एक अकेला और दो ग्यारह
हम लोगों को जीवन में शिक्षा देने वाला यह मुहावरा हमने पढ़ा भी है और सुना भी है -
एक अकेला और दो ग्यारह
अर्थात् एक व्यक्ति अकेला होता है। जब उसके साथ कोई दूसरा जुड़ जाता तो वे दो नहीं बल्कि ग्यारह बन जाते हैं।
यह एक लोकप्रिय हिन्दी भाषा का मुहावरा है। इसका उपयोग प्रायः एकता और सहयोग के महत्व को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह बताता है कि जब बहुत सारे लोग एक साथ आते हैं और एक-दूसरे का समर्थन करते हैं तो वे अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि संगठन में शक्ति होती है या एकता में बल होता है। इसका मतलब है कि जब लोग मिलकर काम करते हैं तो वे अधिक शक्तिशाली होते हैं और किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं जो अकेले होने पर सम्भव नहीं होती।
यदि मिलजुल कर किसी कार्य को किया जाता है तो उसे करने में आनन्द आता है और शीघ्र पूर्ण होता है। पर यदि मिलने वाले अधिकांश लोग छत्तीस के आँकड़े वाले हों तो निश्चित ही वे नौका को डूबो भी सकते हैं। सयाने कह गए हैं -
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
अर्थात् जिसका मतलब है कि एक अकेला व्यक्ति किसी बड़े या मुश्किल काम को पूरा नहीं कर सकता। उसे सफलता पाने के लिए दूसरे लोगों के सहयोग की आवश्यकता होती है। यह निर्विवाद सत्य है, कोई विवाद का विषय नहीं है। इस बात को हम यथावत मान सकते हैं।
हम लोगों ने इतिहास में पढ़ा है और अपने बड़े-बजुर्गों से सुना है कि चमत्कार करने वाले महापुरुष अकेले ही चलते थे। बाद में उनके अनेक अनुयायी बन जाते हैं जो उनकी कीर्ति में चार चाँद लगा देते हैं। कुछ सिरफिरे अकेले चलते हैं। फिर भी वे सिर पर कफन बाँधकर समय की धारा के प्रवाह को मोड़ते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। दुनिया के विरोध की परवाह न करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। तभी हम इन महानुभावों का नाम सम्मान से लेते हैं।
जितने भी समाज सुधारक हुए हैं वे अकेले ही कठिन डगर पर चलते हुए लोगों को जागृत करने का कार्य करते रहे। इसके लिए उन्हें हर कदम पर समाज का विरोध सहना पड़ता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती व मीराबाई ने विषपान किया। महात्मा गांधी ने गोली खाई। ईसा मसीह सूली पर चढ़ गए। भगवान बुद्ध और महावीर को अपने समय में बहुत अधिक विरोध का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार राजाराम मोहन राय आदि समाज सुधारकों को भी अपने समय में विरोध सहना पड़ा।
ऐसे ही सिरफिरे नरसिंह दुनिया की दिशा और दशा बदलने की सामर्थ्य रखते हैं। समाज की भलाई के लिए अपने तन, मन व धन किसी की परवाह किए बिना दिन-रात एक कर देते हैं। भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव जैसे न जाने कितने ही युवाओं ने अपने देश के लिए प्राणों तक की आहुति दे देते हैं। गुरु गोबिन्द जैसे महापुरुष अपने छोटे बच्चों को देश व धर्म की रक्षा के लिए के दीवारों में जिन्दा चुनवा देते हैं।
इसी श्रेणी में हम वैज्ञानिकों को भी रख सकते हैं जिनके अथक परिश्रम का फल हम जीवन की सुविधाओं के रूप में भोग रहे हैं। यदि वे भी हमारी तरह घर बैठकर आराम करते तो हम इतने सुखों को नहीं भोग सकते थे। आज दुनिया छोटी हो गई है और वह वाकई मुट्ठी में आ गई है। जिन ग्रह-नक्षत्रों के विषय में हम केवल सुना करते थे या किस्से-कहानियों में पढ़ा करते थे उन पर मानव का आना-जाना भी इन्हीं वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के कारण ही आज सम्भव हो रहा है।
रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 'एकला चलो रे' शायद इसीलिए कहा था। मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेले ही विदा लेकर अगले पड़ाव के लिए चला जाता है। झुण्ड में तो भेड़-बकरियाँ चला करती हैं। शेर तो अकेला ही जंगल में निर्भय होकर विचरता है। इसी तरह शेर की तरह ऐसे साहसी व्यक्ति संसार के लिए आश्चर्य ही होते हैं। चाहे इन लोगों को सब गालियाँ दें या इनका जमकर विरोध करें, फिर भी इन्हीं के पीछे ही चलते हैं और उनका गुणगान करते हैं।
यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हम अकेले कुछ नहीं कर सकते। ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो मनुष्य के बूते से बाहर हो। इसके लिए बस मन में दृढ़ संकल्प लेना होता है। हर योजना को एक ही व्यक्ति आरम्भ करता है फिर उसका साथ देने के लिए बहुत से लोग जुड़ जाते हैं। अतः मन में विचारे हुए कार्य को शीघ्र आरम्भ करना चाहिए। हो सकता है इतिहास पलक पॉंवड़े बिछाएआपकी प्रतीक्षा में
बैठा हो।
चन्द्र प्रभा सूद
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