सोमवार, 12 जनवरी 2026

आत्मरमण करने वाले

आत्मरमण करने वाले

भौतिक संसार के क्रियाकलापों को करने में हम बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। अपने विषय में सोचने का हम समय निकाल ही नहीं पाते। इसलिए हम स्वयं से नित्य प्रति दूर और दूर होते जाते हैं। हमें आत्ममन्थन करने की महती आवश्यकता होती है। जब तक हम अपने विषय में नहीं सोचेंगे तब तक आत्मोद्धार सम्भव नहीं हो सकता। स्वयं से स्वयं को मिलाना भी उतना ही आवश्यक होता है जितना हम दूसरों के विषय में जानकारी जुटाते हैं। उनके बारे में हम सब कुछ जान-समझ लेना चाहते हैं।
           इसके विपरीत जो अपने अन्तस में विराजमान ईश्वर को पाने के लिए आत्म साधना में लीन हो जाते हैं, वे भौतिक संसार के सभी कार्य व्यवहार करते हुए भी विदेहराज जनक की तरह ऊपर उठ जाते हैं। उनके सभी भौतिक कार्य केवल मात्र आवश्यकता पूर्ति के लिए ही रह जाते हैं। उनमें उनका मन नहीं रमता। वे बारम्बार नाम जाप की ओर प्रवृत्त होते रहते हैं। वे उस दिव्य आनन्द का रसास्वादन करते रहना चाहते हैं। उसकी मस्ती में अपना जीवन व्यतीत करना चाहते हैं।
           आत्मरमण करने वाले लोग व्यवहार में कैसे होते हैं? इस विषय में इष्टोपदेश' का कथन है कि-
        ब्रुवन्नपि न  हि ब्रूते गच्छन्नपि न गच्छति।
         स्थिरीकृतात्मवस्तु पश्यन्नपि न पश्यति॥
अर्थात् अपनी आत्मा में स्थिर रहने वाले व्यक्ति बोलते हुए भी नहीं बोलते, जाते हुए नहीं जाते और देखते हुए नहीं देखते।
            यह श्लोक वास्तव में उन योगीजनों की अवस्था का वर्णन करता है जो आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और अपनी चेतना को आत्मा में स्थिर कर लेते हैं। वे बाहरी दुनिया की क्रियाओं में लिप्त होते हुए भी उनसे प्रभावित नहीं होते और वास्तव में वे उस क्रिया के कर्ता नहीं होते। बल्कि उनका शरीर मात्र कार्य करता है जबकि वे स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) में मग्न रहते हैं।
           इस विषय में यह सब पढ़कर और  सुनकर बड़ा विचित्र लगता है पर सच्चाई यही है। वे सबके साथ बैठे हुए भी अकेले होते हैं क्योंकि उन्हें बतरस में आनन्द का अनुभव नहीं होता। यदि किसी प्रश्न का उत्तर उन्हें देना पड़े तो हाँ या हूँ करके टाल देते हैं। कहीं भी जाते समय अपने ध्यान में मग्न रहते हैं। यदि वे अपनी भौतिक नजरों से कहीं देखते हुए लगते हैं तो भी वास्तव में दूसरो को न देखकर अपने अन्तस में झाँक रहे होते हैं।
           आत्मरमण करने वाले स्वयं में इतने खोए रहते हैं अथवा आत्म अभ्यास में इतना अधिक जुटे रहते हैं कि किसी के पास बैठे रहते हुए भी अपनी साधना में रत रहते  हैं। किसी को उनके साधना में लीन होने का पता ही नहीं चल पाता। इसीलिए बैठते-उठते, सोते-जागते, चलते-फिरते प्रभु के नाम का भजन करते रहते हैं या साधना करते रहते हैं।भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में इन लोगों के विषय में हमें बताया है कि जो सदा ही आत्मरमण करने वाले होते हैं वे कैसे होते हैं-
       यस्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
      आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते॥
अर्थात् जिसकी अपनी आत्मा में प्रीति होती है जो आत्मा में ही तृप्त रहता है और अपनी आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उसके लिए कुछ भी कर्त्तव्य नहीं होता।
           जो व्यक्ति आत्म साधना में लगा रहता है, उसे पुन: पुन: आत्मानन्द को उसी प्रकार अनुभव करने की इच्छा होती है जैसे हम अपनी प्रिय भौतिक वस्तुओं का बार-बार आनन्द लेना चाहते हैं। अपने अन्तस को खोजने में लगा हुआ व्यक्ति आत्मानन्द का इतना अभ्यासी हो जाता है कि उसे सारे भौतिक सुख-साधन बेमायने लगने लगते हैं। वह सांसारिक कार्यों का सम्पादन करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता अर्थात् निर्लिप्त रहता है। यही उसकी विशेषता होती है।
            भगवान श्रीकृष्ण ने बारबार यही उपदेश दिया है कि मनुष्य को संसार में जल में कमल की तरह निर्लिप्त होकर रहना चाहिए। इससे मनुष्य में कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता। वह अपने सभी कृत कार्यों का श्रेय उस परमपिता परमात्मा को देता हुआ आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रशस्त होता है। वह कर्मफल में लिप्त नहीं होता। वह अपना कर्म निष्ठा से करता है।
          आत्मरमण करने वाले लोगों को इस भौतिक संसार के लोग आम भाषा में पागल कह सकते हैं परन्तु वे इस बात से अनजान रहते हैं कि वे क्या खो रहे हैं और ये साधक क्या पा रहे हैं? आत्माभ्यासी लोग ही जीवन का वास्तविक आनन्द लेते हुए अपने सुखद पारलौकिक भविष्य को सुरक्षित करने में सफल हो जाते हैं। दुनिया के जंजालो में फंसे हुए अन्य लोग ऐसा नहीं कर पाते।
चन्द्र प्रभा सूद 

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