धन के पीछे दीवाना होकर भागना
मनुष्य जीवन भर अपने खाने-पहनने की और अपनी स्वयं की सुध बिसराकर पैसे के पीछे दीवाना होकर भागता रहता है। वह भूल जाता है कि यह मृगतृष्णा उसे बस यहाँ-वहाँ भटकाती रहेगी और फिर कहीं का भी नहीं छोड़ेगी। मनुष्य इस विषय पर कभी विचार ही नहीं करना चाहता कि इस संसार में क्या यह धन-दौलत किसी की अपनी बन पाई है? यह उसे क्या-क्या दे सकती है? उसके बदले में उससे क्या-क्या छीनने में सफल हो सकती है? ये प्रश्न वास्तव में विचारणीय हैं।
यह पैसा, यह धन-दौलत मनुष्य को सुन्दर मखमली बिस्तर दिलवा सकती है परन्तु उसे प्रफुल्लतादायक अच्छी और गहरी नींद कभी नहीं दे सकती। इसी तरह यह दौलत भोजन तो दे सकती है पर भूख को मिटा पाना उसके बूते से बाहर की बात है। व्यवहार में देखा जाए तो दौलत हमें पहनने के लिए अच्छे-से-अच्छे कपड़े खरीदकर दे सकती है परन्तु हमारे लिए सुन्दरता नहीं खरीद सकती। यह पैसा ऐशो-आराम के साधन दे सकता है परन्तु सुकून के दो पल हमारे जीवन के लिए नहीं जुटा सकता।
इसी प्रकार धन-दौलत जिस पर हम इतना गर्व करते हैं, वह हमें अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ दे सकती है परन्तु अच्छा स्वास्थ्य अथवा जीवन खरीदकर नहीं दे सकती। बच्चों को यह बिगाड़ सकती है, उन्हें हठी और मानी बना सकती है पर सन्तान को आज्ञाकारी नहीं बना सकती। यह मनुष्य को ऐशो-आराम के साधन दे सकती है परन्तु सुख-सौभाग्य नहीं दे सकती। उसकी पसन्द के नाते-रिश्तेदार देना उसके बस की बात नहीं है। ईश्वर ने जो नाते-रिश्तेदार दे दिए सो दे दिए।
किसी से प्यार अथवा किसी का विश्वास आदि कुछ भी तो नहीं दिला सकती यह दौलत। यह मनुष्य के घर कुव्यसनों का डेरा बना सकती है पर उसे सन्मार्ग पर चलाने के लिए उसका हाथ नहीं थामती। उसे गर्त में गिरते देखती रहती है परन्तु उसे सम्भलने के लिए प्रेरित नहीं करती। अत: इस पर इतना इतराना या मान करना उचित नहीं है। हम यह भी जानते हैं कि यह माया बहुत ही चंचल है, ठगिनी है। हमारे विवेक को भ्रमित कर देती है। यह दौलत भले-चंगे इन्सान को अपने जाल में फंसाकर उसे भ्रष्ट बना देती है।
कबीरदास जी का एक बहुत प्रसिद्ध सब्द या पद है -
माया महा ठगनी हम जानी
इसमें उन्होंने माया को 'महाठगिनी' यानी बहुत बड़ी धोखेबाज कहा है जो त्रिगुण यानी सत्व, रज और तम की फाँसी लेकर मीठी बोली बोलती है। यह माया संसार के सभी प्राणियों को मोह और इच्छाओं के जाल में फंसाकर परम सत्य सत्य ईश्वर से दूर कर देती है।
यह धन-दौलत उसे अपनों से दूर अकेला कर देने का षडयन्त्र करती रहती है। जब वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाती है तब धत्ता बताकर चल देती है। कहने का तात्पर्य यही है कि जब मनुष्य उसके मायाजाल में पूरी तरह उलझ जाता है तब उसे ठोकर मार देती है तथा इठलाते हुए शान से किसी और के पास चली जाती है। बेचारे मनुष्य को तो पता भी नहीं चलता और उसका सब कुछ लुट जाता है और वह नष्ट हो जाता है। वह कंगाल बनकर अपने दुर्भाग्य को कोसता रहता है।
मनुष्य इस धन के हाथ की कठपुतली बना बस सोचता ही रह जाता है कि यह सब कैसे हो गया? क्यों हो गया? वह है कि मुस्कुराते हुए दूर खड़ी होकर उसकी इस बर्बादी का आनन्द लेती रहती है। पलक झपकते ही यह माया राजा को रंक बना देती है और रंक को राजा के सिंहासन पर विराजमान कर देती है। इसके खेल बहुत निराले हैं जो आम आदमी की समझ से बाहर हैं।
इसलिए सयाने कहते हैं कि पैसा हाथ का मैल है। इस पर गर्व नहीं करना चाहिए। आज यह यहॉं है तो देखते-ही-देखते कल कहीं और चली जाएगी। यह किसी को कलम पकड़ाकर वारा न्यारा कर देती है। दूसरी ओर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले से जीवन भर आँख मिचौली का खेल खेलती रहती है। इसकी आशा में संसार में आया हुआ मनुष्य अपने जीवन से हार जाता है पर यह उसका साथ नहीं निभाती।
इस आने-जाने वाली धन-दौलत पर मनुष्य को कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए। इसे देश, धर्म और समाज के हित के लिए खर्च करना चाहिए। घर-परिवार के सदस्यों को भौतिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करते हुए इस धन को परोपकार के कार्यों में लगा देना चाहिए। दानवीर कर्ण की भॉंति इसे दान देने वाले इतिहास में अमर हो जाते हैं। समय-समय पर यथोचित दान देने में ही इस धन-दौलत की सार्थकता होती है। इस तरह इस धन का सदुपयोग करने से मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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