गुरुवार, 26 मार्च 2026

रिश्तों में प्यार और विश्वास

रिश्तों में प्यार और विश्वास

लौकिक रिश्ता हो अथवा ईश्वरीय हो, कोई भी सम्बन्ध ऐसा ही नहीं होता जिसके लिए हमारे मनों पर धूल नहीं जमती। जब तक वहाँ धूल जमी रहती है तब तक सब धुँधला-धुँधला दिखाई देता है। जब उस धूल को हटाकर सफाई कर देते हैं तब सब पारदर्शी हो जाता है। उस समय हमारे समक्ष सब साफ होने लगता है। हर रिश्ते में प्यार और विश्वास का होना बहुत आवश्यक होता है। उनके बिना सब‌ बेमायने रह जाता है।
            यह सब कहने का मात्र यही अभिप्राय है कि हर रिश्ता प्यार और विश्वास पर टिका होता है। जितना अधिक हम एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील रहेंगे, वह सम्बन्ध उतना ही अधिक करीबी बन जाता है। अब सोचने वाली बात यह है कि कौन-सी धूल है जिसकी यहाँ चर्चा की जा रही है? मन पर यह धूल कैसे जम जाती है? इसे साफ करने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जा सकता है?
          ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, माया, लालच, अहंकार आदि की धूल हमारे मनों पर जम जाती है। हम प्राय: आवेश में आ जाते हैं। किसी दूसरे की भौतिक उन्नति, सुख-समृद्धि, वैभव, ज्ञान आदि को हमारा अहं सहन नहीं कर पाता। इसीलिए हम दूसरों की ओर से उदासीन हो जाते हैं और दूरी बना लेते हैं। हम अपने ही बन्धु-बान्धवों के बीच भेदभाव की दीवारें खड़ी करते रहते हैं। अपने सम्बन्धों के बीच जाने-अनजाने नफरत के बीज बोते रहते हैं। जब उसका फल मिलता है तो वह हमसे सहन नहीं होता। हम व्याकुल हो जाते हैं।
          ‌धीरे-धीरे समय बीतने पर सारी यादें धुँधली पड़ जाती हैं। इस कारण हमारे मनों में पड़ी दरारें बढ़ने लगती हैं। हमें सब कुछ बदरंग दिखाई देने लगता है। कुछ भी साफ नहीं दिखाई देता। यदि हम इन यादों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं तब हमारा अहं आड़े आ जाता है। तब हम चाहकर भी अपनी दुर्भावनाओं से मुक्त नहीं हो पाते और हमारे मनों में जमी हुई धूल बढ़ती जाती है। हम उसे साफ करने के स्थान पर वैसा ही छोड़कर आगे बढ़ जाना‌ चाहते हैं। यह उचित नहीं होता।
            हमारे अपने घर में जो भी फर्नीचर होता है, उसे हम प्रतिदिन झाड़-पौंछकर साफ करते हैं, उसे चमकाकर सजाते हैं। इसी तरह अपने घर को भी शीशे की तरह चमकाते हैं ताकि वहाँ आने-जाने वाला हर व्यक्ति हमारे सलीके की प्रशंसा करे। घर यदि साफ-सुथरा होता है तो वहाँ सकारात्मक ऊर्जा प्रसरित होती है। वह ऊर्जा हमारे तन और मन को प्रफुल्लित करती है। इसके विपरीत धूल आदि गन्दगी रहने पर नकारत्मक ऊर्जा रहती है जिससे तन और मन दोनों रोगी हो जाते हैं।
             इस प्रकार हम प्रतिदिन धूल को झाड़कर साफ करते हैं। अपने घर के बाहर सड़क पर जमी धूल भी हमें अच्छी नहीं लगती। उसे कितनी भी साफ कर लो फिर दुबारा उस पर धूल हो ही जाती है। हम बार-बार सफाई करते हैं परन्तु धूल भी अपना साम्राज्य फिर से स्थापित कर लेती है। 
            अपने मन पर नित्य जम रही धूल के प्रति हम लापरवाह रहते हैं। हम उसे साफ करने अथवा हटाने का कोई प्रयास ही नहीं करते। अपने घर की धूल हमें परेशान करती है पर मन की धूल को हम बड़े प्यार से पालते हैं। उसे अपना मीत बना लेते हैं। उससे हमें तनिक भी चिड़चिड़ाहट नहीं होती। इस कारण हमारे मनों में नकारात्मक विचार जन्म लेने लगते हैं जो हमें सहज या सरल बने रहने देना नहीं चाहते। हम अपने अन्तस में हो रहे इस परिवर्तन को समझ ही नहीं पाते।
            यदि हम अपने मन पर पड़ी अथवा विचारों की धूल को दूर करने का प्रयास करें तो निश्चित ही सफलता मिलेगी। जब हम इसे झाड़-पौंछकर साफ कर देंगे तो हमारे अन्तस की जड़ता दूर हो जाएगी। वर्षा के बाद जैसे सारी प्रकृति चमकती हुई दिखाई देती है वैसे ही इस धूल के दूर हो जाने से सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। हमें अपने सम्बन्ध मोहक और अपने-से लगने लगते हैं। उस समय वहॉं पर प्यार और विश्वास अपनी जड़ें मजबूत करने लगते हैं।
             बन्धु-बान्धवों के प्रति मन में पनपने वाला सारा रोष धुलकर सब चमकता हुआ प्रतीत होता है। मनों में आई हुई मलिनता नष्ट होने लगती है। तब उनको कसौटी पर परखने की आवश्यकता नहीं रह जाती। मन में आने वाले ग्लानि के भाव तिरोहित हो जाते हैं और सभी को बहुत सुकून देते हैं। सभी लोग फिर से मानो एक डोर में बॅंधे हुए से प्रतीत होने लगते हैं।
          यथासम्भव अपने अन्तस की धूल को साफ करने के लिए ईश्वर की उपासना, सद् ग्रन्थों का अध्ययन और सज्जनों की संगति में रहना चाहिए। इससे मनों में सरलता और सहजता का वास होता है जिससे सहृदयता बढ़ती है। उसे शीशे की तरह चमकाने से सकारात्मक किरणें प्रवाहित होती हैं। वे हमारे पास आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करती हैं। बस अपने सम्बन्धों को प्यार और विश्वास से सींचने की आवश्यकता होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

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