संयुक्त परिवार एक छतनार वृक्ष
संयुक्त परिवार बच्चे के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होता है। इसकी छत्रछाया में बच्चा फलता-फूलता है। वहाँ पर सदा ही उसका सर्वांगीण विकास होता है। अपने बाल्यकाल से ही वह जीवन में भरपूर प्यार, दुलार, ममता व अपनापन पाता है। उसे रिश्तों के मायने स्वयं ही समझ में आ जाते हैं जो एकल परिवार में सम्भव नहीं हो पाता। संयुक्त परिवार की विशेषता यही है कि वहॉं सभी परिवारी जन प्रेम और सौहार्द से रहते हैं। छोटे-छोटे होने वाले मनमुटाव बेमायने हो जाते हैं। संयुक्त परिवार में रहने के लाभ अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।
संयुक्त परिवार में रहने वाला बच्चा घर में माता और पिता इन दोनों के अतिरिक्त अधिक लोगों को अपने घर में देखता है। समय-समय पर उन सबसे वार्तालाप करता है। उसमें यह समझ विकसित हो जाती है कि किस सम्बन्धी से किस प्रकार का व्यवहार करना होता है। अपने से छोटों, अपने बराबर वालों और अपने से बड़ों लोगों के साथ व्यवहार करते समय क्या-क्या सावधानियाँ अपेक्षित हैं। उसी के अनुरूप बच्चा व्यवहार कुशल बन जाता है।
इसके अतिरिक्त घर में आने-जाने वाले मेहमान भी एकल परिवार की अपेक्षा अधिक ही आते रहते हैं। उनको देखते हुए उसे सम्बन्धों के मायने और उनका महत्त्व स्वत: समझ आ जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि बच्चा हर बात को बड़ी ही बारीकी से देखता, परखता और समझता है। बड़े लोगों की देखा-देखी उसमें स्वाभाविक रूप से समझ आती रहती है।
उसे सबके साथ सामंजस्य स्थापित करना अपने आप ही देखते और समझते हुए आ जाता है। इस प्रकार बड़े होने पर उसे भिन्न प्रकृति के दूसरों लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने में किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि यह गुण उसमें स्वभावत: ही आ जाता है। वह सरलता से सबके साथ यथोचित व्यवहार करने लगता है। उसे किसी के साथ बातचीत करने में न घबराहट होती है और न ही हिचकिचाहट होती है।
घर में अन्य बच्चों के साथ खेल-खेल में भोजन खाना सीख जाता है। संयुक्त परिवारों में रहने वाले प्राय: बच्चे खाने-पीने के लिए अपने माता-पिता को तंग नहीं करते। उसे अपने खिलौने व अन्य सामान मिल-बाँटकर इस्तेमाल करने का ढंग आ जाता है। वह अपनी वस्तुओं को छिपाकर रखने के स्थान पर सबके साथ मिलकर खेलना पसन्द करता है।
स्कूल जाने पर बड़े भाई-बहनों के होते उसे बिल्कुल चिन्ता नहीं होती। स्कूल हो या खेल का मैदान हो, उसे पता होता है कि उसे यदि कोई बच्चा तंग करेगा तो उसके बड़े भाई-बहन उससे निपट लेंगे। इस तरह वह हर स्थान पर स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है। ऐसा करके उसे मानसिक सन्तोष मिलता है। उसके बड़े भाई-बहन उसके लिए एक सुरक्षा कवच की भॉंति होते हैं। उनके रहते उसे एक मॉरल स्पोर्ट मिलती है।
संयुक्त परिवार में पले बच्चे एकल परिवार के बच्चों की बनिस्बत अधिक सुलझे हुए और समझदार होते हैं। उनके आचार-व्यवहार का अन्तर भी हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। वे अधिक जिद्दी नहीं होते। उन्हें अपने दादा-दादी और अन्य बड़े लोगों की अहमियत पता रहती है। बच्चे के लिए सबसे प्रसन्नता इस बात से होती है कि उसे अन्य बच्चों की तरह क्रच में जाकर देर शाम तक बोर नहीं होना पड़ता क्योंकि वहाँ तो सारा समय अनुशासन में रहना होता है। उसे यह भी अच्छा लगता है कि नौकर उसके सिर पर सदा सवार नहीं है। उनके हाथ का बना हुआ बेस्वाद खाना भी उसे नहीं खाना पड़ता।
बड़े-बजुर्गों के घर में रहते हुए अपनी इच्छा से वह खाता, पीता, खेलता और सोता है। घर के दूसरे बच्चों के साथ बैठकर वह स्कूल से मिला हुआ गृहकार्य सरलता से कर लेता है। जहाँ उसकी समझ में न आए तो समझाने के लिए बड़े बैठे हैं न। इस प्रकार जो प्यार, अपनापन व भावनात्मक सुरक्षा बच्चे को अपने घर में मिलती है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकती। बच्चे को जो समय उसके रिटायर्ड या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त दादा-दादी अथवा नाना-नानी दे सकते है, वह उसे माता-पिता नहीं दे सकते। वे तो अपने घर और दफ्तर के व्यस्त कार्यक्रम में उलझे होते हैं।
संयुक्त परिवार में इस प्रकार लड़ते-झगड़ते, मीन-मेख निकालते, रूठते-मानते, प्यार-मुहब्बत से बच्चे का जीवन बड़ी सरलता से व्यतीत हो जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह होती है कि माता-पिता भी अपने बच्चे की ओर से बिल्कुल निश्चिन्त रहते हैं। अतः वे अपने आफिस में अच्छी तरह से कार्य कर पाते हैं। यदि कभी आफिस में देर हो जाए तो भी उन्हें अपने बच्चे की चिन्ता नहीं होती। वे जानते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित हाथों में है।
अन्त में मैं यही सुझाव सबको देना चाहती हूँ कि यदि ऐसी कोई मजबूरी न हो तो अपने बच्चों को इस सुख से वंचित न करें। छोटी-मोटी बातें घर-परिवार में यदि हो भी जाएँ तो उन्हें बच्चों की भलाई के लिए अनदेखा कर दें।
चन्द्र प्रभा सूद
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