बुधवार, 3 जून 2026

बच्चों का भोलापन

बच्चों का भोलेपन

बच्चे अपने भोलेपन में ऐसे कार्य कर जाते हैं जिनसे उनके अपने कोमल मन को ही ठेस लग जाती है। बच्चों के मन में छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष नहीं होता। वे ईमानदार, सच्चे, सरल हृदय और भावुक होते हैं। इसीलिए बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है। इन मासूम बच्चों के मन में हम बड़े लोग जहर घोलकर इन्हें समय से पहले बड़ा बनाने का अपराध अनायास ही करते हैं। छोटे बच्चे बिना सोचे-समझे किसी की भी बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेते हैं यानी दूसरों की कही गई बात को सच मान लेते हैं।
          अपनी बात मनवाने के लिए वे हठ अवश्य करते हैं। यदि उनकी इच्छा को न पूरा किया जाए तो वे आहत हो जाते हैं। कुछ समय तक वे रूठे भी रहते हैं और थोड़े समय के बाद फिर पहले की तरह मस्त हो जाते हैं। तब उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि कुछ पल पहले वे नाराज थे। यही बच्चों की चरित्रगत विशेषता है। इसी कारण वे सबका मन मोह लेने में सफल रहते हैं, उन्हें अपना बना लेते हैं। शीघ्र ही हरेक के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं मानो उनका साथ बरसों पुराना है।
            घर में माता को काम करते देखते हैं तो अपनी माँ का हाथ बटाने के लिए कभी वे झाड़ू लगाने लगते हैं तो कभी डस्टर लेकर डस्टिंग करने लगते हैं। कभी रसोई में जाकर रोटी बनाने की जिद करते हैं। पिता को गाड़ी साफ करते देखकर उनकी सहायता के लिए भागे आते हैं। दादा-दादी के आवाज लगाने पर भागकर उनका काम खुशी-खुशी करते हैं।
             घर में यदि कोई बीमार हो जाए तब उनका काम बढ़ जाता है। वे उसकी तिमारदारी में जुट जाते हैं। बार-बार उन्हें छूकर देखते हैं। उन्हें पानी देते हैं, दवा पकड़ाते हैं और उनके पास सारा समय बैठकर व गप्पे लगाते हैं। जिससे बिमारी की अवस्था में उनका मन बहल सके। ये काम बच्चे 
बखूबी करते हैं। जिससे बिमारी की उस अवस्था में भी उन्हें सुकून मिलता है।
            पापा-मम्मी सवेरे ऑफिस जाते हैं और शाम को लौटकर घर वापिस आते हैं। बच्चे समय बीतते उनके आने की प्रतीक्षा करते हैं। उनकी घर आते ही भागकर उनकी चप्पल लेकर आ जाते हैं। उनके लिए फ्रिज में से पानी निकालकर लाने का प्रयास करते हैं। उनके पास बैठकर अपनी दिनभर की कहानियॉं सुनाते हैं। अपने प्रति उनकी चिन्ता देखकर माता-पिता उन पर बलिहारी जाते हैं। बच्चे से बात करके वे अपनी थकान भूल जाते हैं।
            इस तरह घर में हर किसी सदस्य के लिए फिक्रमन्द रहने वाले बच्चे अपनी नासमझी के कारण प्रायः कुछ-न-कुछ गड़बड़ कर देते हैं। दिन में दसियों बार काम फैला देते हैं। इसके लिए उन्हें डाँट भी लगा दी जाती है। फिर भी वे अपने परोपकारी स्वभाव को नहीं छोड़ते और अपनी ही धुन में खोए रहते हैं। थोड़ी देर के बाद फिर आ जाते हैं कोई दूसरा काम करने के लिए। जरा-सी शाबाशी मिलने पर इतराने लगते हैं।
           अपने अल्पज्ञान के कारण यदा कदा वे अकरणीय कार्य कर जाते हैं। घर के पालतू जीवों को खेल-खेल में तंग करने लगते हैं। कभी-कभी अनजाने में उन जीवों को चोट लग जाती है तब अपनी गलती समझकर वे उदास हो जाते हैं। फिर जब घर के बड़े लोग उन्हें समझाते हैं तब वे दुबारा अपनी गलती न दोहराने के लिए प्रामिस करके प्रसन्नतापूर्वक खेलने लग जाते हैं।
           कभी घर में कोई चिड़िया अण्डे देती है तो उन्हें ज्ञिज्ञासा रहती है कि उसमें से बच्चे कब निकलेंगे? वे कैसे दिखाई देंगे? उन्हें खाना कौन खिलाएगा? आदि प्रश्न उन्हें उद्वेलित करते रहते हैं। इसलिए कभी वे उन अण्डों को सबकी नजर बचाकर छू लेते हैं तो अगले दिन वे उन्हें टूटे हुए मिलते हैं। तब वे व्यथित होकर माता-पिता से इसका कारण जानने का प्रयास करते हैं। जब उन्हें यह पता चलता है कि उनके छूने से चिड़िया ने अण्डों को तोड़ डाला है तो आहत हुआ बालमन फिर भविष्य में उस गलती को न दोहराने की कसम खाता है।
            अपने मंहगे अथवा सस्ते सभी प्रकार के खिलौनों को तोड़कर प्रायः बच्चे उसका मेकेनिज्म समझने का यत्न करते हैं कि वे किस प्रकार बने हैं अथवा उसमें किन-किन वस्तुओं का प्रयोग किया गया है। अपनी इस आदत के कारण उन्हें अक्सर अपने बड़ों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। फिर भविष्य में खिलौनों को न तोड़ने की कसम खाकर वे दुबारा उसी काम में मशगूल हो जाते हैं। यही उनका बचपन है।
             बच्चों को उनके बचपन में ही जीने देने का यत्न करना चाहिए। आयु से पहले उन्हें बड़ा बनकर उनका बचपन नहीं छीनना चाहिए। हो सके तो कुछ पल के लिए उनके साथ बच्चा बनकर अपने बचपन के हसीन पलों को याद कर लेना चाहिए। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो अपने में मस्त हो जाते हैं। फिर इन पलों का आनन्द नहीं आ सकता। 
चन्द्र प्रभा सूद 

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