभी वह नीचे डूबता हुआ पटखनी खाता है तो फिर कभी ऊपर तरता हुआ सफलता के सोपानों को छू लेता है।
          ‌ जीवन के ये उतार-चढ़ाव उसे चाहे-अनचाहे भोगने पड़ते हैं। इन सब थपेड़ों को सहना उसकी नियति है। या यूँ कह सकते हैं कि उसकी मजबूरी है। अपने पूर्वजन्म कृत सुकर्मो अथवा कुकर्मों को भोगकर ही वह इस ससार के बन्धनों से मुक्त हो सकता है। उन्हीं के अनुसार ही उसे जीव योनि प्राप्त होती है।
          संसार में रहते हुए उसे सज्जनों का संसर्ग मिलता रहता है जो उसकी सर्वविध उन्नति करने में सहायक बनते हैं। फिर कभी दुर्जनों का साथ मिल जाता है जिनकी संगति उसके विनाश का कारण बनती है। मनुष्य स्वतन्त्र है जहाँ चाहे वह जा सकता  है। अब यह मनुष्य के स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किस ओर जाना पसन्द करता है। वह अपना उत्थान चाहता है या पतन की राह पर चलना चाहता है।
           इस जगत में कदम-कदम पर विशालकाय मगरमच्छ रूपी मनुष्य भी हमें राह चलते मिल जाते हैं। जिनसे बचना बहुत कठिन होता है। समझदार मनुष्य कोई-न-कोई उपाय करके उनसे पार पा ही लेते हैं और दूसरे लोग उनके जाल में फंसकर छटपटाते रहते हैं। ऐसे हिंसक प्रकृति के लोगों से जितनी भी दूरी बनाकर रखी जाए उतना ही लाभदायक होता है। यत्न यही होना चाहिए कि हमारा फायदा कोई करे या न करे पर वह हमारा नुकसान न कर पाए।
            यह भौतिक जगत मनुष्य को पाप कर्मों के दलदल में बरबस खींचता है। उससे निकल पाना बहुतही कठिन होता है। इसलिए मनीषी इस दलदल में न फंसने की चेतावनी देते हैं। इस दुनिया में मोह माया भी हमें बराबर पीछे की ओर धकेलते हैं। इनको पीछे ठेलते हुए अपनी जीवन नैया को बचाकर दूसरे किनारे पर लेकर जाना है। यह कोई कठिन ऐसा कार्य नहीं है बस हमारी इच्छाशक्ति दृढ़ होनी चाहिए। तभी हम अपना बचाव करने में समर्थ हो सकते हैं अन्यथा यही सच है कि तब हमारी रक्षा कोई भी नहीं कर सकेगा।
              हमारी यह छोटी-सी जीवन नैया इस महासमुद्र में हिचकोले न खाए इसलिए उसे बाधारहित इस भवसागर से पार ले जाने के लिए हमें सत्कर्मों को करने की महती आवश्यकता है। ईश्वर का दामन थामकर, उस मालिक पर पूर्ण विश्वास करके और स्वयं को समर्पण भाव से उसे सौंपकर ही हम इस वैतरणी को पार कर सकते हैं। अन्यथा हम यहाँ हिचकोले खाते रहेंगे और अन्य लोग हमारा तमाशा देखते रहेंगे। इस संसार सागर में हमें डूबाने में लोग जरा-सी भी कसर नहीं छोड़ना चाहते।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

वैराग्य की पराकाष्ठा

वैराग्य की पराकाष्ठा

वैराग्य की पराकाष्ठा मनुष्य का अपने शरीर तक से मोहभंग करवा देती है। वह इस असार संसार के साथ-साथ स्वयं अपने को भी विस्मृत कर देना चाहता है। इसीलिए वह कह बैठता है-
  क्या तन मांजता रे आखिर माटी में मिल जाना।
अर्थात् इस शरीर को माँजने का क्या लाभ? यानी इस शरीर को सजाना-संवारना व्यर्थ है। इसका कारण है कि अन्त में तो इसने मिट्टी में ही मिल जाना होता है। फिर इसकी देखभाल करके  समय क्यों व्यर्थ गॅंवाना?
             ऐसे विचार रखने वालों की इस धरा के किसी भी कार्य-कलाप में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वे सभी कार्यों को करते समय निर्लिप्त रहते हैं। परन्तु कभी-कभी कुछ लोग इन सांसारिक दायित्वों से किनारा भी कर लेते हैं। इस विचारधारा को हम पलायनवादी प्रवृत्ति कह सकते हैं। भौतिक संसार के सभी रिश्ते-नातों से स्वयं को दूर करते हुए मनुष्य ईश्वर के समीप होने लगता है। दिन-रात वह प्रभु का नाम जपने में स्वयं को व्यस्त रखने की कामना करता हैं। 
            यह शरीर हमें ईश्वर ने एक साधन के रूप में दिया है। जिसके माध्यम से हम इस संसार में अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण कर सकें। यदि हम इसकी सार-सम्हाल नहीं करेंगे तो यह रोगी बन जाएगा। तब न हम ईश्वर की भक्ति कर सकेंगे और न ही हम सांसारिक दायित्व पूरे कर पाएँगे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं- '
          दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम
हमारी यही स्थिति हो जाएगी। हम न तो इहलोक संवार सकेंगे और न ही परलोक को‌ सुधार सकेंगे। यह तो स्थिति बहुत विकट हो जाएगी।
            यदि घर में हम वाहन रखते है तो हमें समय-समय पर उसका परीक्षण करवाना पड़ता है, उसमें ईंधन डलवाना होता है, नित्य प्रतिदिन उसकी साफ-सफाई रखनी आवश्यक होती है अन्यथा वह कबाड़ होकर हम पर बोझ बन जाता है। इसी प्रकार शरीर को यदि साफ-सुथरा न रखा जाए, इसे समय पर भोजन न दिया जाए तो यह भी अपने और अपनों पर रोगी होकर बोझ बन जाता है। उस समय सब परेशान हो जाते हैं। इस शरीर को स्वस्थ करने के धन और‌ समय की हानि होती है।
            इसलिए इसका स्वस्थ रहना बहुत ही आवश्यक है। इस शरीर को बेशक आप साध्य न माने पर यह ईश्वर तक जाने का साधन तो है ही। महाकवि कालिदास कने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा है -
          शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
हमारे सभी ऋषि-मुनि इस शरीर को साधन मानकर इसका पूरा ध्यान रखने का परामर्श देते हैं। हम यह कह सकते हैं कि व्यक्ति अपने सभी कर्तव्य चाहे वे धार्मिक हों या सांसारिक, तभी पूरे कर सकता है जब उसका शरीर स्वस्थ और नीरोग हो। एक बीमार या कमजोर शरीर से कोई भी कार्य ठीक से नहीं किया जा सकता। इसलिए शरीर का स्वास्थ्य सबसे बड़ी प्राथमिकता है। 
         यह सच है कि हमें केवल इस शरीर के लिए ही नहीं जीना चाहिए। मात्र इसी को सजाते-संवारते रहें और इसकी देखरेख के लिए ही पानी की तरह पैसा बहाते रहें। सारा-सारा दिन ब्यूटी पार्लर में जाकर सजते रहें अथवा नित नए बालों के स्टाइल बनवाते रहें। उस पर विभिन्न प्रकार के इत्र या परफ्यूम या डियो डालकर इसे नकली सुगन्ध से महकाते रहें। इस तरह इसको खूबसूरत दिखाने के चक्कर में हम दीन-दुनिया भूल जाएँ। घर-परिवार के दायित्वों से मुँह मोड़कर नित्य ही कलह-क्लेश करते रहें।
          इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि शारीरिक सौन्दर्य कुछ सीमित समय के लिए ही रहता है। जहाँ मनुष्य आयु को प्राप्त करने लगता है अर्थात् वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है, वहीं उसके चेहरे पर झुरियाँ आने लगती हैं। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार होने पर अथवा किसी रोग के आ जाने पर भी शरीर की सुन्दरता मुँह मोड़ने लगती है। 
          उस समय जिस शरीर की सुन्दरता पर हमें बड़ा मान था वह साथ निभाने से इन्कार कर देती है। तब हमारा यह सुन्दर शरीर सामान्य-सा रह जाता है। इसीलिए गुणीजन कहते है कि इस शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। हमारा यह सौन्दर्य स्थायी नहीं है। जब यह नहीं रहता तब हमें बहुत दुख होता है।
            अति वैराग्य की चर्चा को यदि हम छोड़ भी दें तो भी इस बात का विशेष ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यह शरीर ही सब कुछ नहीं है। इसके पीछे भागते रहने का कोई लाभ नहीं होता। इसके अन्दर रहने वाली उस आत्मा के विषय में भी हमें सोचना चाहिए। तभी हम सब अपने मानव होने के धर्म को सार्थक करके अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

पाप-पुण्य कर्मों का भुगतान

पाप-पुण्य कर्मों का भुगतान 

मनुष्य को स्वयं अकेले ही अपने सभी पाप-पुण्य कर्मों के लेखे-जोखे का भुगतान करना होता है। वहाँ कोई भी उसका साथी नहीं बनता। यहॉं यह विचार करना आवश्यक है कि आखिर ये पाप और पुण्य होते क्या हैं? इस गुत्थी को सुलझाना बहुत कठिन है। इस रहस्य पर बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उलझ जाते हैं तो फिर हम क्या चीज हैं? 
             मेरे विचार में पाप का अर्थ करते हुए हम कह सकते हैं कि पाप वह कर्म है जो स्वयं को या दूसरों को दुख दे। नैतिक रूप से गलत हो और आत्मा को अपवित्र करे जैसे झूठ, चोरी, हिंसा आदि। इसके विपरीत पुण्य वह कर्म है जो आत्मा को पवित्र करे, सुख दे और नैतिक व धार्मिक मूल्यों का पालन करे - जैसे दान, सेवा, सत्य बोलना जो इस लोक और परलोक में सुखदायी होता है। यानी जो कार्य करने से मन को शान्ति मिले और दूसरों का भला हो, वह पुण्य कर्म है और जो कार्य करने से मन अशान्त हो और दूसरों को कष्ट पहुँचे, वह पाप कर्म है। 
             भरी भीड़ में भी मनुष्य अपने आप को अकेला ही पाता है। गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर की निम्न पंक्ति सदा ही प्रेरणा देती है और मार्गदर्शन कराती है - 
               एकला चलो रे
यह पंक्ति हमें हमारा जीवन जीने के लिए महत्त्वपूर्ण सन्देश देती है कि अकेले चलने में घबराना नहीं चाहिए। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुनिया में अकेले वही चलते हैं जो साहसी होते हैं। जैसे शेर को जंगल में अकेले चलने के लिए किसी भी सहारे की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार मनुष्य को भी सहारों की बैसाखी नहीं तलाशनी चाहिए।
              मनुष्य इस ससार में जब जन्म लेता है तो वह अकेला ही होता है। इसी प्रकार जब इस धरा से विदा लेता है तब भी अकेला होता है। न उसके साथ कोई आता है और न ही कोई जाता है। जब मृत्यु से जन्म की यात्रा मनुष्य एकाकी कर सकता है तो जन्म से मृत्यु तक की यात्रा अकेले करने में उसे कभी परेशानी होनी ही नहीं चाहिए। विचार कीजिए कि इस संसार में हम कब-कब अकेले होते हैं? यदि इसका हल हम कर लेते हैं तो फिर सारी समस्या ही हल हो जाती है।
              मनुष्य अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के फल स्वयं ही भोगता है। उसकी खुशी में तो सब शामिल हो सकते हैं पर उसके दुखों और परेशानियों को कोई नहीं बाँट सकता। यह सच है कि जो भी कष्ट उसके शरीर के होते हैं या उसके मन के अवसाद होते हैं उनमें चाहकर भी कोई भागीदारी नहीं कर सकता। उन सबको अकेले ही भोगता रहता है। अन्य सभी परिवारी जन, मित्र या बन्धु उससे सहानुभूति रख सकते हैं। उसके पास भी खड़े हो सकते हैं पर अपने भोगों का भुगतान तो अकेले ही करना पड़ता है।
        अपने पत्नी, बच्चों या अन्यों के लिए जो भी स्याह-सफेद वह करता है उसका जिम्मा केवल उसी का होता है किसी अन्य का नहीं। यहाँ मुझे महर्षि वाल्मीकि की घटना याद आ रही है। जंगल में राहगीरों को लूटने के उद्देश्य से रत्नानाकर डाकू ने ऋषियों को रोका। तब ऋषियों ने रत्नाकर को समझाया कि यह पाप कर्म छोड़ दो। जब वह नहीं माने तो उन्होंने कहा, "घर जाओ। जिनके लिए तुम यह पापकर्म करते हो उनसे पूछो कि वे इसमें तुम्हारे साथी होंगे।" 
           उन्होंने कहा, "मुझे मूर्ख समझ रखा है? मैं घर जाऊॅंगा तो तुम यहॉं से भाग जाओगे।"
          ऋषियों ने कहा, "तुम हमें बॉंधकर चले जाओ। फिर तो हम यहीं रहेंगे।"
          रत्नाकर को यह सुनकर विचित्र लगा उसने कहा, "वे मेरे अपने हैं और मेरा ही साथ देंगे।"
            ऋषियों के जोर देने पर घर जाकर उसने अपने माता, पिता, पत्नी और बच्चों से वही प्रश्न किया। उन सबका का यही एक उत्तर था, "परिवार के पालन-पोषण का दायित्व उसका है। वह पैसा कैसे कमाता है उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं। इसलिए वे सब उसके पापकर्म में भागीदार कदापि नहीं बनेंगे।" 
         वे भागते हुए ऋषियों के पास गए और उनके पैर पकड़ लिए। उनसे माफी मॉंगी। यहीं से महर्षि के जीवन का एक नया अध्याय आरम्भ हुआ और वे युगों-युगों तक गाई जाने वाली पवित्र रामकथा के रचयिता बने।
              मनुष्य के सुख और दुख के समय के अतिरिक्त उसके अकेलापन की पीड़ा भी उसकी अपनी होती है। जितना वह जीवन की ऊँचाइयों पर पहुँचता जाता है उतना ही अकेला होता जाता है। उसके सभी साथी एक-एक करके पीछे छूटते जाते हैं। वे हाथ बढ़ाकर तब उसे छू भी नहीं पाते।
          हमारे ऋषि-मुनि इसीलिए पुण्यकर्मों को करने और पापकर्पमों को त्यागने पर बल देते हैं ताकि जब उन कर्मों को भोगने का समय आए तो मनुष्य को रोना न पड़े। इस उक्ति को सदा स्मरण रखना चाहिए- 
        सुख के सब साथी दुख में न कोई।
अर्थात् सुख में लोग साथी बनने के लिए तैयार हो जाते हैं परन्तु दुख की स्थिति में कोई साथ नहीं निभाता। यानी दुख उसे अकेले ही झेलना पड़ता है। मनुष्य को अकेले ही अपने सारे कृत शुभाशुभ कर्मों को भोगना होता है। अत: शीघ्र जाग जाएँ तो बहुत ही अच्छा है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

बच्चे प्रातःकालीन सूर्य की तरह

बच्चे प्रात:कालीन सूर्य की तरह

बच्चे प्रात:कालीन सूर्य की तरह कोमल, ताजगी से भरपूर, मासूम और मनमोहक होते हैं। वे उस अवस्था में नव स्फूर्ति, नव जागृति, नव उल्लास आदि से भरे होते हैं। रात का स्याह अन्धेरा जो दुखों और कष्टों का प्रतीक हैं, उनसे मुक्त होकर मुस्कुराते हुए सूर्य पूर्व दिशा से उदित होता है। उसी प्रकार बच्चे अपने पूर्व जन्म के कर्मो को भोगकर, पुराने रोगी या वृद्ध शरीर को त्यागकर एक नए जीवन में प्रवेश करते हैं। जन्म से पूर्व बच्चा माता के गर्भ में यानी अन्धकार में रहता है और वहॉं से पोषण लेता है। उस अन्धकार से उसे तब मुक्ति मिलती है जब वह जन्म लेता है।
              बाल रवि की छवि सभी को बरबस आकर्षित करती है। प्रातः कालीन बाल रवि जब धरा पर अवतरित होता है, उस समय वह लालिमा लिए हुए होता है। लोग प्रातःकाल उठकर उसे अर्घ्य देकर अपने दिन का आरम्भ करते हैं। इस समय आकाश में उगता हुआ सूर्य सारी सृष्टि को दिन के आगमन का सन्देश देता है। सम्पूर्ण वातावरण में हलचल-सी मचने लगती है। सम्पूर्ण प्रकृति, मनुष्य, पशु और पक्षी आदि सभी अपने-अपने कार्यों में जुट जाते हैं।
             इसी प्रकार जब एक नन्हें शिशु का जन्म घर-परिवार में होता है तब सर्वत्र हर्ष एवं उल्लास का वातावरण होता है। घर में आने वाले सभी आगन्तुकों को मिठाइयाँ खिलाई जाती हैं और एक-दूसरे को बधाई दी जाती है। वह नन्हा शिशु माता-पिता का एक सपना होता है जिसके माध्यम से वे अपने सभी अधूरे स्वप्नों को पूरा करना चाहते हैं। उसे उनकी विरासत सम्हालने वाला 'घर का चिराग' कहा जाता है। वह नन्हा-सा मेहमान सबकी नजरों का केन्द्र होता है। उससे सभी परिवारी जनों को बहुत-सी आशाएँ जुड़ी होती है।  
            जैसे-जैसे सूर्य प्रात: से दोपहर तक का सफर तय करता है, उसका मासूम-सा बालरूप मानों कहीं खो जाता है। उस समय वह किसी दूसरे ही नवीन रूप में दिखाई देता है। तब वह युवा सूर्य प्रचण्ड और तेजस्वी बन जाता है। उसकी ऊष्मा और तेज से सम्पूर्ण सृष्टि प्रभावित होती है। उसका ओज समस्त भूमण्डल पर दिखाई देता है। उसके उस विलक्ष्ण तेज से सबकी आँखे चुँधियाने लगती हैं। अर्थात् कोई भी उस युवा सूर्य से आँख नहीं मिला सकता।
             बच्चा भी जब अपने बचपन से आगे युवावस्था की ओर बढ़ता है तब उसके सरलता, स्वाभाविकता, सहजता आदि गुण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और वह एक दूसरे ही नए इन्सान के रूप में बदलने लगता है। इस यौवनकाल में बच्चे के चेहरे पर अलग ही तरह का नूर होता है। उसका उत्साह देखते ही बनता है। वह उत्साह और उमंग से भरा हुआ होता है। वह हर कार्य को करने की क्षमता रखता है। किसी भी कठिनाई में डटकर खड़े रहने का हौंसला रखता है।
            इस समय वह अपने जीवन को एक नया रूप देने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। तब वह आत्मविश्वास से भरा हुआ होता है और उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज चमकता हुआ दिखाई देता है। उस समय वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार होता है। वह अपने जीवन को व्यवस्थित करके एक दिशा का चुनाव करता है।
             बाल रवि की तरह एक छोटा बच्चा सबको अपनी बालसुलभ चेष्टाओं से मोहित करता है। उसके भोलेपन से पूछे गए प्रश्न उसकी जिज्ञासा को प्रकट करते हैं। एक स्थान पर कितने ही बड़े लोग बैठे हों, वे सभी मिलकर भी वैसा खुशनुमा माहौल नहीं बना पाते जो एक बच्चा अपनी तोतली जुबान और मासूमियत से बनाता है। उसके चहकने से सब प्रसन्न होते है और उसके उदास हो जाने पर सब उसकी चिरौरी करते हैं और उसे मनाने का प्रयास करते हैं।
            बाल रवि की तरह अपने बच्चे को बच्चा ही रहने दीजिए। उसकी मासूमियत को उससे छीनकर अनावश्यक रूप से उसे बड़ा न बनाएँ। बड़ा होकर तो वह दुनिया के छल-प्रपंच देखा-देखी स्वयं ही सीख जाता है। जब तक वह भोला-भाला प्यारा-सा बच्चा है तभी तक वह राह चलतों को भी बरबस मोह लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 26 जनवरी 2026

सांसारिक रिश्ते निभाना बच्चों का खेल नहीं

सांसारिक रिश्ते निभाना बच्चों का खेल नहीं 

सांसारिक रिश्ते निभाना बच्चों का खेल कदापि नहीं है। यहाँ कदम-कदम पर अग्नि परीक्षा में खरा उतरना पड़ता है। रिश्तों की दौलत हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर की ओर से हमें उपहार स्वरूप मिलती है। उसे सम्हालकर रखना हमारे अपने हाथ में होता है। हम चाहें तो अपनी सूझ-बूझ से उस पूँजी को अपने सुकृत्यों और अपने सद् व्यवहार से बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत यदि हमारी इच्छा न हो तो अपने झूठे अहं व दुर्व्यवहार से उसे घटा भी सकते हैं। 
              रिश्तों की गरिमा बनाए रखने के लिए कदम-कदम पर बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। अपने रिश्तों को हमें स्वयं ही सहेजकर रखना होता है। किसी भी आयु में अपनों का साथ पाकर मानो इन्सान जी उठता है। यह साथ उसके लिए संजीवनी बूटी का कार्य करता हैं। इसके विपरीत जो लोग रिश्तों में सामंजस्य नहीं बनाना चाहते, वे इस पूँजी को गँवाकर ठन-ठन गोपाल हो जाते हैं। तब अकेले रहना उनकी मजबूरी बन जाती है।
            परिवार में तन, मन और धन जुड़ाव अथवा विघटन के कारक होते हैं। अपने माता-पिता अथवा अन्य सम्बन्धियों की सेवा तन से या इस शरीर से करेंगे तभी चारों ओर वाहवाही होगी। लोग कहेंगे कि फलाँ व्यक्ति सबके लिए बड़ी हाड़तोड़ मेहनत करता है। अपने मन से यदि दूसरों के लिए कुछ भी किया जाए तो उसका प्रभाव सब पर पड़ता है। यदि अनमने होकर अथवा घास काटते हुए किसी के दूसरे के लिए कुछ किया जाए तो वह भार बनकर रह जाता है। ऐसा करने से न तो सेवा करने वाले को प्रसन्नता मिलती है और न ही करवाने वाले को सन्तोष होता है।
              रिश्तों को जोड़ने के लिए धन की बहुत आवश्यकता होती है। यदि धन का अभाव होगा तो किसी को घर पर बुलाना अच्छा नहीं लगता। बिना धन के घर आए किसी मेहमान की आवभगत नहीं की जा सकती। इससे अपने मन को कष्ट होता है। घर में बड़े-बजुर्गों के स्वास्थ्य और उनकी अन्य आवश्यकताओ को पूरा करना धन के बिना सम्भव नहीं हो सकता। अपने जीवन यापन के लिए भी इसकी महती आवश्यकता होती है। इसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते।
             जहाँ सभी रिश्ते तन, मन और धन से ही निभाने सम्भव हो पाते हैं, वहीं सबसे महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध में तो ये तीनों बेहद जरूरी होते हैं। बच्चों के सन्दर्भ में यानी उनके लालन-पालन में भी इन तीनों का योगदान आवश्यक है। उनकी पढ़ाई-लिखाई, उन्हें जीवन में उन्हें सेटल करना और फिर उनके शादी-ब्याह करने में इन तीनों का ही योगदान अनिवार्य होता है। इन सबके लिए तीनों के बिना किसी भी कार्य का सम्पादन करना बहुत कठिन हो जाता है।
            अन्त में मैं पति-पत्नि के रिश्ते की गरिमा की चर्चा करना आवश्यक समझती हूँ जहाँ इन तीनों की महती आवश्यकता होती है। सबसे पहले तन यानी शारीरिक सम्बन्धों की पवित्रता होनी चाहिए। दोनों में से यदि एक भी पक्ष विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाएगा तो यह पवित्र रिश्ता कदापि नहीं निभ सकता। उस स्थिति में तलाक तक की नौबत आ जाती है। दोनों के परिवारों के लिए यह स्थिति सह्य नहीं होती। दोनों ओर की पारदर्शिता होना इस रिश्ते पहली शर्त है।
              दोनो का मन से जुड़ाव जब तक न हो तो भी सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं चलते। यदि दोनों में कोई भी एक अपने जीवन साथी को छोड़कर किसी अन्य के साथ शारीरिक सम्बन्ध न रखते हुए भी भावनात्मक लगाव रखेगा तो भी रिश्तों की पवित्रता भंग होती है। इसका सीधा-सा अर्थ हुआ पत्नी घर में और प्रेयसी मन में अथवा पति घर में व प्रेमी मन में। इन दोनों के ये सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं निभ पाते। घर में होने वाला लड़ाई-झगड़ा, मनमुटाव, अबोलापन आदि गृहस्थी की नींव को खोखला कर देते है। इनके अतिरिक्त आपसी पारदर्शिता के अभाव में वहाँ विघटन की सम्भावना हमेशा बनी रहती है।
                धन भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है गृहस्थ जीवन का। यदि धन-सम्पत्ति के विषय में दोनों एकमत नहीं हैं और मेरा पैसा, मेरा पैसा करते रहते हैं तो वहाँ समस्याएँ अधिक बढ़ जाती हैं। एक-दूसरे को यदि समय पर धन न दिया जाए तो अपने पास पड़े हुए करोड़ों-अरबों रुपए भी व्यर्थ होते हैं। फिर चाहे कितनी भी लीपा-पोती कर लो रिश्ते दरकने लगते हैं। फिर उनकी मिठास चुकने लगती है और वहॉं कटुता का साम्राज्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में साथ रहना बहुत मुश्किल होता है।
             तन, मन और धन की शुचिता आपसी सम्बन्धों के लिए नितान्त आवश्यक होती है। इनमें पारदर्शिता रखने वाले अपनी गाड़ी प्रसन्नतापूर्वक चलाकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ जाते हैं और शेष अन्य लोग जीवन में सदा रोते-कल्पते रहते हैं और शिकवा-शिकायत करते रहते हैं। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं कि सांसारिक रिश्ते निभाना बहुत कठिन है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 25 जनवरी 2026

फूल और शूल दोनों एक साथ

फूल और शूल दोनों एक साथ

फूल और शूल दोनों एक साथ, एक ही पौधे पर जन्म लेते हैं। हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि कभी-कभी अपने ही सहोदर (साथ जन्मे) काँटों के द्वारा गुलाब का फूल छलनी-छलनी कर दिया जाता है। उस समय की परिकल्पना कीजिए कि उस कोमल फूल को यह सोचकर कितनी पीड़ा होती होगी कि अपनों के द्वारा उसे ऐसा दारुण दुख दिया गया है। वह कोमल फूल उन कॉंटों का कुछ बिगाड़ नहीं सकता पर परेशान अवश्य हो सकता है।
            इसी प्रकार मनुष्य को अपने ही सगे भाई-बहनों अथवा मित्र-सम्बन्धियों के द्वारा जब मर्मान्तक पीड़ा पहुँचाई जाती है तब उसकी स्थिति बहुत विचित्र हो जाती है। वह अपनों के ऐसे व्यवहार के कारण मन से पूरी तरह टूटने लगता है। उसे लगता है कि जिन कन्धों का सहारा उसे हमेशा दुखों-परेशानियों में मिलना चाहिए था, वही कन्धे उसे झटककर इस दुनिया में निपट अकेला छोड़ते जा रहे हैं और लहुलूहान करने के लिए हरपल तैयार हो रहे हैं।
            हमारी भारतीय सस्कृति में पुनर्जन्म व कर्मसिद्धान्त को बहुत मान्यता दी जाती है। इसके अनुसार मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार जिन जीवों से सुख अथवा दुख मिलना होता है, उनके साथ उसका संयोग अपने-आप हो जाता है। यही वे लोग होते हैं जो भाई-बहन, मित्र-बन्धु अथवा माता-पिता के रूप में जीव को इस जन्म में मिलते हैं। इस सत्य को हम झुठला नहीं सकते। कर्म सिद्धान्त बहुत ही कठोर है। उसके अनुसार वहॉं किसी भी प्रकार की राहत गुॅंजाइश‌ नहीं होती है।
          जब मनुष्य को इनमें से किसी के द्वारा भी मानसिक पीड़ा पहुँचती है तो उस समय वह अपने सम्बन्ध की गरिमा को देखते हुए उनके साथ यदि दुर्व्यवहार नहीं भी कर सकता तो वह अपने मन-ही-मन में कुढ़ता रहता है। तब वह अपने भाग्य को कोसता हुआ ईश्वर पर दोषारोपण करता है जिसने ऐसे दुख देने वाले सम्बन्धी उसे इस जीवन में उपहार स्वरूप दिए हैं। एक बात सत्य है कि जो कष्ट किसी निर्दोष के मन को होता है, उसका भी भुगतान करना पड़ता है।
           मनुष्य को कभी याद नहीं आता कि यह संसार रिश्तों की एक मण्डी है। रिश्तों की गरिमा बनाना-बिगाड़ना उसके अपने हाथ में है। जैसे रिश्ते हम अपने कर्मों से खरीदना चाहते हैं, उन्हें पा लेते हैं। मण्डी में जाकर हम पैसे देकर या मूल्य चुकाकर अपनी मनचाही कोई भी वस्तु खरीदकर ले आते हैं और उसका उपभोग प्रसन्नतापूर्वक करते हैं। उसी प्रकार रिश्वतों के विषय में भी समझना आवश्यक है। ये रिश्ते हमारे द्वारा किए गए व्यवहार पर निर्भर करते हैं।
          उसी प्रकार हम अपने जीवन में जिन लोगों के लिए शुभकार्य करते हैं, उनकी सहायता करते हैं, उनके दुख दूर करने का यत्न करते हैं, वे आने वाले जन्म में हमारे हितैषी बनते हैं और सहायता करते हैं। परन्तु इसके विपरीत जिन लोगों के साथ हम अच्छा व्यवहार नहीं करते, उन्हें किसी भी रूप में हानि पहुँचाते हैं, वे आने वाले जन्म में हमारा अहित करते हैं और हमारी जड़ें खोदते हैं। इस प्रकार सारा हिसाब-किताब किसी-न-किसी जन्म में एवविध चुकता हो जाता है। 
             वे अपना लेखा-जोखा बराबर करके हमसे विदा ले लेते है अथवा हम उनसे विदा लेकर अगले पड़ाव की ओर पुन: कुछ और लोगों के साथ अपने लेनदेन के हिसाब को शून्य करने के लिए चल पड़ते हैं। इस प्रकार लेनदेन के हिसाब-किताब के इस चक्रव्यूह में जीव भटकता रहता है। उन सबका निपटारा करके ही उसे इनसे मुक्ति मिलती है। वह परम न्यायकारी बिना पक्षपात के सबको एक ही लाठी से हाँकता है।
           पूर्व जन्मों में हमने क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया? हम नहीं जानते परन्तु इस जन्म में हम जो भी स्याह-सफेद कर रहे हैं, उसकी हमें पूरी जानकारी है। आने वाले जन्मों में यदि कष्टों अथवा परेशानियों से बचना चाहते हैं तो हमें दूसरों की राह में शूल नहीं फूल बिछाने चाहिएँ जिससे हमें उन शूलों से छलनी या लहुलूहान न होना पड़े। जीवन में ऐसी कल्पना करना व्यर्थ है कि सभी फूल हमारे हिस्से के और सभी काँटे दूसरों के भाग्य में। हमारे विद्वान हमें चेतावनी देते हैं- 
        जो तोको काँटा बोए ताको बोइए फूल।
        तोको फूल के फूल हैं वा को हैं त्रिशूल॥
अर्थात् जो तुम्हारे रास्ते में कॉन्टे बोए उसके लिए फूल बोइए। इस प्रकार करने से तुम्हें फूल मिलेंगे और उस दूसरे व्यक्ति को शूल मिलेंगे। 
            इस प्रकार करने से जीव फूलों की तरह अपनी सुगन्ध और मुस्कुराहट बिखेरता हुआ अपने कंटक रूपी सहोदरों के चंगुल से बच सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 24 जनवरी 2026

गाड़ गिफ्टेड बच्चे

गाड गिफ्टेड बच्चे 

गाड गिफ्टेड शब्द उन बच्चों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो आम बच्चों से ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में थोड़ा अलग होते हैं अर्थात् विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं। उनकी बुद्धिमत्ता की चर्चा चारों ओर होती है। वे बचपन से ही अपने ज्ञान के कारण सबको आश्चर्यचकित कर देते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि कुछ बच्चे दूसरे बच्चों से अलग होते हैं। उनमें कुछ ऐसी स्किल्स होती हैं जो उन्हें बचपन से ही दूसरों से अलग बना देती हैं। ऐसे बच्चों को‌ ही गिफ्टेड कहा जाता है।
            पिछले कुछ समय पहले टीवी पर चाणक्य आदि बच्चों के ज्ञान को परखा गया और एक्सपर्टस के सामने उनसे विभिन्न प्रश्न पूछे गए जिनके उत्तर उन्होंने बिल्कुल ठीक दिए। समाचार पत्रों में भी ऐसे बच्चों के चर्चे अक्सर होते रहते हैं।
             अब प्रतिदिन के बच्चों के जीवन को ही देखिए। एक कक्षा में चालीस से पचास तक बच्चे होते हैं। वही विषय होते हैं, वही अध्यापक होते हैं और एकसाथ ही सबको पढ़ाया जाता है। परन्तु जब परीक्षा का परिणाम आता है तब कोई निन्यानवे प्रतिशत अंक लेकर प्रथम आता है तो कोई अनुत्तीर्ण हो जाता है। ऐसा अन्तर प्रायः दिखाई देता है।
             उन स्कूलों में जहाँ सभी प्रकार की सुविधाओं से सम्पन्न परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं, वहाँ भी यही स्थितियाँ होती हैं। यह विद्या भी सबको अपने-अपने भाग्य से ही मिलती है। इससे भी बढ़कर एक ही माता-पिता की यदि चार सन्तानें होती हैं तो उनमें कोई इंजीनियर, डाक्टर आदि हो सकता है तो कोई चपरासी भी हो सकता है। इस संसार में कोई यहाँ किसी से छीन-झपटकर विद्या नहीं ले सकता। 
          प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में विद्या के महत्व को रेखांकित करता है। विद्या को अक्षय धन कहा गया है जो भौतिक धन की तरह नष्ट नहीं होती। निम्न श्लोक शिक्षा और ज्ञान के महत्व को दर्शाता है -
            न चोरहार्यं न च राजहार्यं न
             भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
              व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
             विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्।।
अर्थात् विद्या ऐसा धन है जिसे न कोई चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न इसे भाइयों में बाँटा जा सकता है और न ही यह बोझ के समान है। इसे खर्च करने पर यह बढ़ता ही है। इसीलिए विद्या सबसे श्रेष्ठ धन है।
           इसीलिए कहते है कि न इसे चोर चुरा सकते हैं और न भाई इसका बटवारा अन्य धन-सपत्ति की तरह कर सकते हैं। जितना अधिक विद्या ग्रहण करो वह दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सांसारिक धन नश्वर है, लेकिन विद्या अमर है। यह शिक्षा जीवनभर हमारे साथ रहती है और दूसरों के साथ साझा करने पर यह और विकसित होती है।
             इस वर्तमान जन्म में जो विद्या, ज्ञान या अनुभव मनुष्य अपने जीवन मे अर्जित करता है वह मृत्यु के पश्चात भौतिक शरीर के साथ नष्ट नहीं होता बल्कि जन्म-जन्मानतरों तक उसके साथ जाता है। उस जन्म में वह जो ज्ञानार्जन करता है उसमें पूर्ववर्ती जन्म का विद्याधन भी जुड़ जाता है। इस प्रकार बैंक में बढ़ते हुए हमारे धन की तरह कई जन्मों का यह धन भी जुड़कर इतना अधिक हो जाता है कि किसी एक अगले जन्म में बच्चे को गाड गिफ्टेड वाली श्रेणी में ला करके खड़ा कर देता है। ऐसे बच्चे दूसरों के लिए ईर्ष्या का नहीं प्रेरणा का स्त्रोत होते हैं।
            इसीलिए माता-पिता से शास्त्र आग्रह करते हैं कि जहाँ तक हो सके अपने बच्चों को विद्यावान और गुणवान बनाएँ। उनके विषय में कहा है- 
      माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठित:।
      न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥
अर्थात् वे माता-पिता बच्चों का शत्रु कहलाते हैं जो उन्हें शिक्षा नहीं दिलवाते। वे बच्चे उसी प्रकार समाज में सुशोभित नहीं होते जैसे हंसों के बीच में बगुला नहीं जंचता।
             ये गाड गिफ्टेड बच्चे किसी सम्पन्न घर में जन्म लेंगे ऐसा नहीं है। ऐसे बच्चे अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार किसी भी आर्थिक या सामाजिक परिवेश वाले घर में जन्म ले सकते हैं और अपने माता-पिता के लिए गर्व का विषय बन सकते हैं। 
            इन गाड गिफ्टेड बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता भी सर्वत्र सम्मान प्राप्त करते हैं। फूलों की तरह ही इनकी सुगन्ध भी चारों ओर फैलती है। इन बच्चों को एक उदाहरण मानते हुए हर माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपने बच्चों को ज्ञानार्जन के लिए प्रोत्साहित करें।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

अन्धा बनने से बचिए

अन्धा बनने से बचिए 

'अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को देय' - यह उक्ति आज भी उतनी ही सार्थक है जितनी उस समय रही होगी जब किसी ने इसके विषय में विचार किया होगा।
          "अन्धा बॉंटे रेवड़ी फिर फिर अपनों को दे"  एक प्रसिद्ध कहावत (लोकोक्ति) है जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति जिसे अधिकार अथवा शक्ति मिल जाती है, वह बार-बार केवल अपने रिश्तेदारों, दोस्तों या करीबियों को ही लाभ पहुॅंचाता है। वह दूसरों के साथ भेदभाव करता‌ है। यह कहावत अक्सर भाई-भतीजावाद (nepotism) या पक्षपात (favoritism) को दर्शाने के लिए प्रयोग की जाती है जहाँ व्यक्ति अपनी पहुँच का गलत इस्तेमाल करके सिर्फ अपने लोगों का भला करता है, भले ही वह कितना भी "अन्धा" यानी, निष्पक्ष न हो।
             इस उक्ति के एक-एक शब्द पर ध्यान दिया जाए तो स्पष्ट होता है कि मनुष्य मोह के कारण स्वार्थ में इतना अन्धा हो जाता है कि उसे अपनों के अतिरिक्त और कोई भी दिखाई नहीं देता। उसे केवल अपने भाई-बन्धु ही दिखाई देते हैं। वह अन्य लोगों को पीछे की ओर कर देता है।‌ इसीलिए बार-बार पक्षपात करता हुआ वह जाने-अनजाने दूसरे योग्य प्रतियोगियों के प्रति अन्याय कर बैठता है।
             राजनीति, धार्मिक स्थान, सामाजिक कार्य अथवा घर-परिवार आदि कोई भी स्थान हो, हर जगह मानवीय स्वार्थों का ही बोलबाला रहता है। जो कुछ भी पद, कोटा, विशिष्ट कार्य या सम्मान देना है, उसके लिए वही लोग दिखाई देते हैं जो हमारे स्वार्थ की कसौटी पर खरे उतरते हैं अथवा जो भविष्य में किसी भी रूप में हमारे लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि दूर की कौड़ी मानकर ही तो ऐसे लोग सारे खेल खेलते रहते हैं।
              इस प्रकार के कार्य-व्यवहार करते हुए मनुष्य अपने मान-सम्मान को भी दाँव पर लगा देता है। उसे यह भी परवाह नहीं रहती कि समाज उसके इस कृत्य के लिए आलोचना करेगा अथवा पानी पी-पीकर उसे कोसेगा। वह इस बात को नजरंदाज कर देना चाहता है कि विरोधियों को उसके ऊपर कीचड़ उछालने का एक स्वर्णिम मौका मिल जाएगा।
           यहॉं हम कुछ उदाहरण देखते हैं। जब कोई व्यक्ति मन्त्री बनता है, वह अपने ही रिश्तेदारों को सरकारी पदों पर बिठाने के लिए जोड़-तोड़ करने लगता है। तभी इसी मुहावरे का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार किसी संस्था का प्रमुख जब केवल अपने खास लोगों को ही प्रमोशन दे तो यह स्थिति इस कहावत को चरितार्थ करती है। 
          आजकल सोशल मीडिया, टीवी व समाचार पत्रों की सुर्खियों में ऐसे कृत्य खूब चर्चा में रहते हैं। विविध टीवी चैनलों पर ऐसे कृत्यों के लिए चर्चाएँ आयोजित की जाती हैं। कोई भी परिणाम चाहे निकले या न निकले पर वहाँ लम्बी-लम्बी बहस अवश्य होती रहती हैं। हर विरोधी अपने दूसरे पक्ष के लोगों पर कीचड़ उछालता हुआ अपने द्वारा लगाया आरोप सिद्ध करने का भरसक प्रयत्न करना चाहता है।
               ऐसा कार्य करने वाले चिकने घड़े के समान होते हैं जिन पर किसी भी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे अपनी पोल खुल जाने पर शर्मिन्दा नहीं होते बल्कि बस खीसें ही निपोरते रहते हैं। उसके बाद वे अपने ही विरोधियो को धोबी पछाड़ देने के तथाकथित महत्त्वपूर्ण कार्य में जुट जाते हैं। वे उन सभी तथ्यों को शीघ्र ही बटोरकर सहेज लेना चाहते हैं जिनसे उनके विरोधी चारों खाने चित्त हो सकें और फिर वे अपने कुत्सित खेल को सफलता से खेल सकें।
              साम, दाम, दण्ड और भेद किसी का भी सहारा लेकर झूठ के महल पर वे अपने झण्डे गाढ़ना चाहते हैं। परन्तु मिट्टी की हाँडी की तरह झूठ की हाँडी भी बार-बार नहीं चढ़ती। कभी-कभी उन्हें भी इसका दण्ड भुगतना पड़ता है।
              जिन अपनों पर उन्होंने आँख बन्द करके विश्वास होता है, यदा कदा वे ही धोखा दे जाते है।उस समय स्थिति बहुत ही विकट हो जाती है। तब वे उनके रहस्यों को सार्वजनिक करने का प्रयास करते हैं। इससे उनकी छवि धूमिल होने लगती है। वैसे तो इस श्रेणी के लोग मोटी चमड़ी के होते हैं जिन पर इन सब बातों का प्रभाव न के बराबर पड़ता है। वे फिर से अपनी पुरानी चालें चलने लगते हैं।
            वे भूल जाते हैं कि समय बड़ा बलवान है वह किसी को नहीं छोड़ता। वह सबके साथ न्याय करता है। उसके सामने बड़े-बड़े भी धूल चाटते दिखाई देते हैं। जिन योग्य लोगों का हक मारकर वह अपने अयोग्यों को ऊपर उठाना चाहता है उनकी हृदय से उठी हुई हाय भी तो अपना रंग अवश्य दिखाएगी। अपनों को ऊपर अवश्य उठाइए परन्तु स्वार्थ में इतने अन्धे मत हो जाइए कि उनके अतिरिक्त आपको कोई और दिखाई ही न दे। आप दीन और दुनिया सबको ही भूल जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

पागल मन मेरा

पगला मन मेरा
फूलों की तरह ही
नित मुस्कुराना और
भंवरों की तरह गुनगुनाना चाहता है

यह दिन-रात 
नदी जैसी मस्ती में
निरन्तर बहना चाहता है
सारी बाधाओं को पार करना चाहता है

प्रात: पक्षियों के
मनमोहक कलरव 
सुनकर यह दीवाना
चहुँ ओर चहकते हुए उड़ना चाहता है

यह मन मयूर
बादल की गरज
सुन करके मस्ती में
इधर-उधर झूमते हुए नाचना चाहता है

चातक पक्षी-सा
वर्षा की पहली बूँद
का आस्वादन करके
आनन्दित हो मत्त हो जाना चाहता है

सोचती हूँ अब
कैसे समझाऊँ मैं
इस पगले दीवाने को
मेरी कोई बात नहीं मानना चाहता है

यह नहीं जानता
इसकी मनोकामनाएँ
असीम हैं शायद यहाँ
पूर्ण नहीं होंगी कोई बताना चाहता है

पर यह है कि
किसी भी सूरत 
नहीं समझना चाहता 
बहुत मासूम, अल्हड़ बनना चाहता है

मैं अक्सर ही
सोचती हूँ कि आज
खत्म हो रही मस्ती को
यह अब प्रसन्नता से पाना चाहता है

शुभकर्मों से
मिल पाया यह
जीवन है तो अब सारी
ऊँचाइयाँ छू ले, ये मेरा दिल चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 21 जनवरी 2026

बच्चे में अंगूठा चूसने की आदत

बच्चे में अंगूठा चूसने की आदत

अंगूठा चूसने की आदत प्राय: बच्चों में पाई जाती है। बच्चे में अंगूठा चूसने की आदत एक सामान्य व्यवहार है जो सुरक्षा और आराम देता है। प्रायः बच्चे दो से चार साल की उम्र तक खुद ही छोड़ देते हैं। बहुत छोटे बच्चे अपने किसी भी पैर या  हाथ का अगूठा अपने मुँह में डालते हैं। कभी-कभी तो पूरा हाथ भी मुँह में डाल लेते हैं। कोई उनके हाथ को पकड़ता है तो वे उस व्यक्ति के हाथ को भी अपने मुॅंह में डालने का प्रयास करते हैं। इसमें कुछ नयापन नहीं है। 
           परन्तु समस्या वहाँ आड़े आती है जब कुछ बच्चों में अंगूठा चूसने की यह आदत बड़े होने पर भी नहीं छूटती। यदि यह आदत 5 साल की उम्र के बाद या स्थायी दॉंत निकलने के बाद भी रहती है तो यह दॉंतों और जबड़े के विकास को प्रभावित कर सकती है, इससे ऑर्थोडॉन्टिक समस्याओं यानी खुले जबड़े या दॉंत आगे निकले का खतरा होता है। अतः चिन्ता होना स्वाभाविक है। उस समय दन्त चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। वे बच्चे ऐसा क्यों करते हैं? इसके पीछे बहुधा एक मनोवैज्ञानिक कारण होता है। 
          दुधमुँहे बच्चे जब अंगूठा या कोई अंगुली मुँह में डालकर चटखारे लेते है तो वह आनन्द ही कुछ और होता है। माता-पिता या घर के बड़े चौकने रहते हैं कि बच्चे में यह आदत पक्की न हो जाए। इसलिए वे बार-बार उसके मुँह से अंगूठा या अंगुली निकाल देते हैं। इससे बच्चे में यह आदत पनपती ही नहीं है। परन्तु जब घर के लोग किसी भी कारणवश बच्चे की ओर ध्यान नहीं दे पाते तो बच्चे में यह आदत पक्की होने लगती है। धीरे-धीरे वह अंगूठा या अंगुली चूसने का आदी हो जाता है।
          इसका कारण जो समझ में आता है, वह यही है कि बच्चे को जब भूख लगती है तब वह अंगूठा मुँह में डालता है। इससे उसे कुछ समय के लिए तसल्ली हो जाती है। दूसरा कारण यह प्रतीत होता है कि बच्चे को जब डर लगता है तो भी वह ऐसा करता है। इसके अतिरिक्त कुछ बच्चों को सोते समय किसी सहारे की जब आवश्यकता महसूस होती है तब वे मुँह में अंगूठा डाल लेते हैं और फिर वे सो जाते हैं।
            सबसे बड़ा व महत्त्वपूर्ण कारण मुझे लगता है बच्चे का अकेलापन। घर के लोग जब बच्चे की ओर ले लापरवाह हो जाते हैं तब वह अपने इस अकेलेपन को दूर करने के लिए इस बुरी आदत का सहारा लेता है। ये बच्चे बहुत बड़ी आयु हो जाने पर भी इस आदत से मुक्ति पाने में सफल नहीं हो पाते। हाँ, जब किसी दूसरे के सामने होने पर उन्हें इस आदत के कारण से वे शर्म महसूस करते हैं। उस समय उन्हें लगता है कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा? तब वे लुक-छिपकर अंगूठा चूसते हैं पर आदत को छोड़ नहीं पाते।
             ऐसा तो हो नहीं सकता कि उनकी इस लुका-छुपी की आदत का किसी को पता न चले। जब घर के या बाहर के लोग उनका मजाक उड़ाते हैं तो उन्हें शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का तो दूसरे बच्चे हर समय मजाक बनाते हैं चाहे वे स्कूल में हों या खेल के मैदान में हों।
            अंगूठा चूसना उन्हें अपने वातावरण से जुड़ने और उसे समझने में मदद करता है। खासकर सोते समय अंगूठा चूसने से बच्चे को सुकून, सुरक्षा और सन्तुष्टि मिलती है। जो बच्चे जोर से और तीव्रता से चूसते हैं, उन्हें दॉंतों की समस्या होने का खतरा अधिक होता है। यह तो चर्चा हुई बच्चों की समस्या की। अब हमें विचार यह करना है कि इस समस्या से इन मासूमों को छुटकारा कैसे दिलाया जाए? 
           बच्चे को ज़बरदस्ती रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। प्यार और सहयोग से उसकी आदत छुड़ाई जा सकती है। इस बात को समझना चाहिए कि अधिकतर मामलों में यह एक अस्थायी आदत होती है। लगातार निगरानी और सही समय पर हस्तक्षेप करना बहुत आवश्यक होता है। जब बच्चा अंगूठा चूस रहा हो तो उसका ध्यान किसी और चीज यानी खिलौने अथवा खेल में लगाना चाहिए। ताकि उसके दोनों हाथ व्यस्त रहें। सोने से पहले पढ़ने या संगीत सुनने जैसी शान्त दिनचर्या स्थापित करनी चाहिए। इससे आराम करने के लिए अंगूठे की ज़रूरत कम हो जाएगी। बच्चे को डॉंटने या शर्मिंदा करने से बचना चाहिए। 
            माता-पिता को बहुत ही समझदारी का परिचय देना होता है बच्चों को इस आदत से बचाकर निकालने के लिए। उन्हें सबसे पहले अपने बच्चे के अकेलेपन को दूर करने के लिए प्रयत्न करना होगा। बच्चों को यह आश्वासन देना होगा कि उनके माता-पिता उनके साथ हैं वे अकेले नहीं हैं। कैसी भी परिस्थिति हो उन्हें हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि अपने वे बच्चे को बेसहारेपन या अकेलेपन का दश नहीं देंगे। जब बच्चे का अकेलापन दूर होगा तो वह इस आदत से मुक्त हो सकेगा। 
           बच्चा का जब माता-पिता के साथ अपनापा जुड़ता है तो वह उनके करीब हो जाता है। उनके साथ जब वह अपनी परेशानियों को बाँटने लगता है तब उसका डर और अकेलापन सब गायब हो जाते हैं। यदि आपको चिन्ता है या बच्चे के दॉंतों में बदलाव दिखाई दे तो बाल दन्त चिकित्सक (Pediatric Dentist) से मिलेआ जा सकता है। वे सही मार्गदर्शन दे सकते हैं।
           उस समय वह भी स्वयं को दूसरे बच्चों की तरह सौभाग्यशाली समझने लगता है। अपने बच्चों के चहुँमुखी विकास के लिए उनके मित्र बनिए, हौव्वा नहीं। तभी वे भी अपनी बुरी आदतों से मुक्त होकर सामान्य जीवन जी सकेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

मृत्यु को धोखा नहीं दे सकते

मृत्यु को धोखा नहीं दे सकते 

मृत्यु अवश्यम्भावी है इससे आज तक कोई नहीं बच सका। जिन्हें हम भगवान मानते हैं यानी भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण आदि भी इस असार संसार में हमेशा के लिए नहीं रहे। अपितु निश्चित अवधि के पश्चात यहाँ से विदा हो गए। मरणधर्मा कहे जाने वाले इस संसार में मृत्यु निश्चित है। इसे हम धोखा नहीं दे सकते। हम मनुष्यों की तरह यह किसी के झॉंसे में नहीं आती। न ही यह किसी धनवान के द्वारा खरीदी जा सकती है। यह अपना कार्य बहुत दक्षता से करती है।
            प्रत्येक जीवधारी को इस धरा पर अपने कर्मानुसार निश्चित समय के लिए ही जीवन मिलता है। किसी को कुछ पल के लिए जीवन मिलता है तो किसी को सैंकड़ों बरस के लिए। चौरासी लाख योनियों में जीव को किस योनि में जन्म मिलता है, यह उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है। केवल मनुष्य योनि को ही कर्मयोनि कहा जाता है शेष सभी भोगयोनि कहलाती हैं। इन सभी योनियों में अपने कुकृत्यों या दुष्कर्मों का फल भोगने के पश्चात ही मानव के रूप में  जीव का जन्म होता है।
           मानव योनि जीव की बपौती नहीं है कि वह सदा ही मनुष्य योनि ही प्राप्त करता रहेगा। यदि मानव तन पाकर भी वह सत्कर्म नहीं करेगा अथवा कुकर्मों में स्वयं को लिप्त करता रहेगा तो फिर उसे मानवेतर योनियों में जन्म मिलेगा। जीव इन योनियों में भटकता रहता है। एक जन्म के बाद मृत्यु और फिर मृत्यु के बाद पुन: जन्म- यही क्रम निरन्तर चलता रहता है जब तक जीव मोक्ष के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता।
           कोई भी इस असार कहे जाने वाले ससार को छोड़कर नहीं जाना चाहता चाहे वह कितने ही कष्ट में क्यों न हो। बहुत बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि एक महान मूर्तिकार मरना नहीं चाहता था। उसने मृत्यु को चकमा देने के लिए बहुत ही अच्छा उपाय सोचा। एक समय ऐसा आया कि जब उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि मृत्यु का समय अब समीप आने लगा है। मृत्यु का समय निकट जानकर उसने अपने जैसी कई मूर्तियाँ बनाकर अपने हाल कमरे में सजाकर रख दीं और स्वयं भी उनके बीच में जाकर खड़ा हो गया। उसे लगा कि उसे अब मृत्यु का देवता पहचान नहीं सकेगा और वह बच जाएगा।
           कहते हैं जब यमराज उसे लेने के लिए आए तो इतनी सारी सजीव मूर्तियों के बीच छिपे मूर्तिकार को खोज नहीं पाए। तब उन्होंने उसे ढूँढने के लिए जुगत भिड़ाई और कहा,"जिस भी मूर्तिकार ने ये सुन्दर और सजीव मूर्तियाँ बनाई हैं, उसने वाकई चमत्कार किया है। ये मूर्तियाँ सचमुच ही बहुत खूबसूरत हैं पर इनमें एक कमी रह गई है।"
           यह सुनकर उस मूर्तिकार को धक्का लगा। फौरन बाहर आकर उसने पूछा, "क्या कमी रह गई है इन मूर्तियों में?" 
          तब हंसते हुए यमराज ने कहा, "इनमें कोई कमी नहीं है पर तुम में कमी रह गई जो तुम इन मूर्तियों से बाहर निकलकर बोल पड़े।"
            कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य कितने ही मजबूत किले बनाकर स्वयं को सुरक्षित कर लेने का दम्भ भरे अथवा मूर्तिकार की तरह मौत को चकमा देने की कोशिश करे, उसे सफलता नहीं मिल सकती। मृत्यु के पंजे में फंसा वह उससे किसी भी तरह छूट नहीं सकता।
             सार रूप में हम यही समझ सकते हैं कि जन्म से लेकर अन्तिम दिन तक मौत की तलवार हमारे सिर पर लटकती रहती है। जैसे कबूतर आँख बन्द कर ले और सोचे कि बिल्ली चली गई है और अब तो मैं सुरक्षित हो गया हूँ। वास्तव में इस प्रकार सोचना उसकी भूल होती है। वह बिल्ली तो अपना शिकार सरलता से पकड़ लेती है और वह बेचारा कबूतर सोचता ही रह जाता है।
           इसी प्रकार यदि हम अपने सिर पर लटकती तलवार को देखकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं तो मृत्यु को कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला। पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार मिला हुआ हमारा समय जब पूरा हो जाएगा तब वह मृत्यु हमारे शरीर में विद्यमान इस जीव या आत्मा को बिना आगे-पीछे देखे लेकर चल पड़ेगी। जीव को विवशता से मृत्यु का दामन थामना ही पड़ता है। जो महात्मा जन होते हैं, वे हंसते-हंसते मृत्यु को गले लगा लेते हैं। इसके विपरीत अधर्म करने वाले लोग रोते-रोते मृत्यु के साथ जाते हैं।
        मृत्यु तो एक-न-एक दिन हमारे पास आनी ही है इसलिए उससे क्या डरना? महाराज भर्तृहरि जी का कहना है-
         अद्यैव मरणं युगान्तरे वा धीरा: 
         न्यायात्पथ: पदं न प्रविचलन्ति।
अर्थात् धीर लोग अपने न्याय के मार्ग से एक कदम भी विचलित होते क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय नहीं होता।
             दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मृत्यु अटल सत्य है। उसका स्वागत प्रसन्न होकर करना चाहिए। इसका डर उन लोगों को होता है जो अपने सच्चाई व ईमानदारी के ठीक रास्ते को छोड़कर गलत रास्ते पर चलकर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। जो सत्य के मार्ग पर चलते हैं वे हंसते हुए उसे गले लगाने के लिए उसकी प्रतीक्षा में तैयार बैठे रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 19 जनवरी 2026

असहिष्णु होते बच्चे

असहिष्णु होते बच्चे 

माता-पिता के अनावश्यक लाड़-प्यार के कारण आजकल बहुत से बच्चे असहिष्णु होते जा रहे है।बच्चों में अनावश्यक जिद करना, बड़ों का कहना न मानना, तोड़फोड़ करना आदि की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बच्चे दिन-प्रतिदिन ईर्ष्यालु प्रकृति के और अहंकारी बनते जा रहे है। अपने स्वार्थी स्वभाव के कारण वे किसी के साथ अपने खिलौने, बिस्तर अथवा कोई भी चीज शेयर नहीं करना चाहते। उनकी मनोवृति संकुचित होती जा रही है। यह वास्तव में चिन्ता का विषय है। 
           आज इस इक्कीसवीं सदी में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत अधिक बढ़ा है। इसलिए घर में पति-पत्नी दोनों ही उच्च शिक्षा ग्रहण करके नौकरी अथवा अपना व्यवसाय कर रहे हैं। सवेरे से शाम तक अपने कार्यों में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने बारे में भी सोचने का समय नहीं होता। इससे उनका अपना सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता जा रहा है। अपनी इस व्यस्तता के कारण चाहकर भी वे अपने बच्चों की ओर समुचित ध्यान नहीं दे पाते हैं। इसका दुख उन्हें रहता है परन्तु वे अपने हालात से विवश हैं।
            वे लोग अपने परिवार के बारे में सोचने से पहले अपने कैरियर के विषय में सोचते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि यदि बच्चे हो जाऍंगे तो कैरियर दॉंव पर लग जाएगा। पति अथवा पत्नी कोई भी ऐसा रिस्क नहीं लेना चाहता। इसीलिए समयाभाव के कारण पहली बात तो वे बच्चे पैदा ही नहीं करना चाहते और यदि चाहते भी है तो बस एक। चाहे वह लड़की हो या लड़का, उन्हें इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता। उस बच्चे को पालने में भी मानो उन्हें जोर पड़ता है। 
            आज परिवार सीमित होते जा रहे हैं। बच्चों की जायज-नाजायज माँगों को पूरा करके वे उन्हें जिद्दी बना रहे हैं। जब उनकी माँग किसी कारणवश पूरी नहीं हो सकती तो वे पैर पटकते हैं, चिल्लाते हैं और तोड़-फोड़ करते हैं। सारे घर को सिर पर उठा लेते हैं और हंगामा करते हैं।
          किसी दूसरे बच्चे के पास जो भी नई वस्तु देखते है वही उन्हें चाहिए होती है। चाहे उसकी जरूरत उन्हें हो या न हों। चाहे  खरीदकर उसे कोने में पटक दें। दूसरों को अपने से छोटा समझने की प्रवृत्ति उनमें बढ़ती जा रही है। उन्हें ऐसा लगता है कि उनके माता-पिता के पास बहुत-सा पैसा है और वे जो चाहें या जब चाहें कुछ भी खरीद सकते हैं। इस प्रकार के व्यवहार से वे अहंकारी बनते जा रहे हैं। यह किसी भी प्रकार से उनके सर्वांगीण विकास लिए उपयुक्त नहीं है।
            हर उस बच्चे से वे ईर्ष्या करते है जो उनसे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ रहा हो। वे इस बात को आत्मसात नहीं कर सकते कि उन्हें कोई भी किसी भी क्षेत्र में हरा दे और उनसे आगे निकल जाए। हर समय तो भाग्य साथ नहीं देता और जब ऐसा हो जाता है तो मानो उनकी दुनिया में कुछ भी नहीं बचता। अपने को पटकनी देने वाले का समूल नाश करने के लिए वे षडयन्त्र करने लगते हैं। ऐसे ही बच्चे बागी बन जाते हैं। फिर बड़े होकर ऐसे बच्चे गैगस्टर बन जाते हैं और माता-पिता के हाथ से निकल जाते हैं।
            उनके माता-पिता उस अवस्था में स्वयं को असहाय अनुभव करते हैं। उस समय उनकी सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है। वे‌ लोग सोच भी नहीं पाते कि इन सपूतों को वापिस फिर से इन्सान कैसे बनाया जाए? तब भी वे अपने गिरेबान में न झॉंककर उन बच्चों को दोष देते हैं। समय रहते यदि उनकी सुध ले लेते तो ऐसी अवॉंच्छित स्थिति उनके सामने ही नहीं आती जब उन्हें पश्चाताप करना पड़ता।
          माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सब कुछ खरीद कर दें। उनके बिनकहे ही उनकी जरूरत की सारी वस्तुऍं खरीदकर दें। साथ ही उन्हें न सुनने की आदत भी डालें। ऐसा होने से बच्चे को यह समझ में आ जाएगा कि हर बात के लिए जिद नहीं की जाती। यदि कोई मनचाही वस्तु किसी कारण से न मिल पाए तो घर में न तो हंगामा करना होता है और न ही तोड़फोड़। इससे उनमें स्वत: सामंजस्य की समझ भी आ जाएगी।
           बच्चे घर की शोभा होते हैं, माता-पिता का मान होते हैं और राष्ट्र की धरोहर होते हैं। वे कच्ची मिट्टी की तरह कोमल होते हैं। उन्हें जिस भी साँचे में ढाला जाए वे वही आकार लेते हैं। इसलिए उनका चरित्र निर्माण करते समय बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। अत: माता-पिता का नैतिक दायित्व बनता है कि वे अपने व्यस्त कार्यक्रम में से थोड़ा-सा समय निकालकर बच्चों को संस्कारित करें। अति लाड-प्यार से उन्हें बिगाड़कर उनके शत्रु न बनें और अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारकर जीवन भर का सन्ताप मोल न लें।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 18 जनवरी 2026

संयुक्त परिवार एक छतनार वृक्ष

संयुक्त परिवार एक छतनार वृक्ष

संयुक्त परिवार बच्चे के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होता है। इसकी छत्रछाया में बच्चा फलता-फूलता है। वहाँ पर सदा ही उसका सर्वांगीण विकास होता है। अपने बाल्यकाल से ही वह जीवन में भरपूर प्यार, दुलार, ममता व अपनापन पाता है। उसे रिश्तों के मायने स्वयं ही समझ में आ जाते हैं जो एकल परिवार में सम्भव नहीं हो पाता। संयुक्त परिवार की विशेषता यही है कि वहॉं सभी परिवारी जन प्रेम और सौहार्द से रहते हैं। छोटे-छोटे होने वाले मनमुटाव बेमायने हो जाते हैं। संयुक्त परिवार में रहने के लाभ अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।
            संयुक्त परिवार में रहने वाला बच्चा घर में माता और पिता इन दोनों के अतिरिक्त अधिक लोगों को अपने घर में देखता है। समय-समय पर उन सबसे वार्तालाप करता है। उसमें यह समझ विकसित हो जाती है कि किस सम्बन्धी से किस प्रकार का व्यवहार करना होता है। अपने से छोटों, अपने बराबर वालों और अपने से बड़ों लोगों के साथ व्यवहार करते समय क्या-क्या सावधानियाँ अपेक्षित हैं। उसी के अनुरूप बच्चा व्यवहार कुशल बन जाता है।       
             इसके अतिरिक्त घर में आने-जाने वाले मेहमान भी एकल परिवार की अपेक्षा अधिक ही आते रहते हैं। उनको देखते हुए उसे सम्बन्धों के मायने और उनका महत्त्व स्वत: समझ आ जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि बच्चा हर बात को बड़ी ही बारीकी से देखता, परखता और समझता है। बड़े लोगों की देखा-देखी उसमें स्वाभाविक रूप से समझ आती रहती है।
            उसे सबके साथ सामंजस्य स्थापित करना अपने आप ही देखते और समझते हुए आ जाता है। इस प्रकार बड़े होने पर उसे भिन्न प्रकृति के दूसरों लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने में किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि यह गुण उसमें स्वभावत: ही आ जाता है। वह सरलता से सबके साथ यथोचित व्यवहार करने लगता है। उसे किसी के साथ बातचीत करने में न घबराहट होती है और न ही हिचकिचाहट होती है। 
             घर में अन्य बच्चों के साथ खेल-खेल में भोजन खाना सीख जाता है। संयुक्त परिवारों में रहने वाले प्राय: बच्चे खाने-पीने के लिए अपने माता-पिता को तंग नहीं करते। उसे अपने खिलौने व अन्य सामान मिल-बाँटकर इस्तेमाल करने का ढंग आ जाता है। वह अपनी वस्तुओं को छिपाकर रखने के स्थान पर सबके साथ मिलकर खेलना पसन्द करता है।
            स्कूल जाने पर बड़े भाई-बहनों के होते उसे बिल्कुल चिन्ता नहीं होती। स्कूल हो या खेल का मैदान हो, उसे पता होता है कि उसे यदि कोई बच्चा तंग करेगा तो उसके बड़े भाई-बहन उससे निपट लेंगे। इस तरह वह हर स्थान पर स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है। ऐसा करके उसे मानसिक सन्तोष मिलता है। उसके बड़े भाई-बहन उसके लिए एक सुरक्षा कवच की भॉंति होते हैं। उनके रहते उसे एक मॉरल स्पोर्ट मिलती है।
             संयुक्त परिवार में पले बच्चे एकल परिवार के बच्चों की बनिस्बत अधिक सुलझे हुए और समझदार होते हैं। उनके आचार-व्यवहार का अन्तर भी हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। वे अधिक जिद्दी नहीं होते। उन्हें अपने दादा-दादी और अन्य‌ बड़े लोगों की अहमियत पता रहती है। बच्चे के लिए सबसे प्रसन्नता इस बात से होती है कि उसे अन्य बच्चों की तरह क्रच में जाकर देर शाम तक बोर नहीं होना पड़ता क्योंकि वहाँ तो सारा समय अनुशासन में रहना होता है। उसे यह भी अच्छा लगता है कि नौकर उसके सिर पर सदा सवार नहीं है। उनके हाथ का बना हुआ बेस्वाद खाना भी उसे नहीं खाना पड़ता।
            बड़े-बजुर्गों के घर में रहते हुए अपनी इच्छा से वह खाता, पीता, खेलता और सोता है। घर के दूसरे बच्चों के साथ बैठकर वह स्कूल से मिला हुआ गृहकार्य सरलता से कर लेता है। जहाँ उसकी समझ में न आए तो समझाने के लिए बड़े बैठे हैं न। इस प्रकार जो प्यार, अपनापन व भावनात्मक सुरक्षा बच्चे को अपने घर में मिलती है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकती। बच्चे को जो समय उसके रिटायर्ड या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त दादा-दादी अथवा नाना-नानी दे सकते है, वह उसे माता-पिता नहीं दे सकते। वे तो अपने घर और दफ्तर के व्यस्त कार्यक्रम में उलझे होते हैं।
           संयुक्त परिवार में इस प्रकार लड़ते-झगड़ते, मीन-मेख निकालते, रूठते-मानते, प्यार-मुहब्बत से बच्चे का जीवन बड़ी सरलता से व्यतीत हो जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह होती है कि माता-पिता भी अपने बच्चे की ओर से बिल्कुल निश्चिन्त रहते हैं। अतः वे अपने आफिस में अच्छी तरह से कार्य कर पाते हैं। यदि कभी आफिस में देर हो जाए तो भी उन्हें अपने बच्चे की चिन्ता नहीं होती। वे जानते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित हाथों में है।
          अन्त में मैं यही सुझाव सबको देना चाहती हूँ कि यदि ऐसी कोई मजबूरी न हो तो अपने बच्चों को इस सुख से वंचित न करें। छोटी-मोटी बातें घर-परिवार में यदि हो भी जाएँ तो उन्हें बच्चों की भलाई के लिए अनदेखा कर दें।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

उत्तम प्रकृति के लोग

उत्तम प्रकृति के लोग

चन्दन वृक्ष की सुगन्ध और शीतलता के कारण अजगर जैसे विशाल विषधर उस पर लिपटे रहते हैं उस पर उनके विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसी प्रकार उत्तम प्रकृति के महान लोगों पर भी बुरी सगति का कोई असर नहीं होता। रहीम जी ने इसी बात को बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
    जो रहीम उत्तम प्रकृति , का करि सकत कुसंग।
     चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
अर्थात् चंदन की तरह ही उत्तम प्रकृति के लोग होते हैं जिनके ऊपर किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव नहीं पड़ता। हम कह सकते हैं कि सज्जन व्यक्ति अपने उच्च गुणों के कारण बुरे लोगों के प्रभाव में आकर भी अपनी अच्छाई नहीं खोते।
          यह दोहा हमें सिखाता है कि हमें चन्दन के वृक्ष के समान बनना चाहिए। अपनी अच्छाइयों को परिस्थितियों या बुरे लोगों के प्रभाव में आकर नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि हर हाल में अपने सद्गुणों को बनाए रखना चाहिए। चन्दन के पेड़ की यही विशेषता है कि इन विषधरों के लिपट जाने से इसकी महत्ता कम नहीं होती। यह सत्य है कि चन्दन के वृक्ष की न ही शीतलता कम होती है और न ही उसकी सुगन्ध को चारों दिशाओं में फैलने से कोई रोक सकता है।
           जिन लोगों में सतोगुण की अधिकता होती है अथवा जो सात्विक प्रवृत्ति के लोग होते हैं, उन्हें कोई भी संगति प्रभावित नहीं कर सकती। कुसंगति भी यदि उनके पास आती है तो शीतलता ही ढूँढती है। उनकी खुश्बू का आनन्द लेकर वह प्रसन्न होती है। उनके संसर्ग से वह अच्छाई की ओर अग्रसर होने लगती है।
             यह मैंने इसलिए कहा कि महापुरुषों की संगति में आकर बड़े खूँखार अपराधी भी सात्विक और शुद्ध हृदय बन जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि, अंगुलिमाल डाकू आदि हमारे सामने प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। रत्नाकर डाकू साधुओं की संगति में आने के पश्चात अमर रामकथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि बन गए। अंगुलिमाल डाकू महात्मा बुद्ध की शरण में आकर उनके प्रिय शिष्य बन गए थे। इसी प्रकार इतिहास के पृष्ठों को खंगालने पर हमें ऐसे कई और उदाहरण मिल जाएँगे।
           अब हमें विचार इस विषय पर करना है कि इन उत्तम प्रकृति के लोगों के पास ऐसा क्या होता है जो ये सबको बरबस अपनी ओर चुम्बक की तरह आकर्षित कर लेते हैं? वास्तव में ये लोग पारस पत्थर की तरह मूल्यवान होते हैं। इनके सम्पर्क जो एक बार आ जाता है तो वह क्या सोना बन जाता है। यानी बहुमूल्य बन जाता है।
            दूसरे शब्दों में कहें तो वह धीरे-धीरे अपने दुर्गुणों का त्याग करता हुआ इनकी छत्रछाया में महान बन जाता है। तब उसकी सुगन्ध भी चारों ओर फैलने लगती है। सद् गुणों को अपने में आत्मसात कर लेने की उसकी प्रवृति उसे महान लोगों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है। फिर उसके पास भी आकर लोग शीतलता पाते हैं। इसी प्रकार यह क्रम चलता रहता है।
          उत्तम प्रकृति के लोगो की महानता उनकी विशाल हृदयता, दूसरों के प्रति दया व सहानुभूति की भावना और बिना किसी भेदभाव के सबके कष्टों को हरने की इच्छा आदि गुणों के कारण होती है। लोग इन्हें इनके इन महान गुणों के कारण ईश्वर की पूजते हैं।
            जो भी दुखित या पीड़ित इनके द्वार पर अपनी समस्याओं को सुलझाने की याचना लेकर जाता है, उसे ये लोग कभी निराश नहीं करते। ये यथासभव उसे प्रसन्न करके ही भेजते हैं। आज के इस भौतिक युग में जहाँ लोगों के पास अपने लिए समय नहीं होता वहाँ इस प्रकार किसी के दुखों को दूर करने वाला महानुभाव मिल जाए तो यह बहुत बड़ी बात है।
          ईश्वर ऐसे लोगों को वरदान स्वरूप धरा पर अवतरित करता है। ये चन्दन की तरह अपनी सुगन्ध देश-विदेश में सर्वत्र फैलाते हैं। इनके पास आकर कोई भी व्यक्ति खाली हाथ निराश नहीं लौटता। इनकी शीतलता को अपने भीतर महसूस करता रहता है।
          सार रूप में मैं यही कहना चाहती हूॅं कि उत्तम प्रकृति के लोगों के पास यदि विषधर जैसा कुसंग भी आ जाए तो उन्हें कोई अन्तर नहीं पड़ता। वे उसके साथ भी सहृदयता का व्यवहार करते हुए शरण देते हैं। हमें यत्नपूर्वक ऐसे लोगों को ढूँढना चाहिए और उनकी सगति में रहकर महकना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

सांसारिक रिश्तों पर विश्वास बनाना

 सांसारिक रिश्तों पर विश्वास बनाना

बरसों बरस जिस व्यक्ति के साथ रहते हुए हम यह दम्भ भरते हैं कि हम उसे पूरी तरह से जानते और पहचानते हैं अथवा उसकी रग-रग को से अच्छी तरह वाकिफ हैं तो शायद यह कहना उचित नहीं होगा। पता नहीं जीवन के किस मोड़ ऐसी आँधी आ जाए और ऐसा झटका लग जाए कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाए। उस समय हमारे सारे अरमान शीशे की तरह चकनाचूर होकर किरच-किरच हो जाऐंगे। तब हम शायद इस काबिल भी न रह सकें कि बिखरे हुए बेरों को समेट पाएँ।
            अपने आसपास प्राय: ऐसे उदाहरण हमें देखने-सुनने को मिल जाते हैं कि जिन पर विश्वास करना वाकई असम्भव-सा प्रतीत होता है। अचानक हमें अपने साथी के विषय में ऐसी जानकारी मिल जाती है और उस समय ऐसा लगता है मानो पैरों  तले से जमीन खिसक गयी है। तब वही साँप और छुछून्दर वाली स्थिति हो जाती है। उस समय न उगलते बनता है और न निगलते ही बनता है। बड़ी ही विचित्र-सी कशमकश में फंस जाती है यह मनुष्य की जिन्दगी।
             पति अथवा पत्नी में से कोई भी यदि एक-दूसरे की पीठ के पीछे छुपकर कोई मर्यादा विरुद्ध अशोभनीय कार्य कर रहा हो और वह कुकृत्य किसी भी कारण से सार्वजनिक हो जाए या दूसरे को पता लग जाए। तब दोनों में लड़ाई-झगड़े या सिर-फुटोव्वल जैसे हालात होना स्वाभाविक होता है। उस समय दूसरा साथी बच्चों सहित किसी की परवाह किए बिना सम्बन्ध को समाप्त करके अलग रहने का चुनाव करेगा। 
          यदि विवाह के पश्चात भी विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाने हैं अथवा विवाह से पूर्व के किसी अनैतिक कहे जाने वाले सम्बन्ध को हवा देनी हो तो इसकी मान्यता न समाज देता है और न ही परिवार। ऐसे केसों में प्राय: अलगाव हो जाता है। ये साथी तो अपने-अपने जीवन को छोड़कर अन्यत्र अपने बसेरे बना लेते हैं परन्तु उनकी इन गलतियों में वे मासूम पिसते हैं जिनका इन विवादों से कोई लेनादेना नहीं होता। जी हाँ, ये उनके अपने बच्चे ही होते हैं जिनके लिए वे सदा यही कहते है कि हम इनके लिए ही सब कर रहे हैं और इन्हीं के लिए जी रहे हैं। वही ये बच्चे जीवन भर अपने माता-पिता की गलतियों की सजा भुगतते रहते हैं पर किसी का भी पक्ष नहीं ले पाते।
            वर्षों वर्ष भाई-बहन मिलकर रहते हैं। अचानक पता चलता है कि भौतिक धन-सम्पत्ति के लिए वे तो एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन गए हैं। कई बार माता-पिता के साथ वर्षो रहते हुए भी आज्ञाकारी कहा जाने वाला बेटा धमाका कर देता है कि वह उनसे अलग रहना चाहता है अथवा धोखे से सारी प्रापर्टी अपने नाम करवा कर उन्हें बुढ़ापे में अपने माता-पिता को धक्का दे देता है। उन्हें दरबदर कर देता है। उन्हें पाई-पाई का मोहताज बना देता है। कई बच्चे तो माता-पिता का सब कुछ हड़पकर उन्हें वृद्धाश्रम भेज देते हैं।
             यह तो चर्चा की हमने पारिवारिक सम्बन्धों की है। इसी तरह वर्षों तक एक साथ साझा व्यापार करते हुए साथी कब दूसरे को ठगकर सब हथिया लेते हैं पता ही नहीं चलता।‌ धोखा‌ देने के पश्चात वे एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसद नहीं करते। तब उनके मध्य‌ लम्बी और उबाऊ न्याय प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। दोनों ही पक्षों का समय और धन बर्बाद हो जाता है। यहॉं निर्दोष और ईमानदार साथी अधिक परेशान होता है। वह छल-कपट से दूर रहकर विश्वासघात नहीं करता।
             इसी प्रकार कभी-कभी पक्का और सच्चा कहलाने वाला मित्र भी पीठ में छुरा घोंप रहा होता है। अपना कोई प्रिय निकट सम्बन्धी भी कब धोखा देता हुआ सामने आ जाए कुछ पता नहीं चलता। मीठा-मीठा बनकर ये लोग कब पीठ में खंजर घोंप दें, पता ही नहीं चलता। कुछ लोग स्वार्थवश साथ जुड़ते हैं।‌ जब उनका मतलब पूरा हो जाता है तब वे कन्नी काटकर निकल जाते हैं। सामने पड़ जाने पर ऐसे मुॅंह मोड़‌ लेते हैं जैसे वे उसे पहचानते ही नहीं हैं। यह स्थिति बहुत दुखद होती है।
            जिन पर हम आँख बन्द करके कसमें खाने की बात करते हैं यदि वे धोखेबाज या  ठग निकल जाएँ तो मनुष्य का इन्सानियत पर से विश्वास उठने लगता है। उसके मन में कुछ दरकने लगता है। संसार में रहते हुए सभी सांसारिक रिश्तों पर विश्वास बनाना पड़ता है। हम सामाजिक प्राणी हैं उनके बिना अकेले रहने की कल्पना ही‌ नहीं कर सकते। जीवन में सावधानी अवश्य रखना चाहिए। अपने आँख और कान खुले रखने चाहिए ताकि हमें कोई अपना धोखा देकर तोड़ न सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

सामान सौ बरस का

सामान सौ बरस का

मनुष्य को अपने जीवन में क्या चाहिए होता है? यह प्रश्न मन को उद्वेलित करता रहता है। हमारे सयाने लोगों का कथन है कि दो वक्त की रोटी, सिर छिपाने के लिए एक छत और दो जोड़ी कपड़ों की मात्र आवश्यकता होती है। विचारणीय यह कि क्या हम इस बात को आजीवन समझ पाते हैं? मेरे विचार में आप सभी इस प्रश्न के उत्तर में न ही कहेंगे। यह सत्य भी है। मनुष्य को मात्र इन पदार्थों से कभी सन्तुष्टि नहीं होती। 
            ‌समस्याएँ तभी जन्म लेती हैं जब हमारी महत्त्वाकाँक्षाएँ पैर पसारने लगती हैं। उस समय हम ऊॅंची उड़न भरने लगते हैं। तब हमारा दिन-रात का सुख-चैन सब हवा होने लगता है अर्थात् छिनने लग जाता है। हम कोल्हू के बैल की तरह अहर्निश जुटे हुए परेशान होते रहते हैं। किसी भी समय बैठकर चैन से भोजन नहीं कर पाते। हमारा मन हर पल ही परेशान रहता है। हमें सदैव और अधिक पाने की चाहत रहती है। हमारी यही चाह सब बिमारियों की जड़ है।
            एक दाल अथवा सब्जी से रोटी खा लो चाहे छप्पन भोग बना लो, रोटी तो वही दो ही खानी हैं। जब इन्सान ईश्वर से मात्र धन की कामना करता है तो वह उसे प्रचुर धन तो देता है। परन्तु साथ ही यह भी कहता है कि बेटा अब अपनी सारी मनचाही वस्तुएँ खाकर तो दिखा। वह खजाने के ढेर बैठा हुआ भी खाली हाथ रहता है। उसे समझ ही नहीं आती कि उसके साथ हो क्या रहा है? उसके पास दुनिया के सब सुख और ऐश्वर्य हैं, वह उनका भोग नहीं कर पा रहा।
             मालिक मनुष्य को धन के साथ ऐसे रोग भी उपहार में दे देता है कि डाक्टर उसे हर तरह के खाने की चीजों का परहेज बता देते हैं। जो खाद्य उसे खाने में अच्छे लगते हैं, अब वह उन्हें का नहीं सकता। वह बस टुकुर-टुकुर ताकता हुआ उन मनपसन्द खाद्य पदार्थों को निहारता रहता है। दिन भर में ढेरों दवाइयाँ खाता रहता है। तब फिर उस मालिक से गिला-शिकवा करता है। वह मनुष्य पर हंसता है कि मनचाहा पाकर भी शिकायत करता है मूर्ख मनुष्य।
            कहने को मनुष्य को पहनने के लिए वास्तव में दो जोड़ी कपड़ों की आवश्यकता होती है। एक पहनो और फिर दूसरा अगले दिन पहनने के लिए धोकर सूखने डाल दो। हमने कपड़े की हवस भी इतनी बड़ा ली है जो एक और टेंशन कि कारण बन जाती है। हम सब लोगों की अल्मारियाँ कपड़ों से भरी रहती हैं फिर भी हमारे पास कहीं जाते समय पहनने के लिए कपड़े ही नहीं होते। बस एक ही रोना रोते रहते हैं सब कि क्या पहने कपड़े ही नहीं हैं। 
          अरे कोई पूछे तो सही कि भाई ये जब कपड़े पहनने के लिए हैं ही नहीं तो फिर ये इतनी सारी अल्मारियाँ कपड़ों से क्योंकर भरी पड़ी हैं। यह त्रासदी है कि न हम खुद उन कपड़ों को पहनते हैं और न ही मंहगे और ब्राँडेड होने के कारण किसी को देना चाहते हैं। कभी शादी-ब्याह या पार्टी में जाना हो तो यही रोना रहता है कि कपड़े ही नहीं है तो क्या पहने? क्या आप में से किसी के पास भी इसका जवाब है? हम सभी तो एक ही‌ नाव पर सवार हैं।
          रहने के लिए भी एक छत मनुष्य को चाहिए होती है। परन्तु जब सौभाग्य से उसे एक मनपसंद घर मिल जाता है तब वह दूसरा और फिर तीसरा घर बनाना चाहता है। कोई अन्त नहीं, इच्छाएँ तो असीम हैं। उनके पीछे भागते-भागते कब तक अपने सुख-चैन की आहूति दोगे। पहले घर बन गया तो हम बड़े प्रसन्न हुए कि चलो सिर पर छत तो हो गई। थोड़े दिनों बाद दिमाग में फिर कीड़ा कुलबुलाने लगता है कि घर छोटा है गुजारा नहीं होता। अब बड़ा घर चाहिए। इसी तरह हम अपने दुखी होने के लिए हजारों बहाने ढूँढते ही रहते हैं।
             एवंविध आधुनिक भौतिक उपकरणों के पीछे हम भागते रहते हैं। अपनी हैसीयत के अनुसार पहले छोटी गाड़ी, फिर बड़ी गाड़ी और फिर मंहगी-से-मंहगी गाड़ी। इसी प्रकार टीवी, फ्रिज, मोबाइल फोन और बच्चों के खिलौने आदि। फिर भी हर समय का रोना ही रहता है। अरे भाई, अपने इस क्षणभंगुर जीवन को शान्ति से व्यतीत करना शुरू कर दो। जीवन का आनन्द उठा लो।‌ ऑंख बन्द होने के उपरान्त सब यहीं छूट‌ जाएगा।
           हमारी निस्सीम कामनाएँ हमारा जीना दूभर कर देती हैं। हम चक्करघिन्नी की तरह इस दुनिया में गोल-गोल घूमते रहते हैं। जीवन की चक्की में पिसते हुए रोते-झींकते रहते हैं। यह विचार मन में नहीं आता कि- 
        सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
          चार दिन के लिए मिली इस जिन्दगी में उस मालिक को दो घड़ी बैठकर याद कर लिया जाए जिसने इस जीवन में हमारी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण कर दी हैं। यदि मनुष्य जीवन में थोड़ा सन्तोष कर ले तो बहुत मजे से इस मानव जीवन का आनन्द ले सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 14 जनवरी 2026

बच्चों को बिगाड़ते माता-पिता

बच्चों को बिगाड़ते माता-पिता

दादा-दादी या नाना-नानी पर हमेशा से यह आरोप लगता रहता है कि वे बच्चों को वे बिगाड़ते हैं। परन्तु आज स्थितियाँ बिल्कुल बदल गई हैं। हम अपने आसपास देखते हैं कि उनके माता-पिता ही उन्हें बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मेरा विचार है कि इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता। आजकल एकल परिवार का चलन बढ़ गया है। प्रायः घरों में एक या दो बच्चे ही होते हैं। 
            इक्कीसवीं सदी के माता-पिता दोनों ही आज उच्च शिक्षा ग्रहण करके नौकरी कर रहे हैं अथवा अपना व्यवसाय कर रहे हैं। दोनों ही अपने-अपने कार्यों में बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। उनके पास समय का अभाव रहता है। वे अपने उन बच्चों के लिए समय ही नहीं निकल पाते जिनके लिए वे इतनी मेहनत कर रहे हैं। इसलिए वे उस कम समय में अपने बच्चों को बहुत कुछ दे देना चाहते हैं। उनकी परवरिश में किसी तरह की कोई कमी नहीं रखना चाहते।
          इसके अतिरिक्त जीवन की ऊँचाइयों को छूने की महत्त्वाकाँक्षा रखने वाले वे या तो सन्तान चाहते ही नहीं हैं या फिर एक बच्चे से ही सन्तोष करना चाहते हैं फिर चाहे वह लड़का हो या फिर लड़की। इसलिए भी वे बच्चों के प्रति बहुत ही सम्वेदनशील होते जा रहे हैं। आज मॅंहगाई आसमान छू रही है। बच्चों की विद्यालयीन शिक्षा पर भी बहुत खर्च होता है। उच्च शिक्षा के व्यय के विषय में तो पूछना ही बेकार है। इसलिए भी आधुनिक माता-पिता अधिक बच्चे पैदा नहीं करना चाहते।
           वे बच्चों को उनकी आवश्यकता से कहीं मॅंहगी वस्तुएँ खरीद कर देते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चों को दुनिया की हर वो वस्तु खरीद कर देना चाहते हैं जिसे वे खरीद सकते हैं। वे सोचते हैं हमारे पास भरपूर पैसा है तो बच्चों को हम ऐश क्यों न कराएँ? हमारे बच्चे किसी भी मॅंहगी अथवा सस्ती वस्तु के लिए किसी का मुँह क्यों देखें?
            पुराने समय में बच्चे बड़े भाई-बहनों के छोटे हुए कपड़े या जूते-चप्पल पहन लिया करते थे। पुरानी पुस्तकों से पढ़ लिया करते थे। आजकल परिस्थितियॉं बदल गई हैं। परन्तु आज एक घर में यदि दो बच्चे हैं तो वे मिलकर उन खिलौनों से नहीं खेलना चाहते। दोनों के पास ही उनके अपने-अपने खिलौने, बिस्तर व सुन्दर सजे हुए कमरे होते हैं जो सभी आधुनिक उपकरणों से युक्त होते हैं। 
           पहले दादा-दादी अथवा नाना-नानी बच्चों से लाड़ लड़ाते थे और जो भी उनकी मनपसन्द वस्तुएँ उन्हें खरीदकर देते थे। इसीलिए कहा जाता था कि वे उन्हें सदा बिगाड़ते रहते हैं। परन्तु आज माता-पिता इस कार्य को बड़ी कुशलता से कर रहे हैं। बच्चों को न तो वे डाँटते हैं या डपटते हैं और न ही मारते हैं। उनकी हर जायज-नाजायज माँग को पूरा करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। यही कारण है कि बच्चे आज जिद्दी और बददिमाग होते जा रहे हैं।
             वे अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते, बस अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं। उनकी बला से सारी दुनिया भाड़ में जाए, और-तो-और माता-पिता की भी उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। बस उनकी माँगे बस पूरी होती रहनी चाहिएँ। किसी के साथ समझौता करके चलना उनकी प्रवृत्ति में ही नहीं है बल्कि शान के विरूद्ध होता है। उनकी इस प्रवृत्ति को उनके माता-पिता और अधिक हवा देते हैं। इसलिए बच्चों का दिमाग सातवें आसमान पर रहता है।
          पहले बच्चे अपने नाना-नानी, मौसी या बुआ आदि के घर छुट्टियों में कुछ दिन बिताने के लिए चले जाया करते थे। आज समय के साथ यह वाला व्यवहार भी बदल गया है। आज माता-पिता को ही विश्वास नहीं आता कि उनके बच्चे वहाँ ठीक से रह सकेंगे तो फिर उन बच्चों के विषय में कहना ही क्या है? वे तो नखरे दिखाएँगे ही, उन रिश्तों के प्यार व सम्मान को भूलकर वहाँ की ढेरों कमियाँ निकालेंगे ही। माता-पिता भी उनकी बातों को सच मानकर उन्हीं का साथ देते हैं।
            माता-पिता अपने समयाभाव के कारण बच्चों को इतना अधिक बिगाड़ते जा रहे हैं कि फिर समय बीतने पर वे स्वयं ही उनसे डरने लगे हैं। बच्चों की सारी गलतियाँ नजरअंदाज करते-करते उनके मोह में अन्धे होते जा रहे हैं और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें अनजाने में ही खुदा बनाते जा रहे हैं।
           बच्चों के सुखद भविष्य के लिए उन्हें सभी मॅंहगी वस्तुएँ अवश्य दिलाएँ परन्तु साथ ही उन्हें सुसंस्कार भी दें जिससे वे अहंकारी न बने। पहले सभी को अपने बराबर समझने की प्रवृत्ति अपनाऍं और फिर यही बच्चों को भी सिखाऍं। यदि माता-पिता बच्चों को सुसंस्कृत बना सकें तो देश व समाज के प्रति अपने दायित्व का पूर्ण रूप से निर्वहण कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

छह शत्रुओं से दूर रहना

छह शत्रुओं से दूर रहना 

भौतिक सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की इस संसार में जिन लोगों को चाहत है उनके लिए मननशील होना बहुत आवश्यक होता है। इस जीवन के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करते हुए उन्हें अपने जीवन में नित्य उन्नति के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। इसीलिए हमारे मनीषी सफलता का मन्त्र देते हुए कह रहे हैं-
      षड्दोषा: पुरुषेणेव हातव्या भूतिमिच्छता।
      निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
अर्थात् ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता इन छह दोषों से दूर रहना चाहिए।
        जीवन में किसी प्रकार का कष्ट न आए और वह सुखपूर्वक बीते, इसके लिए थोड़ा-सा त्याग करना पड़ता है। सबसे पहले तो मनुष्य को अपनी नींद का त्याग करना चाहिए। यदि वह सोता रहेगा तो वह लूजर रहेगा। उसके जो साथी समय पर अपने कार्य करते हैं वे रेस में उससे आगे निकल जाते हैं और वह पिछड़ जाता है। उसे हार का स्वाद चखना पड़ता है जो वास्तव में बहुत कष्टकर होता है। इसीलिए कहते हैं-
        उठ जाग मुसाफिर भोर भई 
         अब रैन कहाँ जो सोवत है।
         जो सोवत है वो खोवत है 
         जो जागत है सो पावत है॥
इसका अर्थ है कि मनुष्य को जाग जाना चाहिए यानी उसे समय रहते सचेत हो जाना चाहिए। जो होता हअपने आवश्यक कार्यो को समय रहते निपटा लेना चाहिए। जो समय बीतने पर भी सोता है अर्थात् सजग नहीं रहता, वह अपना सब कुछ खो देता है। इसलिए बाद में उसे पछताना पड़ता है। समय बीतने पर उस पश्चाताप का कोई औचित्य नहीं रह जाता। कहा गया है -
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
         तन्द्रा यानी यदि रात को ठीक से नींद पूरी न हो सके तो दिन भर सुस्ती छायी रहती है और बार-बार झपकी आती रहती है। इससे बचना चाहिए। प्रयत्न यही होना चाहिए कि नींद के साथ समझौता न किया जाए। आजकल के बच्चों में यह बिमारी बढ़ती ही जा रही है कि वे रात को देर तक पढ़ते रहते है और फिर दोपहर बाद जागते हैं। इसी तरह नाइट शिफ्ट में नौकरी करने वालों का भी यही हाल होता है। रात देर तक क्लबों व पार्टियों में रहने से भी यह समस्या बढ़ती है। इस तरह नींद के चक्र के गड़बड़ाने से बाडी क्लाक बिगड़ जाता है। इससे बहुत-सी बिमारियाँ मनुष्य को घेरने लगती हैं। उसका शरीर थकने लगता है।
           जब भय किसी मनुष्य के मन में घर करने लगता है तब वह किसी भी नए कार्य को करने से घबराता है। हर काम में खतरा तो जुड़ा होता है। जो खतरों से जीतकर आगे बढ़ता है, वही सफलता प्राप्त करता है और जो डरकर कदम पीछे खींच लेता है वह निस्सन्देह जिन्दगी की दौड़ में पिछड़ जाता है।
          क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो हर कदम पर उसे अपमानित करवाता है। उसके बनते हुए कामों को बिगाड़ देता है। उसे हरा देता है औरअपनों से अलग-थलग करवा देता है। इसे जीतना हम मनुष्यों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है। 
          आलस्य मनुष्य को सदा अवनति की ओर धकेलता है। हाथ पर हाथ रखकर बैठने से तो रोटी का निवाला भी मुँह में नहीं जाता। उसे खाने के लिए भी तो श्रम करना पड़ता है। यदि आलस्य के कारण भाग्य के भरोसे वह बैठा रहेगा तो उस पर जीवन में असफल रहने का ठप्पा लग जाएगा।
          दीर्घसूत्रता के कारण मनुष्य अपना आज का कार्य कल पर टालता ही जाता है। वह कल कभी नहीं आता और उसका कार्य कभी पूरा नहीं हो पाता। इसी बात को स्पष्ट करता कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा है -
      कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
      पल में प्रलय हो जाएगी, बहुरि करेगा कब?
अर्थात् जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए। जो कार्य आज करना है, उसे अभी कर लेना चाहिए। कारण है पल भर में प्रलय अथवा मृत्यु या कोई बड़ी बाधा आ सकती है। तब फिर वह काम कब करोगे? 
          यह दोहा समय के महत्व को बताता है और हमें टालमटोल करने से रोकता है कि किसी भी कार्य को भविष्य पर नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जीवन अनिश्चित है। यह दोहा हमें कर्मठता और तत्परता सिखाता है, कि हमें अपने सभी कार्यों को समय पर पूरा करना चाहिए और उन्हें टालना नहीं चाहिए। मनुष्य को इस संसार में जीने के लिए सीमित समय ही मिलता है। यदि उसे अपनी मूर्खता से बर्बाद कर देगा तो अपने कार्यों को पूर्ण नहीं कर सकेगा।
           जो भी व्यक्ति संसार में नाम कमाना चाहता है, सभी सुखों को पाना चाहता है, सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ना चाहता है, उसे निरन्तर कठोर परिश्रम करना चाहिए। निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता इन दोषों को अथवा शत्रुओं को मनुष्य को अपने जीवन में कदापि स्थान नहीं देना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

आत्मरमण करने वाले

आत्मरमण करने वाले

भौतिक संसार के क्रियाकलापों को करने में हम बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। अपने विषय में सोचने का हम समय निकाल ही नहीं पाते। इसलिए हम स्वयं से नित्य प्रति दूर और दूर होते जाते हैं। हमें आत्ममन्थन करने की महती आवश्यकता होती है। जब तक हम अपने विषय में नहीं सोचेंगे तब तक आत्मोद्धार सम्भव नहीं हो सकता। स्वयं से स्वयं को मिलाना भी उतना ही आवश्यक होता है जितना हम दूसरों के विषय में जानकारी जुटाते हैं। उनके बारे में हम सब कुछ जान-समझ लेना चाहते हैं।
           इसके विपरीत जो अपने अन्तस में विराजमान ईश्वर को पाने के लिए आत्म साधना में लीन हो जाते हैं, वे भौतिक संसार के सभी कार्य व्यवहार करते हुए भी विदेहराज जनक की तरह ऊपर उठ जाते हैं। उनके सभी भौतिक कार्य केवल मात्र आवश्यकता पूर्ति के लिए ही रह जाते हैं। उनमें उनका मन नहीं रमता। वे बारम्बार नाम जाप की ओर प्रवृत्त होते रहते हैं। वे उस दिव्य आनन्द का रसास्वादन करते रहना चाहते हैं। उसकी मस्ती में अपना जीवन व्यतीत करना चाहते हैं।
           आत्मरमण करने वाले लोग व्यवहार में कैसे होते हैं? इस विषय में इष्टोपदेश' का कथन है कि-
        ब्रुवन्नपि न  हि ब्रूते गच्छन्नपि न गच्छति।
         स्थिरीकृतात्मवस्तु पश्यन्नपि न पश्यति॥
अर्थात् अपनी आत्मा में स्थिर रहने वाले व्यक्ति बोलते हुए भी नहीं बोलते, जाते हुए नहीं जाते और देखते हुए नहीं देखते।
            यह श्लोक वास्तव में उन योगीजनों की अवस्था का वर्णन करता है जो आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और अपनी चेतना को आत्मा में स्थिर कर लेते हैं। वे बाहरी दुनिया की क्रियाओं में लिप्त होते हुए भी उनसे प्रभावित नहीं होते और वास्तव में वे उस क्रिया के कर्ता नहीं होते। बल्कि उनका शरीर मात्र कार्य करता है जबकि वे स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) में मग्न रहते हैं।
           इस विषय में यह सब पढ़कर और  सुनकर बड़ा विचित्र लगता है पर सच्चाई यही है। वे सबके साथ बैठे हुए भी अकेले होते हैं क्योंकि उन्हें बतरस में आनन्द का अनुभव नहीं होता। यदि किसी प्रश्न का उत्तर उन्हें देना पड़े तो हाँ या हूँ करके टाल देते हैं। कहीं भी जाते समय अपने ध्यान में मग्न रहते हैं। यदि वे अपनी भौतिक नजरों से कहीं देखते हुए लगते हैं तो भी वास्तव में दूसरो को न देखकर अपने अन्तस में झाँक रहे होते हैं।
           आत्मरमण करने वाले स्वयं में इतने खोए रहते हैं अथवा आत्म अभ्यास में इतना अधिक जुटे रहते हैं कि किसी के पास बैठे रहते हुए भी अपनी साधना में रत रहते  हैं। किसी को उनके साधना में लीन होने का पता ही नहीं चल पाता। इसीलिए बैठते-उठते, सोते-जागते, चलते-फिरते प्रभु के नाम का भजन करते रहते हैं या साधना करते रहते हैं।भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में इन लोगों के विषय में हमें बताया है कि जो सदा ही आत्मरमण करने वाले होते हैं वे कैसे होते हैं-
       यस्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
      आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते॥
अर्थात् जिसकी अपनी आत्मा में प्रीति होती है जो आत्मा में ही तृप्त रहता है और अपनी आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उसके लिए कुछ भी कर्त्तव्य नहीं होता।
           जो व्यक्ति आत्म साधना में लगा रहता है, उसे पुन: पुन: आत्मानन्द को उसी प्रकार अनुभव करने की इच्छा होती है जैसे हम अपनी प्रिय भौतिक वस्तुओं का बार-बार आनन्द लेना चाहते हैं। अपने अन्तस को खोजने में लगा हुआ व्यक्ति आत्मानन्द का इतना अभ्यासी हो जाता है कि उसे सारे भौतिक सुख-साधन बेमायने लगने लगते हैं। वह सांसारिक कार्यों का सम्पादन करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता अर्थात् निर्लिप्त रहता है। यही उसकी विशेषता होती है।
            भगवान श्रीकृष्ण ने बारबार यही उपदेश दिया है कि मनुष्य को संसार में जल में कमल की तरह निर्लिप्त होकर रहना चाहिए। इससे मनुष्य में कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता। वह अपने सभी कृत कार्यों का श्रेय उस परमपिता परमात्मा को देता हुआ आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रशस्त होता है। वह कर्मफल में लिप्त नहीं होता। वह अपना कर्म निष्ठा से करता है।
          आत्मरमण करने वाले लोगों को इस भौतिक संसार के लोग आम भाषा में पागल कह सकते हैं परन्तु वे इस बात से अनजान रहते हैं कि वे क्या खो रहे हैं और ये साधक क्या पा रहे हैं? आत्माभ्यासी लोग ही जीवन का वास्तविक आनन्द लेते हुए अपने सुखद पारलौकिक भविष्य को सुरक्षित करने में सफल हो जाते हैं। दुनिया के जंजालो में फंसे हुए अन्य लोग ऐसा नहीं कर पाते।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 11 जनवरी 2026

छीनकर खाने से पेट नहीं भरता

छीनकर खाने से पेट नहीं भरता

इस संसार का यही दस्तूर है कि छीन कर खाने वालों का पेट कभी नहीं भरता। ऐसे लोगों की भूख और-और करके राक्षसी सुरसा के मुँह की तरह दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। उसमें सब कुछ समाता जाता है। इसके विपरीत संसार में जो लोग मिल-बाँटकर खाते हैं, वे ईश्वर की कृपा से कभी भूखे नहीं सोते। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि उनके साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर नित्य प्रति चलने वाले बहुत से निस्वार्थ लोग जुड़ते जाते हैं। उनका काफिला बढ़ता जाता है।
             छीना-झपटी करने वाले अपने जीवनकाल में सदा अतृप्त रहते हैं। इसका कारण है उनकी लालची मनोवृत्ति। स्वयं कुछ करना नहीं पर दूसरों के पास जो कुछ भी अच्छा लगे उसे छीन लो। ऐसी ही मनोवृत्ति वाले लोग भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, लूट-खसौट जैसे अनैतिक कार्यों को अंजाम देते हैं। इन लोगों को समाज का शत्रु भी कहा जाता है जो दूसरे के खून-पसीने से कमाए हुए धन पर ऐश करना चाहते हैं। इनके मन को शायद कभी यह विचार नहीं कचोटता कि वे जाने-अनजाने अपने लिए खाई खोदी रहे हैं। हो सकता है कि भविष्य में वे उसी में गिरकर लहूलुहान हो जाऍं।
           ये लोभी प्रवृत्ति के लोग कितना भी धन एकत्र कर लें अथवा सुख-सुविधाएँ बटोर लें पर इनका मन अमीर नहीं होता। मन से ये सदा गरीब ही रहते हैं क्योंकि इनका भटकाव कभी समाप्त ही नहीं होता। इनकी ऊपरी चमक-दमक देखकर भले ही लोग इनसे प्रभावित हो जाएँ परन्तु जब उनकी वास्तविकता सामने आती है तो उनसे किनारा करने में भी लोग समय नहीं लगते। उस समय अपनी गलती का सुधार कर सकते हैं। 
            इन लोगों के बच्चों में भी जीवन में संघर्ष करके कुछ पाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। वे उस नाजायज आए हुए धन का दुरूपयोग करते हैं और उसे उड़ाते हैं। बहुधा उनका धन व्यसनों में उड़ जाता है। सयाने कहते हैं- 
                 पैसा बोलता है। 
उनके इसी व्यवहार से यह उक्ति सिद्ध हो जाती है। तभी उनके पैसे में बरकत नहीं होती। इधर आता है उधर जाता है। पता ही नहीं चलता कहाँ आया और कहाँ गया? 
           वे यदि किसी की सहायता करते हैं या दान देते हैं तो उसमें प्रशंसा पाने का उनका स्वार्थ हावी होता है। केवल अपना प्रचार करना ही उनका उद्देश्य होता है। जबकि हमारे शास्त्र हमें यही समझाते हैं -
    दाऍं हाथ से दो तो बाऍं हाथ को पता न चले।
अपने नाम का पत्थर लगवाकर, फोटो खिंचवाकर वे महान दानवीर बनकर लोगों को प्रभावित करना चाहते हैं। वास्तव में किसी की सहायता करने की प्रवृत्ति उन लोगों में नहीं होती।
            इसके विपरीत मिल-जुलकर और बाँटकर खाने वालों को किसी नाम अथवा यश की कामना नहीं होती। वे इन सब तुच्छ भौतिक उपाधियों के पीछे नहीं भागते  बल्कि वे उपलब्धियॉं दास की तरह उनके पीछे-पीछे चलती हैं। दोनों प्रकार के लोगों में यही मुख्य अन्तर होता है। हम कह सकते हैं कि सदा दूसरों के कष्ट को दूर करने वाले कोई साधारण जीव नहीं हो सकते। वे लोग अपने आप में विशेष होते हैं। उन्हें अपनी चिन्ता नहीं होती, वे यथासम्भव परहित की कामना में जुटे रहते हैं। ईश्वर उनके खजानों में कभी कोई कमी नहीं रखता जो मिल-बाँटकर खाते हैं। 
            उनके पास यदि कभी किसी वस्तु की कमी हो भी जाए तो उन्हें पता भी नहीं चलता और वह वस्तु किसी अन्य बहाने से उनके पास स्वयं ही आ जाती है जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती है। इसके पीछे उन महापुरुषों की इच्छाशक्ति और निस्वार्थ भावना ही कारण होती है जिसके परिणाम स्वरूप ईश्वर उनको सदा बरकत देता है। वे जिनके लिए निःस्वार्थ कार्य करते हैं, वहीं उनकी भुजाऍं बन जाती हैं। उनका बढ़ता कारवॉं उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है।
             यह सत्य है कि ऐसे लोगों का कभी कोई कार्य नहीं अटकता। उनके सत्कार्यों में साथ देने वाले बहुत से लोग उनके साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर चलने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार वे सैंकड़ों व हजारों हाथों वाले बनकर संसार में जीते हैं।
            जहाँ तक हो सके मनुष्य को छीनकर खाने वाले बनकर अकेले हो जाने की बनिस्बत दूसरों के साथ मिल-बाँटकर खाने वाला बनने का यत्न करना चाहिए। हम सभी अपने बच्चों  को सदा दोस्तों के साथ शेयरिंग करके ही खाने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। इसका अर्थ यही है कि ऐसा करना अच्छा होता है। अत: हमें स्वय भी इस आदत का अनुसरण करना चहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 10 जनवरी 2026

किशोरावास्था में अकेलेपन की समस्या

किशोरावस्था में अकेलेपन की समस्या 

आज के भाग्म भाग वाले जीवन में किशोरावस्था में भी बहुत सारी चुनौतियों का सामना किशोरों को करना पड़ता है। उन पर अकेलापन हावी होता जा रहा है। वे दिन-प्रतिदिन चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। आजकल प्राय: सभी लोग शिकायत करते है कि किशोर किसी के साथ सीधे मुँह बात नहीं करते। पता नहीं वे किस नशे में रहते हैं। परन्तु बच्चे इस अकेलेपन की समस्या से झूझते हुए दिखाई देते हैं। किशोरों की यह अवस्था युवावस्था और बाल्यावस्था के बीच में पुल की तरह होती है। 
             किशोरावस्था में अकेलापन एक आम और गम्भीर समस्या बनती जा रही है जो पहचान बनाने, सामाजिक दबाव बनाने, सोशल मीडिया और मानसिक संघर्ष के कारण हो सकती है। इससे अलगाव, उदासी, चिड़चिड़ापन और शारीरिक समस्याऍं पैदा होने लगती हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यता पर इसका प्रभाव पड़ने लगता है। इस अवस्था में किशोर स्वयं को बड़ा घोषित करना चाहते हैं परन्तु उनका मानसिक स्तर बड़ों जैसा नहीं होता है। 
            किशोरों में भावनाओं को नियन्त्रित करने वाला हिस्सा अपरिपक्व होता है। इस कारण वे अकेलापन अधिक अनुभव करते हैं। स्वयं को समझने की प्रक्रिया में वे‌ अकेलापन महसूस करने लगते हैं। दूसरों की परफेक्ट जिन्दगी को देखकर उन्हें पीछे छूट जाने का डर सताने लगता है। वे अपनी तुलना दूसरों से करने‌ लगते हैं। ऐसा करना उनके लिए उचित नहीं कहा जा सकता। वे भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की क्षमता एक जैसी नहीं होती है।
             वे अपने लिए पूर्ण स्वतन्त्रता चाहते हैं परन्तु उसके मायने न पता होने पर उसे सम्हाल नहीं पाते। उस स्वतन्त्रता का दुरूपयोग करते हुए कुछ किशोर यदाकदा बुरे दोस्तों की संगति में पड़कर जाते हैं यानी मित्रों के कहने में आकर व्यसनों में उलझ जाते हैं। इस प्रकार अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं।
          इस वय में वे छोटे भाई-बहनों के साथ रहना पसद नहीं करते। वे उन्हें अपने बराबर के नहीं लगते। इसलिए वे उनसे दूरी बनाकर रहते हैं। बड़े उन्हें बच्चा मानते हुए अनदेखा करते हैं। इस कारण वे निपट अकेले हो जाते हैं। अपने इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वे नित नए उपाय तलाशते हैं। हमउम्र साथियों को ढूँढते हैं। उनके साथ वे अपना समय व्यतीत करते हैं, मौज-मस्ती करते हैं, हंसी-मजाक करते हैं और घूमते-फिरते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे दोस्तों को खोजकर उन्होंने कोई खजाना पा लिया है।
              वे अपने माता-पिता का समय चाहते हैं। वे उनसे सलाह-मशविरा करना चाहते हैं। स्कूल और अपने दोस्तों की समस्याओं को उनके साथ शेयर करना चाहते हैं। वे माता-पिता की डाँट-डपट के लिए तरसते हैं। पर माता-पिता दोनों अपने-अपने कार्य-व्यवसाय में सवेरे से शाम तक बहुत ही व्यस्त रहते हैं। सुविधा सम्पन्न घरों  की स्त्रियाँ जो नौकरी या व्यवसाय नहीं करतीं वे क्लबों, किटी पार्टियों या शापिंग आदि में व्यस्त रहती हैं। उनके पास भी बच्चों के लिए समय का अभाव रहता है।
           समयाभाव के मुआवजे के रूप में वे बच्चों को उनकी मनपसन्दीदा मंहगी वस्तुएँ खरीदकर देते हैं। घूमने जाने पर उनको आवश्यकता से अधिक धन थमाकर उनका दिल जीतने की नाकाम कोशिश करते हैं। किशोरों को धन से अधिक माता-पिता से लाड-प्यार करने की आवश्यकता होती हैं। वे बचपन की तरह उनके साथ रूठने-मानने का खेल खेलना चाहते हैं। बहुत दुखी की बात है कि उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाती।
            घर में सबके बीच रहते हुए भी वे स्वयं को बहुत अकेला महसूस करते हैं। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वे अपने कमरे में अकेले बैठकर टीवी देखना और गेम्स खेलना पसन्द करते हैं। मोबाइल पर वाट्स अप से दोस्तों से गप्पें हाँककर सन्तुष्ट होते हैं। फेसबुक पर मनपसन्द पोस्ट या वीडियो देखकर अपना समय बिताना उन्हें अच्छा लगता है। अपनी पसन्द के गाने सुनते हुए वे अपना मन बहलाने की नाकामयाब कोशिश करते हैं।
             किशोरावस्था में बच्चे संक्रमण काल से गुजर रहे होते हैं उन्हें इस अवस्था में मात-पिता के प्यार-दुलार की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। वे उनका ध्यान आकर्षित करने की भरसक कोशिश करते हैं। उन्हें संस्कार देने की बहुत जरूरत होती है। इस अवस्था से सभी को ही गुजरना होता है। माता-पिता को किशोरावस्था की कठिनाइयों को समझने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों से वार्तालाप करते रहना चाहिए। उनकी छोटी-छोटी समस्याओं को सुलझाना चाहिए। 
            किशोरों के साथ मित्रवत व्यवहार करते हुए उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि जीवन के इस कठिन दौर में वे अकेले नहीं हैं बल्कि माता-पिता उनके साथ हैं। यह विश्वास किशोरों की बहुत बड़ी पूँजी होता है अन्यथा वे दुनिया की भीड़ में स्वयं को अकेला समझते हुए निराश हो जाते हैं। इसलिए अकेलेपन की समस्या से झूझते हुए कुछ किशोर डिप्रेशन के भी शिकार हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

संसार में खाली हाथ आता‌

सज्जनों पर अविश्वास

मनुष्य का यह दुर्भाग्य होता है जब वह कुसंगति में पड़कर दुर्जनों के व्यवहार को बहुत करीब से देखता है। उनकी निर्दयता के कारण उन पर विश्वास नहीं कर पाता। उनके लिए यह कहना कठिन होता है कि वे लोग किस समय पर क्या-से-क्या कर डालें? हमारे सयाने कहते हैं कि दुजर्नों के साथ की गई न दोस्ती अच्छी होती है और न ही दुश्मनी भली होती है। ये लोग किसी भी व्यक्ति के विश्वासपात्र नहीं होते। उनके लिए किसी की भी जान ले लेना मानो खेल होता है।
             इसी कारण दुर्जन की संगति करने वाला मनुष्य सज्जनों पर भी विश्वास नहीं  कर पाता। उसका मन यह बात मानने के लिए तैयार नहीं हो पाता कि कोई स्वार्थ रहित होकर भी किसी की भलाई के विषय में सोच सकता है। वे इस बात से अनजान रहते हैं कि दूसरों का सदा ही हित साधने वाले लोग सज्जन कहलाते हैं। उनके मन किसी भी जीव के लिए भिन्न भावना नहीं होती।
          दुर्जनों की संगति से पड़ित व्यक्ति सज्जनों के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाता।  इसी बात को किसी विद्वान बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा है कि दूध का जला छाछ को फूँक मारकर पीता है-
दुर्जनदूषितमनस: सुजनेष्वपि नास्ति विश्वास:।
बाल पायसदग्धो दध्यपि फूतकृत्य भक्ष्यति॥
अर्थात दूषित मन वाले दुष्ट लोग सज्जनों पर भी विश्वास नहीं करते जिस प्रकार गरम दूध से जला हुआ बच्चा दही को भी फूँक मारकर खाता है अथवा छाछ को फूँककर पीता है।
          दुर्जनों की संगति में रहने वाला हर मनुष्य उनके ही रंग में रंग जाता है। वह भी कठोर व निर्दय बन जाता है। अपना स्वार्थ साधना ही उसका एकमात्र लक्ष्य होता है। उसके इस लक्ष्य में जो भी बाधक होता है वह उसे गाजर-मूली की तरह काट फैंकता है। दया, ममता और सहानुभूति जैसे शब्द उसके शब्दकोश मानो निकाल बाहर कर दिए जाते हैं। यदि वे इन मानवोचित गुणों का पालन करते रहें तो कठोर व निर्दय नहीं बन सकते।   
        इनके विपरीत सज्जन अपने सद् गुणों के कारण ही महान बनते हैं। उन पर आँख बंद करके विश्वास किया जा सकता है। सभी लोग एकस्वर से उनको सज्जन इसीलिए कहते हैं कि वे बिना किसी निजी स्वार्थ के सबसे जुड़ते हैं। 
          उनके लिए सभी जीव अपने होते हैं, कोई भी पराया नहीं होता। दूसरे शब्दों में कहें तो-    
                 'वसुधैव कुटुम्बकम्' 
इस उक्ति को वे चरितार्थ करते हैं जिसका अर्थ है सारी पृथ्वी अपना घर है। जब सारी धरती अपनी है तो वहाँ रहने वाले सभी जीव भी तो अपने ही होते हैं। वहॉं कोई भी पराया नहीं होता।
            सज्जनों की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि वे हर किसी के दुख-दर्द में स्वयं ही शामिल होते हैं। उनके पास कोई भी कैसी भी समस्या क्यों न लेकर जाए उसे निराश नहीं करते। सबके रहस्यों को सदा ही गुप्त रखते हैं और किसी के भी समक्ष उन्हें प्रकट करके उसे तिरस्कार का पात्र नहीं बनने देते।
        दुर्जनों में सज्जनों जैसी विशेषताओं का अंश मात्र भी गुण नहीं होता। उन्हें तो हर किसी की छिछालेदार करने में आनन्द आता है। ऐसे दुर्जन मित्रों से सदा ही सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे किसी के सगे नहीं होते। केवल स्वार्थ पूर्ति उनका लक्ष्य होता है उसके बाद तो वे पहचानने से भी इन्कार कर देते हैं। उनके साथ मैत्री हमेशा मनुष्य के पतन का कारण होती है। इस बात को भूलना उसकी भूल कहलाती है।
        सज्जनों पर अविश्वास करके मनुष्य स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कार्य करता है। उसे सज्जनों और दुर्जनों के स्वभाव का अंतर समझना चाहिए और उसी के अनुरूप ही उनके साथ व्यवहार करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सज्जनों पर अविश्वास

सज्जनों पर अविश्वास

मनुष्य का यह दुर्भाग्य होता है जब वह कुसंगति में पड़कर दुर्जनों के व्यवहार को बहुत करीब से देखता है। उनकी निर्दयता के कारण उन पर विश्वास नहीं कर पाता। उनके लिए यह कहना कठिन होता है कि वे लोग किस समय पर क्या-से-क्या कर डालें? हमारे सयाने कहते हैं कि दुजर्नों के साथ की गई न दोस्ती अच्छी होती है और न ही दुश्मनी भली होती है। ये लोग किसी भी व्यक्ति के विश्वासपात्र नहीं होते। उनके लिए किसी की भी जान ले लेना मानो खेल होता है।
             इसी कारण दुर्जन की संगति करने वाला मनुष्य सज्जनों पर भी विश्वास नहीं  कर पाता। उसका मन यह बात मानने के लिए तैयार नहीं हो पाता कि कोई स्वार्थ रहित होकर भी किसी की भलाई के विषय में सोच सकता है। वे इस बात से अनजान रहते हैं कि दूसरों का सदा ही हित साधने वाले लोग सज्जन कहलाते हैं। उनके मन किसी भी जीव के लिए भिन्न भावना नहीं होती।
          दुर्जनों की संगति से पड़ित व्यक्ति सज्जनों के प्रति आश्वस्त नहीं हो पाता।  इसी बात को किसी विद्वान बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा है कि दूध का जला छाछ को फूँक मारकर पीता है-
दुर्जनदूषितमनस: सुजनेष्वपि नास्ति विश्वास:।
बाल पायसदग्धो दध्यपि फूतकृत्य भक्ष्यति॥
अर्थात दूषित मन वाले दुष्ट लोग सज्जनों पर भी विश्वास नहीं करते जिस प्रकार गरम दूध से जला हुआ बच्चा दही को भी फूँक मारकर खाता है अथवा छाछ को फूँककर पीता है।
          दुर्जनों की संगति में रहने वाला हर मनुष्य उनके ही रंग में रंग जाता है। वह भी कठोर व निर्दय बन जाता है। अपना स्वार्थ साधना ही उसका एकमात्र लक्ष्य होता है। उसके इस लक्ष्य में जो भी बाधक होता है वह उसे गाजर-मूली की तरह काट फैंकता है। दया, ममता और सहानुभूति जैसे शब्द उसके शब्दकोश मानो निकाल बाहर कर दिए जाते हैं। यदि वे इन मानवोचित गुणों का पालन करते रहें तो कठोर व निर्दय नहीं बन सकते।   
        इनके विपरीत सज्जन अपने सद् गुणों के कारण ही महान बनते हैं। उन पर आँख बंद करके विश्वास किया जा सकता है। सभी लोग एकस्वर से उनको सज्जन इसीलिए कहते हैं कि वे बिना किसी निजी स्वार्थ के सबसे जुड़ते हैं। 
          उनके लिए सभी जीव अपने होते हैं, कोई भी पराया नहीं होता। दूसरे शब्दों में कहें तो-    
                 'वसुधैव कुटुम्बकम्' 
इस उक्ति को वे चरितार्थ करते हैं जिसका अर्थ है सारी पृथ्वी अपना घर है। जब सारी धरती अपनी है तो वहाँ रहने वाले सभी जीव भी तो अपने ही होते हैं। वहॉं कोई भी पराया नहीं होता।
            सज्जनों की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि वे हर किसी के दुख-दर्द में स्वयं ही शामिल होते हैं। उनके पास कोई भी कैसी भी समस्या क्यों न लेकर जाए उसे निराश नहीं करते। सबके रहस्यों को सदा ही गुप्त रखते हैं और किसी के भी समक्ष उन्हें प्रकट करके उसे तिरस्कार का पात्र नहीं बनने देते।
        दुर्जनों में सज्जनों जैसी विशेषताओं का अंश मात्र भी गुण नहीं होता। उन्हें तो हर किसी की छिछालेदार करने में आनन्द आता है। ऐसे दुर्जन मित्रों से सदा ही सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे किसी के सगे नहीं होते। केवल स्वार्थ पूर्ति उनका लक्ष्य होता है उसके बाद तो वे पहचानने से भी इन्कार कर देते हैं। उनके साथ मैत्री हमेशा मनुष्य के पतन का कारण होती है। इस बात को भूलना उसकी भूल कहलाती है।
        सज्जनों पर अविश्वास करके मनुष्य स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कार्य करता है। उसे सज्जनों और दुर्जनों के स्वभाव का अंतर समझना चाहिए और उसी के अनुरूप ही उनके साथ व्यवहार करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 7 जनवरी 2026

दीपक तले अन्धेरा

दीपक तले अन्धेरा

'दीपक तले अन्धेरा' हमारे सयानों ने सोच-समझकर ही यह वाक्य कहा है। दीपक जब जलता है तो चारों ओर उसका प्रकाश फैलाता है परन्तु जिस स्थान पर वह रखा जाता है यानी उसके ठीक अपने ही नीचे प्रकाश नहीं पहुँच पाता। उस स्थान पर अन्धेरा ही रहता है।
             हम इस मुहावरे के अर्थ में कह सकते हैं कि जहाँ प्रकाश या ज्ञान होना चाहिए, वहीं पर अज्ञानता या बुराई का होना। इसे खासकर ऐसे व्यक्ति के संदर्भ में कहा जा सकता है जो दूसरों को उपदेश देता है किन्तु खुद अच्छे आचरण का पालन नहीं करता या अपनी बुराइयों को अनदेखा करता है। यह उस विडम्बना को दर्शाता है कि दीपक स्वयं जलकर दूसरों को रोशनी देता है परन्तु खुद उस रोशनी से वंचित रहता है। 
            इस मुहावरे के पीछे के छुपे मर्म को समझना बहुत आवश्यक है। यह वाक्य हमें सोचने के लिए विवश कर देता है कि ऐसा कहने के पीछे हमारे विद्वानों की क्या सोच रही होगी? उनके समक्ष ऐसा क्या घटित हुआ होगा जिसके कारण उन्होंने अपनी ऐसी राय बनाई होगी?
              इस विषय पर बहुत विचार करने के बाद मैंने यही निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य अपने कुटुम्बी जनों के लिए जैसे जीवन की परिकल्पना करता है अथवा जैसा समाज को बनाना चाहता है, शायद अपनों को उस साँचे के अनुरूप ढाल पाने में उसे सफलता हाथ नहीं लग पाती। 
             बहुत बार ऐसा भी देखा गया है कि समाज सुधार करने वालों के अपने बच्चे राह भटककर गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसका कारण है कि वे अधिक समय तक घर से बाहर के झमेलों को सुलझाने में लगे रहते हैं। उन्हें निपटाने में इतना व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने घर और बच्चों का उन्हें होश ही नहीं रहता। अपने घर-परिवार और बच्चों को वे उतना समय नहीं दे पाते जितना उनके लिए आवश्यक होता है। घर में थोड़ा-सा समय रहकर अपने स्वयं के बच्चों को संस्कारित करने का ख्याल ही उनके मन से शायद निकल जाता है। अथवा वे ऐसा ही मानकर चलते हैं कि उनके घर के सदस्य तो कोई गलत कार्य कर नहीं सकता।
            एक शिक्षक जो अपने छात्रों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है पर खुद रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, उसके लिए कहा जा सकता है कि 'दीपक तले अन्धेरा है।' एक व्यक्ति जो दूसरों को अच्छा करने की सलाह देता है परन्तु स्वयं गलत काम करता है, वह इस मुहावरे का सटीक उदाहरण है। यानी हम कह सकते हैं कि दूसरों को ज्ञान देना बहुत सरल है और स्वयं अज्ञानी रहना या उस ज्ञान की अनुपालना न करना भी हो सकता है।
             यह सत्य है कि माता-पिता यदि बच्चों को अपने पास बिठाकर संस्कारित नहीं कर पाएँगे तो उनका भटकना तो स्वाभाविक ही है। परन्तु यदि उन पर सस्कारों का अंकुश ही नहीं रहेगा तो वे अपनी मनमानी निश्शंक या निडर होकर करते रहेंगे। मनमानी करते हुए वे कहाँ तक पहुँच जाएँगे इस विषय में कोई कुछ भी नहीं कहने में समर्थ नहीं हो सकता।
            इतिहास के पन्ने खंगालने पर हमें इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जहाँ महान साम्रज्यों को उनके ही अपने उत्तराधिकारियों द्वारा बरबाद कर दिया गया। आज भी समाचार पत्रों अथवा टीवी चैनलों में सुर्खियाँ बटोरते हुए ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहाँ बड़े-बड़े पदों पर विराजमान और न्यायालय में न्याय करने वालों के बच्चे कार चोरी जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं या अन्य कुकर्म करते हुए पकड़े जाते हैं। इसी प्रकार शिक्षाविदों  के बच्चे भी किसी कारण से पढ़ने से वंचित रह जाते हैं।
            एवं विध अहिंसा का पाठ पढ़ाने वालों के बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के हो जाते हैं। समाजसेवियों के घरों के बच्चे भी नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बन जाते हैं। दूसरों को धर्म का उपदेश देने वालों के यहाँ भी अधर्मी जन्म ले लेते हैं। देशभक्तों की सन्तानें भी देशद्रोही हो सकती हैं। ईमानदार लोगों के उत्तराधिकारी समय के साथ बहते हुए भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर और दूसरों का गला काटने वाले बन जाते हैं।
          समाज को प्रकाशित करने में जुटे लोग यदि अपने घर-परिवार में इच्छित सुधार कर लें तभी 'दीपक तले अन्धेरे' वाली यह उक्ति उनके लिए अनुपयोगी सिद्ध हो सकती है अन्यथा दीपक तले अन्धेरा तो वास्तव में होता ही है इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद