शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

चुगलखोरी एक विशेष कला

चुगलखोरी एक विशेष कला

चुगलखोरी एक कला विशेष है। इस कला में हर कोई निपुण नहीं हो सकता। वैसे व्यक्ति इस कला में निपुणता हासिल न ही करे तो अच्छा है। इस शब्द का प्रयोग लोग गाली के रूप में करते हैं। चमचा, चुगलखोर, बॉस का कुत्ता आदि कहकर लोग उनके सामने अथवा पीछे उनका उपहास उड़ाते हैं। इन चिकने घड़ों को इस विशेषण से कोई अन्तर नहीं पड़ता। वे उल्टा खुश होते हैं। इस चुगलखोरी की नामुराद आदत को हम नकारात्मक सोच का नाम दे सकते हैं। प्राय: लोग इस आदत को पसन्द नहीं करते। 
             अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए ये चुगलखोर दूसरों की यानी अपने साथियों की पीठ में छुरा भौंकने जैसा निकृष्ट कार्य करते हैं। ऐसा दुष्कृत्य करने वालों से लोग दूरी बनाकर रखते हैं। उन्हें देखते ही प्रायः लोग अपनी बात का रुख मोड़ देते हैं। लोग उनके सामने ऐसी कोई भी बात करने से कतराते हैं जिसको तोड़-मरोड़कर वे अपने लाभ के लिए उपयोग कर सकें। जबान का यह कुटेव एक इन्सान को सबकी नजरों से गिरा देता है। 
              लोग यही सोचते हैं कि जब दूसरों की चुगली करके अमुक व्यक्ति हमारे सामने वाहवाही लूटना चाहता है तो फिर अन्यों के समक्ष अवश्य ही हमारी बुराई भी करता होगा। ऐसे लोग हमारे आसपास सर्वत्र ही उपलब्ध रहते हैं। कार्यालयों में कम्पनी के स्वामी अथवा बॉस ऐसे चुगलखोरों को पालते हैं जो आफिस में बैठे हुए उन्हें अपने साथियों के विषय में बताते रहें। 
             ग्यारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कश्मीरी कवि और विद्वान क्षेमेन्द्र हैं। 'नर्ममाला' उनके द्वारा रचित एक प्रमुख व्यंग्यात्मक काव्य है। इस ग्रन्थ में उन्होंने तत्कालीन समाज, भ्रष्ट अधिकारियों और  कर्मचारियों की बुराइयों पर तीखा प्रहार किया है। यह कृति सामाजिक व्यंग्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। चुगलखोर नामक प्राणि के विषय में 'नर्ममाला' में कहा गया है -
       पिशुनेभ्य:नमस्तेभ्य: यत्प्रसादान्नियोगिन:।
       दूरस्था अपि जायन्ते सहस्त्रश्रोत्रचक्षुष:॥
अर्थात् उन चुगलखोरों को नमस्कार है जिनकी कृपा से स्वामी दूर रहते हुए भी हजार आँख और कान वाले हो जाते हैं।
              इसका तात्पर्य यही है कि किसी भी कार्यालय में कार्य करने वाले स्वामी यदि दूर भी बैठे हों तब भी उनको ऑफिस की खबरें देने वाले उनके चमचे वहाँ विद्यमान रहते हैं। वे उन्हें आँखों देखी सारी खबरें देते रहते हैं। वे नमक-मिर्च लगाकर सारी झूठी-सच्ची खबरें बताने का अपना कार्य बड़ी कुशलता से निभाते हैं। इन चुगलखोरों को बॉस भी कोई महत्त्व नहीं देते। सिर्फ स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ही बॉस इनको मुँहलगा बनाते हैं। अपना काम पूरा हो जाने पर वे इन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फैंकने से भी परहेज नहीं करते।
          इस चुगलखोरी के दूरगामी परिणाम भयंकर होते हैं। ये लोग अपनी दुश्मनी निकालने के लिए बॉस के कान भरते हुए अनजाने में अपने साथियों का अहित कर बैठते हैं। पण्डित विष्णु शर्मा रचित 'पञ्चतन्त्रम्' नामक पुस्तक इसी भाव को स्पष्ट करती है -
        अहो खलभुजङ्गस्य विपरीतो वचक्रम:।
        कर्णे लगति चैकस्य प्राणैरन्यो वियुज्यते॥
अर्थात् यह आश्चर्य की बात है कि इस चुगलखोर रूपी सर्प के मारने का उपाय ही विपरीत प्रकार का है। वह एक के कान में डसता है पर प्राणों से कोई दूसरा ही वियुक्त होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि कवि चुगलखोर को साँप की संज्ञा दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि इनके मारने का तरीका बहुत विचित्र है। यह किसी एक व्यक्ति के कान में अपनी चुगली का विष उगलता है परन्तु उससे किसी दूसरे व्यक्ति का विनाश होता है।
            चुगलखोरी रूपी निन्दा पुराण दूसरे का अहित तो करता ही है, स्वयं अपने लिए भी गड्ढा खोदता है। दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ में मनुष्य हर जगह अपनी हानि कर बैठता है। ऐसे व्यक्ति हमेशा ही अविश्वसनीय होते हैं। अत: उन पर कोई विश्वास नहीं करता। ऐसा कुकृत्य करता हुआ मनुष्य अपने अन्तस् के विचारों को दूषित करता है। इस चुगली रूपी मल से अपने अन्त:करण की शुद्धि करना बहुत कठिन हो जाता है। जीवन के अन्त अर्थात् मृत्यु के बाद भी ऐसे लोगों का नाम सभी हिकारत से लेते हैं।
            प्रयास यही करना चाहिए कि इस बुराई के घर से यथासम्भव दूर ही रहा जाए। अपने क्षणिक तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति करते हुए मनुष्य को अपना इहलोक और परलोक बिगड़ने नहीं देना चाहिए। अपने व्यवहार के प्रति प्रत्येक व्यक्ति को बहुत सावधान रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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