शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

अन्धा बनने से बचिए

अन्धा बनने से बचिए 

'अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को देय' - यह उक्ति आज भी उतनी ही सार्थक है जितनी उस समय रही होगी जब किसी ने इसके विषय में विचार किया होगा।
          "अन्धा बॉंटे रेवड़ी फिर फिर अपनों को दे"  एक प्रसिद्ध कहावत (लोकोक्ति) है जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति जिसे अधिकार अथवा शक्ति मिल जाती है, वह बार-बार केवल अपने रिश्तेदारों, दोस्तों या करीबियों को ही लाभ पहुॅंचाता है। वह दूसरों के साथ भेदभाव करता‌ है। यह कहावत अक्सर भाई-भतीजावाद (nepotism) या पक्षपात (favoritism) को दर्शाने के लिए प्रयोग की जाती है जहाँ व्यक्ति अपनी पहुँच का गलत इस्तेमाल करके सिर्फ अपने लोगों का भला करता है, भले ही वह कितना भी "अन्धा" यानी, निष्पक्ष न हो।
             इस उक्ति के एक-एक शब्द पर ध्यान दिया जाए तो स्पष्ट होता है कि मनुष्य मोह के कारण स्वार्थ में इतना अन्धा हो जाता है कि उसे अपनों के अतिरिक्त और कोई भी दिखाई नहीं देता। उसे केवल अपने भाई-बन्धु ही दिखाई देते हैं। वह अन्य लोगों को पीछे की ओर कर देता है।‌ इसीलिए बार-बार पक्षपात करता हुआ वह जाने-अनजाने दूसरे योग्य प्रतियोगियों के प्रति अन्याय कर बैठता है।
             राजनीति, धार्मिक स्थान, सामाजिक कार्य अथवा घर-परिवार आदि कोई भी स्थान हो, हर जगह मानवीय स्वार्थों का ही बोलबाला रहता है। जो कुछ भी पद, कोटा, विशिष्ट कार्य या सम्मान देना है, उसके लिए वही लोग दिखाई देते हैं जो हमारे स्वार्थ की कसौटी पर खरे उतरते हैं अथवा जो भविष्य में किसी भी रूप में हमारे लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि दूर की कौड़ी मानकर ही तो ऐसे लोग सारे खेल खेलते रहते हैं।
              इस प्रकार के कार्य-व्यवहार करते हुए मनुष्य अपने मान-सम्मान को भी दाँव पर लगा देता है। उसे यह भी परवाह नहीं रहती कि समाज उसके इस कृत्य के लिए आलोचना करेगा अथवा पानी पी-पीकर उसे कोसेगा। वह इस बात को नजरंदाज कर देना चाहता है कि विरोधियों को उसके ऊपर कीचड़ उछालने का एक स्वर्णिम मौका मिल जाएगा।
           यहॉं हम कुछ उदाहरण देखते हैं। जब कोई व्यक्ति मन्त्री बनता है, वह अपने ही रिश्तेदारों को सरकारी पदों पर बिठाने के लिए जोड़-तोड़ करने लगता है। तभी इसी मुहावरे का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार किसी संस्था का प्रमुख जब केवल अपने खास लोगों को ही प्रमोशन दे तो यह स्थिति इस कहावत को चरितार्थ करती है। 
          आजकल सोशल मीडिया, टीवी व समाचार पत्रों की सुर्खियों में ऐसे कृत्य खूब चर्चा में रहते हैं। विविध टीवी चैनलों पर ऐसे कृत्यों के लिए चर्चाएँ आयोजित की जाती हैं। कोई भी परिणाम चाहे निकले या न निकले पर वहाँ लम्बी-लम्बी बहस अवश्य होती रहती हैं। हर विरोधी अपने दूसरे पक्ष के लोगों पर कीचड़ उछालता हुआ अपने द्वारा लगाया आरोप सिद्ध करने का भरसक प्रयत्न करना चाहता है।
               ऐसा कार्य करने वाले चिकने घड़े के समान होते हैं जिन पर किसी भी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे अपनी पोल खुल जाने पर शर्मिन्दा नहीं होते बल्कि बस खीसें ही निपोरते रहते हैं। उसके बाद वे अपने ही विरोधियो को धोबी पछाड़ देने के तथाकथित महत्त्वपूर्ण कार्य में जुट जाते हैं। वे उन सभी तथ्यों को शीघ्र ही बटोरकर सहेज लेना चाहते हैं जिनसे उनके विरोधी चारों खाने चित्त हो सकें और फिर वे अपने कुत्सित खेल को सफलता से खेल सकें।
              साम, दाम, दण्ड और भेद किसी का भी सहारा लेकर झूठ के महल पर वे अपने झण्डे गाढ़ना चाहते हैं। परन्तु मिट्टी की हाँडी की तरह झूठ की हाँडी भी बार-बार नहीं चढ़ती। कभी-कभी उन्हें भी इसका दण्ड भुगतना पड़ता है।
              जिन अपनों पर उन्होंने आँख बन्द करके विश्वास होता है, यदा कदा वे ही धोखा दे जाते है।उस समय स्थिति बहुत ही विकट हो जाती है। तब वे उनके रहस्यों को सार्वजनिक करने का प्रयास करते हैं। इससे उनकी छवि धूमिल होने लगती है। वैसे तो इस श्रेणी के लोग मोटी चमड़ी के होते हैं जिन पर इन सब बातों का प्रभाव न के बराबर पड़ता है। वे फिर से अपनी पुरानी चालें चलने लगते हैं।
            वे भूल जाते हैं कि समय बड़ा बलवान है वह किसी को नहीं छोड़ता। वह सबके साथ न्याय करता है। उसके सामने बड़े-बड़े भी धूल चाटते दिखाई देते हैं। जिन योग्य लोगों का हक मारकर वह अपने अयोग्यों को ऊपर उठाना चाहता है उनकी हृदय से उठी हुई हाय भी तो अपना रंग अवश्य दिखाएगी। अपनों को ऊपर अवश्य उठाइए परन्तु स्वार्थ में इतने अन्धे मत हो जाइए कि उनके अतिरिक्त आपको कोई और दिखाई ही न दे। आप दीन और दुनिया सबको ही भूल जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद 

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