स्वर्णिम अवसर
उन्नति करने के लिए हर मनुष्य को उसके जीवन काल में एक स्वर्णिम अवसर ईश्वर की ओर से अवश्य मिलता है। समझदार मनुष्य उस अवसर को पहचान लेता है और उसका सदुपयोग कर लेता है। उस समय वह अपने जीवन में ऊँचाइयों को छू लेता है। मनुष्य वह सब प्राप्त कर लेता है जो उसे समाज में एक विशेष स्थान प्रदान करता है। परन्तु यदि वह किसी भी कारण से आया हुआ मौका अपने हाथ से गँवा देता है तो कोई गारण्टी नहीं कि वह पल फिर से उसके जीवन काल में कभी दुबारा आएगा भी अथवा नहीं।
पण्डित विष्णु शर्मा ने 'पञ्चतन्त्रम्' नामक पुस्तक में यह श्लोक लिखा है जो इसी सार को समझाता हुआ हमें कह रहा है -
कालोहि सकृदभ्येति यन्नरं कालाङ्क्षिणम्।
दुर्लभ: स पुनस्तेन कालकर्माचिकीर्षता॥
अर्थात् सुअवसर के इच्छुक पुरुष को, वह उसके जीवन में एक ही बार प्राप्त होता है। उस समय जो पुरुष कार्य नहीं करता, पुन: वह उसे वह अवसर प्राप्त नहीं होता।
ईश्वर हमें बारबार ऐसे अवसर नहीं देता। हमें स्वय ही अपने विवेक से उसका उपयोग करना होता है। यदि हम अपने अहं में चूर होकर अथवा आलस्यवश उस समय कोई योजना क्रियान्वित करके सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे तब हमारा भाग्य भी फलदायी नहीं होगा। इसका कारण यही है कि भाग्य से मिले सुअवसर के समय पुरुषार्थ नही किया, उसे गॅंवा दिया।
'हरिवंश पुराण' भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुए कह रहा है-
न मुह्यति प्राप्तकृतां कृती हि।
अर्थात् कुशल मनुष्य उचित अवसर पर कार्य करने से नहीं चूकते।
हमारे मनीषी हमें समय-समय पर जगाते रहते हैं परन्तु हम हैं जो कान में तेल डालकर बैठे रहते हैं। उनके समझाने को हम अपने अहं में आकर अनदेखा कर देते हैं। अपने आराम में खलल हमें जरा भी पसन्द नहीं आता। 'हमारा मन होगा तो हम जाग जाएँगे नहीं तो सोते रहेंगे किसी के पेट में दर्द क्यों होता है' - हमारा यही रवैया हमें अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के लिए मजबूर करता है। अवसर चूक जाने पर यदि पश्चाताप करते हैं तो कोई लाभ नहीं होता।
आजीवन हम उस एक पल के लिए तरसते रहते हैं जिसे पाकर हम सफल व्यक्ति बनकर वाहवाही लूट सकते थे। सबकी आँखों का तारा बन सकते थे। काश ऐसा हो सकता अथवा हम उस पल को ही वहीं रोककर रख पाते। हम तो बस सदा उस पल को कोसते रहते हैं जिसका हम किसी भी कारणवश सदुपयोग नहीं कर सके। उस समय हमारे किन्तु, परन्तु अथवा काश आदि कुछ भी काम नहीं आते।
अवसर को चूकने वाले मनुष्य से बढ़कर मूर्ख और कोई नहीं होता। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य अपनी मूर्खता को ढकने के लिए सौ-सौ बहाने गढ़ता रहता है। और कुछ नहीं तो यह रटा-रटाया वाक्य तो बोल ही सकता है -
यदि दुर्भाग्य ही प्रबल हो तो मनुष्य क्या
कर सकता है?
ऐसे ही व्यक्ति होते हैं जो अपने पूरे जीवन में नाकामयाबी का बोझ ढोते रहते हैं। अपने घर-परिवार और समाज में एक असफल व्यक्ति का टेग लगाकर घूमते हैं। उन्हें अपनी पत्नी, बच्चों और अन्य परिवारी जनों से कदम-कदम पर अपमानित होना पड़ता है। उनके जीवन के ये सबसे अधिक दुखदायी पल होते हैं। उनके अपने भी उन्हें कौंचने के बहाने ढूँढते रहते हैं।
यदि उनसे यह पूछा लिया जाए कि 'क्या तुमने कुछ यत्न किया था, मौके का लाभ उठाने का, जिसे तुमने गँवा दिया है?' उनके पास इस प्रश्न का कोई सही उत्तर होता ही नहीं है। वे बस इधर-उधर की बातें करके टाल-मटोल करते रहते हैं। इसीलिए वे अपने जीवन से सदा मायूस रहते हैं। अपनी नाकामयाबी का ठीकरा ईश्वर पर फोड़ते हुए उसे लानत-मलानत करते हैं। उससे शिकवा-शिकायत करते नहीं अघाते।
मनुष्य को जीवन में हर समय सावधान रहना चाहिए। मिलने वाले सुअवसर का लाभ उठाने का मौका उसे मिल सके। उसे व्यर्थ गँवाकर मनुष्य को पश्चाताप न करना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें