शनिवार, 8 नवंबर 2025

बच्चे महान समालोचक

बच्चे महान समालोचक

बच्चों को कम समझने की गलती हम बड़ों को कभी नहीं करनी चाहिए। बच्चे बहुत समझदार होते हैं। वे अपने मुॅंह से चाहे कुछ कहें या न कहें पर वे हर चीज का मुआयना (observe) बड़ी  बारीकी से करते हैं। हर बात को अपने मन में बसाकर रखते हैं। बच्चों को हम महान समालोचक कह सकते हैं। बड़ों की कोई भी गलती उनकी नजर से बच नहीं सकती। इसका कारण उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति होती है। वे बार-बार प्रश्न करते रहते हैं। उसके पीछे हर बात की जानकारी लेना होता है। 
          वे हर जगह, हर बात पर सदा ही क्या, क्यों, किसलिए, कब आदि को ढूँढते रहते हैं। इन्हीं सारे प्रश्नों के उत्तर वे खोजते रहते हैं। अपनी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए वे बारबार सबसे प्रश्न पूछते हैं और अपनी शंकाओं का समाधान करते रहते हैं।
कभी-कभी हम उनके इन प्रश्नों से झुँझला जाते हैं और डॉंटकर उन्हें चुप करा देते हैं। पर बालमन को इस डॉंट-फटकार से कोई लेना देना नहीं होता। फिर अगले ही पल वह किसी नए अनसुलझे प्रश्न को लेकर सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछते हैं।
          बच्चों के विषय में चर्चा करते समय मुझे एक गाना स्मरण आ रहा है। वर्ष1996 में बनी मासूम फिल्म का गाना जिसके गीतकार और संगीतकार आनन्द राज आनन्द हैं तथा गायक आदित्य नारायण हैं। इस गीत में बच्चा अपनी समझदारी का बखान करते हुए कहता है -
छोटा बच्चा जान के न कोई आँख दिखाना रे
डुबी डुबी डब डब
अक्ल का कच्चा समझ के हमको न समझाना रे
डुबी डुबी डब डब
भोली सूरत जान के हमसे न टकराना रे
डुबी डुबी डब डब
ना धिन धिन्ना ना धिन धिन्ना नाच नचा देंगे।
          देखा जाए तो हम स्वयं ही उन्हें गलत आदतें सिखाते है। हम उनके सामने झूठ बोलकर कहीं भी जाते हैं पर उन्हें सच बोलने का पाठ पढ़ाते हैं। घर में नापसन्द या अनचाहे मेहमानों के आने पर हम उनका सत्कार भार समझकर करते हैं और उनकी पीठ पीछे उन्हें भला-बुरा कहते हैं। परन्तु अपने प्रियजनों के आने पर प्रसन्नता से आवभगत करते हैं। बच्चों के सामने बैठ कर अपने कार्यक्षेत्र की, आस-पड़ोस की, मित्रों की सम्बन्धियों अच्छी-बुरी सभी बातें चटखारे लेकर और शेखी बघारते हुए उनके सामने सुनाते हैं। 
            अपने चेहरों पर लगाए हुए नकली मुखौटों के कारण हम समय-समय पर अलग-अलग तरह से व्यवहार करने का प्रयत्न करते हैं। इन सबके अतिरिक्त किसी के दुख-सुख में मन माने तो हम शामिल हो जाते हैं अन्यथा बहानों की बड़ी लम्बी लिस्ट हमारे पास तैयार रहती है। हम आपस में घर-परिवार में  कैसा व्यवहार करते हैं? बड़े-बजुर्गों के प्रति हमारा रवैया कैसा है, सहानुभूति पूर्ण है या नहीं? छोटों व बराबर वालों के साथ हमारा बर्ताव कैसा है? आस-पड़ोस से हम लोग सहृदयतापूर्वक पेश आते हैं या नहीं? ये बातें भी बच्चों के कोमल मन की स्लेट पर अंकित हो जाती हैं जो समय के साथ-साथ और अधिक गहरी होती जाती हैं। 
            बालमन पर पड़े इन संस्कारों के विषय में वह हैरान होकर सोचता रहता है। उसकी यही सोच उसका मार्गदर्शन करती है। अपने आसपास घटित घटनाओं से वह नोट्स बनाता रहता है और जब मौका होता है तो सबके सामने बिना झिझक कह भी देता है कि फलाँ समय पर आपने ऐसा कहा था या किया था। उस समय घर के बड़ों को शर्मिन्दा होना पड़ता है। उस समय वे बगलें झाँकते हुए उस मासूम को डाँटकर अपने दिल की भड़ास निकाल लेते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि बच्चे के कोमल हृदय पर इस व्यवहार का अच्छा असर होगा अथवा नहीं।
             यदि बच्चों से हम अच्छा व्यवहार करने की अपेक्षा रखते हैं तो पहले अपने स्वयं के अन्तस में झाँककर देखना चाहिए। आत्मपरीक्षण करने पर समझ आ जाएगा कि बच्चे के इस मुँहफट रवैये के पीछे स्वयं हमारे से ही चूक हो गई है। बच्चा जिद्दी व अड़ियल होकर बिना कारण बार-बार माता-पिता का सिर क्यों नीचा कराता है? उनकी अवमानना करके उसे खुशी क्यों मिलती है? 
            बच्चों को हम जैसा बनाना चाहते हैं वे वैसे ही बन जाते हैं। स्वयं पर थोड़ा-सा ध्यान देने और अपने पर संयम रखने से हम बच्चों के व्यवहार को अनुशासित कर सकते हैं। बच्चों को सदैव उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। बचपन से ही उन्हें संस्कारित करने के लिए माता-पिता को ध्यान देना चाहिए। तभी हम लोग उन्हें एक सभ्य तथा सुशिक्षित नागरिक बनाने के अपने दायित्व का पूर्ण रूपेण निर्वहण कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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