मंगलवार, 30 सितंबर 2025

जो ब्रह्माण्ड में वही शरीर में

जो ब्रह्माण्ड में वही शरीर में

यजुर्वेद के एक मन्त्र में कहा गया है -
          यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे, 
         यथा ब्रह्माण्डे तथा पिंडे
अर्थात् जैसा मानव शरीर है और वैसा ही ब्रह्माण्ड है। जैसा ब्रह्माण्ड है और वैसा ही मानव शरीर है। यहॉं 'पिण्डे' का अर्थ है सूक्ष्म जगत और 'ब्रह्माण्डे' का अर्थ है स्थूल जगत है।
           चरक संहिता का यह श्लोकांश हमें यही बात समझा रहा है - 
            यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे
अर्थात् जो-जो इस ब्रह्माण्ड में है वही सब हमारे शरीर में भी है। 
            यह एक गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक विचार है जो मानव शरीर और ब्रह्माण्ड के बीच के सम्बन्ध को दर्शाता है। यह एकता और परस्पर सम्बन्ध के सिद्धान्त पर बल देता है।           
           'योगदर्शन' में इस विचार का उपयोग शरीर और मन को जोड़ने और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह दर्शाता है कि शरीर और ब्रह्माण्ड की चेतना एक ही है। व्यक्तिगत आत्मा(आत्मा) ब्रह्माण्डीय आत्मा(परमात्मा) का ही हिस्सा है। यानी हिन्दूदर्शन और योगदर्शन में कहा जाता है कि मानव शरीर ब्रह्माण्ड का एक छोटा संस्करण है। ब्रह्माण्ड और मानव शरीर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों एक ही सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। 
          यह भौतिक संसार पंचमहाभूतों से बना है-  आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। उसी प्रकार हमारा हमारा यह शरीर भी इन्हीं पाँचों महाभूतों से बना हुआ है। जब जीव की मृत्यु होती है तो उसके उपरान्त ये पाँचों महातत्त्व अपने-अपने तत्त्व में जाकर मिल जाते हैं।
              इन पंचमहाभूतों की पंचतन्मात्राएँ हैं। मनुष्य में भी ये सभी पंचतन्मात्राएँ  विद्यमान हैं-  आकाश की तन्मात्रा शब्द है। मनुष्य अपने कानों से सुनता है। वायु की तन्मात्रा स्पर्श है। मनुष्य अपने शरीर पर स्पर्श का अनुभव करता है। अग्नि की तन्मात्रा ताप है। अग्नि तत्त्व मनुष्य के शरीर में है जिससे वह भोजन पचाता है और अग्नि जैसा तेज उसके चेहरे पर रहता है। जल की तन्मात्रा रस है। मनुष्य के मुँह से निकलने वाला रस भोजन को स्वादिष्ट बनाता है और शरीर को पुष्ट करता है। पृथ्वी की तन्मात्रा गन्ध है। पृथ्वी में हर स्थान पर गन्ध बिखरी हुई है। मनुष्य अपनी घ्राण शक्ति (नाक) से गन्ध को सूॅंघता है और आनन्द का अनुभव करता है।
             इन पंचमहाभूतों के पाँच गुण हैं जो मनुष्य शरीर में भी होते हैं- आकाश का गुण अप्रतिघात (non resistance) है। आकाश की तरह पूरे शरीर पर त्वचा का आवरण(covering) है। हमारे शरीर के सूक्ष्म छिद्रों से जहाँ प्रतिघात होता है उसे आकाश तत्त्व से उपचार से रोका जाता है। वायु का गुण चलत्व (mobility) है। हमारा शरीर भी वायु की तरह चलायमान है। वह सदा इधर से‌ उधर आता-जाता रहता है। 
           अग्नि का गुण उष्णत्व (heating) है। अग्नि के समान उष्णता मनुष्य में होती है तभी वह जीवित रहता है। यदि उसकी उष्णता समाप्त हो जाए तो वह इस दुनिया से कूच कर जाता है। जल का गुण द्रवत्व (fluidity) है। जल के समान ही मनुष्य में आर्द्रता होती है। तभी दया, ममता, करुणाआदि गुणों के कारण वह दूसरों के दुख को सुनकर द्रवित हो जाता है। पृथ्वी का गुण ठोसपन (solidification) है। पृथ्वी की तरह मनुष्य भी ठोस है अन्यथा वह टिक नहीं सकता हवा में झूलता रहेगा। पृथ्वी की तरह शरीर में भी अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ एवं लवण कैलशियम, पोटाशियम, फासफोरस, सोडियम, लोहा, तांबा, सल्फर आदि विद्यमान हैं। 
            ब्रह्माण्ड और शरीर में समानता है पर अन्तर केवल स्थूल व सूक्ष्म का है। जितने मूर्तिमान भाव विशेष इस लोक में हैं वे सब मनुष्य में हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो लोक या प्रकृति तथा पुरुष में समानता है। चरक संहिता इसी कथन को हमारे लिए कहती है- 
     यावन्तो  हि  लोके  मूर्तिमन्तो  भावविशेषा:।
     तावन्त: पुरुषे यावन्त: पुरुषे तावन्तो लोके॥
अर्थात् लोक और पुरुष (पुरुष और लोक) का यह समता सम्बन्धित ज्ञान, दोनों में अन्तर करने वाली विभेदक बुद्धि नष्ट हो जाती है। मनुष्य में सत्य बुद्धि का उदय होता है, इससे संसार के सम्पूर्ण प्राणिमात्र में अपनत्व उत्पन्न होता है।
          ब्रह्माण्ड में चेतनता है तो मनुष्य भी चेतन है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलता फिरता रहता है। परन्तु जब यह किसी कारण से रोगी हो जाता है और चलने-फिरने में अक्षम हो जाता है तो इसमें जड़ता आने लगती है। ईश्वर ने बुद्धि के रूप में  सबसे अच्छा उपहार इसे दिया है। इस बुद्धि से वह चमत्कार करता है।
          इस प्रकार पंचमहाभूतों के सभी गुण मनुष्य में हैं। जिसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इस शरीर में भी है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 29 सितंबर 2025

ज्ञानाचरण की आवश्यकता

ज्ञानाचरण की आवश्यकता 

ज्ञान अर्जित करके ज्ञानाचरण तो करना चाहिए परन्तु उसका मद कदापि नहीं। मनुष्य को अपने अर्जित ज्ञान पर आचरण अवश्य करना चाहिए। अन्यथा पुस्तकीय ज्ञान के कोई मायने नहीं रह जाते। अपने अल्प ज्ञान पर मनुष्य को कदापि अहंकार नहीं करना चाहिए। ज्ञानार्जन की पहली शर्त होती है विनम्रता। हमारे शास्त्र यही शिक्षा देते हैं कि विद्या प्राप्ति की पहली शर्त है - 
    विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्।
   पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।
अर्थात् विद्या विनय (विनम्रता) देती है, विनय से पात्रता (योग्यता) आती है, पात्रता से धन मिलता है, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है। 
           यानी विद्या विनम्रता देती है। जो व्यक्ति विनम्र नहीं है, उसे विद्वान या ज्ञानी कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। यह श्लोक शिक्षा के महत्व को दर्शाता है। यह बताता है कि शिक्षा मनुष्य को न केवल ज्ञानी बनाती है बल्कि उसे विनम्र, योग्य और सुखी भी बनाती है। 
            इसी प्रकार निम्न श्लोक यह कहता है-
       नमन्ति फलिनो वृक्षा: नमन्ति गुणिनो जना:।
       शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन॥
अर्थात् फलदार वृक्ष झुकते हैं और गुणवान लोग झुकते(विनम्र) होते हैं। परन्तु मूर्ख और ठूँठ कभी नहीं झुकते। कहने का अर्थ है कि पेड़ जो ठूँठ बन गया है और मूर्ख मिथ्या अभिमान में टूट जाते हैं पर झुक जाने में अपना अपमान समझते हैं।
             मनुष्य को सदा यह सोचना चाहिए कि इस ब्रह्माण्ड में अनन्त ज्ञान का भण्डार है। अनेक विषय हैं। प्रत्येक मनुष्य के पास केवल थोड़ा-सा ज्ञान होता है। उस पर उछलते रहना बुद्धिमत्ता नहीं होती। कुछ सीमित पुस्तकें पढ़ लेने या शोध कर लेने से कोई मनुष्य ज्ञानी नहीं बन जाता। सागर से यदि एक गागर भर पानी ले लिया जाए तो क्या उस गागर को अपने भरे होने पर अहंकार कर लेना चाहिए? नहीं, कदापि नहीं। वे तो उस सागर की कुछ बूँदें मात्र हैं, सम्पूर्ण सागर नहीं हैं।
              इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति को भी ऐसा ही समझना चाहिए कि ब्रह्माण्ड के विशाल ज्ञान के भण्डार की कुछ ही बूँदों के बराबर ही उसका ज्ञान है। यदि वह इसे आत्मसात कर लेता है तो वह कभी भी मिथ्या अभिमान नहीं कर सकेगा। तब वह किसी के अल्प ज्ञान का उपहास नहीं करेगा। वह स्वयं को सर्वज्ञ समझने की भूल कभी नहीं करेगा।
             प्रत्येक ज्ञानवान व्यक्ति को सदैव यही सोचना चाहिए कि हर व्यक्ति की गुण-ग्रहण करने की शक्ति(grasping power) एक जैसी नहीं हो सकती। यदि एक जैसी शक्ति होती तो पूरे विश्व में सभी वैज्ञानिक या इंजीनियर या सेवा कार्य करने वाले या व्यापारी या राजनेता होते आदि। सभी की बुद्धि की क्षमता अलग होती है। इसीलिए ईश्वर की ओर से ये ही विभिन्नता है। हमें भी इसका मान रखना चाहिए।
               ईश्वर की बनाई हुई इस सृष्टि में बहुत ही विविधता है। उसने सभी को उनके गुण और कर्म के अनुसार कार्य सौंपा है ताकि वह सृष्टि को सुचारू रूप से चला सके। एवंविध सब लोग मिल-जुलकर सबके साथ व्यवहार करें। अतः संसार में डॉक्टर, इंजीनियर, नेता, अभिनेता, वकील, अध्यापक, सैनिक, सीए, एम बी ए, धोबी, नाई, लुहार, सुनार, बढ़ई, मिस्त्री आदि विभिन्न कार्यों को करने वाले लोग हैं। हर व्यक्ति को समाज में रहते हुए दूसरे की आवश्यकता पड़ती है। किसी व्यक्ति को भी हेय समझकर उसका तिरस्कार करना, उस परमपिता को कभी पसन्द नहीं आता।
              विद्वान को चाहिए कि यदि वह किसी भी मनुष्य को अहं में डूबा देखे तो उसे सन्मार्ग दिखाए जिससे उसका अज्ञान दूर हो सके। ज्ञानी यदि ज्ञान के बल पर स्वयं को ईश्वर की तरह समझने लगे तो उसके जैसा अधम कोई अन्य नहीं हो सकता। तब तो यही कहा जा सकता है कि वह मूर्ख है अथवा ढोंगी है जो दूसरों को मूर्ख समझ कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है।
              इस ज्ञान मद के विषय में भर्तृहरि जी 'नीतिशतकम्' में कहते हैं-
    यदा किंचिज्ज्ञोsहं गजैव मदान्ध: समभवम्।
     यदा सर्वज्ञोsस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मन:।।
    यदा किंचित्किंचद् बुधजनसकाशादवगतम्।
    तदा मूर्खोsस्मीति ज्वर इव मदों में व्याप्त:।।
अर्थात् जब मैं अल्पज्ञ था तो हाथी की तरह मदान्ध था। मैं सर्वज्ञ हो गया हूँ, इस अभिमान से मेरा मन भरा हुआ था। जब ज्ञानियों के संसर्ग में थोड़ा बहुत जाना तब मैं ने समझा कि मैं तो अभी तक अज्ञ था, मूर्ख था। इस तरह ज्वर की तरह मेरा गर्व दूर हो गया।
          इस प्रकार यदि हम नित्य अपना विश्लेषण करते रहेंगे तो यह जान पाना कठिन नहीं होगा कि हमारा अपने ज्ञान का अभिमान करना हमारी बड़ी नासमझी थी। इसलिए जब भी जाग गए तभी समझो जीवन सफल हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 28 सितंबर 2025

किससे मॉंगें?

किससे माँगें?

आज यदि इस बात पर चर्चा करें कि हम किससे माँगे तो आप सब शायद मुझे पागल कहेंगे। यही कहना चाहेंगे कि हमें पास सब कुछ है तो हमें किसी से माँगने की आवश्यकता नहीं है। हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते थे- 'सौ दाँदिए को भी एक दाँदिए की जरूरत पड़ जाती है।'
अर्थात् कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जिसके पास सौ बैल हैं, ऐसे समृद्ध व्यक्ति को भी एक बैल वाले से उसका बैल उधार माँगना पड़ जाता है।
           हम सब दुनिया की हर वस्तु पाना चाहते हैं। उसके लिए जी तोड़ परिश्रम भी करते हैं। जब हम अपना मनचाहा प्राप्त कर लेते हैं तब हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। हमें ऐसा लगता है कि हमसे अधिक भाग्यशाली और दुनिया में कोई नहीं है। इसके विपरीत यदि हम अपनी कामना की पूर्ति में असफल हो जाते हैं तब थक हारकर उदास हो जाते हैं। उस समय हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारे जैसा बदकिस्मत कोई और इंसान नहीं है। हम निराशा के गर्त में डूबने लगते हैं। ऐसी स्थिति में हम ईश्वर को दोष देते हैं। उसे कोसते हैं कि वह हमें खुशियाँ नहीं देना चाहता। पता नहीं किस जन्म का बदला हमसे ले रहा है।
           ऐसा नहीं है कि निर्धन व्यक्ति को ही मॉंगने की आवश्यकता होती है। धनाढ्य जनों को कभी आपना घर चाहिए, नित-नयी गाड़ी चाहिए, इंकम टैक्स-सेल्स टैक्स से बचना होता है, अच्छा स्वास्थ्य चाहिए, सुन्दर सुशील पति/पत्नी जरूरी है, आज्ञाकारी सन्तान की कामना, अच्छी नौकरी या फिर तरक्की की इच्छा, विदेश में सेटल होना या विदेश यात्रा करना आदि कुछ भी हो सकता है। इनके अतिरिक्त हमें परीक्षा-कम्पीटिशन में पास होना, यश, बल, बुद्धि आदि सब भी चाहिए होते हैं। कभी-कभी तो हद हो जाती है जब किसी पड़ोसी, मित्र या सम्बन्धी की नई खरीददारी देखकर उसकी होड़ में बिना समय गंवाए, उसे खरीदने के लिए लालायित हो जाते हैं।
            विचार करने योग्य बात यह है कि वह प्रभु बहुत ही न्यायकारी है। किसी के भी साथ अन्याय नहीं करता। हमारे इस जन्म और पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार देर-सवेर हमें अवश्य दे देता है। इसलिए कहते हैं-
        'उसके घर में देर है अंधेर नहीं।'
             हमारे समक्ष प्रश्न यह उठता है कि हम अपनी कामनाओं की पूर्ति करने के लिए किससे माँगे? यदि सासांरिक रिश्ते-नातों से माँगेंगे तो वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार एकाध बार हमारी सहायता करेंगे। बार-बार किसी से सहायता की गुहार लगाना उचित नहीं होता। इससे अपना अपमान होता है। हर इन्सान की अपनी सीमाएँ होती हैं। उन्हीं सीमाओं में रहकर ही वह सहायता कर सकता है। यहाँ भी रिश्तों में हम भेदभाव को देख सकते हैं। 
        जिससे मनुष्य को भविष्य में कुछ पाने की आशा होती है, उनकी सहायता अगणित बार कर सकते हैं। वैसे जिनसे उनको स्वार्थ सिद्ध होने की उम्मीद नहीं होती उसकी एक बार ही सहायता करके न जाने कितनी बार अहसान जताएँगे। यदि ब्याज पर पैसा उठाने की सोचें तो पूरा जीवन उसे चुकाने में बीत जाता है। 
              बैंकों से यदि सहायता लेने की सोचेंगे तो वहाँ भी सरलता से काम नहीं होते। वहाँ भी सौ अड़ंगे लगाए जाते हैं। वे भी उन्हीं लोगों के पुनः पुनः सहायक बनते हैं जहाँ से कुछ प्राप्ति होती है। चाहे वे उनका दिया हुआ पैसा लौटाए या नहीं। आम आदमी के तो नाक में दम कर देते हैं। उन्हें तो दो-चार हजार रुपयों के लिए भी अदालत में घसीटेंगे, उनके घर नीलाम कर देंगे, गाड़ी उठाकर ले जाएँगे। परन्तु करोड़ों रुपयों का उनका बकाया न चुकाने वालों की जी हजूरी करते हैं क्योंकि उनसे लाभ लेने होते हैं।
              इसलिए मेरे विचार में माँगना है तो जगत के पिता उस परमात्मा से माँगो जो बिना कहे ही हमारी झोलियाँ अपनी नेमतों से भरता रहता है। वह निस्वार्थ भाव से अपने खजाने हम सब पर लुटाता है। वह कभी भी किसी पर अपना अहसान नहीं जताता। न ही वह सांसारिक लोगों की तरह दुनिया में जगह-जगह गाता फिरता है कि मैंने अमुक व्यक्ति की सहायता की है। देखो-देखो मैं कितना बड़ा हूॅं और महान हूँ? 
               वह चुपके से बस हमारी कामनाओं को पूर्ण करने के लिए हमारी सहायता कर देता है। कोई ऐसा माध्यम बना देता है कि बिना कष्ट के हमारा कार्य हो जाता है। किसी को इसकी कानोंकान खबर भी नहीं लगती। यह उस प्रभु की महानता का ही प्रतीक है। इसे हम अज्ञ लोग समझ ही नहीं पाते और परेशान रहते हैं। उसकी महानता को हमें अपने हृदय से स्वीकार करना चाहिए।
             मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि माँगना है तो उसी मालिक से माँगो जो देकर पश्चाताप नहीं करता है। हम एक कदम उसकी ओर बढ़ाते हैं तो वह आगे बढ़कर हमें थाम लेता है। वह हमारी सहायता करने में में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता। वही हमारा सच्चा बन्धु है उसी का पल्लू पकड़ लो तो फिर उद्धार हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 27 सितंबर 2025

अच्छे स्वास्थ्य की कामना

अच्छे स्वास्थ्य की कामना 

मनुष्य का स्वस्थ रहना बहुत आवश्यक होता है। वह स्वस्थ रहकर ही अपने सभी दायित्वों का निर्वहण कर सकता है। अच्छा स्वास्थ्य हर मनुष्य चाहता है। मनुष्य को दिया गया यह ईश्वर का वरदान है। इस शरीर का नीरोग रहना बहुत आवश्यक है। हमें महाकवि कालिदास ने समझाते हुए कहा है-
        शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
अर्थात धर्म का पालन करने के लिए साधन शरीर है। हम अपने धर्म या कर्त्तव्यों का पालन स्वस्थ रहकर कर सकते हैं। यदि मनुष्य अस्वस्थ हो जाए तो उसे हर कार्य के लिए दूसरों का मुँह देखना पड़ता है। जब मनुष्य दूसरों के अधीन हो जाएगा तो अपने दायित्वों का निर्वहण नहीं कर सकेगा। यह पीड़ा उसे और अधिक रोगी बनाती है।
         इसी शरीर के होने से सभी का होना है। अत: शरीर की रक्षा और उसे नीरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। हमारी ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति की अभिव्यक्ति का माध्यम यह शरीर ही है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है। यह मन ही हमारे मोक्ष और बन्धन का कारक होता है। 
          हम सभी लोग भली-भाँति अपने घर-परिवार के दायित्वों को पूरा करने के लिए अथक परिश्रम करते हैं। दिन-रात एक कर देते हैं। उसके लिए जो साधन रूपी शरीर ईश्वर ने हमें दिया है, उसकी हम परवाह नहीं करते। आप शायद कहेंगे मैं गलत कह रही हूँ। हम तो बढ़िया खाना खाते हैं, अच्छे मंहगे मौसमी फल खाते हैं और मेवे भी खाते हैं। जब अस्वस्थ होते हैं तो डाक्टर के पास जाकर इलाज भी करवाते हैं।
               फिर भी मैं यही कहूँगी कि हम अपना ध्यान नहीं रखते। एक नजर जरा अपनी दिनचर्या पर डालिए। हम प्रातःकाल उठने के पश्चात और रात को सोने तक अपने घर और दफ्तर के कार्यों को निपटाने की धुन में लगे रहते हैं। न हमें खाने की चिन्ता रहती है और न ही समय की। ऐसे में हम समय-असमय खाना खाते हैं और कभी-कभी कार्य की अधिकता होने पर खाना भी नहीं खाते। दिनभर चाय-कॉफी पीकर गुजार देते हैं। रात को देर तक जाग-जाग कर काम करते हैं जिससे पूरी नींद भी नहीं ले पाते।
              हम समय पर खाना नहीं खाते और अगर खाते हैं तो उल्टा-सीधा खाना जल्दी में ठूस कर भागने की करते हैं। न अपनी पूरी नींद सो पाते हैं तो फिर बताइए इस बेचारे स्वास्थ्य का क्या होगा? 
              हमारी इस प्रकार अव्यवस्थित दिनचर्या से शरीर का चक्र डॉंवाडोल होने लगता है। शरीर में गैस बनने लगती है, इससे उल्टी भी हो सकती है, दिन-प्रतिदिन शरीर कमजोर होने लगता है व हम थके हुए रहते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य कई रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं। कभी-कभी काम के इस प्रेशर से ब्लडप्रेशर की समस्या हो जाती है। सबसे बढ़कर दिल का दौरा तक पड़ जाता है। फिर कवायद शुरू हो जाती है डाक्टरों के पास जाने की। उधर काम का प्रेशर और इधर डाक्टरों का चक्कर। इन दोनों पाटों के बीच में बस मनुष्य पिसता रह जाता है।  
             एक मोटर का रखरखाव यदि ठीक से न किया जाए या बिना आराम दिए उसकी क्षमता से अधिक काम उससे लिया जाए तो वह भी बिगड़ जाती है। वह ठीक से काम करती रहे इसके लिए उसमें ग्रीस आदि डाली जाती है और कुछ समय चलाने के बाद उसे आराम भी दिया जाता है ताकि वह लम्बे समय तक चलती रहे। पर हम मनुष्य अपने शरीर से आवश्यकता से अधिक काम लेते हैं। अपने आराम की चिन्ता नहीं करते। खानपान के प्रति लापरवाही बरतते हैं। ऐसे में यह शरीर लम्बे समय तक साथ नहीं देता। यह बगावत करने लगता है और रोगी हो जाते हैं।
             गृहिणियाँ तो लापरवाही के मामले में बहुत आगे हैं। वे अपने पति व बच्चों के आगे सोच नहीं पातीं। प्रायः महिलाएँ अपने हिस्सा भी उन्हें दे देती हैं। चौबीसों घण्टे घर-बाहर के कार्यों को समेटते हुए उन्हें अपने बारे में सोचने का समय नहीं मिलता। इससे भी अधिक जब तक बिस्तर पर पड़ जाने की नौबत न आ जाए तब तक वे अपनी बिमारियों को अनदेखा करती रहती हैं। जब वे बिस्तर पकड़ लेती हैं तब पता चलता है कि उनकी हालत कैसी है? यह स्थिति वास्तव में कष्टप्रद होती है।
               बच्चे जो हर घर की शोभा हैं उनका खानपान सबसे अधिक दुखदायी है। वे मोबाइल व कमप्यूटर आदि से खेलने के कारण शारीरिक खेलों से दूर होते जा रहे हैं। आज जंकफूड और शीतल पेय पदार्थों के कारण बच्चे अल्पायु में ही मोटापा, शूगर, बीपी, आँख के रोग आदि बिमारियों का शिकार हो रहे हैं। उनके मासूम बचपन को बचाने की बहुत आवश्यकता है।
               पुरुष हो या स्त्री दोनों का स्वस्थ रहना परिवार के लिए आवश्यक होता है। यदि एक भी रोगी हो जाए तो घर अस्त-व्यस्त हो जाता है। बच्चे अलग परेशान हो जाते हैं। इसलिए घर के छोटे-बड़े हर सदस्य का आहार-विहार सन्तुलित होना चाहिए ताकि स्वस्थ रहकर अपने सभी कार्यो को सम्पादित किया जा सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

कौआ चला हंस की चाल

कौआ चला हंस की चाल

हम सबने निम्न उक्ति हम पढ़ी है और शायद इसे समझने का यत्न भी किया होगा -
    कौवा चला हंस की चाल, अपनी ही चाल भूला
अर्थात् कौवा अपनी एक खास चाल में चलता है। जब वह हंस की तरह चलने की कोशिश करने लगता है तो वह अपनी खुद की चाल भी भूल जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हंस की नकल करने के चक्कर में कौवा अपनी पहचान ही खोने लगता है।
            अपने सहज गुणों को छोड़कर, किसी और की नकल करने की कोशिश करने से मनुष्य स्वयं को नुकसान पहुॅंचा देता है। यानी कोई व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान या क्षमताओं को भूलकर, किसी और की तरह बनने की कोशिश करता है। तब वह न तो पहले जैसा रह पाता है और न ही वह नया रूप पा पाता है। 
            उसी प्रकार हम मनुष्य भी उस हंस रूपी परमपिता परमात्मा में एकाकार होने के सपने को संजोये न ईश्वरमय हो पाए हैं और न ही एक अच्छा इन्सान बन सके हैं। स्वयं को ईश्वर बताने वाले उन तथाकथित धर्मगुरुओं के सम्बन्ध में तो चर्चा करना ही व्यर्थ है। उनमें से कुछ का हश्र तो हम सबने ही देखा है। उनके अतिरिक्त जिनके विषय में हमें जानकारी नहीं है वे भी कमोबेश वैसे ही हो सकते हैं। प्रायः सभी धर्म के नाम पर ढोंग ही करते हैं। उनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। इसीलिए उनके कथन का समाज पर प्रभाव नहीं पड़ता। जो लोग उनके साथ सम्बन्ध बनाते हैं, वे उनके ज्ञान व गुणों से प्रभावित होकर नहीं अपितु केवल स्वार्थ के कारण ही उन लोगों से जुड़ते हैं।
             स्वयं को महारथी कहने वाले उन अखाड़ों की चर्चा तो कुम्भ स्नान के समय ही उजागर हो जाती है। उनमें अपने अखाड़े को सर्वश्रेष्ठ कहलवाने के प्रयास में अच्छा खासा वाद-विवाद होता है और लट्ठ तक चलते हैं।
               ऐसे स्वयंभू कहलवाने वालों से हम सांसारिक लोग अधिक श्रेष्ठ हैं। हम कम-से-कम ईश्वर का प्रतिनिधि होने का दावा तो नहीं करते। न दूसरों को अपरिग्रह का उपदेश देते हुए दान के नाम धन का संग्रह करके अपने लिए गाड़ियों, धन-दौलत अथवा जमीन-जयदाद के अम्बार लगाते हैं। न ही अपना विरोध करने वालों को यातनाएँ देते हैं या उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। ये सब मैं नहीं कह रही बल्कि समाचार-पत्रों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की सुर्खियों में बहुत बार हम देख व पढ़ चुके हैं।
              इसीलिए हमारे सद् ग्रन्थ वेद हमें चेतावनी देते हुए समझाते हैं- 'मनुर्भव' अर्थात् मनुष्य बनो। अब आप कहेंगे अच्छे भले इन्सान हम हैं फिर इन्सान बनने की बात कहाँ से आ गई?
              मानव बनने के गुण हैं- यम-नियम का पालन करना, असामाजिक कार्य न करना, देश व धर्म पर बलिदान होना, अपने घर-परिवार के सभी दायित्वों का निर्वहण करना, प्रणिमात्र से प्यार करना, नफरत का व्यापार न करना, मन-वचन से एक होना आदि।
             यह सत्य है कि मनुष्य का जन्म लेकर हम इस धरा पर अवतरित हो गए हैं। हम मानवोचित गुणों को आत्मसात नहीं कर पा रहे। आज भी प्रायः चर्चाओं में, साहित्य रचनाओं में पहले इन्सान बनने की बात होती है। जब मानवोचित गुण मनुष्य में आ जाएँगे तब उसे स्वयं को भगवान मनवाने की होड़ नहीं रहेगी। न ही उसकी धोबी के कुत्ते जैसी स्थिति रहेगी जो घर और घाट दोनों ही स्थानों पर अवांछित हो जाता है।
              उस हंस रूपी परमेश्वर की तरह नीर-क्षीर विवेकी हम अब तक नहीं बन पाए। उसके गुणों को भी अपना नहीं सके। उसके समकक्ष तो क्या उसका पासंग भी नहीं आ पाए। न ही मनुष्य बन पाए। यहाँ मुझे साहिर लुधियानवी जी का लिखा, रौशन जी का संगीतबद्ध किया और मन्ना डे जी द्वारा गाए गए एक सुप्रसिद्ध भजन की याद आ रही है-
लागा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे
चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
हो गई मैली मोरी चुनरिया
कोरे बदन सी कोरी चुनरिया
जाके बाबुल से नज़रें मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
भूल गई सब बचन बिदा के
खो गई मैं ससुराल में आके
जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
कोरी चुनरिया आत्मा मोरी
मैल है माया जाल
वो दुनिया मोरे बाबुल का घर
ये दुनिया ससुराल
जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
           मुझे ऐसा लगता है कि अन्तकाल में हम सब लोगों की यही स्थिति होने वाली है। शेष ईश्वर शुभ करे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

एक अकेला और दो ग्यारह

एक अकेला और दो ग्यारह

हम लोगों को जीवन में शिक्षा देने वाला यह मुहावरा हमने पढ़ा भी है और सुना भी है -
          एक अकेला और दो ग्यारह  
अर्थात् एक व्यक्ति अकेला होता है। जब उसके साथ कोई दूसरा जुड़ जाता तो वे दो नहीं बल्कि ग्यारह बन जाते हैं।
           यह एक लोकप्रिय हिन्दी भाषा का मुहावरा है। इसका उपयोग प्रायः एकता और सहयोग के महत्व को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह बताता है कि जब बहुत सारे लोग एक साथ आते हैं और एक-दूसरे का समर्थन करते हैं तो वे अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि संगठन में शक्ति होती है या एकता में बल होता है। इसका मतलब है कि जब लोग मिलकर काम करते हैं तो वे अधिक शक्तिशाली होते हैं और किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं जो अकेले होने पर सम्भव नहीं होती। 
            यदि मिलजुल कर किसी कार्य को किया जाता है तो उसे करने में आनन्द आता है और शीघ्र पूर्ण होता है। पर यदि मिलने वाले अधिकांश लोग छत्तीस के आँकड़े वाले हों तो निश्चित ही वे नौका को डूबो भी सकते हैं। सयाने कह गए हैं - 
        अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
अर्थात् जिसका मतलब है कि एक अकेला व्यक्ति किसी बड़े या मुश्किल काम को पूरा नहीं कर सकता। उसे सफलता पाने के लिए दूसरे लोगों के सहयोग की आवश्यकता होती है। यह निर्विवाद सत्य है, कोई विवाद का विषय नहीं है। इस बात को हम यथावत मान सकते हैं।
              हम लोगों ने इतिहास में पढ़ा है और अपने बड़े-बजुर्गों से सुना है कि चमत्कार करने वाले महापुरुष अकेले ही चलते थे। बाद में उनके अनेक अनुयायी बन जाते हैं जो उनकी कीर्ति में चार चाँद लगा देते हैं। कुछ सिरफिरे अकेले चलते हैं। फिर भी वे सिर पर कफन बाँधकर समय की धारा के प्रवाह को मोड़ते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। दुनिया के विरोध की परवाह न करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। तभी हम इन महानुभावों का नाम सम्मान से लेते हैं।
          जितने भी समाज सुधारक हुए हैं वे अकेले ही कठिन डगर पर चलते हुए लोगों को जागृत करने का कार्य करते रहे। इसके लिए उन्हें हर कदम पर समाज का विरोध सहना पड़ता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती व मीराबाई ने विषपान किया। महात्मा गांधी ने गोली खाई। ईसा मसीह सूली पर चढ़ गए। भगवान बुद्ध और महावीर को अपने समय में बहुत अधिक विरोध का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार राजाराम मोहन राय आदि समाज सुधारकों को भी अपने समय में विरोध सहना पड़ा।        
          ऐसे ही सिरफिरे नरसिंह दुनिया की दिशा और दशा बदलने की सामर्थ्य रखते हैं। समाज की भलाई के लिए अपने तन, मन व धन किसी की परवाह किए बिना दिन-रात एक कर देते हैं। भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव जैसे न जाने कितने ही युवाओं ने अपने देश के लिए प्राणों तक की आहुति दे देते हैं। गुरु गोबिन्द जैसे महापुरुष अपने छोटे बच्चों को देश व धर्म की रक्षा के लिए के दीवारों में जिन्दा चुनवा देते हैं।
              इसी श्रेणी में हम वैज्ञानिकों को भी रख सकते हैं जिनके अथक परिश्रम का फल हम जीवन की सुविधाओं के रूप में भोग रहे हैं। यदि वे भी हमारी तरह घर बैठकर आराम करते तो हम इतने सुखों को नहीं भोग सकते थे। आज दुनिया छोटी हो गई है और वह वाकई मुट्ठी में आ गई है। जिन ग्रह-नक्षत्रों के विषय में हम केवल सुना करते थे या किस्से-कहानियों में पढ़ा करते थे उन पर मानव का आना-जाना भी इन्हीं वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के कारण ही आज सम्भव हो रहा है। 
            रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 'एकला चलो रे' शायद इसीलिए कहा था। मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेले ही विदा लेकर अगले पड़ाव के लिए चला जाता है। झुण्ड में तो भेड़-बकरियाँ चला करती हैं। शेर तो अकेला ही जंगल में निर्भय होकर विचरता है। इसी तरह शेर की तरह ऐसे साहसी व्यक्ति संसार के लिए आश्चर्य ही होते हैं। चाहे इन लोगों को सब गालियाँ दें या इनका जमकर विरोध करें, फिर भी इन्हीं के पीछे ही चलते हैं और उनका गुणगान करते हैं।
               यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हम अकेले कुछ नहीं कर सकते। ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो मनुष्य के बूते से बाहर हो। इसके लिए बस मन में दृढ़ संकल्प लेना होता है। हर योजना को एक ही व्यक्ति आरम्भ करता है फिर उसका साथ देने के लिए बहुत से लोग जुड़ जाते हैं। अतः मन में विचारे हुए कार्य को शीघ्र आरम्भ करना चाहिए। हो सकता है इतिहास पलक पॉंवड़े बिछाएआपकी प्रतीक्षा में
बैठा हो।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 24 सितंबर 2025

आत्मविश्लेषण

आत्मविश्लेषण

आत्मविश्लेषण या आत्मचिन्तन करना प्रत्येक मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है। जिन लोगों को नित्य अपना विश्लेषण करने की आदत होती है, वे अपनी कमियों पर धीरे-धीरे विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो प्रबुद्ध जन समय-समय पर आत्मचिन्तन करते रहते हैं, वे अपनी छोटी-छोटी असफलताओं अथवा गलतियों से शिक्षा ग्रहण करते हुए उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो जाते हैं। उनके आत्मविश्लेषण करने के गुण को हम उनकी सफलता का रहस्य भी मान सकते हैं।
             दैनन्दिन कार्यों को करते हुए प्रतिदिन कुछ पल अपने लिए भी चुरा लेने चाहिएँ। उन सीमित पलों को आत्मचिन्तन के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए सबसे अच्छा समय होता है रात्रि में सोने का। सोते समय एकान्त में अपने पूरे दिन के लेखे-जोखे पर नजर डालनी चाहिए। दिन भर हमने क्या खोया और क्या पाया? और इसी प्रकार यह भी विचार करना चाहिए कि आज दिन में कितने अच्छे कार्य किए और कितनी बार हमसे गलतियाँ हो गईं? हमने किसी का दिल तो नहीं दुखाया? कौन-कौन से अच्छे कार्य किए?
              दिनभर में जो अच्छे कार्य हमने किए हैं, उनके लिए ईश्वर को धन्यवाद करना चाहिए। इस विचार से अपने मन में सन्तुष्टि होती है कि हमने कुछ अच्छे कार्य किए। उन कार्यों को भविष्य में भी करते रहना चाहिए। इसके विपरीत जाने-अनजाने जो गलतियाँ हमसे उस दिन हुई हैं, उनके लिए ईश्वर से क्षमा याचना करती चाहिए। इसके लिए अपने मन में पश्चाताप भी करना चाहिए। अगले दिन उन गलतियों को न दोहराने का दृढ़ संकल्प अपने मन में करना चाहिए। 
            इस प्रकार प्रतिदिन बार-बार अभ्यास करने से अपने दोषों को सुधारने का हमें अवसर मिलता है। जब हम अपने दोषों को दूर करने का संकल्प ले लेते हैं तब धीरे-धीरे दोषों का त्याग करके विकास की ओर उन्मुख होते हैं। फिर हमें सफल व्यक्ति बनने से कोई भी रोक नहीं सकता। जब हम अपने मन से कोई भी कार्य करने के लिए संकल्पित हो जाते हैं तब हमारे जीवन की दिशा बदल जाती है। हमारे हृदय में दूसरों की सहायता करने की भावना आने लगती है। यह साधारण मनुष्य को खास आदमी बना देती है।
             यदि इस आदत को अपना लिया जाए तो किसी अन्य व्यक्ति को हमारा विश्लेषण करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। हम स्वयं ही अपने समीक्षक बनकर अपना सुधार करने में सक्षम हो जाएँगे। इसी बात को स्पष्ट करता कबीरदास जी का एक दोहा स्मरण हो रहा है -
        निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
       बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।।
अर्थात्  जिसका अर्थ है कि निन्दा करने वाले को हमेशा अपने पास रखना चाहिए क्योंकि वे बिना किसी साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल कर देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो निन्दक हमारी कमियों को उजागर करके हमें सुधारने में मदद करते हैं जिससे हमारा स्वभाव बिना किसी बाहरी मदद के शुद्ध हो जाता है। 
               हम स्वयं ही जब अपने समीक्षक बन जाते हैं, उस समय हमारी कुटिया में बैठा निन्दक भी हमारी कमियाँ ढूँढते हुए माथा पीट लेगा। हम उसे अपनी कमियाँ ढूँढने का अवसर न देकर मात देने में समर्थ हो जाएँगे। फिर तो यह हमारे लिए सौभाग्य का अवसर बन जाएगा। यदि किसी से क्षमा याचना करने से बिगड़ी बात सकती है तो उसे मानने में ही भलाई है।
          कुछ लोग प्रतिदिन डायरी लिखते हैं। यह डायरी लिखना एक बहुत ही अच्छी आदत है। इस प्रकार दिनभर के कार्य कलापों को डायरी के पन्नों में कैद कर लेना भी एक तरह का आत्मचिन्तन ही कहलाता है। इस लेखन में भी एक ईमानदार सोच व सच्चाई होती है जो हमें आईना दिखाती है। तो इस विश्लेषण से भी अपनी कमजोरियों पर नियन्त्रण रख सकते हैं। आत्मचिन्तन अथवा डायरी लेखन के बहुत से लाभ हैं। इनमें एक यह है कि हम अपनी कमजोरियों पर काबू रख सकते हैं। जहाँ लगे कि हमसे गलती हो गयी है उसका सुधार कर सकते हैं। 
            कभी-कभी जीवन में ऐसे पल आ जाते हैं जब लाभ के स्थान पर हमें हानि हो जाती है, हम जबरदस्ती कष्टों को न्यौता दे बैठते हैं। उस समय आत्मविश्लेषण करना बहुत आवश्यक होता है। मन को शान्त करके, अकेले बैठकर आत्मचिन्तन करने से समस्या सुलझाने में सहायता मिलती है। यदि हम सजगता से विश्लेषण करते हैं तो हम अपनी कमी जान लेते हैं। उस कमी को दूर करके धीरे-धीरे पुनः सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ सकने में समर्थ हो सकते हैं।  
           हमें आत्मविश्लेषण करने की आदत बनानी चाहिए। इस आत्मचिन्तन के बल पर हम अपने सपनों को साकार करने में समर्थ हो जाते हैं। ईश्वर भी हम मनुष्यों के सकारात्मक प्रयत्नों से प्रसन्न होता है और वह हमें सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने में सहायता करता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 23 सितंबर 2025

गृहिणी का महत्व

गृहिणी का महत्व 

गृहिणी की महत्ता बताते हुए महर्षि वेदव्यास ने 'महाभारतम्' के शान्तिपर्व में कहा है -
      न गृहं गृहमित्याहुः गृहणी गृहमुच्यते।
     गृहं हि गृहिणीहीनं अरण्यं सदृशं मतम्॥
अर्थात् घर तो गृहणी के कारण ही घर कहलाता है। बिन गृहणी तो घर जंगल के समान होता है।
             ईट-पत्थरों से बना हुआ मकान तभी घर बनता है जब एक स्त्री उसे अपने तप और त्याग से उसे सजीव करती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि एक घर सिर्फ एक इमारत नहीं होता है, बल्कि यह एक ऐसा स्थान है जहॉं प्यार, देखभाल और स्नेह होता है। यह सब एक गृहिणी के कारण ही सम्भव होता है। इसलिए एक गृहिणी अपने घर का दिल होती है, उसकी आत्मा होती है। वहीं घर की धुरी होती है। उसकी परिक्रमा घर के सदस्य करते रहते हैं।
              एक स्त्री जो अपने घर का सुचारु रूप से संचालन करती है और आने-जाने वाले मेहमानों का यथोचित स्वागत-सत्कार करती है, उसका यश दूर-दूर तक फैलता है। जिस पुरुष को ऐसी सौभाग्यशालिनी पत्नी मिल जाए उसका तो जन्म सफल हो जाता है। ऐसा घर स्वर्ग के समान होता है जहाँ पति-पत्नी में सामंजस्य होता है। उनके बच्चे सुसंस्कारी होते हैं। घर के सभी सदस्य एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं। घर के बड़े छोटों के सिर पर अपना वरद हस्त रखते हैं और छोटे अपने बड़ों के मान को बनाए रखते हैं। यह सभी सुस्थितियाँ किसी गृहिणी के अथक प्रयास का परिणाम होती हैं।
            यह सत्य है कि घर को सम्हालना पुरुष के बूते की बात नहीं। ईश्वर ने यह कार्य स्त्री को ही सौंपा है। उसका सुघड़ होना ही उसकी पहचान है। वह सदा अपने पति व बच्चों को बॉंधकर रखती है। उसके सुरुचिपूर्ण होने से घर में घुसते ही एक अलग ही तरह का अनुभव होता है। घर का हर कोना उसकी सुव्यवस्था से महकता हुआ दिखाई देता है। वह चाहे घर से बाहर जाकर कार्य करती हो या घर में ही रहने वाली गृहिणी हो। दोनों ही स्थितियों में वह घर के सभी दायित्वों को बिना परेशान हुए बखूबी निभाती है।
              बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जिस घर में हमेशा कलह-क्लेश रहता है, उस घर के मटकों का पानी भी समाप्त हो जाता है। वहॉं बच्चे व बड़े सभी अपनी मनमानी करते हैं। कोई भी किसी की बात सुनने समझने के लिए तैयार ही नहीं होता। वहाँ पर रहने वाले सभी सदस्य नरक से भी बदतर जिन्दगी जीते हैं। ऐसे घर में घुसते ही वहाँ की अव्यवस्था को देखकर पलभर भी रुकने की इच्छा नहीं होती। ऐसा लगता है मानो अवॉंछित मेहमान बनकर अनजानी जगह पर आ गए हैं। इस माहौल को देखकर कोई भी व्यक्ति गृहिणी के बारे में अपनी धारणा बनाने में स्वतन्त्र होता हैं।
             एक सद्गृहिणी अपने कर्मानुसार ईश्वर प्रदत्त नेमतों से अपनी गृहस्थी को बहुत अच्छी तरह से चलाती है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जीवन व्यतीत करते हुए वह अनावश्यक गिला-शिकवा नहीं करती। मजबूरियों को वह अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने देती। जो मिल गया उसी में सन्तोष करने की उसकी प्रवृति, उसे दूसरे लोगों से विशेष बना देती है। अपने घर में यदि रूखी-सूखी रोटी भी खानी पड़े तो किसी दूसरे को इसकी कानों-कान खबर नहीं लगने देती। यह उसकी अपनी सुव्यवस्था है कि वह अपने घर व आने वाले अतिथियों को उस स्थिति में भी बखूबी सम्हाल लेती है।
             एक समझदार गृहिणी वही है जो सभी आवश्यक खर्चों को करते हुए, जीवन की धूप-छाँव के लिए भी कुछ धन सुरक्षित रख लेती है। कभी घर-परिवार में कुछ ऊँच-नीच हो जाए तो उसका ढिंढोरा नही पीटती। न ही अपने माता-पिता को इन छोटी-छोटी बातों के लिए अनावश्यक परेशानी में डालती है। घर में बाहर से आने वालों को इस सब की भनक नहीं लगने दती है। सभी गृहिणियों को अपने प्यारे घर व बच्चों को नौकरों के हवाले न छोड़कर उनकी देखरेख का दायित्व स्वयं संभालना चाहिए। बच्चों को नौकरों के नहीं आपके संस्कारों की आवश्यकता होती है।
              एक गृहिणी के बारे में जितना लिखा जाए वह कम ही है क्योकि वही परिवार की धुरी है।विष्णु शर्मा विरचित 'पंचतन्त्रम्' में भी गृहिणी के विषय में इस प्रकार कहा है - 
           गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
       गृहं तु गृहिणीहीनं कान्तारादतिरिच्यते॥
अर्थात् पंचतन्त्र के अनुसार जिस घर में गृहिणी न हो, वह घने जंगल से भी बदतर जगह है।
            यही एक सद्गृहिणी की महानता का प्रतीक है। उसके बिना घर बिल्कुल सूना लगता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो घर की आत्मा कहीं चली गई है। घर में बेशक सभी सदस्य विद्यमान हों परन्तु उसके बिना उस घर में रौनक नहीं होती।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 22 सितंबर 2025

नींद की समस्या

नींद की समस्या

नींद की समस्या आधुनिक युग की देन है। आजकल यह समस्या एक बहुत विकराल रूप धारण करती जा रही है। कभी यह कहा जाता था कि वृद्धावस्था में नींद न आने की समस्या हो जाती है। परन्तु आज के इस भौतिक युग की आपाधापी में सब लोग टेंशन में रहने लगे है। बड़े दुख की बात है कि बच्चों और युवाओं को भी यह बीमारी अपने जाल में जकड़ती जा रही है। हर व्यक्ति किसी न किसी कारण से परेशान रहता है। बहुत से लोग नींद की दवाई के अभ्यस्त होने लगे हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
             प्रतिस्पर्धा के इस युग में बच्चों के ऊपर पढ़ाई का इतना अधिक प्रेशर होता जा रहा है कि बेचारे दिन-रात एक कर देते हैं। सौ प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चों को भी अपने इच्छित कॉलेज में दाखिला मिल जाएगा अथवा मन पसन्द विषय मिल जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। बच्चों में होड़ लगी रहती है यह जानने के लिए कि कौन-सा बच्चा लगातार कितनी रातें पढ़ने के लिए जाग सकता है? यदि कम अंक आ जाएँ तो अपनी रुचि के विषय नहीं मिलते और न ही अपने मनपसंद कॉलेज में दाखिला भी मिलता है। कैरियर बिगड़ न जाए इस डर के कारण बच्चे रात-रात भर जागकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे रहते हैं।
            युवा वर्ग की अपनी ही समस्याएँ हैं। जितने युवा एम. एन. सीज में नौकरी करते हैं,  उनके काम-काज के घण्टों का कुछ पता नहीं रहता। वे दफ्तर तो समय पर जाते हैं और रात को उनके घर आने का कोई ठिकाना नहीं होता। वे आराम भी नहीं कर पाते और पूरी नींद लेने का समय भी उन बेचारों को नहीं मिलता। इन युवाओं के अतिरिक्त कुछ युवा ऐसे भी हैं जो नाइट ड्यूटी करते हैं और रात की नींद दिन में पूरी करने का यत्न करते हैं। डॉक्टर, टेलीफोन ऑपरेटर, शिफ्ट में काम करने वाले सब लोगों को अपनी नींद का बलिदान  देना पड़ता है।
             आजकल एक और नया प्रचलन हो गया है। शादी-ब्याह या पार्टियॉं देर रात तक चलती हैं। लेट नाइट पार्टियाँ, पब व क्लब से आधी रात लौटना, शादी-ब्याह के लिए दूर-दूर जाने के कारण लेट होना भी नींद के न आने के कुछ प्रमुख कारण हैं। व्यवसायी सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, सर्विस टैक्स, वैट, फेरा आदि कानूनी पेचों में घिरे हुए परेशान होते हैं। इस कारण ही उनकी रातों की नींद हराम हो जाती है। अस्वस्थ होने की स्थिति में भी नींद की समस्या हो जाना स्वाभाविक होता है। उस समय नींद समय-असमय आती है। अतः वे रोगी होकर परेशान रहते हैं।
               डॉक्टरों के अनुसार बच्चों को प्रतिदिन आठ घण्टे गहरी नींद (sound sleep) में सोना चाहिए और प्रौढ़ों एवं वृद्धों के लिए छह घण्टे की नींद आवश्यक है। यदि नींद बिना बाधा के आए तो मनुष्य प्रातः तरोताजा व प्रसन्न दिखाई देते हैं। वैसे तो दिन में सोना और रात में जागना एक प्रकार से रोग ही होता है। इसी तरह रात को देर से सोना और सवेरे देर से उठना भी रोग का ही प्रकार है। इसी प्रकार अधिक सपने आने से नींद बाधित होती है और नींद न आने की समस्या बढ़ाती है। 
              कभी-कभी शरीर के अस्वस्थ होने पर भी नींद ऑंखों से दूर हो जाती है। बहुधा बहुत छोटे बच्चे के रात को जागने और रोने के कारण उसकी माता रात को सो नहीं पाती। कभी-कभी जीवन में दुख-तकलीफ आ जाने पर भी नींद कोसों दूर भाग जाती है। यदि नींद पूरी न हो तो मनुष्य अलसाया हुआ रहता है। इससे उसकी कार्य क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। उसकी काम करने की क्षमता दिनों-दिन घटने लगती है। यह स्थिति उसके कैरियर को हानि पहुॅंचा सकती है। उसकी पदोन्नति में भी बाधक बन सकती है।
               नींद की समस्या अनेक बिमारियों को न्योता देती है। नींद की गोली खाकर सोना इसका हल नहीं है। एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य इसका अभ्यस्त हो जाता है। उस समय इस गोली का असर भी उस पर  नहीं होता। यथासम्भव अपनी नींद से समझौता नहीं करना चाहिए। यत्न करना चाहिए कि अपने कार्यालय की किन्हीं परेशानियों का प्रभाव कभी आपके परिवार पर न पड़े। खाना खाते समय अपने मन को व्यवस्थित करने का प्रयास कीजिए। 
              रात को बिस्तर पर जाने से पहले अपनी सारी चिन्ताओं एवं परेशानियों की गठरी बनाकर अपने से दूर किसी कोने में रख देनी चाहिए। जिस भी इष्ट की आप आराधना करते हैं, सोते समय उसका नाम जपते हुए सोने का प्रयास कीजिए। उस नाम जप में डूबे हुए सोने से गहरी निद्रा आएगी। प्रातःकाल जब आप उठेंगे तो स्वयं को तरोताजा महसूस करेंगे। अगले दिन उत्साह पूर्वक कार्य कर सकेंगे। फिर एक नए दिन की शुरूआत करने में स्वयं को तैयार पाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 21 सितंबर 2025

असत्य आचरण

असत्य आचरण

हम सब लोग असत्य या झूठ के सहारे अपना सारा जीवन व्यतीत करते हैं। सुनने में यह बात अटपटी अथवा अविश्वसनीय लग सकती है। यदि सचमुच हम गम्भीरतापूर्वक सोचेंगे तो हमें यह बात सत्य प्रतीत होगी। यह केवल चौंकाने वाली बात नहीं है। इस विषय पर हम लोगों को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। इसके पीछे के कारणों को ढूँढकर उनको हमें ही दूर करना है। चलिए असत्य बोलने के कुछ कारणों पर आज हम चर्चा करते हैं। मुझे आशा ही नहीं बल्कि विश्वास है कि सभी सुधीजन मेरे विचारों से सहमत होंगे।
             यह सत्य है कि अपने घर-परिवार में प्रायः माता-पिता अपने बच्चों से उस समय झूठ बोलते हैं जब उन्हें कहीं लेकर नहीं जाना होता। बच्चे अपनी गलतियों को छुपाने के लिए अपने माता-पिता से झूठ बोलते हैं। पति अपनी पत्नी से झूठ बोलता है और पत्नी अपने पति से। मित्र अपने मित्र से झूठ बोलता रहता है। बच्चे गृहकार्य न करने पर अपने स्कूल में अध्यापकों से और घर में माता-पिता से झूठ बोलने में अपनी शान समझते हैं। घरों में काम करने वाली घरेलू सहायिकाऍं तो काम पर न आने के लिए अनावश्यक ही किसी को बीमार कर देती हैं या किसी की मृत्यु हो गई बता देती हैं।
            बॉस या मालिक अपने अधीनस्थों से झूठ बोलते हैं। उसी तरह अधीनस्थ कर्मचारी भी अपने मालिक से। जब कभी छुट्टी चाहिए होती है तो झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट बनाकर भेज देते हैं। प्रायः धर्मगुरु अपनी शेखी बघारने के लिए अपने ही अनुयायियों से झूठ बोलकर उन्हें गुमराह करते हैं। व्यापारी, राजनेता आदि सभी महानुभाव इस असत्य के व्यापार में संलग्न हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि असत्य के व्यवहार में सभी लोग योग्यता प्राप्त करके उत्तीर्ण होना चाहते हैं।
              हम सभी जानते हैं कि असत्य बोलना बहुत गलत होता है। यह अविश्वास का मूल कारण है। इससे अपना मन अपवित्र होता है। सबसे मजे की बात यह है कि स्वयं असत्य का व्यवहार करने वाले दूसरों की झूठी बात को सुनकर बौखला जाते हैं। उन पर क्रोध करने लगते हैं। स्वयं को ईश्वर का सच्चा भक्त कहने वाले लोगों को तो कदापि असत्य भाषण नहीं करना चाहिए। 
              इस असत्य के व्यवहार के विषय में गहराई से सोचने की आवश्यकता है। हम सब लोग सोचकर बहुत ही प्रसन्न होते हैं कि फलाँ व्यक्ति को हमने मूर्ख या उल्लू बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया। परन्तु वास्तव में उसकी हानि होती है या नहीं परन्तु हमारे चारित्रिक पतन की शुरूआत अवश्य हो जाती है। असत्य भाषण से मनुष्य का कल्याण इस प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे आँधी आने से बड़े-बड़े वृक्ष नष्ट हो जाते हैं। योगशास्त्र का कहना है- शुरू
         असत्यवचनात् वैरविषादाप्रत्ययावय:।
    प्रादु:षन्ति न के दोषा: कुपथ्याद् व्याधयो यथा॥अर्थात् कुपथ्य सेवन से व्याधियाँ या रोग उत्पन्न होते हैं। असत्य बोलने से वैर-विषाद और अविश्वास आदि कौन से दोष हैं जो उत्पन्न नहीं होते। अर्थात् सभी दोष मनुष्य में आ जाते हैं।
               सत्यमेव जयते नानृतम्
हमारे ऋषियों ने हमें समझाया है कि अन्तत: सत्य की ही विजय होती है झूठ की नहीं। सत्य को चाहे सात परदों में छुपा लो फिर भी वह कस्तूरी की तरह अपनी सुगन्ध बिखेरता हुआ, मुस्कुराता हुआ हमारे समक्ष प्रकट हो जाता है। इसके विपरीत हींग को कितना ही मुल्लमा चढ़ा कर रख लिया जाए, वह अपनी दुर्गन्ध छोड़ ही देती है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उसी प्रकार चाशनी में डूबा हुआ असत्य भी समय आने पर स्वत: प्रकट हो ही जाता है। मनुष्य को तब शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता है। अपनी नजरें चुरानी पड़ती हैं।
          सत्य खरे सोने की तरह होता है जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। असत्य को हम चाहे कितना भी गोल्ड प्लेटेड कर लें, समय बीतने पर वह अपनी चमक खो देता है। उस समय असली और नकली का अन्तर समझ आ जाता है। तब फिर हम लोग नकली वस्तुओं के पीछे क्यों भागें? खरा सोना जब उपलब्ध है तो उसे ही खरीदकर अपनी पूँजी को बढ़ाने का यत्न करना चाहिए।
              असत्यवादी व्यक्ति की जब पोल खुलती है तब उसके सामने मृत्यु के समान बहुत ही कष्टदायी स्थितयाँ उत्पन्न हो जाती हैं। यह सबसे बड़ा अधर्म है जो जगत के पिता परमेश्वर को बिल्कुल पसन्द नहीं आता। 'वृहन्नारद पुराण' का यह मत है- 
      असत्यनिरतश्चैव ब्रह्म हा परिकीर्तित:।
अर्थात् असत्य में लगा हुआ व्यक्ति ब्रह्म का हत्यारा कहलाता है।
        वाल्मीकि रामायण में कहा गया है-
'असत्य भाषी व्यक्ति से लोग उसी प्रकार डरते हैं जैसे साँप से।'
        अपनी सुविधा या आदत के कारण चाहे बच्चा हो या कोई बड़ा व्यक्ति किसी के भी झूठ की सराहना नहीं की जा सकती। यह भी एक ऐसा रोग है जिससे छुटकारा पाना कठिन होता है। जिसने इस शत्रु को अपने वश में कर लिया वह संयमी महान बन जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 20 सितंबर 2025

भाग्य का हमारे जीवन पर प्रभाव

भाग्य का हमारे जीवन पर प्रभाव

भाग्य का हमारे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव होता है। इस संसार में मनुष्य जब जन्म लेता है तो अपना भाग्य साथ ही लिखवाकर आता है ऐसा हमारी भारतीय संस्कृति मानती है। वास्तव में हमारे संचित कर्मों से प्रारब्ध बनता है। उसे ही मनुष्य का भाग्य कहकर जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य का भाग्य कौन लिखता है? यह भाग्यकैसे बनता है? आदि प्रश्न हमारी जिज्ञासा को निरन्तर बढ़ाते रहते हैं। इनकी खोज में मनुष्य का जिज्ञासु मन लगा रहता है।
            ऐसा कोई भी व्यक्ति विशेष ऊपर आसमान में नहीं बैठा रहता है जो हमारा भाग्य लिखने का कार्य करता है। हम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता होते हैं। सीधा स्पष्ट-सा गणित है कि हम जो भी अच्छे कार्य (सुकर्म) या बुरे कार्य (कुकर्म) करते हैं, वही हमारा भाग्य बनाते हैं। आगे चलकर दोनों कर्मों का फल जीव को भोगना पड़ता है। ऐसा नहीं हो सकता कि कर्म कोई करे और उसका फल किसी और को मिल जाए। हम मनुष्यों की तरह ईश्वरीय न्याय ऐसी घपलेबाजी नहीं करता। यानी जो मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। इससे छुटकारा नहीं मिलता।
             सुकर्मों का फल हमें जीवन में सफलताओं एवं सुख-समृद्धि के रूप में मिलता है। उस समय हम मानो आकाश की ऊॅंचाइयों को छू रहे होते हैं। सुख के समय हमारे पॉंव जमीन पर नहीं पड़ते। हमें ऐसा लगता है कि हमने दुनिया जीत ली है। हम चाहते हैं कि सभी लोगों के साथ-साथ प्रकृति भी हमारा सुख बॉंटे। तब हम अपनी कहानियॉं सबको सुनाना चाहते हैं, चाहे कोई हमारी बात सुनना पसन्द करें अथवा नहीं। बस हम उत्साहित होकर अपना ही राग छेड़ते रहते हैं।
             इसके विपरीत दुष्कर्मों का फल हमें असफलता तथा कष्ट-परेशानियों के रूप में मिलता है। उस समय हम उदास, निराश और उत्साहहीन होते हैं। तब जीवन को ढोना ही हमारी विवशता हो जाती है। तब हमें लगता है कि संसार के सभी लोग हमारे दुख में शामिल हो जाऍं। प्रकृति भी हमारे दुख में ऑंसू बहाए। हर कोई हमारे दुख की कहानी सुने। ऐसा हो नहीं सकता। सभी लोग अपनी-अपनी व्यस्तताओं में उलझे हुए हैं। किस के पास इतना फालतू समय है कि वह दूसरों के दुखों को सुने, व्यर्थ ही उनके पचड़ों में पड़े। उसे सांत्वना देते हुए बैठा रहे। 
              जो भी शुभाशुभ कर्म अपने जीवनकाल में हम करते हैं, उनमें से कुछ कर्मों का फल हम इसी जन्म में भोग लेते हैं। कुछ कर्म भोगने से शेष बच जाते हैं। यही बचे हुए कर्म जन्म-जन्मान्तर तक हमारा पीछा नहीं छोड़ते यानी साथ निभाते हैं। इस जन्म के शेष कर्म पूर्वजन्मों के बचे हुए कर्मों में जुड़ जाते हैं। उन सभी शेष बचे हुए कर्मों से हमारा भाग्य बनता है। यह भाग्य हर जन्म में जीव के साथ-साथ चलता है। जमा-घटा का यह खेल हमारे साथ खेला जाता रहता है।
             भाग्य और कर्म अन्योन्याश्रित हैं। कर्म के बिना भाग्य फलदायी नहीं होता और भाग्य के बिना कर्म। इस बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि वे एक दूसरे के पूरक हैं और एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
             यदि मनुष्य का भाग्य प्रबल होता है तब उसे थोड़ी-सी मेहनत करने पर आशातीत सफलता प्राप्त होता है। यदि वह श्रम नहीं करता तो अपने स्वर्णिम अवसर से चूक जाता है। उस समय उसके पश्चाताप करने का भी कोई लाभ नही होता। परन्तु इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि मनुष्य कठोर परिश्रम करता है पर उसे आशा के अनुरूप फल नहीं मिलता। इसका यह अर्थ नहीं कदापि नहीं कि मनुष्य परिश्रम करना छोड़कर हाथ पर हाथ रखकर निठल्ला बैठ जाए और भाग्य को कोसता रहे या ईश्वर को गाली देता रहे।
          मनुष्य को सदा अपने भाग्य और कर्म दोनों को एक समान मानना चाहिए। बार-बार सफलता की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। भाग्य भी तभी फल देता है जब मनुष्य स्वयं श्रम करता है।अब भाग्य से हमें भोजन प्राप्त हो गया है। उसे खाने के लिए भी तो मेहनत करनी पड़ेगी। रोटी का निवाला खुद मुँह में नहीं जाएगा। हाथ हिलाना पड़ेगा, रोटी का ग्रास तोड़ेंगे तभी तो निवाला मुँह में जाएगा और हमारा पेट भरेगा।
        हमेशा चींटी के श्रम को याद रखिए जो पुनः पुनः गिरकर, अथक प्रयास करके अपने लक्ष्य को पाने में अन्तत: सफल हो जाती है। इसी तरह हम अपनी बार-बार ईमानदार कोशिश से असफलता को  पुनः सफलता में बदल सकते हैं।    
        हर प्रकार की सुख-समृद्धि हमें अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलती है। फिर भी हमारे लिए यही उचित है कि हम अपने कठोर परिश्रम की बदौलत ही अपनी सफलताओं को पाने से न चूकें।जब-जब अपने बाहुबल पर विश्वास करके कठोर परिश्रम करेंगे तब-तब हमारा भाग्य हमें अवश्यमेव फल देगा। भाग्य के भरोसे बैठकर कर्म करना नहीं त्यागना है। उन्नति करने का अवसर हर किसी को जीवन में अवश्य मिलता है। शर्त बस यही है कि उस अवसर की प्रतीक्षा करते हुए हमें अपने हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना है बल्कि भविष्य को सुखद बनाने का सार्थक प्रयास करना है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

पति-पत्नी में सामंजस्य आवश्यक

 पति-पत्नी में सामंजस्य आवश्यक 

पति और पत्नी दोनों को सामंजस्यपूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहिए। अपने जीवनकाल में और मृत्यु के पश्चात अपनी सुरक्षा के बारे में समय रहते सोचना चाहिए। आज आपाधापी के समय दोनों ही कार्य करते हैं। अच्छा तो यही है कि एक-दूसरे के बैंक अकांऊट, बैंक लाकर, धन-सम्पत्ति, लेनदेन, इन्श्योरेंस पालिसी, शेयर आदि के बारे में दोनों ही को जानकारी होनी चाहिए। कई लड़कियों को उनके माता-पिता धन-सम्पत्ति देते हैं। उसका भी दोनों को पता रहना चाहिए। यदि दोनों को सारी जानकारी हो तो एक साथी के काल कवलित हो जाने पर दूसरे साथी को किसी तरह की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता।
            यदि दोनों में ऐसा विश्वास व तालमेल नहीं होता तो एक-दूसरे के अनजान रह जाते हैं। सब बर्बाद हो जाता है। बहुत-सी धन-सम्पत्ति जो बेनामी होती है वह हाथ नहीं आती बल्कि निकल जाती है। इस तरह मेहनत की कमाई व्यर्थ चली जाती है। जिस परिवार को सुरक्षित रखने के लिए दिन-रात हाड़ तोड़ मेहनत की, वह उनके काम नहीं आ पाती। यह बहुत ही दुखद स्थिति होती है। ईश्वर न करे कभी एक्सीडेंट होकर अथवा अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती होना पड़े। यदि उन दोनों को बैंक अकाउंट, मेडिक्लेम पॉलिसी की जानकारी होगी तो कठिनाई नहीं होगी। अन्यथा वे किस से सहायता की आशा करेंगे?
             जहाँ पत्नी नौकरी नहीं करती वहाँ पति का दायित्व और बढ़ जाता है। हर समझदार पति का यह कर्तव्य है कि वह अपने जीते-जी कुछ ऐसा कार्य करे जिससे उसकी पत्नी व बच्चे उसके जीवनकाल में तो सुख-सुविधाओं का भोग तो करें ही पर उसकी मृत्यु के बाद भी वे सुरक्षित रहें। यथासमय पत्नी व बच्चों की यथोचित सुरक्षा हेतु वसीयत तैयार करवा लेनी चाहिए। ताकि इससे उसकी मृत्यु के उपरान्त उसकी विधवा पत्नी और बच्चों को उनका हक मिल सके। उनको दरबदर की ठोकरें न खानी पड़ें। ऐसा देखा गया है कि कई बार विधवा बहु को ससुराल वाले सम्पत्ति के लालच में परेशान करते हैं और घर तक से निकाल देते हैं। लालच में अन्धे होकर वे अपने पोते-पोतियों तक की परवाह नहीं करते। उन्हें धन-सम्पत्ति से बेदखल करके ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं।
            ऐसी स्थिति में उस स्त्री के पास अपने मायके जाने का एकमात्र विकल्प बचता है। वहाँ भी भाई-भाभी इस महंगाई में अपना भरण-पोषण करने के लिए परेशान रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में दो-तीन लोगों का अनावश्यक बोझ वे नहीं उठा पाते या उठाना ही नहीं चाहते। उन लोगों को अपने माता-पिता और बच्चों का खर्च उठाना पड़ता है। घर की सौ जिम्मेदारियॉं निभानी पड़ती हैं। अतः वहाँ पर उन लोगों को ठौर नहीं मिल पाता। उस स्थिति में महिला को समझ नहीं आता कि अब उसे क्या करना चाहिए?
            जहाँ लड़की को सम्हालने के लिए उसके माता या पिता अथवा दोनों ही हैं, वहाँ पर बात अलग होती है। आज इक्कीसवीं सदी में बहुत-सी लड़कियाँ शिक्षा ग्रहण करके अपने पैरों पर खड़ी हैं। वे तो कुछ हद तक परिस्थितियों को झेल लेती हैं। पर यदि किराए के मकान में रहना पड़ जाए तो फिर समस्याओं का अम्बार लग जाता है। बच्चे जब अपने जीवन में सेटल हो जाते हैं और तब यदि पति की मृत्यु होती है तो भी पत्नी के लिए सब कुछ इतना सरल नहीं होता। 
            आजकल बहुत से स्वार्थी बच्चे ऐसे हैं जो अपनी असहाय माँ के विषय में नहीं सोचते। यदि माँ के नाम धन-सम्पत्ति हो तो लालच के कारण उसे सम्मान दे दिया जाता है। परन्तु यदि माँ के नाम पर कोई वसीयत नहीं की गई हो तो नालायक सब कुछ धोखे से हड़प कर लेते हैं। अपनी ही जननी को धक्के खाने के लिए बेसहारा छोड़ देते हैं। ये अपने माता-पिता के अहसानों को भी भूल जाते हैं। ऐसे बच्चे एहसान फरामोश होते हैं जो अपने माता-पिता के अहसानों को भी भूल जाते हैं।
             इसी प्रकार यदि पत्नी की मृत्यु पहले हो जाती है तो पति की दुर्दशा हो जाती है। उसके अपने भाई-बहनों को उसकी देखभाल करने की फुर्सत नहीं होती। बच्चे छोटे हों तो उन्हें बड़ा करने की समस्या होती है। बच्चों की शादी हो जाने के उपरान्त वह उन पर बोझ बनने लगता है। यदि उसके पास अपनी धन-दौलत है तो फिर भी उसकी पूछ हो जाएगी। अन्यथा उसका जीवन कष्टप्रद हो जाता है। कुछ बच्चे इतने नालायक होते हैं जो अपने वृद्ध माता या पिता को ओल्ड होम भेजने से परहेज नहीं करते।
              पति-पत्नी दोनों ही यदि थोड़ी समझदारी दिखाएँ तो एक के जाने के बाद दूसरा असहाय अनुभव नहीं करता। इसलिए सभी सुधीजनों को उचित समय पर इस परेशानी से बचने का उपाय सोच लेना चाहिए। एक-दूसरे को अपना हमराज बनाना चाहिए। हर जानकारी दोनों को बिना पूर्वाग्रह के होनी चाहिए जिससे कभी किसी भी परेशानी में आर्थिक चोट न सहनी पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

चिन्ता चिता के समान

 चिन्ता चिता के समान

मनीषी चिन्ता को चिता के समान कहते हैं। वे कहते हैं कि चिन्ता करने से मनुष्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। चिता पर रखा हुआ मनुष्य का शरीर एक बार जलकर भस्म हो जाता है पर यह चिन्ता मनुष्य को पल-पल जलाती है। चिन्ता मनुष्य को चैन से नहीं बैठने देती। मनुष्य सदैव उदास, परेशान-सा दिखाई देता है। उसे लगता है कि मानो खुशियॅं उससे रूठ गई है। उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया है, वे मेरे घर का रास्ता भूल गई हैं। यह स्थिति व्यक्ति के लिए वास्तव में बहुत कष्टकारी होती है।
           'नराभरणम्' ग्रन्थ में चिन्ता के विषय में कहा है- 
        चिन्तायाश्च चितायाश्च बिन्दुमात्रं विशेषत:।
        चिता दहति निर्जीवं चिन्ता जीवन्तमप्यहो॥
अर्थात् चिन्ता और चिता में केवल एक बिन्दु का अन्तर है परन्तु चिता निर्जीव को जलाती है और चिन्ता जीवित को।
             हम सब जानते हैं कि चिन्ता करने से कोई लाभ नहीं होता। इससे कोई हल भी नहीं निकलता। पर फिर भी हम मनुष्य हैं कि किसी भी कारण से परेशान होकर चिन्ता करने लगते हैं। इसे हम मानवीय कमजोरी भी कह सकते हैं। इस चिन्ता के समान शरीर को सुखाने वाली और कोई वस्तु नहीं है। होनी तो होकर ही रहती है और हमारे कहने से वह टलने वाली भी नहीं है। इसलिए अनावश्यक चिन्ता करने का कोई लाभ नहीं होता। 
            यह इनसानी कमजोरी हरपल मनुष्य को घेर कर रखती है। उसका सुख-चैन सब हर लेती है। यद्यपि घर-परिवार के सदस्यों का एक दूसरे के प्रति चिन्तित रहना उनके परस्पर प्रेम का परिचायक माना जाता है। तथापि अनावश्यक चिन्ता करना कभी-कभी अकारण ही विवाद का रूप ले लेती है। आजकल बच्चे-बड़े सभी इस कारण नाराज रहते हैं। इसे अपने कार्यों में दखलअंदाजी समझते हैं। वे सोचते हैं कि हम समझदार हो गए हैं फिर हम किसी के प्रति जवाबदेह क्यों बनें? 
           'पद्मपुराण' में चिन्ता के विषय में यह कहा गया है - 'कुटुम्ब की चिन्ता से ग्रसित व्यक्ति के श्रुत ज्ञान, शील और गुण उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार कच्चे घड़े में रखा हुआ जल।'
           चिन्ता के कई कारण हो सकते हैं- बच्चों की पढ़ाई, उनका सेटल होना, उनकी शादी, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या, किसी सदस्य का घर देर से आना, पड़ोसी की समृद्धि या उनके घर किसी नई वस्तु का आना, घर में धन-समृद्धि की कमी अथवा घर के सदस्यों में अनावश्यक ही खटपट रहना आदि। अब इन परेशानियों में इन्सान चिन्ता ही कर सकता है। वह यह भी जानता है कि चिन्ता करने से कुछ भी नहीं होने वाला। पर इन्सानी स्वभाव ही ऐसा है कि हर बात पर वह चिन्तित हो जाता है।
            हमारे नेताओं को देखिए जिन्हें देश और जनता की बहुत चिन्ता रहती है। उस चिन्ता में घुलते हुए वे बेचारे दिन-प्रतिदिन दुबले होते जा रहे हैं। व्यवसायियों को हमेशा कर्मचारियों और हर प्रकार के टैक्स की चिन्ता रहती है जो स्वाभाविक भी है। इस समस्या से उन्हें झूझना पड़ता है।
              भूतकाल में जो हो चुका है उसे छोड़ देना चाहिए। उससे शिक्षा अवश्य लेनी चाहिए पर उसको पकड़कर घुलते रहना या चिन्ता करना बुद्धिमानी नहीं कहलाती। इसी प्रकार भविष्य के गर्भ में क्या है? कोई भी सांसारिक व्यक्ति नहीं जानता। इसलिए उसे ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। नाहक चिन्ता करके सभी परिजनों को कभी व्यथित नहीं करना चाहिए। अत: भविष्य में आने वाले सम्भावित अनिष्टों की चिन्ता करने वालों की शान्ति भंग हो जाती है। जो बहुत अमूल्य है।
               बस केवल उसी के विषय में विचार करना चाहिए जो हमारे सामने प्रत्यक्ष विद्यमान है। वर्तमान की तथाकथित चिन्ता ही बहुत है सन्तप्त रहने के लिए। मनुष्य को नदी की तरह गम्भीर होना चाहिए। नदी को पार करने में जो मनुष्य लगा हुआ है, वह जल की गहराई की चिन्ता कभी नहीं करता। उसी तरह जिस व्यक्ति का चित्त स्थिर है, वह इस संसार सागर के नानाविध कष्टों का सामना करने पर भी उनसे नहीं घबराता। उनका दृढ़ता पूर्वक सामना करता है।
             यह सिद्धान्त हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि समय से पहले और भाग्य से अधिक न किसी को मिला है और न ही मिलेगा। फिर हमारे कर्म ही प्रधान हैं जो हमें अपने जीवनकाल में सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख एवं समृद्धि देते हैं। तो फिर चिन्ता करके बदहाल क्यों होने का क्या लाभ है? 
            अपनी सारी चिन्ताएँ उस जगत जननी माता के हवाले करके निश्चिन्त हो जाइए। जैसे बच्चे अपनी माता से अपने दुख बाँटकर चैन की नींद सो जाते हैं। उसी प्रकार उस मॉं पर विश्वास रखिए। शेष ईश्वर सब शुभ करेगा, यही विचार अपने मन में सदा रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 17 सितंबर 2025

शब्द ब्रह्म

शब्द ब्रह्म

हमारे भारतीय शास्त्र शब्द को ब्रह्म कहते हैं यानी ईश्वर का रूप मानते हैं। इससे भी अधिक बढ़कर 'ब्रह्मविद्योपनिषद' का कथन है- 
         यस्मिन्विलीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते।
         धियं हि लीयते ब्रह्म सोऽमृतत्वाय कल्पते।। अर्थात् जिस शब्द में लय होती है, उसे परब्रह्म कहा गया है। जो बुद्धि ब्रह्म में लीन हो जाती है, वह अमृत स्वरूप कही गई है।
           शब्द संस्कार होता है जिसकी अपनी एक पहचान होती है। हमें प्रयास यही करना चाहिए कि शब्द का उच्चारण शुद्ध किया जाए। इस बात को हम इस प्रकार कह भी सकते हैं कि शब्द का अशुद्ध उच्चारण सीधा-सीधा ईश्वर का अपमान है।
          शब्द को नाद भी कहते हैं जिसका ब्रह्म की तरह कोई आकार नहीं होता। वह भी उसकी तरह सर्वत्र व्यापक होता है। उस ध्वनि में व्यवधान पैदा करने का अर्थ होता है, वायुमण्डल की तंरगों को दूषित करना। यहाँ संगीत के सुरों की चर्चा कर सकते हैं जिनके साथ यदि छेड़छाड़ की जाए तो वे बेसुरा राग अलापते हैं। वे सुर इतने कर्णकटु होने लगते हैं कि हम उन्हें वहीं रोक देने के लिए शोर मचा देते हैं।
             इसी प्रकार भौतिक संसाधन टीवी, फ्रिज, किसी भी तरह की कोई गाड़ी, कोई भी मोटर आदि यदि स्वर यन्त्र की खराबी से भयानक शब्द करने लगें तो हम अनमने से हो जाते हैं। तब उसे वहीं बन्द करके सुधारने का प्रयत्न करते हैं। इसी प्रकार कनफोड़ू संगीत भी हमारी सहनशक्ति को झकझोर देता है। जब तक वह बन्द नहीं हो जाता या हम उससे दूर नहीं चले जाते बेचैन रहते हैं। यहाँ तो हम उनके सुधार का उपाय कर सकते हैं पर प्रदूषित वातावरण का सुधार तो नहीं कर सकते। मात्र भाषण देकर हम औपचारिकता का निर्वहण कर लेते हैं फिर बस अपना कार्य समाप्त हो गया समझ लेते हैं।
             सत्य यही है कि ब्रह्माण्ड में शब्द हमेशा विचरण करते रहते हैं। शब्दों का शुद्ध उच्चारण वातावरण को शुद्ध रखता है और अशुद्ध उच्चारण उसे प्रदूषित करता है। जिससे निश्चित ही हम सबकी अपनी हानि होती है। ब्रह्माण्ड में ये शब्द एक ध्वनि करते रहते हैं। 
           शब्द का अशुद्ध उच्चारण यदि किया जाता है तो वह कर्णकटु हो जाता है अथवा कानों को चुभता है। हम भारतीय वैसे भी मानते हैं कि यदि मन्त्र का उच्चारण अशुद्ध किया जाए तो वह सुफल देने के स्थान पर विनाश तक कर देता है। इसलिए मनीषी मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण पर बल देते हैं। वैसे भी अशुद्ध शब्द सुनने से मन को पीड़ा होती हैं। उस समय ऐसा लगता है कि अशुद्ध बोलने वाले को किसी तरह से भगा दिया जाए।
           शब्द चमत्कार से भरा होता है। यह भावना को मूर्तरूप देकर साकार करता है। बोलते समय उचित शब्द का चयन करना भी किसी साधना से कम नहीं होता। गलत शब्द का प्रयोग दूसरे को मानसिक आघात व पीड़ा दे सकता है। इस प्रकार इसकी बड़ी ही विचित्र महिमा है। अर्थवान शब्द की अपार शक्ति होती है। परन्तु लोग अशुद्ध बोलते हैं और अशुद्ध ही लिखते हैं। ऐसा करने से कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है और लेने के देने पड़ जाते हैं। 
             एक उदाहरण देखते हैं। मान लो हमने किसी को जाने से रोकना है तो हम कहेंगे- 'रुको, मत जाओ।' परन्तु हमने कह दिया- 'रुको मत, जाओ।' तो हो गया झगड़ा। इसका अर्थ यह हुआ कि हमने उस व्यक्ति को रोकने के बजाय जाने के लिए कह दिया। महाकवि कालिदास विवाह से पूर्व महामूर्ख थे। विवाह के उपरान्त जब दोनों पति-पत्नी एक कमरे में बैठे हुए थे तो ऊँट की आवाज सुनकर उन्होंने उष्ट्र के स्थान पर उट्र कहा तो उनकी विदुषी पत्नी ने उन्हें अपने घर से बाहर निकाल दिया था।
           इस प्रकार हमारी छोटी-सी गलती के कारण बहुधा अपरिहार्य स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जब हमें न चाहते हुए भी मुँह छुपाना पड़ जाता है। कभी किसी के सामने झेंपना न पड़े इसीलिए शायद 'पहले तोलो फिर बोलो' उक्ति का प्रचलन हुआ होगा। इस उक्ति का बहुत गहरा भाव है। इसका सीधा-सा अर्थ हम यह कर सकते हैं कि अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए या अनावश्यक बोलने से बचना चाहिए। बहुत अधिक बोलना कभी-कभी व्यर्थ ही झगड़े का कारण बन जाता है।
           आजकल प्रचलन होता जा रहा है यह कहने का कि मैंने ऐसा नहीं कहा था पर मेरी बात को गलत समझ लिया गया। मेरी कही गई बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। हम हर दूसरे दिन टीवी पर देखते हैं या फिर समाचार पत्र में पढ़ते हैं। यह सब इसी दोषपूर्ण बोलचाल का ही परिणाम है। बाद में हम अपने पक्ष में सफाई देते फिरते हैं या क्षमा याचना करते रहते हैं। इस सारी फजीहत से बचने के लिए पहले ही सोचना चाहिए। सन्तुलित भाषा में अपनी बात को रखना चाहिए।
             वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि शब्द सौरमण्डल में विचरण करते रहते हैं। हमें अपने शब्दों का प्रयोग नापतोल कर करना चाहिए। यथासम्भव शब्द का शुद्ध उच्चारण करके वातावरण को दूषित होने से बचाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

धर्म की मर्यादा

धर्म की मर्यादा

धर्म की अपनी एक मर्यादा होती है उसका पालन हर व्यक्ति को करना चाहिए। इस लोक में माता, पिता, भाई, बन्धु और मित्र हमारे सहायक हो सकते हैं परन्तु परलोक में केवल धर्म ही हमारा साथ देता है। आत्मा के शरीर से बाहर निकलते ही इस भौतिक शरीर को अपने प्रिय सुजन मिट्टी के ढेले के समान समझकर अग्नि के हवाले कर देते हैं। सभी सांसारिक रिश्ते-नाते केवल श्मशान तक साथ निभाते हैं। उसके बाद धर्म हमारा हाथ थाम लेता है और फिर जन्म-जन्मान्तरों तक मीत बनकर हमें मार्ग दिखाता है।
               अकेला धर्म ही हमारा ऐसा मित्र है जो लोक-परलोक दोनों स्थानों पर हमारा साथ नहीं छोड़ता बल्कि भाई, बन्धु, सखा आदि सब कुछ बनकर कदम-कदम पर हमारी रक्षा करता है। हम ऐसे एहसान फरामोश हैं कि उसी का तिरस्कार करते रहते हैं। वह हमें कुमार्ग पर कदम न बढ़ाने के लिए चेतावनी देता है और हम उसे डाँटकर चुप करा देते हैं। हम लोग जब तब अपनी मनमानी करते हैं। उसका फल कष्ट व परेशानियों के रूप में जीवन भर भोगते रहते हैं।
              धर्म कहता है माता-पिता की सेवा करो, नित्य पञ्चमहायज्ञ करो, स्त्रियों का सम्मान करो, पराई स्त्री को माता समझो, सबके साथ समता का व्यवहार करो आदि। धर्म परस्पर भाईचारा निभाने का आदेश देता है। प्राणिमात्र पर दया करने का उपदेश देता है। धर्म में हिंसा या मारकाट का कोई स्थान नहीं होता। जब हम धर्म के परामर्श के अनुसार चलते हैं तो इस जीवन में सफलताओं की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं। तब स्वयं को दुनिया का सबसे सौभाग्यशाली इन्सान समझकर हम इतराते रहते हैं। 
            धर्म मनुष्य को दुखों से निकालकर सुख की शीलत छाया में ले जाता है। वह असत्य से सत्य की ओर व अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। यही अधर्म पर विजय दिलाता है। धर्म का पालन करके ही मनुष्य को आत्मबल मिलता है। वह किसी से डरता नहीं है। वह किसी भी प्रकार के अन्याय व अत्याचार का सजग होकर विरोध कर सकता है। दूसरों को भी धर्म की अनुपालना के लिए प्रेरित करता है। ऐसा धर्म का पालक सबके लिए उदाहरण बन जाता है। लोग उसे महापुरुष की संज्ञा देते हैं। जिस मार्ग वह चलता है वह दूसरे लोगों के लिए अनुकरणीय बन जाता है।
          इसीलिए विद्वान कहते हैं- 
           महाजनो येन गत: स पन्थ:।
अर्थात् महापुरुष जिस मार्ग पर चलते हैं वास्तव में वही उचित मार्ग होता है। उसी पर हम सबको चलना चाहिए।
             धर्म की मर्यादा के पालन का एक अर्थ है अपने घर-परिवार, देश, धर्म व समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाना। प्राणिमात्र से अपने जैसा व्यवहार करना भी धर्म की मर्यादा ही है। सभी सम्बन्धों में घालमेल न करके उनके प्रति सजग रहना धर्म का सार है। भगवान राम को हम इसीलिए मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं क्योंकि उन्होंने सभी रिश्तों की मर्यादा को समझा और उनको अपने मन से निभाया।
            धर्म की मर्यादा का दूसरा अर्थ है जिस भी धर्म के अनुयायी हैं, उसे सच्चे मन से अपनाएँ। वहाँ इसके पालन में प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं होती। किसी को दिखावा नहीं करना चाहिए बल्कि आत्मिक शान्ति के लिए ही उसका अनुगमन करना चाहिए ताकि लोक और परलोक दोनों सुधर जाएँ।  ईमानदारी, श्रद्धा व सच्चाई से धर्म का अनुसरण करने से ही ईश्वर प्रसन्न होता है। मालिक को सरल हृदय लोग ही सदा पसन्द आते हैं।
              धर्म का ढोंग करना धर्म की मर्यादा का पालन कदापि नहीं कहलाता। धर्म की मर्यादा का पालन करने का तात्पर्य यही है कि हम मन, वचन व कर्म से अपने धार्मिक और सामाजिक आदि सभी दायित्वों का सुचारू रूप से निर्वहण करें। हमें धर्म के अनुसार अपना आचरण रखना चाहिए। ऐसा करने से हमारी आत्मिक उन्नति होती है। तभी हमारे इहलोक और परलोक दोनों सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 15 सितंबर 2025

रिश्तों का आधार विश्वास

रिश्तों का आधार विश्वास 

सभी रिश्तों की बुनियाद का आधार केवल विश्वास होता है। विश्वास के बिना संसार चल नहीं सकता। यदि विश्वास को हम जीवन से निकाल दें तो सब शून्य हो जाएगा। घर-परिवार में परस्पर विश्वास हो तो वहाँ स्वर्ग के समान सुमधुर और सामंजस्यपूर्ण वातावरण का निर्माण होता है। वहाँ रहने वालों को तो आनन्द आता ही है और आने वाले अतिथि भी प्रसन्न होकर जाते हैं। ऐसे घर की खूशबू चहुं ओर फैलती है। दूसरे लोग भी उनकी तरह अपने घर को बनाने का प्रयत्न करते हैं।
               ऐसा माहौल तभी बन सकता है जब बड़े-बजुर्ग सबके साथ समता का व्यवहार करें व सब पर ही अपना वरद हस्त रखें। बच्चे आज्ञाकारी हों और बड़ों का सम्मान करने वाले हों। छोटे-बड़े सभी सदस्य एक-दूसरे की जड़ें काटने के बजाय उन्हें अपने प्यार और सद्भाव से सींचें। इसका कारण है रिश्ते बहुत ही नाजुक और कोमल पौधों की तरह होते हैं। ऐसे घर-परिवारों की सुगन्ध दूर-दूर तक फैलती है। लोग हमेशा उनकी एकजुटता व सामंजस्य के उदाहरण देते हैं।
              इसके विपरीत जिस घर-परिवार में सदा परस्पर अविश्वास होता है तो वहाँ अशान्ति बनी रहती है। हमेशा लड़ाई-झगड़ा होते रहते हैं। कोई किसी को फूटी आँख नहीं सुहाता। छोटे-बड़े का लिहाज वहाँ नहीं किया जाता। वहाँ हर चीज की बर्बादी होती है। कहते हैं ऐसे घरों से माँ लक्ष्मी रुष्ट होकर शीघ्र ही अपना ठिकाना बदल लेती है। फिर इन लोगों को अपने किए पर पश्चाताप होता है। उस समय जब सब नष्ट हो जाता है तब पछताने से कोई लाभ नहीं होता।
             इसी प्रकार पति-पत्नी का रिश्ता है , वह विश्वास की नाजुक डोर में बॅंधा होता है यदि उसमें इसकी कमी हो जाए तो उनमें अलगाव हो जाता है। फिर तलाक जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। उनके सम्बध की टूटन दो परिवारों के कष्ट का कारण बन जाती है। बेचारे बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनका तो इस सबमें कोई दोष नहीं होता। माता-पिता तो अपने रास्ते खोज लेते हैं पर ये मासूम अपने पिता अथवा माता के बिछोह में तकिए भिगोते रहते हैं।
             मित्रों में मित्रता का आधार परस्पर विश्वास होता है। इस विश्वास की कसौटी पर जो खरा नहीं उतरता, उसका साथ कोई नहीं देता। ऐसे मनुष्य से सभी किनारा कर लेते हैं। वह व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं बन पाता। इसलिए वह अलग-थलग कर दिया जाता है। बाद में चाहे वह अपने कृत्यों के लिए क्षमायाचना करता रहे परन्तु दिलों आई खटास पुनः सम्बन्धों को सुधारने नहीं देती। मनों में एक गॉंठ पड़ जाती है।
               व्यापार में लाखों-करोड़ों रुपयों का व्यवहार विश्वास की बुनियाद पर हो जाता हैं। उचंती में भी कारोबार में लाखों रुपयों का लेनदेन होता है। यदि एक बार विश्वास खण्डित हो जाए तो मनुष्य व्यापार में पिछड़ जाता है। दुबारा विश्वास जमाने में बहुत समय लग जाता है।
           और-तो-और अण्डरवर्ल्ड, स्मगलिंग आदि सभी असामाजिक कार्य करने वाले भी विश्वास के भरोसे ही चलते हैं। परस्पर विश्वासघात करने वालों को उसी क्षण वे मौत के घाट उतार देते हैं। वहॉं विश्वासघात करने वालों को माफी नहीं मिलती, उन्हें सीधी मौत मिलती है। इसीलिए उस दलदल में जो एक बार घुस जाता है, उसकी वापसी असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य होती है।
             सभा-सोसायटी, कार्यक्षेत्र आदि हर स्थान पर विश्वास का दामन थामकर चला जाता है। इन स्थानों पर अविश्वास का कोई अर्थ ही नहीं होता। सामाजिक कार्य विश्वास के भरोसे ही चलते हैं। वहॉं पर जो गलत कार्य करता हुआ पकड़ा जाता है, वह समाज में बदनाम हो जाता है। उसके पास फिर मुॅंह छुपाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचता। लोग उससे अपने सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। वह व्यक्ति अलग-थलग हो जाता है।
            परिवार की तरह देश भी विश्वास के भरोसे चलता है। प्रजा शासक पर और शासक प्रजा पर विश्वास करके ही आगे बढ़ते हैं। देश से विश्वासघात या गद्दारी करने वालों के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं। वे लोग उनसे बच नहीं सकते। उसके लिए उन्हें कठोर से कठोर सजा मिलती है। वे देश और समाज के दोषी बनकर न्याय व्यवस्था की नजरों से बच नहीं सकते।
             एक पैदा हुआ बच्चा भी ऊपर से नीचे उतरते समय मुट्ठी में कपड़ा या अगुली जो हाथ में आ जाए कसकर पकड़ लेता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि जिसकी गोद में वह है, उसे गिरने नहीं देगा। इसी प्रकार कुछ माह के बच्चे को आकाश में उछालने का खेल खेलते हैं तो वह हमारे साथ ही इस खेल का आनन्द लेता है। वह भी खिलखिलाकर हंसता है।‌ उसे बिल्कुल डर नहीं लगता बल्कि उसे यह विश्वास होता है कि वह सुरक्षित हाथों में है। इसलिए उसका अहित नहीं हो सकता।
        सभी सम्बन्धों एवं व्यवहारों में आपसी विश्वास का होना बहुत आवश्यक होता है। दूसरी ओर अविश्वास सम्बन्धों की चूलें हिला देता है। इसीलिए विश्वासघात हो जाने पर मनुष्य आत्महत्या कर लेता है। कई बार खून-खराबा तक हो जाता है। हमें यथासम्भव यही प्रयास करना चाहिए कि हर क्षेत्र में परस्पर विश्वास बना रहे। जिससे सभी लोगों में समरसता बनी रहे। इसकी स्वस्थ समाज को बहुत आवश्यकता है। निस्संदेह यह कार्य हम सभी लोग मिल-जुलकर कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 14 सितंबर 2025

आत्मविश्वास मनुष्य की पूॅंजी

आत्मविश्वास मनुष्य की पूॅंजी

स्वयं पर विश्वास करना आत्मविश्वास कहलाता है।यह बहुत महत्वपूर्ण है कि मनुष्य अपना विश्वास बनाए रखे। आत्मविश्वास मनुष्य के जीवन की ऐसी पूँजी है जिसकी उसे मृत्यु पर्यन्त हर कदम पर बहुत ही आवश्यकता होती है। समाज में अपनी एक नयी पहचान बनाने में यह हमारी सहायता करता है। आत्मविश्वास से भरे हुए लोगों के चेहरों पर बिना मेकअप किए ही एक अलग तरह की चमक या तेज होता है जो उन्हें दूसरों से अलग करके विशेष बना देता है।
             आत्मविश्वास से भरपूर व्यक्ति तलवार की धार पर चलने जैसे किसी भी कठिन-से-कठिन कार्य को चुटकी बजाते ही पूर्ण कर लेता है। समुद्र में गहरे पैठने से लेकर आकाश की ऊँचाइयों को नापने में हिचकिचाता नहीं है। पर्वतों का सीना चीरकर नए रास्ते बना लेना उसके बाँए हाथ का खेल होता है। ऐसे संकल्पित लोग ही चमत्कार करने का साहस रखते हैं। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण ये आत्मविश्वासी लोग समाज और दुनिया में अग्रणी बन जाते हैं।
               इन्हीं लोगों के परिश्रम के फलस्वरूप आज हम इतनी अधिक सुविधाएँ भोग रहे हैं। हम दिन-रात अन्धेरे को दूर भगाकर प्रकाश का आनन्द उठाते हैं। आज सर्दी में हमें सर्दी का अहसास नहीं होता और गर्मी में गर्मी नहीं सताती। दुनिया तो आज वाकई मुट्ठी में आ गई है। विश्व के किसी भी कोने में कहीं भी आना-जाना कुछ घण्टों में हो जाता है। कहीं भी रहने वाले मित्रों और परिजनों से पल भर में बात हो जाती है। विडियो कॉल से उन्हें प्रत्यक्ष देख सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि इन आत्मविश्वासियों के कारण ही विज्ञान ने हर क्षेत्र में विकास किया है। 
            विश्व में जितने भी ऐसे विश्वास से भरपूर लोग हैं वे बिना डरे शेर की तरह पहली पंक्ति में चलते हैं। वे अपने कदमों के निशान पीछे छोड़ते जाते हैं। शेष दुनिया उनके पीछे उन्हीं निशानों पर चलती है। हर क्षेत्र में उन्हीं के नाम पर सारे रिकार्ड बनते हैं। इन लोगों को अकेले चलने में भी कोई परहेज नहीं होता। ये समय की धारा को अपनी इच्छाशक्ति से मोड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। ये जब चाहे तभी कहीं पर, किसी भी क्षेत्र में अपना डंका बजाने की सामर्थ्य रखते हैं।
             इस आत्मविश्वास के बिना किसी  मनुष्य के जीवन की कल्पना करना कठिन होता है। इसकी कमी होने पर वह हीन भावना से ग्रसित व कुण्ठित हो जाता है। अपने पर से उसका विश्वास उठने लगता है। तब वह मायूसियों के घेरे में कैद हो जाता है। उसे ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सारा जमाना उसका शत्रु बन गया है। किसी की अच्छी शिक्षा भी उसे जहर की तरह कड़वी लगती है। हर कामयाब व्यक्ति से वह ईष्या करने लगता है। गाली-गलौच करके वह अपने मन की भड़ास निकाल कर स्वयं को और अधिक परेशानी में डाल लेता है। 
             यदि आत्मविश्वास की कमी हो जाए तो मनुष्य जीवन में उन्नति नहीं कर पाता। किसी भी कार्य को करने से पहले ही वह घबराने लग जाता है और उसे अनावश्यक ही डर लगता है। उसका गला सूखने लगता है और हाथ-पाँव काँपने लगते हैं। अपने जीवन में निराशा के गर्त में वह डूबने लगता है। कभी-कभी हीन भावना के चलते वह डिप्रेशन में चला जाता है। और कुछ विशेष परिस्थितियों में वह अपना मानसिक सन्तुलन तक खो बैठता है और मनोरोगी बन जाता है। फिर वह डाक्टरों के अधीन हो जाता है।
            मनुष्य में आत्मविश्वास सुसंस्कारों, उच्च विचारों से आता है। उच्च शिक्षा व योग्यता उसे डगमगाने नहीं देते। सद् ग्रन्थों के अध्ययन और सत्संगति से आत्मोन्नति होती है। इसलिए स्वयं को सदा सकारात्मक कार्यो में व्यस्त रखना चाहिए। अपनी सोच का दायरा विस्तृत करना चाहिए। इस प्रकार अपने आत्मविश्वास को निरन्तर बनाए रखना चाहिए। यह विश्वास बनाए अपने मन में बनाए रखना चाहिए कि कभी भी कैसी भी परिस्थिति आ जाए हम आत्मविश्वास का दामन नहीं छोड़ेंगे और न ही उसे डगमगाने देंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 13 सितंबर 2025

हिन्दी के प्रति हीनता और उपेक्षा

हिन्दी के प्रति हीनता और उपेक्षा

अपने देश, वेष और भाषा से जिसको प्यार नहीं वह मनुष्य नहीं। अपने ही देश में हमारी मातृभाषा हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। बहुत वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी के बाद हमारे वीरों के बलिदान के फलस्वरूप हमारा देश तो स्वतन्त्र हो गया परन्तु फिर भी मानसिक रूप से हम आज तक परतन्त्र हैं।
           वैसे तो भारतीय संविधान में हिन्दी को मातृभाषा स्थान दिया गया है परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। हमारे देश को स्वतन्त्र हुए लगभग 75 वर्ष हो गए हैं लेकिन आज तक पूरे देश में हिन्दी भाषा को लागू नहीं किया जा सका। विचारणीय है कि हमारा भारत देश में हिन्दी भाषी लोगों का प्रतिशत अधिक है। बहुत दुर्भाग्य है हमारे देश का कि तुच्छ राजनैतिक स्वार्थों के कारण भाषा के नाम पर गाहे-बगाहे दंगा-फसाद तक होते रहते हैं। 
             अंग्रेजी भाषा आज भी हमारे दिलो दिमाग पर हावी है। सारे सरकारी, गैर सरकारी व वैधानिक कार्य जब अंग्रेजी भाषा में होते हैं, तो एम.एन.सीज जो बाहर से आई हैं उनको हम क्या कहें? 
            हर स्थान व क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा का ही वर्चस्व है। हिन्दी भाषा का व्यवहार करने वाले लोगों के साथ अपने ही देश में अछूतों की भाँति बर्ताव किया जाता है। उन्हें द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दी भाषी लोग अपने ही देश में बेगाने हो गए हैं।
            इसी रवैये का परिणाम है पब्लिक स्कूल। इन स्कूलों में हिन्दी की दशा बहुत दयनीय है। कक्षा दशम तक भी हिन्दी अनिवार्य रूप से नहीं पढ़ाई जाती। वहाँ भी संस्कृत, जर्मन, फ्रैंच, उर्दू, जापानी, चायनीज आदि देशी-विदेशी भाषाएँ हिन्दी के विकल्प के रूप में विद्यार्थियों को दी जाती हैं।ग्यारहवीं कक्षा में साईंस, कामर्स, आर्टस आदि में से किसी एक स्ट्रीम को चुनना होता है इसलिए हिन्दी पढ़ने वाले बच्चे न के बराबर होते हैं। 
           मात्र प्रशासनिक पदों के आवेदन के लिए हिन्दी भाषा का कक्षा दशम की परीक्षा का प्रमाणपत्र होना अनिवार्य होता है। इसलिए दूसरी भाषा पढ़ने वाले कुछ ही बच्चे केवल दसवीं कक्षा की हिन्दी की बोर्ड में परीक्षा देते हैं।
             दुर्भाग्यपूर्ण है यह स्थिति कि घर में, विद्यालय में व मित्रों के साथ सारा दिन हिन्दी बोलने वालों को हिन्दी कठिन लगती है और अच्छी नहीं लगती। माता-पिता भी हिन्दी को हौव्वा बनकर रखते हैं। उनका भी यही कहना होता है- 'अरे भाई, हिन्दी तो बहुत मुश्किल है। जब हमें ही समझ में नहीं आती तो हम बच्चों को क्या कहें?'
          मिश्नरी स्कूलों में तो हिन्दी भाषा की स्थिति बहुत अधिक खराब है। कई स्कूलों में हिन्दी बोलने पर बच्चों को जुर्माना देना पड़ता है या सजा भुगतनी पड़ती है।
           यह तो है अपने ही देश में, अपनी मातृभाषा हिन्दी की दुर्दशा। समझ नहीं आता कि हिन्दी भाषा की इस दुर्दशा के दोषियों को कौन सजा देगा? जबकि विदेशों में हिन्दी भाषा की आवश्यकता को अनुभव किया जा रहा है और वहॉं के स्कूलों में इसे पढ़ाया जा रहा है।
            आधुनिक वैज्ञानिक युग में संस्कृत भाषा और हिन्दी भाषा को कमप्यूटर के लिए सर्वोत्तम भाषा माना गया है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

धर्म की जीवन‌ में आवश्यकता

धर्म की जीवन‌ में आवश्यकता 

धर्म की हम सब मनुष्यों के जीवन में बहुत आवश्यकता है। धर्म के बिना मनुष्य जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। सभी भारतीय धर्मशास्त्र सदा हमें अपने धर्म का पालन करने का सद् परामर्श देते हैं। विश्व का कोई भी धर्म मनुष्य को कभी यह नहीं सिखाता कि वह स्वार्थी बनकर दूसरों के रास्ते में काँटे बिछाए और सभी के लिए मुसीबत ही बन जाए।
              जहाँ धर्म को जीवन यापन का प्रधान साधन माना जाता था, वहीं अब कुछ लोग इसे पतन का कारण भी मानने लगे हैं। इसका कारण है कि कुछ मुट्ठी भर लोग अपने कुत्सित स्वार्थों की पूर्ति के लिए ईर्ष्या-द्वेष की नीति अपना रहे हैं। धर्म के नाम पर खूनी खेल खेल रहे हैं। वे भूल रहे हैं कि ये कार्य किसी भी देश या किसी काल में स्वीकार्य नहीं किए गए।
              आज पूरे विश्व में कुछ लोग धर्म के नाम पर आतंक का साम्राज्य फैलाकर सब की शान्ति भंग करना चाहते हैं। यहाँ वहाँ हर जगह बम ब्लास्ट करना, मानव बम बनाकर विध्वंस करना, आगजनी करना, लूटपाट करना, छोटे-छोटे बच्चों को अनाथ व बेसहारा बना देना आदि अमानवीय कृत्य कदापि क्षम्य नहीं हो सकते।
              केवल आत्मतोष के लिए दूसरों के प्राणों को मिट्टी की भाँति समझने की वे भूल कर बैठते हैं। धर्म मनुष्य को पतन के मार्ग से बचाकर सन्मार्ग की ओर ले जाता है। परन्तु वे भूल रहे हैं कि ईश्वर द्वारा निर्मित इस सुन्दर सृष्टि को नष्ट करने का अधिकार उस मालिक ने किसी को नहीं दिया है।
               धर्म के नाम पर जो असहिष्णु बनने का प्रयास करते हैं, उन लोगों को सदा यह याद रखना चाहिए कि ईश्वर की इस सृष्टि में आतंक, ईर्ष्या, द्वेष आदि असामाजिक एवं अमानवीय कार्यो का कोई स्थान नहीं है। उसकी रचना को मनुष्य कोई नष्ट करे अथवा बिगाड़ने का प्रयास करे, यह दुष्कृत्य ईश्वर को बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।
             हम सांसारिक लोगों में यह सामर्थ्य नहीं है कि उसकी सत्ता को चुनौती दे सकें। उसकी लाठी जब चलती है तो बिना आवाज के चलती है। जब वह वार करती है तो सबको हिलाकर रख देती है। रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि जितने भी अहंकारियों ने उसे चुनौती देने का यत्न किया उनका अन्त कैसा हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। जितने भी आततायी राजा आदि इस संसार में हुए हैं, उनके अन्त का गवाह इतिहास है।
              धर्म मनुष्य को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। वह अत्याचार का विनाश करके सदा धर्मराज्य की स्थापना करता है। हमारे समक्ष भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। दम्भी रावण व कंस का विनाश करके उन्होंने इस देश में धर्म की स्थापना की। गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को दीवार में चुनवा दिया। मीरा बाई ने विष का प्याला पिया। धर्म के लिए ईसा मसीह सूली पर चढ़ गए। आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने विष पान कियाथा।
              धर्म सुसंस्कारों को देने वाला एक माध्यम ही रहने दें तो अच्छा होगा। इसके नाम पर राजनीति करना या खून-खराबा करने की स्वतन्त्रता किसी को भी नहीं दी जा सकती। हमारे कामों में कोई भी दखल अंदाजी करे, यह हमें बिल्कुल भी सहन नहीं होता तो वह मालिक इसे क्यों पसन्द करने लगा? जगत की उत्पत्ति, पालन व संहार उस जगतपिता के काम हैं। उसके कामों में टाँग अड़ाना छोड़ देना ही श्रेयस्कर है। 
             ‌संसार के स्वामी प्रभु की सता को चुनौती देने के स्थान पर हमें उसकी इच्छा के आगे सिर झुकाना चाहिए। उसके बनाए हुए नियमों का अपने मन से पालन करना चाहिए। इस प्रकार करने में ही मानव जाति का भला हो सकता है और चारों ओर सौहार्द व सुख-शान्ति बनी रह सकती है। इसी से ही मानवजाति का कल्याण सम्भव है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 11 सितंबर 2025

जाप के लिए माला

जाप के लिए माला

ईश्वर की आराधना या जाप करने के लिए हम एक सौ आठ मनकों की माला अपने हाथ से फेरते हैं। जाप करने के लिए माला रूद्राक्ष, तुलसी, स्फटिक या ऊन से बनी हुई कोई भी हो सकती है। इससे जाप करने में सुविधा होता है।
              कुछ लोगों का मानना है कि ईश्वर हमें गिनकर नेमते नहीं देता तो उसका नाम हमें गिनकर नहीं लेना चाहिए। मैं भी यही मानती हूँ कि गिनकर जाप नहीं करना चाहिए। आप उठते-बैठते, सोते-जागते, चलते-फिरते हुए दिन-रात मालिक के नाम का स्मरण कीजिए। पर नियम का पालन भी आवश्यक होता है। 
            ‌ प्रत्येक ज्योतिर्विद अथवा तान्त्रिक जब भी किसी कष्ट को दूर करने का उपाय बताते हैं तो एक माला से लेकर सवा लाख तक का जाप प्रायः बताते हैं। इसके अपवाद स्वरूप कभी-कभी इससे अधिक भी बता देते हैं। 
              भारतीय विद्वानों का मानना है कि जाप करते समय जपसरिणी का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। माला में एक मनका जो गाँठ लगा हुआ होता है उसके ऊपर एक फुम्मन सा बना होता है, उसे जप सरिणी कहते हैं। इसका यह अर्थ होता है कि यह 108वाँ मनका है। वहीं से माला को घुमा दिया जाता है और वह आखिरी मनका नम्बर एक हो जाता है।
              अपने विचार आप सुधीजनों के समक्ष रखते हुए मैं इतना ही कहना चाहती हूँ कि हम सांसारिक लोग हैं। दिनभर हम दुनिया के पचासों पचड़ों में फंसे रहते हैं। अत: उनका प्रभाव हमारे मन एवं मस्तिष्क पर पड़ना निश्चित होता है। ईश्वर का स्मरण करते समय भी हमें वे विचार परेशान करते हैं। इस दुनिया में जिस प्रभु ने हम लोगों को भेजा है, उस मालिक का नित्य ही स्मरण करना हमारा दायित्व है। 
        कबीरदास जी ने निम्न दोहे में कहा है-
      माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर।
      कर का मनका डारि के मन का मनका फेर।।
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं कि माला फेरते हुए बहुत समय बीत गया पर मन फेर नहीं गया। हाथ की माला के मनका छोड़कर अपने मन के मनके को फेरों।
             यानी इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी हमें समझाते हुए कह रहे हैं कि वर्षों माला फेरते रहे पर मन हेराफेरी करता रहता है। उससे छुटकारा नहीं मिल सका। इसलिए हाथ के पकड़े मनके को छोड़कर हमारे अन्तस में निरन्तर चलने वाली माला को फेरो। अर्थात् अपने श्वासों की माला पर ध्यान लगाकर मन को साधकर प्रभु का ध्यान करना चाहिए। यानी मन को साधना मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक है। तभी मनुष्य ईश्वर प्राप्ति की ओर कदम बढ़ा सकता है।
              यदि हम बिना माला के एक घण्टे के लिए जाप करने की सोचेंगे तो मेरा मानना है यह सम्भव नहीं हो पाएगा। अभी हम इतने बड़े तपस्वी नहीं हैं कि एक घण्टे के समय के जाप करने के नियम का पालन कर सकें। हर थोड़ी बाद घड़ी देखने से मन नहीं रमेगा। यदि एक घण्टे का हम अलार्म लगाएँगे तो ध्यान इसी में रहेगा कि शायद अभी एक घण्टा नहीं हुआ। इसलिए अलार्म नहीं बोल रहा आदि। इसके अतिरिक्त जाप कहीं और छूट जाएगा और हम सपनों में कहीं खो जाएँगे या दुनिया के व्यवहारों में भटक जाएँगे। इसलिए माला से जाप करने के उपरान्त जितना चाहे और भी जाप कर सकते हैं इस प्रकार बिना गिनती का जाप करना भी सम्भव हो सकेगा
              इसलिए मन लगे या न लगे अपना नियम अवश्य निभाना चाहिए। मन को साधने में तो बड़े- बड़े ऋषि-मुनियों को भी बरसों लग जाते हैं। हम लोग साधारण मनुष्य हैं। हम तो बस घर-परिवार में ही रमे रहते हैं। नियमपूर्वक जो भी कार्य किया जाता है, धीरे- धीरे उसमें मन रमने लगता है। उसी की कड़ी है माला से जाप करना। यदि हाथ में माला होती है तो भटकते हुए मन को मोड़ना अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जाता है।
              सभी लोग अपनी सुविधा एवं निमय के अनुसार ईश्वर की आराधना करने में स्वतन्त्र हैं। किसी मनुष्य पर किसी व्यक्ति को किसी तरह की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। मेरे मन में ये कुछ विचार आए थे। इसलिए उन्हें आपके साथ साझा किया है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 10 सितंबर 2025

आत्महत्या हल नहीं

आत्महत्या हल नहीं

समझ नहीं आता कि आजकल आत्महत्याएँ कुछ अधिक होने लगी हैं। समाचार पत्रों, टी वी, सोशल मीडिया पर इनकी चर्चा प्रायः होती रहती है। सभी वर्गों और आयु के लोग इस घृणित कृत्य को कर रहे हैं। किसान, व्यापारी वर्ग, नौकरी पेशा लोग, नेता, अभिनेता, विद्यार्थी, बच्चे, युवा, वृद्ध आदि सभी आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं। उन सब लोगों को शायद अपनी समस्या या परेशानी से बचने का उस समय यही एकमात्र सरल-सा मार्ग दिखाई दे रहा होता है।
          आत्महत्या करना किसी समस्या का हल नहीं है। इसका सीधा-सा अर्थ यह कर सकते हैं कि पीठ दिखाकर समस्याओं से भागना। इतने शुभकर्मों के पश्चात प्राप्त हुए इस अमूल्य मानव जीवन का ऐसा घृणित अन्त वास्तव में बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। पूर्वजन्मों में किए गए प्रारब्ध कर्मों के अनुसार ही जीवन देकर, ईश्वर जीव को इस संसार में भेजता है। ईश्वर मनुष्य को जीवन जीने के लिए भेजता है, न कि व्यर्थ में गॅंवाने के लिए। आत्महत्या करना मानो ईश्वर के विधान को चुनौती देना कहलाता है। आत्महत्या करने को किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
            आखिर मनुष्य आत्महत्या क्योंकर करता है? इस आत्महत्या का रास्ता चुनने के पीछे उसका मनोविज्ञान क्या होता होगा? इन प्रश्नों के उत्तर में यही कह सकते हैं कि मनुष्य किसी भी कारण से जब अपने दुखों और परेशानियों को सहन नहीं कर सकता, तब वह टूटने लगता है। वह उनसे छुटकारा पाना चाहता है। उसे लगता है कि अपने दुखों से बचकर निकल जाने का यही एक सरल मार्ग दिखाई देता है। यदि वह आत्महत्या कर लेगा तब इस तरह के अपने असहनीय भीषण कष्टों से वह सदा के लिए मुक्त हो जाएगा।
           इसका यह भी कारण हो सकता है कि शायद लोगों में सही या गलत को पहचानने में कहीं चूक हो रही है। अथवा दुनिया की दौड़ में पिछड़ जाना भी शायद उनको एक समस्या हो नजर आती होगी। वे अपने जीवन को बोझ मानने लगते होंगे। तभी जीवन जीने के स्थान पर उससे छुटकारा पाने के लिए अमानवीय कृत्य कर बैठते हैं। वे उस समय अपनी सोचने-समझने की शक्ति को खो देते हैं। तभी वे अपने संस्कारों और मानवीय मूल्यों को विस्मृत कर देते हैं।
           'ईशोपनिषद्' के निम्न मन्त्र में ऋषि ने बताया है कि आत्महत्या करने वाले कहाँ जाते हैं-
       असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः
      तांस्ते प्रेत्यभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।
अर्थात् सर्वत्र व्याप्त ईश्वर को देखने की दृष्टि जिन लोगों के पास नही होती, जो अकर्मण्यता से ग्रस्त है, ऐसे ही लोग हैं जो आत्महत्या करते है। वे मरणोपरान्त ऐसे लोकों को प्राप्त करते हैं, जो अन्धकार से आच्छादित है ।
          मनीषी कहते हैं कि मृत्यु के पश्चात मनुष्य को नया जन्म मिलता है। परन्तु मृत्यु से पहले जीवन को आत्महत्या करके विनाश करने वाले लोग ऐसे लोकों में भटकते है, जो अन्धकार से युक्त होते हैं। जब तक प्रारब्ध के अनुसार उनके जीवन की निश्चित अवधि समाप्त नहीं हो जाती, तब तक उन जीवों को नया जन्म नहीं मिल पाता। वहाँ पर भटकते हुए उन लोगों को अनेकानेक कष्टों का सामना करना पड़ता है।
          जिन दुखों के कारण मनुष्य जीवन की बाजी हार जाता है, वे कष्ट अगले जन्म में भी उसका पीछा नहीं छोड़ते। अपने किए हुए शुभाशुभ कर्म तो उसे भोगने ही पड़ते हैं, तभी उसे उनसे मुक्ति मिल सकती है। जो भी कर्म मनुष्य ने अपने पूर्वजन्मों में किए होते हैं, उनसे उसे तभी छुटकारा मिलता है, जब वह उन्हें भोग लेता है। यही ईश्वरीय या विधि का विधान भी कहा जाता है। इस अटल सत्य को कोई बदल नहीं सकता। कर्म का यह सिद्धान्त बहुत ही जटिल है। इसीलिए हम मनुष्यों की समझ में बिल्कुल नहीं आता।
           आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध करने के लिए मनुष्य स्वतन्त्र है। परन्तु ऐसा दुष्कृत्य करके मनुष्य अपने प्रियजनों का अनजाने में अहित कर बैठता है। वह स्वयं तो अपने कष्टों से तथाकथित रूप से मुक्त हो जाता है, पर पीछे वालों को नरक की भट्टी में झौंक जाता है। अपने प्रियजन के बिछोह के साथ-साथ उन्हें समाज के तानों और उलाहनों का सामना करना पड़ता है। समाज और न्याय व्यवस्था के अगनित सवालों का भी उत्तर उन लोगों को देना पड़ता है।
           मनुष्य यदि ईश्वर पर पूरा भरोसा रखे, तो वास्तव में उसे समझ आएगा कि उसके कठिन समय में वह उसकी सहायता कर रहा होता है। जिस प्रकार सांसारिक माता-पिता अपने बच्चे को दुखी नहीं देख सकते, उसी प्रकार परमपिता परमात्मा भी नहीं चाहता कि उसके बच्चे कभी दुखी रहें। यह हम मनुष्यों की गलतियाँ होती हैं, जिनके कारण उन अशुभ कर्मों का दण्ड हमें समयानुसार अवश्य ही भुगतना पड़ता है। उससे बचकर ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में मनुष्य छुप नहीं सकता।
          मनुष्य को अपने कष्टकारी समय में सहारा प्राप्त करने के लिए सज्जनों की संगति में जाना चाहिए। उसे मानसिक शान्ति पाने के लिए अपने घर में बैठकर सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। यदि अपने मन में परेशानियों से हारकर जब कभी संसार से पलायन करने या आत्महत्या करने का विचार मन में आ भी जाए तो उस पर पुनः विचार करना चाहिए। अपने परिवारी जनों से विचार-विमर्श करना चाहिए। कोई न कोई सकारात्मक हल अवश्य ही निकल आता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

जपयोग की साधना

जपयोग की साधना

निराकार या साकार जिस भी इष्ट के नाम का स्मरण करने के लिए आप जो आराधना करते हैं, उसे जप करना कहते हैं । इस संसार में ईश्वर ने हमें अपनी उपासना करने के लिए अवतरित किया है। हमें प्रभु का निरन्तर जप करना चाहिए। आत्मोन्नति चाहने वालों को निश्चित ही‌ जप साधना करके अपना‌ उद्धार करना चाहिए।‌ 
            जपयोग की साधना से धीरे-धीरे मन स्थिर होने लगता है। यदि किसी विशेष मन्त्र के जप का प्रावधान न किया हो तो 'ऊँ' का जप कर सकते हैं जो निरापद व सर्वश्रेष्ठ है।
जप के प्रकार-
1 वाचिक(वैखरी) जप- वाचिक जप में मन्त्र का उच्चारण कितनी भी जोर से कर सकते हैं। इससे प्रारम्भिक अवस्था में चंचल मन को व्यवस्थित करने में सहायता मिलती है। मन को स्थिर करने के लिए सामूहिक वैखरी जप भी बहुत प्रभावशाली होता है। इसे घर पर, किसी मन्दिर में अथवा किसी हाल में किया जा सकता है।
2  उपांशु जप-  मन्त्र को फुसफुसाते हुए उपांशु जप किया जाता है। इसमें होंठ हिलते हैं पर ध्वनि नहीं होती। यह जप किसी अन्य को सुनाई नहीं देता पर स्वयं जपकर्त्ता इसे सुन सकता है। यह जप मानसिक जप की श्रेणी में आता है। जिस स्थान पर शोर अधिक हो, वहाँ इस जप से अपने मन को स्थिर किया जा सकता है।
3 मानसिक जप- यह जप मन में मौन रहकर किया जाता है। इसमें न ध्वनि होती है और न ही होंठ हिलते हैं। इस जप को करने से शब्द नहीं होता। उसकी आवाज स्वयं को भी नहीं सुनाई देती। जिसका मन स्थिर हो जाता है वह इस जप को करते हैं। इस जप से आत्म साक्षात्कार तक पहुँच सकते हैं।
4  लिखित जप- लाल, नीली या हरी किसी भी स्याही का प्रयोग करके एक निश्चित संख्या में मन्त्र लिखा जाता है। जहाँ तक सम्भव हो अक्षर छोटे व सुन्दर तरीके से लिखने चाहिएँ। लिखित जप के साथ-साथ मनुष्य को मानसिक जप भी करना चाहिए।
5 तालव्य जप-  कुछ विद्वान मानते हैं कि तालु के साथ जीभ को मोड़कर लगाकर जप करना चाहिए। यह भी मानसिक जप ही होता है और इससे भी मन स्थिर रहता है।
            ‌जप करते समय दो बातों का विशेष रूप से ध्यान देना होता है- पहला है मन्त्र का शुद्ध उच्चारण करना। दूसरा जप करने के साथ-साथ माला का एक-एक मनका सरकाना। ये कार्य चेतना को विकसित करने और स्थिर करने के लिए आवश्यक हैं। कुछ समय पश्चात अपने अन्तस में ही एक लय और ताल का अनुभव होता है। सोते समय यदि जप किया जाए तो विचारों की अधिकता बाधक बनती है तब मन्त्र व माला दोनों रुक जाते है और तालमेल बाधित हो जाता है।
              जो लोग हमेशा शंकालु, परेशान या बेचैन रहते हैं, उन्हें जपयोग से लाभ होता है। जप को कहीं भी कभी भी किया जा सकता है। किसी भी निश्चित समय पर किया गया, नियम पूर्वक जप लाभदायक होता है। भीड़ में या शोर वाले स्थान पर जप करते समय माला का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
              विद्वानों का मानना हैं कि जप करते समय जपसरिणी का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। यदि मन व्यग्र हो तो जप का लाभ नहीं मिल पाता कहा गया है-    
              व्यघ्रचित्तो हतो जप:। 
अर्थात् चित्त के व्यग्र होने से जप बेकार हो जाता है।
          ‌  अजपा जाप क्रियायोग का आधार है। इसमें कुशलता प्राप्त करने के लिए साधक को प्रत्याहार, धारणा और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। इस जप में पूर्णता प्राप्त करने वाले के संस्कारों का क्षय हो जाता है। तब मन पूर्णरूप से एकाग्र होने लगता है। यह जप ध्यान योग की पहली सीढ़ी है।
            जप करते समय सुविधाजनक आसन में बैठना चाहिए। यदि बैठना सम्भव न हो तो सीधे लेटकर शवासन में जप करना चाहिए। इस जप साधना से मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 8 सितंबर 2025

मुखिया को निष्पक्ष होना चाहिए

मुखिया को निष्पक्ष होना चाहिए 

घर हो, या देश हो या कोई संस्थान हो, वहॉं के मुखिया या Head को निष्पक्ष होना चाहिए। उसकी दृष्टि में सभी बराबर होने चाहिए। मुखिया कैसा होना चाहिए? इस विषय पर तुलसीदास जी ने कहा है-
       मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक।
      पाले पैसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक॥
अर्थात् इस दोहे में तुलसीदास जी का कहना है कि मुखिया को मुख के समान होना चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मुख में जब कोई खाद्य पदार्थ डाला जाता है तो वह खाने में कोई भेदभाव नहीं करता। अब चाहे वह खाना नमकीन, खट्टा, मीठा, तीखा, कसैला आदि किसी भी स्वाद का हो। वह सभी पदार्थों को एक ही प्रकार से बिना किसी झिकझिक के खाता है। उसी प्रकार एक ही प्रक्रिया से उन सबको पचने व शरीर के सम्पूर्ण अंगों को पुष्ट करने के लिए आगे भेज देता है।
              इसी प्रकार मुखिया भी होना चाहिए। उसे किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। धर्म-जाति, रंग-रूप, अमीर-गरीब आदि के भेद को अनदेखा करते हुए सबको एक समान समझना चाहिए और सभी लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए। अब प्रश्न यह उठता है कि मुखिया किसे कहते हैं? वह कौन होता है? उसके क्या कर्त्तव्य हैं? आदि।
         ‌‌     इन प्रश्नों के उत्तर में हम कह सकते हैं कि मुखिया सबसे बड़े या प्रमुख को कहते हैं। अब वह किसी व्यापारिक संस्था, किसी आफिस का बास हो सकता है। किसी धार्मिक संस्था आदि का प्रधान हो सकता है। घर-परिवार में सबसे बड़ा सदस्य हो सकता है या फिर किसी देश का राष्ट्रपति अथवा प्रधानमन्त्री कोई भी हो सकता है।
             व्यापारिक संस्था या किसी आफिस का मुखिया यानी मालिक या बास यदि अपने सभी कर्मचारियों के साथ मधुरता और सहृदयता का व्यवहार करता है, उनके घर-परिवार की जानकारी रखता है, उनके सुख-दुख में उनसे सहानुभूति रखता है तो वहाँ का माहौल बहुत ही सौहार्दपूर्ण होता है। सभी कर्मचारी अपनी क्षमता से भी बढ़कर अपने काम निपटाते हैं। वे किसी को शिकायत का मौका नहीं देते। फलस्वरूप ऐसी ही संस्थाएँ निरन्तर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती हैं।
           इसी प्रकार अन्य धार्मिक, समाजिक आदि संस्थाओं में प्रधान आदि के समतापूर्वक व्यवहार से कार्य कुशलतापूर्वक सम्पन्न होते हैं। वहाँ पर सभी लोग मिलजुल कर संस्था को उन्नत करने का प्रयास करते हैं। 
               शिक्षण संस्थानों की सफलता भी वहाँ के मुखिया यानी प्रिंसिपल के व्यवहार पर निर्भर करता है। यह उसके हाथ में होता है कि संस्था को नम्बर वन बनाए ताकि उसकी धूम मच सके। अन्यथा संस्था के लोग उसके विरूद्ध हो जाते हैं और उस संस्थान की टी आर पी नित्य गिरने लगती है। ऐसे में लोग अपने बच्चों को वहॉं पर पढ़ने के लिए भेजने‌ के लिए उत्साहित नहीं दिखाई देते।
            घर-परिवार में यदि मुखिया छोटे-बड़े सभी सदस्यों के साथ समता का व्यवहार करेगा, सबको यथायोग्य सम्मान देगा तो उस घर में सौहार्द व सद्भावना का माहौल रहेगा। सबकी शक्ति मिलकर जब एक हो जाती है तो वहाँ सभी परेशानियाँ पलक झपकते दूर हो जाती हैं। ऐसे परिवारों में सुख, समृद्धि व शान्ति का साम्राज्य होता है जो सबको आह्लादित करता है। यदि  मुखिया पक्षपात करेगा तो वहाँ नित झगड़े होने लगते। सम्बन्धों में दरारें आने लगती हैं और घर नरक के तुल्य हो जाता है। सभी सदस्य एक-दूसरे से कटने लगते हैं और फिर वहॉं छुपाव-दुराव की स्थितियॉं बनने लग जाती हैं। इससे मनों की दूरियॉं बढ़ती हैं।
                किसी देश में राजा या राष्ट्रपति अथवा प्रधानमन्त्री जो भी कोई मुखिया है यदि वह अपने देशवासियों को एकसमान मानते हुए सबके लिए नीतियाँ और कानून बनाता है तो देश की भलाई होती है। वहाँ लूट- नहीं खसौट नहीं होती और न ही अराजकता का वातावरण होता है। शासक यदि सकारात्मक रुख अपनाएगा तो देश के लोग समृद्धि की ओर कदम बढ़ाते हैं। यही समृद्ध देश किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए सक्षम होता है। परन्तु यदि वह अपने प्रजाजनों के साथ भेदभाव करेगा तो लोगों में परस्पर में वैमनस्य बढ़ेगा, लोगों का आपस में एक-दूसरे पर विश्वास नहीं रहता और वहाँ अराजकता फैल जाती है। ऐसे देश पर कोई अन्य देश अपना आधिपत्य बहुत सरलता से कर लेता है।
               कोई भी मुखिया जब निष्पक्ष होकर अपने अधीनस्थों के लिए सोचता है तो सबका दिल जीत लेता है। वह प्रिय बनकर सबके हृदयों पर राज करता है। तब सर्वत्र ही खुशियाँ खुश होकर दस्तक देती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 7 सितंबर 2025

जिन्दगी के साथ छुपन छुपाई का खेल

जिन्दगी के साथ छुपन छुपाई का खेल

बच्चों की भाँति हम जिन्दगी के साथ आँख मिचौली या छुपन छुपाई का खेल खेलते रहते हैं। हम अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं और यह सोचते हैं कि हमें कोई नहीं देख रहा इसलिए हम अपनी मनमानी कर सकते हैं परन्तु यह किसी सूरत नहीं हो सकता।
            इस खेल में एक बच्चा आँखें बंद करके सौ तक गिनती गिनता है और बाकी सभी बच्चे ऐसी जगह छिपने की कोशिश करते हैं जहाँ बारी(den) देने वाला उनको आसानी से ढूँढ न सके। वह गिनती पूरी करके ढूँढने निकलता है। जिसे वह पकड़ लेता है उसे अपनी बारी देनी होती है। इस प्रकार यह खेल चलता रहता है। इस खेल में बच्चे के आँख बन्द कर देने के बाद उसे कोई नहीं दिखाई देता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वह मनमर्जी करे या सबको झाँसा देकर भाग जाए। अपना कार्य उसे करना पड़ता है तभी इस खेल को खेलने का आनन्द आता है।
            संसार में रहकर हम सबको खोजने में सारा समय व्यतीत करते रहते हैं। जितना हम अपनों की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं, उतना ही वे हमारी पहुँच से दूर होते जाते हैं। यदि हम सबके साथ मिलकर रहें तो क्योंकर अपनों की खोज-खबर लेने के लिए हमें मारा मारा फिरना पड़े? सीधा व सरल सा गणित है जिसे अपना बनाओगे वह पराया होकर भी अपना बन जाएगा। इसके विपरीत यदि अपनों से दुर्व्यवहार करके पराया बना दोगे तो वे अपने हमसे ही छिटककर दूर चले जाएँगे। इसलिए अपना कौन है और पराया कौन है? हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है।
               हम अपने रिश्ते-नातों, भाई-बन्धुओं, सज्जनों-दुश्मनों के साथ जीवन पर्यन्त यह खेल खेलते रहते हैं। कभी अपनी आर्थिक मजबूरियों के चलते तो कभी सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक कारणों के चलते। कुछ समस्याओं का कारण सचमुच हमारी अपनी विवश्ताएँ होता है और कुछ हमारी मौजमस्ती में डूबकर दूसरों को अनदेखा करने से बन जाते हैं। 
             मानव जीवन हमें ईश्वर ने ऐसा दिया है कि हमें सबकी आवश्यकता होती है। हमें छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी हर वस्तु व हर सम्बन्ध चाहिए होता है। किसी के भी न होने की स्थिति में हम पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।
          इसी प्रकार जीवन में सुख-दुख की भी आँख मिचौली चलती रहती है। न तो हम सुखों को नजर अंदाज कर सकते हैं और न ही दुखों से मुँह मोड़ सकते हैं। दोनों को कर्मानुसार भोगना हमारा प्रारब्ध है। छुटकारा हमारे चाहने से हमें नहीं मिलेगा बल्कि भोगकर ही मिलेगा।
             जब हम अपने अहं में प्रकृति के साथ यह खेल खेलने की बेवकूफी करते हैं तो उसका भयंकर दण्ड या प्रकृति का कोप प्राकृतिक आपदाओं के रूप में हमें सहना पड़ता है। ये आपदाऍं अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, बाढ़, सुनामी आदि किसी रूप आकार हमारे जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। हम बस कठपुतली की तरह मूक बने इन समस्याओं से दो-चार होते रहते हैं।
              हमारा वश चले तो हम जीवन व मृत्यु के साथ भी आँख मिचौली खेल लें। पर ईश्वर ने यह अधिकार अपने पास रखा हुआ है। मनुष्य की यह हस्ती नहीं है कि वह मालिक के न्याय में अपनी नाक घुसा सके। उसे हर हाल में परास्त होना ही होता है। यही विधि का विधान है जिसे हम लोगों को सिर झुकाकर स्वीकार करना होता है। यही इस जीव की नियति है।
          इस खेल को खेलते समय अपनी सीमाओं को हमें नहीं भूलना चाहिए। ईश्वर के न्याय को सिर झुकाकर स्वीकार कर लेंगे तो हम सुखी रहेंगे अन्यथा दुखों की चक्की में पिसते रहेंगे। ईश्वरीय विधान को मानने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई चारा भी तो नहीं है। हम अपनी मनमर्जी ईश्वर के समक्ष नहीं चला सकते। इस विषय पर हमें स्वयं ही मनन करना है।
चन्द्र प्रभा सूद