रविवार, 22 फ़रवरी 2026

पराई स्त्री माता समान

पराई स्त्री माता समान

भारतीय संस्कृति में माता के महत्त्व को स्थान-स्थान पर बताया गया है। अपनी मॉं का सदैव सम्मान करने के लिए अनुशासित किया गया है। पराई स्त्री के साथ मनुष्य को कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसके विषय में भी आदिष्ट किया गया है। हितोपदेश के रचयिता प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान नारायण पण्डित ने कहा है जो कहा है, वह हमारी संस्कृति का परिचायक है -
                  मातृवत् परदारेषु 
अर्थात् पराई स्त्री को माता समझो। कहने का तात्पर्य यह है कि पराई स्त्री पर कभी भी गलत नजर नहीं डालनी चाहिए और उसका अपनी माँ की तरह सम्मान करना चाहिए।
              यह नीति वचन पुरुषों के लिए मर्यादा निर्धारित करता है। मर्यादा और अमर्यादा के बीच मात्र एक झीनी-सी दीवार होती है। एक ओर  मर्यादित आचरण उसे देवतुल्य बना देता है। उसे समाज युगों-युगों तक याद रखता है। उसे ताज की तरह अपने सिर पर बिठाता है और उसके उदाहरण देता है।
              इसके विपरीत दूसरी ओर का अमर्यादित आचरण उसे दानव बना देता है। ऐसे मनुष्य को समाज के लोग हिकारत की नजर से देखते हैं। वह समाज व न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सारी आयु सजा भोगता है। उसके साथ ही उसके अपने निर्दोष होते हुए भी उसकी गलतियों की बलि चढ़ जाते हैं। कोई भी उससे सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। ऐसे लोगों को कहीं, किसी पार्टी आदि में भी बुलाना अपनी नैतिकता के विरुद्ध समझते है। एक व्यक्ति के ऐसे अमर्यादित आचरण के कारण उन सबका सामजिक बायकाट हो जाता है।
              स्त्री से सतीत्व की अपेक्षा रखने वाले पुरुष से भी यही आशा की जाती है कि वह अपने आचार-व्यवहार पर अंकुश रखे। यदि वह अपनी पत्नी में भगवती सीता का प्रतिरूप देखना चाहता है तो उसे स्वयं भी राम जैसा एकपत्नी व्रत धारण करना होगा। इसी तथ्य को निम्न श्लोकांश में इस प्रकार कहा है -
            सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च 
             धर्मस्तथार्थश्च रति:स्वदारै:।
अर्थात् गृहस्थ पुरुष सत्य और सरलता का पालन करे। अतिथिपूजा, धर्म, अर्थ के कार्य करे और अपनी स्त्री में अनुराग रखे।
             सत्य और सरलता का व्यवहार करना मात्र स्त्री का धर्म नहीं पुरुष का भी धर्म होता है। इसी प्रकार अतिथि सत्कार करना भी दोनों ही का दायित्व है। सभी धार्मिक कार्यों में पति-पत्नी दोनों की उपस्थिति अनिवार्य यानी जाती है। अश्वमेध यज्ञ के समय सीता जी की अनुपस्थिति की अवस्था में में भगवान राम ने उनकी स्वर्ण प्रतिमा रखी थी। एवंविध घर-गृहस्थी के आर्थिक मामलों में भी दोनों की स्वीकृति होने से बड़ा और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं होता।
            हमारे महान मनीषियों ने सदा ही यह उपदेश दिया है कि पुरुष केवल अपनी पत्नी का ही होकर रहे। इस प्रकार समाज में व्यभिचार नहीं फैलता। ऐसे व्यवहार से बलात्कार जैसे अपराधों से समाज को मुक्ति मिल सकती है। दूसरी ओर व्यक्ति बहुत-सी सम्भावित बिमारियों से ग्रसित होने से बच जाता है।
              अपनी पत्नी के लिए एक पुरुष बहुत संवेदनशील होता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी उसके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष की ओर नजर उठाकर देखे अथवा वह किसी अन्य से कोई सम्बन्ध रखे। फिर अपने लिए भी उसे ऐसा ही सोचना चाहिए कि यदि वह किसी अन्य महिला को नजर उठाकर देखेगा या उससे अनैतिक सम्बन्ध बनाएगा तो उसकी पत्नी को भी यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। तब उस पत्नी के मन में उसके लिए नफरत और क्रोध का होना स्वाभाविक प्रक्रिया होती है।
             पत्नी के अप्रत्याशित बदले हुए व्यवहार पर शिकायत करना अथवा उसे भला-बुरा कहने का ऐसे दुराचारी व्यक्ति को कोई हक नहीं होता। उसे सबसे पहले अपने गिरेबान में पहले झाँककर देखना चाहिए। उसके बाद ही उसे बोलने या कुछ कहने का अधिकार होता है।
          स्त्री के लिए यदि शास्त्र मर्यादाओं की रेखा खींचते हैं तो पुरुष के लिए भी उन्होंने संयमित और मर्यादित जीवन जीने का विधान बनाया है। अपनी सीमाओं को लाँघने का हक शास्त्र किसी व्यक्ति को नहीं देते, फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री। उन नियमों का पालन करते हुए पुरुष को अपने जीवन में आगे कदम बढ़ाना चाहिए। अपने एकनिष्ठ जीवन जीने की मर्यादा का निर्वहण पुरुष को सच्चाई और ईमानदारी से करना चाहिए। मनुष्य की मन की भावना सर्वोपरि होती है। उसकी श्रद्धा और उसका विश्वास उसे कहीं-का-कहीं पहुँचा सकते हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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