मंगलवार, 24 मार्च 2026

मिल-जुलकर सौहार्दपूर्वक रहना

मिल-जुलकर और सौहार्दपूर्हवक रहना

सभी मनुष्यों को सदा परस्पर मिल-जुलकर और  प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। इससे उनमें एकता की भावना बढ़ती है और चारों ओर सौहार्द फैलता है। यह मानवता के लिए बहुत आवश्यक होता है। यदि किसी के भी साथ घृणा या ईर्ष्या की जाए तब चारों ही ओर परस्पर नफरत की आग भड़कने लगती है जिसकी चपेट में आकर बहुत कुछ जलकर खाक हो जाता हैं। इससे हम सबको हानि होती है। चाहे उसे हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकें अथवा नहीं।
              ईश्वर ने मनुष्य को सहृदय प्राणी बनाकर इस संसार में भेजा है। वह नहीं चाहता कि उसके बनाए हुए जीवों से कोई भी नफरत करे। वह स्वयं सबसे प्रेम करता है और किसी से कभी नाराज नहीं होता। इसलिए वह चाहता है कि उसके बनाए हुए सभी लोग मिल-जुलकर रहें। उनमें परस्पर भाईचारा बना‌ रहना‌ चाहिए। कहीं विरोध या अलगाव की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
            यदि किसी व्यक्ति की कोई बात पसन्द न आए तो यह आवश्यक नहीं कि उसी समय बदला ले लिया जाए। होना तो चाहिए कि उसे शान्ति पूर्वक इस बात का अहसास करवा दिया जाए कि उसकी अमुक बात अच्छी नहीं लगी। उसके बाद फिर अपने-अपने मन को एक-दूसरे की ओर से साफ कर लेना चाहिए। अपने मन में कलुषित भाव लाकर अनावश्यक ही पिष्टपेषण करने से सदा बचना चाहिए और स्वयं को परेशान करने से बचना चाहिए।
            अपनी नाराजगी को केवल शब्दों  तक रखना चाहिए, दिल की गहराई में बसाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। कुछ कह लिया और कुछ सुन लिया, मन की भड़ास निकल गई। फिर ऐसे हिसाब बराबर करके हाथ मिला लेना चाहिए। दुश्मनी पालने से किसी का भला नहीं होता। अपनों को यदि इस तरह हम दिन-प्रतिदिन नाराज करते जाएँगे तो शत्रुओं की संख्या बढ़ाते जाएँगे। उस समय अपना कहने के लिए हमारे पास कोई नहीं रहेगा। हम अकेले होकर सबसे कट जाऍंगे।
            धीरे-धीरे अकेले हो जाने से जीवन यात्रा दुष्वार हो जाती है। कहते हैं-
         अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
अर्थात् अकेला मनुष्य तो कुछ भी नहीं कर सकता। हर कार्य को करने के लिए उसे बहुत से लोगों की आवश्यकता पड़ती है।
          'एकता में बल है' कहकर इसीलिए मिलकर रहने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसी भाव को इस तरह भी कहकर समझाया जाता है कि  'एक अकेला और दो ग्यारह।' यानी सामाजिक प्राणि यह मनुष्य समाज से कटकर अलग-थलग होकर कभी अकेला नहीं रह सकता। अकेले रहना किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए अभिशाप से कम नहीं होता। ऐसा व्यक्ति सब परिजनों से कटकर मात्र दुखी ही रहता है। माना कि ऋषि-मुनि अकेले रह सकते हैं पर केवल तब, जब वे साधना कर रहे हों। हमेशा के लिए तो वे भी अकेले नहीं रह सकते।
           मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भी अकेला नहीं रह सकता। यदि उसे अकेलापन न सताता तो वह इस सृष्टि की रचना करके स्वयं को व्यस्त न रखता। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा है - 
                एकोहं बहुस्याम' 
अर्थात् मैं एक हूॅं, मैं अनेक‌ हो जाऊॅं कहकर इस बात की पुष्टि की है। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है कि एक ही ब्रह्म अपने संकल्प से कई रूपों में विस्तृत हो गया।
           वह बस बैठा हुआ दुनिया के लोगों के खेल देखकर अपना मनोरंजन करता रहता है। दूसरों को आकर्षित करने अथवा अपना बनाने का एकमात्र जादू है प्रेम का व्यवहार करना। इससे शेर जैसे खूँखार, हाथी जैसे शक्तिशाली और साँप जैसे जहरीले जीवों को वश में किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि संसार के सभी जीव इस प्यार की भाषा को बखूबी समझते हैं। इसलिए किसी को भी अपना बनाना हो तो उससे प्यार और अपनत्व का ही व्यवहार करना चाहिए।
             मन को थोड़ा-सा विशाल बनाने से उसमें छिपे घृणा, द्वेष आदि शत्रु स्वयं ही निकलकर भाग जाते हैं। उस समय मनुष्य की मन की वृत्तियाँ सात्विक हो जाती हैं। उसके पास आने वाला हर जीव स्वाभाविक रूप से स्वयं ही उसके प्यार से सराबोर हो जाता है। प्यार से सब कुछ सरल और सहज हो जाता है। मनुष्य के सभी कार्य स्वत: ही सिद्ध हो जाते हैं। इसका कारण यही  है कि प्यार करने वाले व्यक्ति के बहुत से साथी अपने आप बन जाते हैं। 
             इस तरह उसके अपनों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो जाती है। जब बहुत से हाथ एकसाथ आगे बढ़ने लगते हैं  तब दुनिया का कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो पूरा नहीं हो सकता। जहाँ तक हो सके चारों ओर प्यार की वर्षा होती रहनी चाहिए। इस दुनिया से नफरत, आतंक और अन्य बुराइयों को दूर करने के लिए और स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए इसकी महती आवश्यकता है। इसलिए प्रेम की गंगा बहाते रहिए और धरती पर ही स्वर्ग जैसी सुख एवं शान्ति का आनन्द लेते रहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

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