सफलता जब पंख लगाकर उड़ती
सफलता जब पंख लगाकर उन्मुक्त आकाश में पक्षी की भाँति ऊँची उड़ान भरने लगती है तब उन पंखों को कतरने के लिए बहुत से लोग कैंची लेकर तैयार बैठे होते हैं। यह स्थिति वास्तव में बहुत कष्टकारक होती है परन्तु दुर्भाग्यवश यह भी जीवन का एक सत्य है। इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। सीधी-सी बात है कि कोई भी मनुष्य दूसरे को सफल होते हुए नहीं देखना चाहता। उसकी टॉंग खींचकर गिराने से लोग गुरेज नहीं करते। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों को उन्नति करते देखकर प्रसन्न होते हैं।
इस संसार में लोग अपने दुखों से दुखी नहीं होते, वे दूसरो के सुखों से परेशान होते हैं। किसी का भी धन-वैभव अथवा सुख-समृद्धि अन्यों के लिए ईर्ष्या का कारण बन जाती है। लोग यह नहीं सोचना चाहते कि अमुक व्यक्ति ने दिन-रात एक करके जी तोड़ अथक परिश्रम किया है। तब जाकर उसने जीवन में यह सब प्राप्त किया है। दूसरे व्यक्ति की सफलता मानो उनके गले की फॉंस बन जाती है जिसे न उनसे निगलते बनता हैं और न ही उनसे उसे उगलते बनता है।
जब तक किसी भी योजना को साकार करने के लिए उसे उपयुक्त उपाय से क्रियान्वित न किया जाए तब तक उसके सफल होने में सन्देह रहता है। योजना की सफलता के लिए सबसे पहले उसे एक रूप दिया जाता है। उसके बाद उसके लिए धन-बल का प्रबन्ध करना होता है। फिर उसका क्रियान्वयन इस प्रकार करना पड़ता है कि मनुष्य को असफलता का मुँह न देखना पड़े। हर उद्देश्य को सफल बनाने के लिए सच्चे और ईमानदार साथियों का होना पहली आवश्यकता होती है। सबसे महत्त्वपूर्ण होता है व्यक्ति का अपना श्रम और लगन या उसकी निष्ठा।
जिस मनुष्य ने इन सभी पक्षों पर समय लगाकर और मन्थन करके किसी भी योजना का प्रारूप तैयार किया हो, उसे प्राय: सफलता मिलती है। यदि उससे कहीं चूक हो जाए तो उसे सुधारकर फिर पूरे साहस से अपने कर्मक्षेत्र में उतर जाता है। तब तक वहाँ डटा रहना होता है जब तक उसे वहाँ मनचाही सफलता न मिल जाए।
इसके विपरीत जो व्यक्ति अपनी कार्य योजना को आरम्भ करने से पूर्व ही उसको सार्वजनिक कर देता है अथवा चारों ओर प्रचारित करता है, उसके असफल होने के अवसर अधिक होते हैं। इसका कारण है कि अपने रहस्य का उसने ऐसा ढिंढोरा पीटा जिससे उसके पहले ही किसी और ने उसे क्रियान्वित करके शायद उसका लाभ उठा लिया हो। मनीषी इसीलिए चेतावनी देते हैं कि अपने रहस्यों को तब तक गुप्त रखना चाहिए जब तक उनका शुभारम्भ न हो जाए।
कुछ लोग ऐसे सुविधाभोगी होते हैं जिन्हें बिना हाथ-पैर हिलाए केवल सोचने मात्र से ही सफलता चाहिए होती है। दिवास्वप्न देखने वाले वे शेखचिल्ली अपने जीवन के हर मोर्चे पर असफल रहते हैं। वे अपनों से और समाज से तिरस्कृत होते रहते हैं। ये लोग अपनी असफलता के कारणों पर विचार करने के स्थान पर, अपना पूरा जीवन दूसरे सफल व्यक्तियों को कोसते रहते हैं। उन पर टीका-टिप्पणी करते हैं। इससे भी बढ़कर अपनी असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़कर आत्ममुग्ध होते हैं।
कुछ मनुष्य दूसरों की देखादेखी अथवा होड़ में उत्साहित होकर किसी भी कार्य को आरभ्भ कर लेते हैं पर रास्ते में आने वाली कठिनाइयों के कारण उसे बीच अधर में अधूरा छोड़कर पलायन कर जाते हैं। ऐसे ढुलमुल रवैये वाले लोग भी अपने जीवन में कदापि सफल नहीं हो पाते।
सफलता सदा उन्हीं लोगों के कदम चूमती है जो अपनी असफलताओं और मार्ग में आने वाली निराशाओं को अपने नियन्त्रण में करके, उनसे शिक्षा लेकर निरन्तर आगे बढ़ते रहते हैं। पीछे मुड़कर देखना उनके स्वभाव में नहीं होता। दिन-रात एक करके अपने लक्ष्य की ओर देखने वाले, ये निस्सन्देह सफल होते हैं। ऐसे साहसी व्यक्ति समाज में अग्रणी बनते हैं। इन साहसी उद्यमियों को समाज सदा सम्मान भरी नजरों से देखता है। ऐसे ही महानुभाव सबके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनते हैं और समाज का पथप्रदर्शन करते हैं।
सफलता प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है। उसे पाने के लिए आलस्य त्यागकर उद्यम करना पड़ता है। बैठे-बिठाए तो सामने रखी थाली का निवाला भी मुँह में नहीं जाता। सफल व्यक्तियों से ईर्ष्या करने के स्थान पर उनकी तरह दृढ़तापूर्वक लक्ष्य का सन्धान करने की आवश्यकता होती है। सफलता का मीठा फल चखना चाहिए, उसे दूर की कौड़ी समझने की भूल करके उससे मुँह नहीं मोड़ लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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