बुधवार, 14 जनवरी 2026

बच्चों को बिगाड़ते माता-पिता

बच्चों को बिगाड़ते माता-पिता

दादा-दादी या नाना-नानी पर हमेशा से यह आरोप लगता रहता है कि वे बच्चों को वे बिगाड़ते हैं। परन्तु आज स्थितियाँ बिल्कुल बदल गई हैं। हम अपने आसपास देखते हैं कि उनके माता-पिता ही उन्हें बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मेरा विचार है कि इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता। आजकल एकल परिवार का चलन बढ़ गया है। प्रायः घरों में एक या दो बच्चे ही होते हैं। 
            इक्कीसवीं सदी के माता-पिता दोनों ही आज उच्च शिक्षा ग्रहण करके नौकरी कर रहे हैं अथवा अपना व्यवसाय कर रहे हैं। दोनों ही अपने-अपने कार्यों में बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। उनके पास समय का अभाव रहता है। वे अपने उन बच्चों के लिए समय ही नहीं निकल पाते जिनके लिए वे इतनी मेहनत कर रहे हैं। इसलिए वे उस कम समय में अपने बच्चों को बहुत कुछ दे देना चाहते हैं। उनकी परवरिश में किसी तरह की कोई कमी नहीं रखना चाहते।
          इसके अतिरिक्त जीवन की ऊँचाइयों को छूने की महत्त्वाकाँक्षा रखने वाले वे या तो सन्तान चाहते ही नहीं हैं या फिर एक बच्चे से ही सन्तोष करना चाहते हैं फिर चाहे वह लड़का हो या फिर लड़की। इसलिए भी वे बच्चों के प्रति बहुत ही सम्वेदनशील होते जा रहे हैं। आज मॅंहगाई आसमान छू रही है। बच्चों की विद्यालयीन शिक्षा पर भी बहुत खर्च होता है। उच्च शिक्षा के व्यय के विषय में तो पूछना ही बेकार है। इसलिए भी आधुनिक माता-पिता अधिक बच्चे पैदा नहीं करना चाहते।
           वे बच्चों को उनकी आवश्यकता से कहीं मॅंहगी वस्तुएँ खरीद कर देते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चों को दुनिया की हर वो वस्तु खरीद कर देना चाहते हैं जिसे वे खरीद सकते हैं। वे सोचते हैं हमारे पास भरपूर पैसा है तो बच्चों को हम ऐश क्यों न कराएँ? हमारे बच्चे किसी भी मॅंहगी अथवा सस्ती वस्तु के लिए किसी का मुँह क्यों देखें?
            पुराने समय में बच्चे बड़े भाई-बहनों के छोटे हुए कपड़े या जूते-चप्पल पहन लिया करते थे। पुरानी पुस्तकों से पढ़ लिया करते थे। आजकल परिस्थितियॉं बदल गई हैं। परन्तु आज एक घर में यदि दो बच्चे हैं तो वे मिलकर उन खिलौनों से नहीं खेलना चाहते। दोनों के पास ही उनके अपने-अपने खिलौने, बिस्तर व सुन्दर सजे हुए कमरे होते हैं जो सभी आधुनिक उपकरणों से युक्त होते हैं। 
           पहले दादा-दादी अथवा नाना-नानी बच्चों से लाड़ लड़ाते थे और जो भी उनकी मनपसन्द वस्तुएँ उन्हें खरीदकर देते थे। इसीलिए कहा जाता था कि वे उन्हें सदा बिगाड़ते रहते हैं। परन्तु आज माता-पिता इस कार्य को बड़ी कुशलता से कर रहे हैं। बच्चों को न तो वे डाँटते हैं या डपटते हैं और न ही मारते हैं। उनकी हर जायज-नाजायज माँग को पूरा करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। यही कारण है कि बच्चे आज जिद्दी और बददिमाग होते जा रहे हैं।
             वे अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते, बस अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं। उनकी बला से सारी दुनिया भाड़ में जाए, और-तो-और माता-पिता की भी उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। बस उनकी माँगे बस पूरी होती रहनी चाहिएँ। किसी के साथ समझौता करके चलना उनकी प्रवृत्ति में ही नहीं है बल्कि शान के विरूद्ध होता है। उनकी इस प्रवृत्ति को उनके माता-पिता और अधिक हवा देते हैं। इसलिए बच्चों का दिमाग सातवें आसमान पर रहता है।
          पहले बच्चे अपने नाना-नानी, मौसी या बुआ आदि के घर छुट्टियों में कुछ दिन बिताने के लिए चले जाया करते थे। आज समय के साथ यह वाला व्यवहार भी बदल गया है। आज माता-पिता को ही विश्वास नहीं आता कि उनके बच्चे वहाँ ठीक से रह सकेंगे तो फिर उन बच्चों के विषय में कहना ही क्या है? वे तो नखरे दिखाएँगे ही, उन रिश्तों के प्यार व सम्मान को भूलकर वहाँ की ढेरों कमियाँ निकालेंगे ही। माता-पिता भी उनकी बातों को सच मानकर उन्हीं का साथ देते हैं।
            माता-पिता अपने समयाभाव के कारण बच्चों को इतना अधिक बिगाड़ते जा रहे हैं कि फिर समय बीतने पर वे स्वयं ही उनसे डरने लगे हैं। बच्चों की सारी गलतियाँ नजरअंदाज करते-करते उनके मोह में अन्धे होते जा रहे हैं और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें अनजाने में ही खुदा बनाते जा रहे हैं।
           बच्चों के सुखद भविष्य के लिए उन्हें सभी मॅंहगी वस्तुएँ अवश्य दिलाएँ परन्तु साथ ही उन्हें सुसंस्कार भी दें जिससे वे अहंकारी न बने। पहले सभी को अपने बराबर समझने की प्रवृत्ति अपनाऍं और फिर यही बच्चों को भी सिखाऍं। यदि माता-पिता बच्चों को सुसंस्कृत बना सकें तो देश व समाज के प्रति अपने दायित्व का पूर्ण रूप से निर्वहण कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें