रविवार, 9 नवंबर 2025

डर पर विजय

डर पर विजय 

हम अपने आसपास देखते हैं कि हर मनुष्य को किसी-न-किसी कारण से डर लगता है। उसे डर क्यों लगता है? वह किससे डरता है? क्या वह छोटा बच्चा है जिसे डर लगता है? ये सभी प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं और विचारणीय भी।
         अब हम यह विचार करते हैं कि बड़े लोगों को डर क्यों लगता है? उसे डर तब लगता है जब वह अपनी घर-परिवार की और समाजिक जिम्मेदारियों से बचता है। घर के आवश्यक कार्यों अथवा दायित्वों को भी भूल जाता है। अपने कार्यक्षेत्र के दैनन्दिन कार्यों में असावधानी के कारण गलतियाँ कर बैठता है। इसलिए वह नौकरी खो जाने से डरता है। व्यापार में घाटा होने या उसके डूब जाने से वह डरता है। कम्पनी‌ में हड़ताल हो जाने के कारण वह बेरोजगार होने से डर जाता है।
        वह हर उस इन्सान से डरता है जिसके प्रति अपराध करता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों, अपने बॉस, राज्य, न्यायालय, पुलिस, इन्कमटैक्स, एक्साइज आदि के फेर से मनुष्य डरता है। धर्म भीरू होने के कारण वह धार्मिक कार्यों का निष्पादन न कर पाने के कारण ईश्वर से डरता है। जब कोई परेशानी उसके जीवन में आती है तो वह अपने कृत कर्मों से घबराने लगता है।
          अपने अधिकारों के लिए हर कदम पर हंगामा करने वाला मनुष्य स्वयं अपने ही कर्त्तव्यों से मुँह मोड़ लेने से परहेज नहीं करता। अपने कार्यों में मनुष्य बहुत मजे से कोताही करता है फिर जब उसका परिणाम आने का समय  होता है तब वह आने वाली असफलता के कारण भयभीत होने लगता है। 
        कोई ऊँचाई से नीचे गिर जाने से डर से ऊँचाई वाले स्थानों या पर्वतों पर नहीं जाता है। कोई पानी में डूब जाने के डर से नदी-समुद्र में नहीं जाता। आग से जल जाने का भय उसे सताता है। प्राकृतिक कोप- बादल फटना, आँधी-तूफान, बाढ़, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि के प्रकोप से मनुष्य सदा ही डरता रहा है।
            इनके अतिरिक्त सड़क पर चलते समय गाड़ी की अथवा गाड़ी से दुर्घटना का डर उसे सताता है। सोचने की बात यह है कि जब इतना बड़ा मनुष्य डरने लगे तब हमें क्या उपाय करना चाहिए? उसे यदि कोई समझाएगा तो काट खाने को दौड़ेगा। मजे की बात यह है कि वह अपनी गलतियों को जानता है पर फिर भी अनजान बने रहने का नाटक करता है।
        बच्चे जब किसी भी कारण से डरते हैं तो हम उन्हें निडर बनने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें  साहसी लोगों के किस्से  सुनाकर उत्साहित करते हैं। उन्हें आश्वस्त करते हैं कि हम उनके हाथ हैं इसलिए वे न डरें और बहादुर बनें। एक आयु प्राप्त मनुष्य तो कोई छोटा बच्चा नहीं है कि जब वह डर जाए तब उसे समझा-बुझा दिया जाए अथवा डाँट-डपट देने से उसके मन से डर निकल जाएगा। अब पुचकारने या दुलारने वाली उसकी आयु बीत चुकी है।
        मनुष्य अपने डर पर विजय कैसे पा सकता है? इसका सरल-सा उपाय है। मन से डर को निकाल भगाने के लिए किसी भी प्रकार के प्रलोभन से दूर रहे। अपने सभी दायित्वों का निर्वहण दक्षता से करे। अपने कार्यों में सदा पारदर्शिता यानि सच्चाई व ईमानदारी लाए। सकारात्मक दृष्टिकोण रखना आवश्यक है।
             डर से भागने के बजाय धीरे-धीरे उसका सामना करना चाहिए। यह उन स्थितियों पर नियन्त्रण का अनुभव करने में सहायता करेगा जिनसे हम डरते हैं। घबराहट होने पर अपनी हथेली पेट पर रखकर धीरे-धीरे गहरी साँस लें। इससे मनुष्य का मन शान्त होने लगता है और घबराहट को दूर करने में मदद मिलेन लगती है। डर जब मनुष्य पर हावी होने लगता है तब सच में वही हो जाता है जिसकी वह कल्पना कर रहा होता है। अपनी छोटी-छोटी सफलताओं के लिए खुद को प्रोत्साहित करना चाहिए। अपनी उन कमियों पर काम करना चाहिए जो डर का कारण बन रही हैं।  
              अपनी जीवन शैली में बदलाव करना आवश्यक होता है। योग और व्यायाम करने से मन शान्ति मिलती है और तनाव से निपटने में सक्षम हो जाते हैं। हास्य व्यंग्य देखना अथवा कोई रचनात्मक काम करना से मन को हल्का होता है और डर से लड़ने में सहायता मिलती है। बदलती परिस्थितियों को खतरे के स्थान पर विकास के अवसर के रूप में देखने का प्रयास करना चाहिए। 
           यदि डर बहुत अधिक हो‌ जाए या ऐसा लगने लगे कि स्वयं इससे निपट नहीं सकते हैं तो किसी मनोचिकित्सक से परामर्श कर लेना चाहिए।इन सबसे भी बढ़कर ईश्वर की शरण में चले जाना चाहिए जिससे मनुष्य के पास किसी प्रकार का डर न आता है और न ही उसे सताता है। उस मालिक की आराधना करने से ही मनुष्य को मानसिक व आत्मिक बल मिलता है।
          सयाने कहते हैं- 
                डर के आगे जीत है।
अत: इस डर को वश में करके मनुष्य को आगे बढ़ जाना चाहिए। इसी में समझदारी है।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें