मंगलवार, 13 जनवरी 2026

छह शत्रुओं से दूर रहना

छह शत्रुओं से दूर रहना 

भौतिक सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की इस संसार में जिन लोगों को चाहत है उनके लिए मननशील होना बहुत आवश्यक होता है। इस जीवन के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करते हुए उन्हें अपने जीवन में नित्य उन्नति के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। इसीलिए हमारे मनीषी सफलता का मन्त्र देते हुए कह रहे हैं-
      षड्दोषा: पुरुषेणेव हातव्या भूतिमिच्छता।
      निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
अर्थात् ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता इन छह दोषों से दूर रहना चाहिए।
        जीवन में किसी प्रकार का कष्ट न आए और वह सुखपूर्वक बीते, इसके लिए थोड़ा-सा त्याग करना पड़ता है। सबसे पहले तो मनुष्य को अपनी नींद का त्याग करना चाहिए। यदि वह सोता रहेगा तो वह लूजर रहेगा। उसके जो साथी समय पर अपने कार्य करते हैं वे रेस में उससे आगे निकल जाते हैं और वह पिछड़ जाता है। उसे हार का स्वाद चखना पड़ता है जो वास्तव में बहुत कष्टकर होता है। इसीलिए कहते हैं-
        उठ जाग मुसाफिर भोर भई 
         अब रैन कहाँ जो सोवत है।
         जो सोवत है वो खोवत है 
         जो जागत है सो पावत है॥
इसका अर्थ है कि मनुष्य को जाग जाना चाहिए यानी उसे समय रहते सचेत हो जाना चाहिए। जो होता हअपने आवश्यक कार्यो को समय रहते निपटा लेना चाहिए। जो समय बीतने पर भी सोता है अर्थात् सजग नहीं रहता, वह अपना सब कुछ खो देता है। इसलिए बाद में उसे पछताना पड़ता है। समय बीतने पर उस पश्चाताप का कोई औचित्य नहीं रह जाता। कहा गया है -
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
         तन्द्रा यानी यदि रात को ठीक से नींद पूरी न हो सके तो दिन भर सुस्ती छायी रहती है और बार-बार झपकी आती रहती है। इससे बचना चाहिए। प्रयत्न यही होना चाहिए कि नींद के साथ समझौता न किया जाए। आजकल के बच्चों में यह बिमारी बढ़ती ही जा रही है कि वे रात को देर तक पढ़ते रहते है और फिर दोपहर बाद जागते हैं। इसी तरह नाइट शिफ्ट में नौकरी करने वालों का भी यही हाल होता है। रात देर तक क्लबों व पार्टियों में रहने से भी यह समस्या बढ़ती है। इस तरह नींद के चक्र के गड़बड़ाने से बाडी क्लाक बिगड़ जाता है। इससे बहुत-सी बिमारियाँ मनुष्य को घेरने लगती हैं। उसका शरीर थकने लगता है।
           जब भय किसी मनुष्य के मन में घर करने लगता है तब वह किसी भी नए कार्य को करने से घबराता है। हर काम में खतरा तो जुड़ा होता है। जो खतरों से जीतकर आगे बढ़ता है, वही सफलता प्राप्त करता है और जो डरकर कदम पीछे खींच लेता है वह निस्सन्देह जिन्दगी की दौड़ में पिछड़ जाता है।
          क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो हर कदम पर उसे अपमानित करवाता है। उसके बनते हुए कामों को बिगाड़ देता है। उसे हरा देता है औरअपनों से अलग-थलग करवा देता है। इसे जीतना हम मनुष्यों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है। 
          आलस्य मनुष्य को सदा अवनति की ओर धकेलता है। हाथ पर हाथ रखकर बैठने से तो रोटी का निवाला भी मुँह में नहीं जाता। उसे खाने के लिए भी तो श्रम करना पड़ता है। यदि आलस्य के कारण भाग्य के भरोसे वह बैठा रहेगा तो उस पर जीवन में असफल रहने का ठप्पा लग जाएगा।
          दीर्घसूत्रता के कारण मनुष्य अपना आज का कार्य कल पर टालता ही जाता है। वह कल कभी नहीं आता और उसका कार्य कभी पूरा नहीं हो पाता। इसी बात को स्पष्ट करता कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा है -
      कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
      पल में प्रलय हो जाएगी, बहुरि करेगा कब?
अर्थात् जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए। जो कार्य आज करना है, उसे अभी कर लेना चाहिए। कारण है पल भर में प्रलय अथवा मृत्यु या कोई बड़ी बाधा आ सकती है। तब फिर वह काम कब करोगे? 
          यह दोहा समय के महत्व को बताता है और हमें टालमटोल करने से रोकता है कि किसी भी कार्य को भविष्य पर नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जीवन अनिश्चित है। यह दोहा हमें कर्मठता और तत्परता सिखाता है, कि हमें अपने सभी कार्यों को समय पर पूरा करना चाहिए और उन्हें टालना नहीं चाहिए। मनुष्य को इस संसार में जीने के लिए सीमित समय ही मिलता है। यदि उसे अपनी मूर्खता से बर्बाद कर देगा तो अपने कार्यों को पूर्ण नहीं कर सकेगा।
           जो भी व्यक्ति संसार में नाम कमाना चाहता है, सभी सुखों को पाना चाहता है, सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ना चाहता है, उसे निरन्तर कठोर परिश्रम करना चाहिए। निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता इन दोषों को अथवा शत्रुओं को मनुष्य को अपने जीवन में कदापि स्थान नहीं देना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद 

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