शुक्रवार, 20 मार्च 2026

नवरात्र पर विशेष

नवरात्र पर विशेष

नवरात्र के इस पावन पर्व में हम माँ दुर्गा के नौ रूपों - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्धमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं।
        हाँ, यहाँ तान्त्रिकों की तन्त्र साधना के विषय में चर्चा करना हमारा उद्देश्य नहीं है जो इन दिनों श्मशान में जाकर साधना करते हैं और फिर अपनी मनचाही सिद्धियाँ प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। फिर उनके अनुरूप कार्य करते हैं।
           प्रश्न यह उठता है कि अपने जीवन में इन रूपों को ढालने की हमने कभी कोशिश की है क्या? मात्र नौ दिन माँ की पूजा करके हम अपने सभी कर्त्तव्यों से मुक्त हो पाएँगे क्या? दुष्टों का दलन करने वाली माँ के इस बलिदान को क्या हम यूँ ही व्यर्थ में गॅंवा देंगे?
            इन प्रश्नों का सीधा-सा उत्तर है नहीं। केवल कथन मात्र से समस्याओं का अन्त नहीं होगा। जब तक हम माँ के इन रूपों को अपने में आत्मसात नहीं करेंगे अथवा उन पर आचरण नहीं करेंगे तब तक सब अधूरा ही रहेगा। केवल कहने मात्र से बात नहीं बनती। उसे जीवन में क्रियान्वित करना पड़ता है। तभी वास्तव में हम मॉं के इन रूपों के अनुसार जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
          माँ दुर्गा ने संसार की भलाई करने के लिए कठोर कदम उठाया था। अपना सुख-चैन सब छोड़कर उसने उन असुरों से युद्ध करने की ठानी थी। उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करके माँ ने हम सबके समक्ष एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया था। माँ भगवती ने जनसाधारण की भलाई के लिए दुष्टों का संहार करके हमें चमत्कृत किया हैं।
          उस सबके विषय में बस किस्से-कहानियों की तरह पढ़कर हम चटखारे नहीं ले सकते। उसकी शूरवीरता को हमें अपने अन्तस् में अनुभव करना होगा। उचित समय आने पर उसी तरह आचरण भी करना होगा। समाज में दुष्प्रवृत्ति के लोगों का संहार तो हम नहीं कर सकते परन्तु उनके कुकृत्यों के लिए न्याय व्यवस्था का सहारा लेकर उन्हें दण्ड अवश्य दिलवा सकते हैं। यह हमारा मौलिक दायित्व भी है और उसे निभाना चाहिए।
          आज मैं अपनी सभी बहनों से आग्रह करना चाहती हूँ कि एक माँ के सभी करुणा, कोमलता, दयालुता आदि गुणों के साथ-साथ माँ दुर्गा के वीरता और दुष्टदलन वाले गुणों को आगे बढ़कर अपनाएँ। इस प्रकार करके हर प्रकार के अत्याचार का मुँहतोड़ जवाब देने की सामर्थ्य माँ स्वयं ही हम सबको देगी।
            माँ दुर्गा के सभी अस्त्रों-शस्त्रों यानी त्रिशूल, शंख, तलवार, धनुष-बाण, चक्र, गदा आदि  का प्रयोग करते समय साम, दाम, दण्ड और भेद का सहारा लेने में किंचित भी हिचकिचाना नहीं है। तभी हम मॉं के सच्चे भक्त कहला सकेंगे।
           हमें स्वयं ही अपने मनोबल को ऊपर उठाते हुए स्वेच्छा से यह प्रण लेना होगा कि माँ दुर्गा की तरह बुराई के कारण को जड़ से उखाड़कर हमें फैंकना है। तभी नवरात्र को मनाने की सार्थकता है अन्यथा अन्य रस्मों अथवा उत्सवों की तरह यह पूजन भी मात्र एक दिखावे की रस्म बनकर निरर्थक रह जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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