सोमवार, 26 जनवरी 2026

सांसारिक रिश्ते निभाना बच्चों का खेल नहीं

सांसारिक रिश्ते निभाना बच्चों का खेल नहीं 

सांसारिक रिश्ते निभाना बच्चों का खेल कदापि नहीं है। यहाँ कदम-कदम पर अग्नि परीक्षा में खरा उतरना पड़ता है। रिश्तों की दौलत हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर की ओर से हमें उपहार स्वरूप मिलती है। उसे सम्हालकर रखना हमारे अपने हाथ में होता है। हम चाहें तो अपनी सूझ-बूझ से उस पूँजी को अपने सुकृत्यों और अपने सद् व्यवहार से बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत यदि हमारी इच्छा न हो तो अपने झूठे अहं व दुर्व्यवहार से उसे घटा भी सकते हैं। 
              रिश्तों की गरिमा बनाए रखने के लिए कदम-कदम पर बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। अपने रिश्तों को हमें स्वयं ही सहेजकर रखना होता है। किसी भी आयु में अपनों का साथ पाकर मानो इन्सान जी उठता है। यह साथ उसके लिए संजीवनी बूटी का कार्य करता हैं। इसके विपरीत जो लोग रिश्तों में सामंजस्य नहीं बनाना चाहते, वे इस पूँजी को गँवाकर ठन-ठन गोपाल हो जाते हैं। तब अकेले रहना उनकी मजबूरी बन जाती है।
            परिवार में तन, मन और धन जुड़ाव अथवा विघटन के कारक होते हैं। अपने माता-पिता अथवा अन्य सम्बन्धियों की सेवा तन से या इस शरीर से करेंगे तभी चारों ओर वाहवाही होगी। लोग कहेंगे कि फलाँ व्यक्ति सबके लिए बड़ी हाड़तोड़ मेहनत करता है। अपने मन से यदि दूसरों के लिए कुछ भी किया जाए तो उसका प्रभाव सब पर पड़ता है। यदि अनमने होकर अथवा घास काटते हुए किसी के दूसरे के लिए कुछ किया जाए तो वह भार बनकर रह जाता है। ऐसा करने से न तो सेवा करने वाले को प्रसन्नता मिलती है और न ही करवाने वाले को सन्तोष होता है।
              रिश्तों को जोड़ने के लिए धन की बहुत आवश्यकता होती है। यदि धन का अभाव होगा तो किसी को घर पर बुलाना अच्छा नहीं लगता। बिना धन के घर आए किसी मेहमान की आवभगत नहीं की जा सकती। इससे अपने मन को कष्ट होता है। घर में बड़े-बजुर्गों के स्वास्थ्य और उनकी अन्य आवश्यकताओ को पूरा करना धन के बिना सम्भव नहीं हो सकता। अपने जीवन यापन के लिए भी इसकी महती आवश्यकता होती है। इसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते।
             जहाँ सभी रिश्ते तन, मन और धन से ही निभाने सम्भव हो पाते हैं, वहीं सबसे महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध में तो ये तीनों बेहद जरूरी होते हैं। बच्चों के सन्दर्भ में यानी उनके लालन-पालन में भी इन तीनों का योगदान आवश्यक है। उनकी पढ़ाई-लिखाई, उन्हें जीवन में उन्हें सेटल करना और फिर उनके शादी-ब्याह करने में इन तीनों का ही योगदान अनिवार्य होता है। इन सबके लिए तीनों के बिना किसी भी कार्य का सम्पादन करना बहुत कठिन हो जाता है।
            अन्त में मैं पति-पत्नि के रिश्ते की गरिमा की चर्चा करना आवश्यक समझती हूँ जहाँ इन तीनों की महती आवश्यकता होती है। सबसे पहले तन यानी शारीरिक सम्बन्धों की पवित्रता होनी चाहिए। दोनों में से यदि एक भी पक्ष विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाएगा तो यह पवित्र रिश्ता कदापि नहीं निभ सकता। उस स्थिति में तलाक तक की नौबत आ जाती है। दोनों के परिवारों के लिए यह स्थिति सह्य नहीं होती। दोनों ओर की पारदर्शिता होना इस रिश्ते पहली शर्त है।
              दोनो का मन से जुड़ाव जब तक न हो तो भी सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं चलते। यदि दोनों में कोई भी एक अपने जीवन साथी को छोड़कर किसी अन्य के साथ शारीरिक सम्बन्ध न रखते हुए भी भावनात्मक लगाव रखेगा तो भी रिश्तों की पवित्रता भंग होती है। इसका सीधा-सा अर्थ हुआ पत्नी घर में और प्रेयसी मन में अथवा पति घर में व प्रेमी मन में। इन दोनों के ये सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं निभ पाते। घर में होने वाला लड़ाई-झगड़ा, मनमुटाव, अबोलापन आदि गृहस्थी की नींव को खोखला कर देते है। इनके अतिरिक्त आपसी पारदर्शिता के अभाव में वहाँ विघटन की सम्भावना हमेशा बनी रहती है।
                धन भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है गृहस्थ जीवन का। यदि धन-सम्पत्ति के विषय में दोनों एकमत नहीं हैं और मेरा पैसा, मेरा पैसा करते रहते हैं तो वहाँ समस्याएँ अधिक बढ़ जाती हैं। एक-दूसरे को यदि समय पर धन न दिया जाए तो अपने पास पड़े हुए करोड़ों-अरबों रुपए भी व्यर्थ होते हैं। फिर चाहे कितनी भी लीपा-पोती कर लो रिश्ते दरकने लगते हैं। फिर उनकी मिठास चुकने लगती है और वहॉं कटुता का साम्राज्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में साथ रहना बहुत मुश्किल होता है।
             तन, मन और धन की शुचिता आपसी सम्बन्धों के लिए नितान्त आवश्यक होती है। इनमें पारदर्शिता रखने वाले अपनी गाड़ी प्रसन्नतापूर्वक चलाकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ जाते हैं और शेष अन्य लोग जीवन में सदा रोते-कल्पते रहते हैं और शिकवा-शिकायत करते रहते हैं। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं कि सांसारिक रिश्ते निभाना बहुत कठिन है।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें