सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

ईश्वर की उपासना

ईश्वर की उपासना

सृष्टि के रचयिता परमपिता परमात्मा का हम पर बहुत उपकार है। उसने ही हमें इस धरा पर अवतरित किया। एक वही है जो हमें दुनिया की सभी सुख-सुविधाऍं प्रसन्नता से देता है। कभी वह हम पर अहसान नहीं दिखाता। हम यदि चौबीसों घण्टे उसकी महिमा का गुणगान कर सकें तो वह भी उसकी दी गई नेमतों से कम ही रहेगा।
           'द्वात्रिंशत् पुतलिकासिंहासनम्' नामक एक संस्कृत भाषा का ग्रन्थ है। इसका हिन्दी में 'सिंहासन बतीसी' नाम से अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में निम्न श्लोक कवि ने वर्षों पूर्व लिखा था, वह आज भी उतना ही सटीक है -
        देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
       यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥
अर्थात् देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर और गुरु में मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
            हम ईश्वर की उपासना किस रुप में करते हैं अथवा जिस किसी भी नाम से उसे याद करते हैं, यह मायने नहीं रखता। असली मुद्दा यह है कि हमारे मन में अपने इष्ट को प्राप्त करने के लिए कितनी तड़प है। हम उसकी उपासना सच्चे मन से करते हैं अथवा केवल दिखावा करते हैं। ईश्वर के भजन का तभी फल मिलता है जब हम पूर्णरूपेण उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए या उनसे सबसे बड़ा भक्त होने का सर्टिफिकेट पाने के लिए किया गया प्रयास, उस परमेश्वर की नजर में शून्य होता है। 
           तीर्थ स्थान पर यदि हम मौज-मस्ती के लिए जाते हैं तो तीर्थ भ्रमण का हमें लाभ नहीं मिलता। न तो हमारे विचारों में कोई परिवर्तन आता है और न ही हम प्रभु के सच्चे और बड़े भक्त बन सकते हैं। तीर्थ करने की हमारे जीवन में तभी उपयोगिता होती है यदि वहाँ जाकर घर-गृहस्थी के झंझटों से मन को विरक्त करके मालिक का स्मरण करते हैं। विद्वानों की सत्संगति करते हुए ज्ञानार्जन करते हैं। साधना करते हुए अपने अन्त:करण को शुद्ध-पवित्र बनाते हैं, तभी तीर्थ करने का हमारा उद्देश्य पूर्ण होता है। अन्यथा तो पिकनिक मनाकर लौट आने वाली बात होती है।
          ब्राह्मण में यदि हमारा विश्वास होता है तभी उससे मार्गदर्शन लिया जाता है। हमें अपने संस्कारों को करवाने के लिए भी सदा योग्य ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यदि उसमें आस्था नहीं होगी तो हमारे धार्मिक कृत्यों को करने का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकेगा।
           मन्त्रों में अपार शक्ति होती है। ये आत्मोन्नति करने में हमारी सहायता करते हैं। ये मन्त्र हमें अपने इष्ट तक पहुँचाने का सफल माध्यम बनते हैं। हम मन्त्र जाप करके ही तो अपने प्रभु का सानिध्य प्राप्त करते हैं। यदि मन्त्र पर हमें विश्वास नहीं होगी तो हमें कोई सिद्धि भी नहीं मिलेगी। यदि हम मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करते हैं तो भी उसका फल नहीं मिलता। कभी-कभी उससे अनिष्ट भी हो जाता है।तब ये अमूल्य मन्त्र हमें अपने इष्ट से मिलाने में सफल नहीं हो पाएँगे।
           तान्त्रिक इन मन्त्रों को सिद्ध करके चमत्कार करते हैं। मैं उनकी इस पद्धति पर कोई आलोचना नहीं करना चाहती। यह व्यक्ति विशेष की मान्यता होती है। पर मैं इतना अवश्य कहना चाहती हूँ कि इन मन्त्रों से प्राप्त सिद्धियों का समाज के हित में उपयोग करना चाहिए। मारण-उच्चाटन आदि में इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।
             ज्योतिष एक वेदांग है। ज्योतिषीय गणना की विधा अपने आप में सम्पूर्ण है। उस पर मन से विश्वास करना आवश्यक है। हाँ, फलित ज्योतिष में जहाँ लालच व स्वार्थ हावी हो जाते हैं, वहाँ पर गलती की गुँजाइश बनी रहती है। फिर भी मनुष्य किसी ज्योतिषी के पास विश्वास होने पर ही जाता है। वह अपनी विकट समस्या का उपाय जानना चाहता है।
            डॉक्टर पर यदि विश्वास नहीं होगातो वह कितना ही योग्य क्यों न हो रोगी स्वस्थ नहीं हो पाता। इसलिए उस पर अपने मन से विश्वास करना चाहिए।
            गुरु पर विश्वास न हो तब उसकी शरण में जाना व्यर्थ होता है। प्राचीन काल में योग्य गुरु के पास लोग अपने बच्चों को विद्याध्ययन के लिए के लिए भेजते थे। उन्हें यही विश्वास होता था कि उनके बच्चे योग्य बनकर जीवन में यश कमाएँगे। गुरु का कार्य शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति करना होता है। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव मनुष्य को इहलोक और परलोक के बन्धनों से मुक्त करवाता है।
              सार रूप में हम कह सकते हैं कि मन की सच्ची भावना होने से सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर औ र गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखकर हम उनसे लाभ ले सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

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