शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

सांसारिक रिश्तों पर विश्वास बनाना

 सांसारिक रिश्तों पर विश्वास बनाना

बरसों बरस जिस व्यक्ति के साथ रहते हुए हम यह दम्भ भरते हैं कि हम उसे पूरी तरह से जानते और पहचानते हैं अथवा उसकी रग-रग को से अच्छी तरह वाकिफ हैं तो शायद यह कहना उचित नहीं होगा। पता नहीं जीवन के किस मोड़ ऐसी आँधी आ जाए और ऐसा झटका लग जाए कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाए। उस समय हमारे सारे अरमान शीशे की तरह चकनाचूर होकर किरच-किरच हो जाऐंगे। तब हम शायद इस काबिल भी न रह सकें कि बिखरे हुए बेरों को समेट पाएँ।
            अपने आसपास प्राय: ऐसे उदाहरण हमें देखने-सुनने को मिल जाते हैं कि जिन पर विश्वास करना वाकई असम्भव-सा प्रतीत होता है। अचानक हमें अपने साथी के विषय में ऐसी जानकारी मिल जाती है और उस समय ऐसा लगता है मानो पैरों  तले से जमीन खिसक गयी है। तब वही साँप और छुछून्दर वाली स्थिति हो जाती है। उस समय न उगलते बनता है और न निगलते ही बनता है। बड़ी ही विचित्र-सी कशमकश में फंस जाती है यह मनुष्य की जिन्दगी।
             पति अथवा पत्नी में से कोई भी यदि एक-दूसरे की पीठ के पीछे छुपकर कोई मर्यादा विरुद्ध अशोभनीय कार्य कर रहा हो और वह कुकृत्य किसी भी कारण से सार्वजनिक हो जाए या दूसरे को पता लग जाए। तब दोनों में लड़ाई-झगड़े या सिर-फुटोव्वल जैसे हालात होना स्वाभाविक होता है। उस समय दूसरा साथी बच्चों सहित किसी की परवाह किए बिना सम्बन्ध को समाप्त करके अलग रहने का चुनाव करेगा। 
          यदि विवाह के पश्चात भी विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाने हैं अथवा विवाह से पूर्व के किसी अनैतिक कहे जाने वाले सम्बन्ध को हवा देनी हो तो इसकी मान्यता न समाज देता है और न ही परिवार। ऐसे केसों में प्राय: अलगाव हो जाता है। ये साथी तो अपने-अपने जीवन को छोड़कर अन्यत्र अपने बसेरे बना लेते हैं परन्तु उनकी इन गलतियों में वे मासूम पिसते हैं जिनका इन विवादों से कोई लेनादेना नहीं होता। जी हाँ, ये उनके अपने बच्चे ही होते हैं जिनके लिए वे सदा यही कहते है कि हम इनके लिए ही सब कर रहे हैं और इन्हीं के लिए जी रहे हैं। वही ये बच्चे जीवन भर अपने माता-पिता की गलतियों की सजा भुगतते रहते हैं पर किसी का भी पक्ष नहीं ले पाते।
            वर्षों वर्ष भाई-बहन मिलकर रहते हैं। अचानक पता चलता है कि भौतिक धन-सम्पत्ति के लिए वे तो एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन गए हैं। कई बार माता-पिता के साथ वर्षो रहते हुए भी आज्ञाकारी कहा जाने वाला बेटा धमाका कर देता है कि वह उनसे अलग रहना चाहता है अथवा धोखे से सारी प्रापर्टी अपने नाम करवा कर उन्हें बुढ़ापे में अपने माता-पिता को धक्का दे देता है। उन्हें दरबदर कर देता है। उन्हें पाई-पाई का मोहताज बना देता है। कई बच्चे तो माता-पिता का सब कुछ हड़पकर उन्हें वृद्धाश्रम भेज देते हैं।
             यह तो चर्चा की हमने पारिवारिक सम्बन्धों की है। इसी तरह वर्षों तक एक साथ साझा व्यापार करते हुए साथी कब दूसरे को ठगकर सब हथिया लेते हैं पता ही नहीं चलता।‌ धोखा‌ देने के पश्चात वे एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसद नहीं करते। तब उनके मध्य‌ लम्बी और उबाऊ न्याय प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। दोनों ही पक्षों का समय और धन बर्बाद हो जाता है। यहॉं निर्दोष और ईमानदार साथी अधिक परेशान होता है। वह छल-कपट से दूर रहकर विश्वासघात नहीं करता।
             इसी प्रकार कभी-कभी पक्का और सच्चा कहलाने वाला मित्र भी पीठ में छुरा घोंप रहा होता है। अपना कोई प्रिय निकट सम्बन्धी भी कब धोखा देता हुआ सामने आ जाए कुछ पता नहीं चलता। मीठा-मीठा बनकर ये लोग कब पीठ में खंजर घोंप दें, पता ही नहीं चलता। कुछ लोग स्वार्थवश साथ जुड़ते हैं।‌ जब उनका मतलब पूरा हो जाता है तब वे कन्नी काटकर निकल जाते हैं। सामने पड़ जाने पर ऐसे मुॅंह मोड़‌ लेते हैं जैसे वे उसे पहचानते ही नहीं हैं। यह स्थिति बहुत दुखद होती है।
            जिन पर हम आँख बन्द करके कसमें खाने की बात करते हैं यदि वे धोखेबाज या  ठग निकल जाएँ तो मनुष्य का इन्सानियत पर से विश्वास उठने लगता है। उसके मन में कुछ दरकने लगता है। संसार में रहते हुए सभी सांसारिक रिश्तों पर विश्वास बनाना पड़ता है। हम सामाजिक प्राणी हैं उनके बिना अकेले रहने की कल्पना ही‌ नहीं कर सकते। जीवन में सावधानी अवश्य रखना चाहिए। अपने आँख और कान खुले रखने चाहिए ताकि हमें कोई अपना धोखा देकर तोड़ न सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

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