मन की सोच के अनुसार संसार
मानव मन की सोच जैसी होती है, उसे यह संसार वैसा ही दिखाई देता है। यदि उसकी सोच का दायरा विस्तृत होगा यानी वह अच्छी, भली अथवा सुन्दर होगी तो उसे सारा संसार अच्छा, भला और सुन्दर नजर आएगा। उस समय उसे सारी प्रकृति मनोरम दिखाई देती है। नदियॉं, पर्वत, झरने, आकाश, पृथ्वी और सागर आदि सभी उसे लुभावने लगते हैं। वह इन सबमें खोकर अपने जीवन को सार्थक करना चाहता है। वह मन से प्राणिमात्र से प्यार करता है। किसी के भी प्रति अपने मन में दुर्भावना नहीं रखता।
दूसरी ओर जब उसके मन के भाव विपरीत होते हैं, उस समय उसे सब बदरंग दिखाई देने लगता है। उसे चारों ओर की खूबसूरती में अच्छाई कम और बुराई अधिक दिखाई देती है। उस समय उसे यह संसार बिल्कुल भी रहने लायक प्रतीत नहीं होता। उसे ऐसा लगता है जैसे सारा संसार उस पर हंस रहा है, व्यंग्य कर रहा है। प्रकृति उसके जीवन को कोई आनन्द नहीं दे पाती। अपने बन्धु-बान्धवों को स्वार्थी कहकर वह उनसे किनारा करने लगता है। यानी उसे कुछ भी नहीं सुहाता।
मनुष्य के मन में जब खुशी अथवा उल्लास होता है तब वह चाहता है कि हर व्यक्ति उसके साथ उसकी खुशी बाँटे और उसकी खुशी में शामिल हो। उस समय वह अपने परिजनों से घिरा रहना चाहता है। तब उसे सारी कायनात अपनी तरह प्रसन्न होती हुई प्रतीत होती है। उसे लगता है कि सारी प्रकृति उसका साथ दे रही है, उसकी खुशियों में शामिल हो रही है। वह उसके साथ रो रही है, हँस रही है, नाच-गा रही है अथवा चारों ओर अपनी खुशबू बिखेर रही है।
इसके विपरीत जब मनुष्य का मन दुखों और परेशानियों से घिरा होता है तो उसे लगता है कि सारा जमाना उसका दुश्मन हो गया है। ईश्वर भी उससे नाराज होकर परेशान कर रहा है। उससे उसकी खुशी देखी नहीं जाती। इसलिए वह उसे दुखी ही दुख दे रहा है। तब सारी प्रकृति उसे उदास और बदरंग दिखाई देने लगती है। उस समय उसे ऐसा लगता है मानो उसके साथ ही वह उत्साह से रहित निर्जीव-सी हो गई है। उसके मन में जीवन के प्रति मोह ही नहीं रह जाता।
मनुष्य के मन में जब ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि भाव अपना बसेरा कर लेते हैं तो उसे चारों ओर नफरत का व्यापार होता दिखाई देता है। तब उसे लगने लगता है कि आपसी भाईचारा, प्यार, मुहब्बत सब खत्म हो गया है और सभी एक-दूसरे की टाँग खींचने में लगे हुए हैं। इस संसार में परस्पर नफरत के कारण कोई भी किसी को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता, सबका खून सफेद हो गया है। उसके मन में अनजाना-सा भय व्याप्त होने लगता है। यह स्थिति वास्तव में भयावह होती है।
मन में क्रोध की अधिकता हो जाने पर मनुष्य इस दुनिया को आग लगा देना चाहता है। किसी की शक्ल नहीं देखना चाहता। इस दुनिया को छोड़कर कहीं भाग जाना चाहता है। परन्तु जब उसके मन में प्यार का भाव आता है तब सभी उसे अपने लगने लगते हैं। उसे लगता है यह संसार मानो प्यार का सागर है जिसमें नहाकर सभी सराबोर हो रहे हैं। सब कुछ अच्छा और भला प्रतीत होता है। वह स्वयं भी सबसे प्रेम से मिल-जुलकर रहना चाहता है।
चोर को सभी लोग चोर दिखते हैं। हेराफेरी व चालबाजी करने वाले को सभी हेराफेरी करने वाले और चालबाज दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचारी, चोरबाजारी करने वाले को सब भ्रष्ट लगते हैं। इसके विपरीत सरल व सहज स्वभाव वालों को सभी सरल और सीधे लगते हैं। सज्जनों को सब सज्जन लगते हैं और मूर्खों को सब मूर्ख। पागल पूरी दुनिया को ही पागल समझते हैं। वीरों के लिए सभी वीर होते हैं और कायरों के लिए सब कायर होते हैं। सच्चे लोगों को सब सच्चे और झूठों को सब झूठे लगते हैं। इसीलिए असत्यवादी किसी पर विश्वास नहीं करते।
रैदास जी ने कहा था-
मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मन शुद्ध पवित्र हो तो उनके पास जो कठौती है, उसमें रखा हुआ पानी गंगाजल हो सकता है।
तुलसीदास जी ने भी मन के इन्हीं भावों के विषय में कहा था-
जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अर्थात् जैसी मनुष्य की भावना होती है, उसे ईश्वर उसी रूप में दिखाई देता है।
तुलसीदास जी के कथन के अनुसार यदि हम विश्लेषण करें तो मनुष्य के मन के भावों के अनुसार ही उसे संसार और संसार के लोग दिखाई देते हैं।
इन सबसे अलग हटकर अन्य जीवों के विषय में देखें तो कह सकते हैं कि पशु-पक्षी आदि अन्य जीव भी प्रेम, घृणा और हिंसा की भावना को समझते हैं। प्रेम की बदौलत शेर जैसे खूँखार जानवर, हाथी जैसे शक्तिशाली जीव और साँप जैसे जहरीले प्राणी पालतू बनाए जा सकते हैं।
साररूप में हम यही कह सकते हैं कि हमारे मन के भावों का बहुत गहरा प्रभाव सामने वाले व्यक्ति के ऊपर पड़ता है। फिर वह उसी के अनुसार ही व्यवहार करता है।
चन्द्र प्रभा सूद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें