वैराग्य की पराकाष्ठा
वैराग्य की पराकाष्ठा मनुष्य का अपने शरीर तक से मोहभंग करवा देती है। वह इस असार संसार के साथ-साथ स्वयं अपने को भी विस्मृत कर देना चाहता है। इसीलिए वह कह बैठता है-
क्या तन मांजता रे आखिर माटी में मिल जाना।
अर्थात् इस शरीर को माँजने का क्या लाभ? यानी इस शरीर को सजाना-संवारना व्यर्थ है। इसका कारण है कि अन्त में तो इसने मिट्टी में ही मिल जाना होता है। फिर इसकी देखभाल करके समय क्यों व्यर्थ गॅंवाना?
ऐसे विचार रखने वालों की इस धरा के किसी भी कार्य-कलाप में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वे सभी कार्यों को करते समय निर्लिप्त रहते हैं। परन्तु कभी-कभी कुछ लोग इन सांसारिक दायित्वों से किनारा भी कर लेते हैं। इस विचारधारा को हम पलायनवादी प्रवृत्ति कह सकते हैं। भौतिक संसार के सभी रिश्ते-नातों से स्वयं को दूर करते हुए मनुष्य ईश्वर के समीप होने लगता है। दिन-रात वह प्रभु का नाम जपने में स्वयं को व्यस्त रखने की कामना करता हैं।
यह शरीर हमें ईश्वर ने एक साधन के रूप में दिया है। जिसके माध्यम से हम इस संसार में अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण कर सकें। यदि हम इसकी सार-सम्हाल नहीं करेंगे तो यह रोगी बन जाएगा। तब न हम ईश्वर की भक्ति कर सकेंगे और न ही हम सांसारिक दायित्व पूरे कर पाएँगे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं- '
दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम
हमारी यही स्थिति हो जाएगी। हम न तो इहलोक संवार सकेंगे और न ही परलोक को सुधार सकेंगे। यह तो स्थिति बहुत विकट हो जाएगी।
यदि घर में हम वाहन रखते है तो हमें समय-समय पर उसका परीक्षण करवाना पड़ता है, उसमें ईंधन डलवाना होता है, नित्य प्रतिदिन उसकी साफ-सफाई रखनी आवश्यक होती है अन्यथा वह कबाड़ होकर हम पर बोझ बन जाता है। इसी प्रकार शरीर को यदि साफ-सुथरा न रखा जाए, इसे समय पर भोजन न दिया जाए तो यह भी अपने और अपनों पर रोगी होकर बोझ बन जाता है। उस समय सब परेशान हो जाते हैं। इस शरीर को स्वस्थ करने के धन और समय की हानि होती है।
इसलिए इसका स्वस्थ रहना बहुत ही आवश्यक है। इस शरीर को बेशक आप साध्य न माने पर यह ईश्वर तक जाने का साधन तो है ही। महाकवि कालिदास कने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा है -
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
हमारे सभी ऋषि-मुनि इस शरीर को साधन मानकर इसका पूरा ध्यान रखने का परामर्श देते हैं। हम यह कह सकते हैं कि व्यक्ति अपने सभी कर्तव्य चाहे वे धार्मिक हों या सांसारिक, तभी पूरे कर सकता है जब उसका शरीर स्वस्थ और नीरोग हो। एक बीमार या कमजोर शरीर से कोई भी कार्य ठीक से नहीं किया जा सकता। इसलिए शरीर का स्वास्थ्य सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
यह सच है कि हमें केवल इस शरीर के लिए ही नहीं जीना चाहिए। मात्र इसी को सजाते-संवारते रहें और इसकी देखरेख के लिए ही पानी की तरह पैसा बहाते रहें। सारा-सारा दिन ब्यूटी पार्लर में जाकर सजते रहें अथवा नित नए बालों के स्टाइल बनवाते रहें। उस पर विभिन्न प्रकार के इत्र या परफ्यूम या डियो डालकर इसे नकली सुगन्ध से महकाते रहें। इस तरह इसको खूबसूरत दिखाने के चक्कर में हम दीन-दुनिया भूल जाएँ। घर-परिवार के दायित्वों से मुँह मोड़कर नित्य ही कलह-क्लेश करते रहें।
इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि शारीरिक सौन्दर्य कुछ सीमित समय के लिए ही रहता है। जहाँ मनुष्य आयु को प्राप्त करने लगता है अर्थात् वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है, वहीं उसके चेहरे पर झुरियाँ आने लगती हैं। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार होने पर अथवा किसी रोग के आ जाने पर भी शरीर की सुन्दरता मुँह मोड़ने लगती है।
उस समय जिस शरीर की सुन्दरता पर हमें बड़ा मान था वह साथ निभाने से इन्कार कर देती है। तब हमारा यह सुन्दर शरीर सामान्य-सा रह जाता है। इसीलिए गुणीजन कहते है कि इस शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। हमारा यह सौन्दर्य स्थायी नहीं है। जब यह नहीं रहता तब हमें बहुत दुख होता है।
अति वैराग्य की चर्चा को यदि हम छोड़ भी दें तो भी इस बात का विशेष ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यह शरीर ही सब कुछ नहीं है। इसके पीछे भागते रहने का कोई लाभ नहीं होता। इसके अन्दर रहने वाली उस आत्मा के विषय में भी हमें सोचना चाहिए। तभी हम सब अपने मानव होने के धर्म को सार्थक करके अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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