मंगलवार, 27 जनवरी 2026

बच्चे प्रातःकालीन सूर्य की तरह

बच्चे प्रात:कालीन सूर्य की तरह

बच्चे प्रात:कालीन सूर्य की तरह कोमल, ताजगी से भरपूर, मासूम और मनमोहक होते हैं। वे उस अवस्था में नव स्फूर्ति, नव जागृति, नव उल्लास आदि से भरे होते हैं। रात का स्याह अन्धेरा जो दुखों और कष्टों का प्रतीक हैं, उनसे मुक्त होकर मुस्कुराते हुए सूर्य पूर्व दिशा से उदित होता है। उसी प्रकार बच्चे अपने पूर्व जन्म के कर्मो को भोगकर, पुराने रोगी या वृद्ध शरीर को त्यागकर एक नए जीवन में प्रवेश करते हैं। जन्म से पूर्व बच्चा माता के गर्भ में यानी अन्धकार में रहता है और वहॉं से पोषण लेता है। उस अन्धकार से उसे तब मुक्ति मिलती है जब वह जन्म लेता है।
              बाल रवि की छवि सभी को बरबस आकर्षित करती है। प्रातः कालीन बाल रवि जब धरा पर अवतरित होता है, उस समय वह लालिमा लिए हुए होता है। लोग प्रातःकाल उठकर उसे अर्घ्य देकर अपने दिन का आरम्भ करते हैं। इस समय आकाश में उगता हुआ सूर्य सारी सृष्टि को दिन के आगमन का सन्देश देता है। सम्पूर्ण वातावरण में हलचल-सी मचने लगती है। सम्पूर्ण प्रकृति, मनुष्य, पशु और पक्षी आदि सभी अपने-अपने कार्यों में जुट जाते हैं।
             इसी प्रकार जब एक नन्हें शिशु का जन्म घर-परिवार में होता है तब सर्वत्र हर्ष एवं उल्लास का वातावरण होता है। घर में आने वाले सभी आगन्तुकों को मिठाइयाँ खिलाई जाती हैं और एक-दूसरे को बधाई दी जाती है। वह नन्हा शिशु माता-पिता का एक सपना होता है जिसके माध्यम से वे अपने सभी अधूरे स्वप्नों को पूरा करना चाहते हैं। उसे उनकी विरासत सम्हालने वाला 'घर का चिराग' कहा जाता है। वह नन्हा-सा मेहमान सबकी नजरों का केन्द्र होता है। उससे सभी परिवारी जनों को बहुत-सी आशाएँ जुड़ी होती है।  
            जैसे-जैसे सूर्य प्रात: से दोपहर तक का सफर तय करता है, उसका मासूम-सा बालरूप मानों कहीं खो जाता है। उस समय वह किसी दूसरे ही नवीन रूप में दिखाई देता है। तब वह युवा सूर्य प्रचण्ड और तेजस्वी बन जाता है। उसकी ऊष्मा और तेज से सम्पूर्ण सृष्टि प्रभावित होती है। उसका ओज समस्त भूमण्डल पर दिखाई देता है। उसके उस विलक्ष्ण तेज से सबकी आँखे चुँधियाने लगती हैं। अर्थात् कोई भी उस युवा सूर्य से आँख नहीं मिला सकता।
             बच्चा भी जब अपने बचपन से आगे युवावस्था की ओर बढ़ता है तब उसके सरलता, स्वाभाविकता, सहजता आदि गुण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और वह एक दूसरे ही नए इन्सान के रूप में बदलने लगता है। इस यौवनकाल में बच्चे के चेहरे पर अलग ही तरह का नूर होता है। उसका उत्साह देखते ही बनता है। वह उत्साह और उमंग से भरा हुआ होता है। वह हर कार्य को करने की क्षमता रखता है। किसी भी कठिनाई में डटकर खड़े रहने का हौंसला रखता है।
            इस समय वह अपने जीवन को एक नया रूप देने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। तब वह आत्मविश्वास से भरा हुआ होता है और उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज चमकता हुआ दिखाई देता है। उस समय वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार होता है। वह अपने जीवन को व्यवस्थित करके एक दिशा का चुनाव करता है।
             बाल रवि की तरह एक छोटा बच्चा सबको अपनी बालसुलभ चेष्टाओं से मोहित करता है। उसके भोलेपन से पूछे गए प्रश्न उसकी जिज्ञासा को प्रकट करते हैं। एक स्थान पर कितने ही बड़े लोग बैठे हों, वे सभी मिलकर भी वैसा खुशनुमा माहौल नहीं बना पाते जो एक बच्चा अपनी तोतली जुबान और मासूमियत से बनाता है। उसके चहकने से सब प्रसन्न होते है और उसके उदास हो जाने पर सब उसकी चिरौरी करते हैं और उसे मनाने का प्रयास करते हैं।
            बाल रवि की तरह अपने बच्चे को बच्चा ही रहने दीजिए। उसकी मासूमियत को उससे छीनकर अनावश्यक रूप से उसे बड़ा न बनाएँ। बड़ा होकर तो वह दुनिया के छल-प्रपंच देखा-देखी स्वयं ही सीख जाता है। जब तक वह भोला-भाला प्यारा-सा बच्चा है तभी तक वह राह चलतों को भी बरबस मोह लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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