प्राणों का महत्त्व
हमारे शरीर में रहने वाले प्राण जीव के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उनके बिना हमारे जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। प्राणों के बिना हमारा शरीर राख की ढेरी के समान बन जाता है। शरीर से प्राणों के निकल जाने के बाद अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति को भी मनुष्य घर में नहीं रहने देता। शीघ्र ही वे उसे अग्नि को समर्पित कर देता है। यदि ऐसा न किया जाए तो कुछ दिनों पश्चात उस शव में से दुर्गन्ध आने लगती है।
'छान्दोग्योपनिषद्' में एक कथा के माध्यम से प्राणों का महत्त्व समझाया गया है। कथा इस प्रकार है कि प्राचीन काल में एक बार सभी इन्द्रियॉं अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगीं। यानी आँख, नासिका, कान (श्रवण शक्ति), जिह्वा(बोलने की शक्ति), मन और प्राण सभी अपने आप को दूसरी इन्द्रियों से श्रेष्ठ बता रहे थे। इसलिए उनमें विवाद होने लगा और फिर उनका झगड़ा बहुत बढ़ने लगा। सभी इन्द्रियॉं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुॅंच पा रही थीं। सभी इन्द्रियॉं अपनी इस समस्या का समाधान चाहती थीं।
अन्त में वे सभी अपने विवाद को सुलझाने के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी के पास गईं और उन्हें अपने विवाद का कारण बताया। उन्होंने उन सबको कहा, "जिसके शरीर से बाहर चले जाने के बाद सब समाप्त हो जाए वही श्रेष्ठ है।"
सभी इन्द्रियों ने इस सुझाव को मान लिया और उस पर अमल करने का फैसला किया।
सबसे पहले आँखें शरीर से एक वर्ष के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसने उन सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
उन सबने उत्तर दिया, "जिस प्रकार एक अन्धा व्यक्ति अपने कानों से सुनता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ और मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
फिर नासिका (सूँघने की शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने वापिस लौटकर सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे न सूँघते हुए व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, वाणी से बोलता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
उसके पश्चात कान (श्रवण शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने वापिस लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
उन सब ने उत्तर दिया, "जैसे एक बहरा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
फिर वाक्(बोलने की शक्ति) बाहर चली गई। उसने भी लौटकर वही पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे एक गूॅंगा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
फिर उसी तरह से मन ने भी एक साल के पश्चात लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?
उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे बिना मन के बच्चा आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
अन्त में जब प्राण शरीर को छोड़कर बाहर निकलने लगे तो पल भर में ऐसा लगने लगा मानो सब कुछ समाप्त हो रहा है। उस समय सभी इन्द्रियाँ एकसाथ चिल्लाने लगीं, "मत जाओ, मत जाओ। तुम्हारे बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। तुम चले जाओगे तो सब समाप्त हो जाएगा। हमें समझ आ गया है कि तुम्हीं हम सब में श्रेष्ठ हो।"
यह उपनिषद् कथा हमें प्राणों का महत्त्व समझा रही है कि उनके बिना इस शरीर का कोई मूल्य नहीं। नश्वर शरीर में रहने वाली अनश्वर आत्मा को हम संसार की चकाचौंध में भूल जाते हैं। हम सारा समय इस शरीर के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं। इसी को सदा सजाते-संवारते रहते हैं और इतराते रहते हैं। हम इस बात को भी नजरअंदाज कर देते हैं कि जब यह रूप-यौवन जल्दी ही ढल जाएगा तो फिर क्या होगा?
हमारी यह आत्मा अविनाशी ईश्वर का एक अंश मात्र है। परमात्मा की भॉंति यह भी नित्य और नूतन है। हमारे इस भौतिक शरीर के मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी यह सदैव विद्यमान रहती है। यह युगों-युगों तक रूप बदल-बदलकर इस संसार में जन्म लेती रहती है। हमारी आत्मा अपने पुराने, रोगी अथवा कटे-फटे शरीरों का त्याग करके नए शरीर को धारण करती रहती है। अत: आत्मज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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