कौआ चला हंस की चाल
हम सबने निम्न उक्ति हम पढ़ी है और शायद इसे समझने का यत्न भी किया होगा -
कौवा चला हंस की चाल, अपनी ही चाल भूला
अर्थात् कौवा अपनी एक खास चाल में चलता है। जब वह हंस की तरह चलने की कोशिश करने लगता है तो वह अपनी खुद की चाल भी भूल जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हंस की नकल करने के चक्कर में कौवा अपनी पहचान ही खोने लगता है।
अपने सहज गुणों को छोड़कर, किसी और की नकल करने की कोशिश करने से मनुष्य स्वयं को नुकसान पहुॅंचा देता है। यानी कोई व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान या क्षमताओं को भूलकर, किसी और की तरह बनने की कोशिश करता है। तब वह न तो पहले जैसा रह पाता है और न ही वह नया रूप पा पाता है।
उसी प्रकार हम मनुष्य भी उस हंस रूपी परमपिता परमात्मा में एकाकार होने के सपने को संजोये न ईश्वरमय हो पाए हैं और न ही एक अच्छा इन्सान बन सके हैं। स्वयं को ईश्वर बताने वाले उन तथाकथित धर्मगुरुओं के सम्बन्ध में तो चर्चा करना ही व्यर्थ है। उनमें से कुछ का हश्र तो हम सबने ही देखा है। उनके अतिरिक्त जिनके विषय में हमें जानकारी नहीं है वे भी कमोबेश वैसे ही हो सकते हैं। प्रायः सभी धर्म के नाम पर ढोंग ही करते हैं। उनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। इसीलिए उनके कथन का समाज पर प्रभाव नहीं पड़ता। जो लोग उनके साथ सम्बन्ध बनाते हैं, वे उनके ज्ञान व गुणों से प्रभावित होकर नहीं अपितु केवल स्वार्थ के कारण ही उन लोगों से जुड़ते हैं।
स्वयं को महारथी कहने वाले उन अखाड़ों की चर्चा तो कुम्भ स्नान के समय ही उजागर हो जाती है। उनमें अपने अखाड़े को सर्वश्रेष्ठ कहलवाने के प्रयास में अच्छा खासा वाद-विवाद होता है और लट्ठ तक चलते हैं।
ऐसे स्वयंभू कहलवाने वालों से हम सांसारिक लोग अधिक श्रेष्ठ हैं। हम कम-से-कम ईश्वर का प्रतिनिधि होने का दावा तो नहीं करते। न दूसरों को अपरिग्रह का उपदेश देते हुए दान के नाम धन का संग्रह करके अपने लिए गाड़ियों, धन-दौलत अथवा जमीन-जयदाद के अम्बार लगाते हैं। न ही अपना विरोध करने वालों को यातनाएँ देते हैं या उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। ये सब मैं नहीं कह रही बल्कि समाचार-पत्रों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की सुर्खियों में बहुत बार हम देख व पढ़ चुके हैं।
इसीलिए हमारे सद् ग्रन्थ वेद हमें चेतावनी देते हुए समझाते हैं- 'मनुर्भव' अर्थात् मनुष्य बनो। अब आप कहेंगे अच्छे भले इन्सान हम हैं फिर इन्सान बनने की बात कहाँ से आ गई?
मानव बनने के गुण हैं- यम-नियम का पालन करना, असामाजिक कार्य न करना, देश व धर्म पर बलिदान होना, अपने घर-परिवार के सभी दायित्वों का निर्वहण करना, प्रणिमात्र से प्यार करना, नफरत का व्यापार न करना, मन-वचन से एक होना आदि।
यह सत्य है कि मनुष्य का जन्म लेकर हम इस धरा पर अवतरित हो गए हैं। हम मानवोचित गुणों को आत्मसात नहीं कर पा रहे। आज भी प्रायः चर्चाओं में, साहित्य रचनाओं में पहले इन्सान बनने की बात होती है। जब मानवोचित गुण मनुष्य में आ जाएँगे तब उसे स्वयं को भगवान मनवाने की होड़ नहीं रहेगी। न ही उसकी धोबी के कुत्ते जैसी स्थिति रहेगी जो घर और घाट दोनों ही स्थानों पर अवांछित हो जाता है।
उस हंस रूपी परमेश्वर की तरह नीर-क्षीर विवेकी हम अब तक नहीं बन पाए। उसके गुणों को भी अपना नहीं सके। उसके समकक्ष तो क्या उसका पासंग भी नहीं आ पाए। न ही मनुष्य बन पाए। यहाँ मुझे साहिर लुधियानवी जी का लिखा, रौशन जी का संगीतबद्ध किया और मन्ना डे जी द्वारा गाए गए एक सुप्रसिद्ध भजन की याद आ रही है-
लागा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे
चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
हो गई मैली मोरी चुनरिया
कोरे बदन सी कोरी चुनरिया
जाके बाबुल से नज़रें मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
भूल गई सब बचन बिदा के
खो गई मैं ससुराल में आके
जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
कोरी चुनरिया आत्मा मोरी
मैल है माया जाल
वो दुनिया मोरे बाबुल का घर
ये दुनिया ससुराल
जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग...
मुझे ऐसा लगता है कि अन्तकाल में हम सब लोगों की यही स्थिति होने वाली है। शेष ईश्वर शुभ करे।
चन्द्र प्रभा सूद
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