भाग्य का हमारे जीवन पर प्रभाव
भाग्य का हमारे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव होता है। इस संसार में मनुष्य जब जन्म लेता है तो अपना भाग्य साथ ही लिखवाकर आता है ऐसा हमारी भारतीय संस्कृति मानती है। वास्तव में हमारे संचित कर्मों से प्रारब्ध बनता है। उसे ही मनुष्य का भाग्य कहकर जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य का भाग्य कौन लिखता है? यह भाग्यकैसे बनता है? आदि प्रश्न हमारी जिज्ञासा को निरन्तर बढ़ाते रहते हैं। इनकी खोज में मनुष्य का जिज्ञासु मन लगा रहता है।
ऐसा कोई भी व्यक्ति विशेष ऊपर आसमान में नहीं बैठा रहता है जो हमारा भाग्य लिखने का कार्य करता है। हम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता होते हैं। सीधा स्पष्ट-सा गणित है कि हम जो भी अच्छे कार्य (सुकर्म) या बुरे कार्य (कुकर्म) करते हैं, वही हमारा भाग्य बनाते हैं। आगे चलकर दोनों कर्मों का फल जीव को भोगना पड़ता है। ऐसा नहीं हो सकता कि कर्म कोई करे और उसका फल किसी और को मिल जाए। हम मनुष्यों की तरह ईश्वरीय न्याय ऐसी घपलेबाजी नहीं करता। यानी जो मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। इससे छुटकारा नहीं मिलता।
सुकर्मों का फल हमें जीवन में सफलताओं एवं सुख-समृद्धि के रूप में मिलता है। उस समय हम मानो आकाश की ऊॅंचाइयों को छू रहे होते हैं। सुख के समय हमारे पॉंव जमीन पर नहीं पड़ते। हमें ऐसा लगता है कि हमने दुनिया जीत ली है। हम चाहते हैं कि सभी लोगों के साथ-साथ प्रकृति भी हमारा सुख बॉंटे। तब हम अपनी कहानियॉं सबको सुनाना चाहते हैं, चाहे कोई हमारी बात सुनना पसन्द करें अथवा नहीं। बस हम उत्साहित होकर अपना ही राग छेड़ते रहते हैं।
इसके विपरीत दुष्कर्मों का फल हमें असफलता तथा कष्ट-परेशानियों के रूप में मिलता है। उस समय हम उदास, निराश और उत्साहहीन होते हैं। तब जीवन को ढोना ही हमारी विवशता हो जाती है। तब हमें लगता है कि संसार के सभी लोग हमारे दुख में शामिल हो जाऍं। प्रकृति भी हमारे दुख में ऑंसू बहाए। हर कोई हमारे दुख की कहानी सुने। ऐसा हो नहीं सकता। सभी लोग अपनी-अपनी व्यस्तताओं में उलझे हुए हैं। किस के पास इतना फालतू समय है कि वह दूसरों के दुखों को सुने, व्यर्थ ही उनके पचड़ों में पड़े। उसे सांत्वना देते हुए बैठा रहे।
जो भी शुभाशुभ कर्म अपने जीवनकाल में हम करते हैं, उनमें से कुछ कर्मों का फल हम इसी जन्म में भोग लेते हैं। कुछ कर्म भोगने से शेष बच जाते हैं। यही बचे हुए कर्म जन्म-जन्मान्तर तक हमारा पीछा नहीं छोड़ते यानी साथ निभाते हैं। इस जन्म के शेष कर्म पूर्वजन्मों के बचे हुए कर्मों में जुड़ जाते हैं। उन सभी शेष बचे हुए कर्मों से हमारा भाग्य बनता है। यह भाग्य हर जन्म में जीव के साथ-साथ चलता है। जमा-घटा का यह खेल हमारे साथ खेला जाता रहता है।
भाग्य और कर्म अन्योन्याश्रित हैं। कर्म के बिना भाग्य फलदायी नहीं होता और भाग्य के बिना कर्म। इस बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि वे एक दूसरे के पूरक हैं और एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
यदि मनुष्य का भाग्य प्रबल होता है तब उसे थोड़ी-सी मेहनत करने पर आशातीत सफलता प्राप्त होता है। यदि वह श्रम नहीं करता तो अपने स्वर्णिम अवसर से चूक जाता है। उस समय उसके पश्चाताप करने का भी कोई लाभ नही होता। परन्तु इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि मनुष्य कठोर परिश्रम करता है पर उसे आशा के अनुरूप फल नहीं मिलता। इसका यह अर्थ नहीं कदापि नहीं कि मनुष्य परिश्रम करना छोड़कर हाथ पर हाथ रखकर निठल्ला बैठ जाए और भाग्य को कोसता रहे या ईश्वर को गाली देता रहे।
मनुष्य को सदा अपने भाग्य और कर्म दोनों को एक समान मानना चाहिए। बार-बार सफलता की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। भाग्य भी तभी फल देता है जब मनुष्य स्वयं श्रम करता है।अब भाग्य से हमें भोजन प्राप्त हो गया है। उसे खाने के लिए भी तो मेहनत करनी पड़ेगी। रोटी का निवाला खुद मुँह में नहीं जाएगा। हाथ हिलाना पड़ेगा, रोटी का ग्रास तोड़ेंगे तभी तो निवाला मुँह में जाएगा और हमारा पेट भरेगा।
हमेशा चींटी के श्रम को याद रखिए जो पुनः पुनः गिरकर, अथक प्रयास करके अपने लक्ष्य को पाने में अन्तत: सफल हो जाती है। इसी तरह हम अपनी बार-बार ईमानदार कोशिश से असफलता को पुनः सफलता में बदल सकते हैं।
हर प्रकार की सुख-समृद्धि हमें अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलती है। फिर भी हमारे लिए यही उचित है कि हम अपने कठोर परिश्रम की बदौलत ही अपनी सफलताओं को पाने से न चूकें।जब-जब अपने बाहुबल पर विश्वास करके कठोर परिश्रम करेंगे तब-तब हमारा भाग्य हमें अवश्यमेव फल देगा। भाग्य के भरोसे बैठकर कर्म करना नहीं त्यागना है। उन्नति करने का अवसर हर किसी को जीवन में अवश्य मिलता है। शर्त बस यही है कि उस अवसर की प्रतीक्षा करते हुए हमें अपने हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना है बल्कि भविष्य को सुखद बनाने का सार्थक प्रयास करना है।
चन्द्र प्रभा सूद
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